कहां जन्में पवन-पुत्र हनुमान

संदर्भः भगवान हनुमान जयंती 27 अप्रैल पर विशेष-
प्रमोद भार्गव
राम-कथा के सार्थक वाचक संत मोरारी बापू का यह कथन तार्किक है कि ‘यह कहना मुश्किल है कि हनुमान जी का जन्म स्थान कहां है। हनुमान वायु-पुत्र हैं। अर्थात वायु, हवा या पवन का जन्म स्थान कहां है, यह कहना कठिन है।’ ‘वैसे भी सनातन हिंदुओं के मनोभाव में अपने ईश्वर और उनके नाना रूपों के जन्म स्थान, तिथि, समय, जाति और उनके माता-पिता या भाई-बंधुओं के बारे में जानने में जिज्ञासा नहीं है। कालक्रम तो पश्चिमी विश्व की देन है। हमारी तो सनातन धारणा है कि काल शून्य है और विश्वास शाश्वत। यही धारणा रही है कि हमने अपने देवों के अस्तित्व के संदर्भ में ऐतिहासिक या पौराणिक सत्यता को भी तथ्यों के आधार पर नहीं परखा। इसलिए वे कल्पनिक हैं या वास्तविक इस गूढ़ रहस्य पर आम जनमानस विचार ही नहीं करता। दरअसल ऐसा करते तो उनकी अलौकिक दिव्यता, सर्वव्यापकता और अनंत शक्ति प्रभावित होते और उनके प्रति जो भक्ति का भाव है, वह भी विचलित होता। वैसे भी लोक में व्याप्त देवी-देवताओं की वर्ण, जाति या उनकी क्षेत्रीयता में तलाश किसी भी महान व्यक्तित्व की महिमा को संकीर्ण करना है न कि व्यापक ! तत्पश्चात भी ऐसा नहीं है कि ईश्वरत्व को प्राप्त हमारे जो देवी-देवता हैं, उनका कोई वंश, इतिहास या भूगोल है ही नहीं ?
दक्षिण भारत के दो प्रांत कर्नाटक और आंध्र-प्रदेश के बीच यह विवाद था कि आखिर हनुमान कहां जन्मे ? अब तिरुमाला में भगवान वेंकटेश्वर के व्यव्यस्थापक ‘तिरुमाला तिरुपति देवस्थान’ (टीटीडी) ने ‘अंजनाद्रि पर्वत’ के शिखर पर स्थित एक गुफा को हनुमान का जन्म स्थल घोषित कर दिया है। यह स्थान आंध्र-प्रदेश के श्री अंजनेया स्वामी के नाम से विख्यात है। तिरुमाला पर्वत श्रृंखला से पांच किमी दूर उत्तर में सातवें पर्वत के शिखर पर ‘जपाली तीर्थम’ अंजनाद्रि पर्वत स्थित है। इस श्रृंखला में नयनाद्रि, श्ोषाद्रि और गरुणाद्रि शिखर भी शामिल हैं। वायु-पुत्र कहे जाने वाले हनुमान देवी अंजनी के पुत्र हैं। उन्होंने इन्हीं पर्वतमालाओं पर विचरते हुए तप करके ज्ञान प्राप्त किया। अंजनाद्रि शिखर को खोजने के लिए ‘राष्ट्रीय संस्कृत विश्व-विद्यालय’ के कुलपति मुरलीधर शर्मा के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया गया था। इस समिति ने प्राचीन साहित्य, पुरा व शिला लेखों, खगोलीय गणनाओं और बाल्मीकि रामायण, महाभारत व पुराणों में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर या सुनिश्चित किया कि ‘अंजनाद्रि’ स्थल हनुमान का जन्म स्थान है।
इस विवाद के सुलझ जाने के बावजूद लोक में जनश्रुतियों के आधार पर हनुमान के जन्म स्थान को लेकर जो विश्वास व धारणाएं हैं, वे अपनी जगह कायम हैं। सदियों से यह मान्यता स्थापित है कि कर्नाटक के बेल्लारी में हंपी के पास किष्किंधा क्षेत्र में वानरों का राज्य था और यहीं हनुमान जन्मे थे। झारखंड के गुमला जिले के ग्राम अंजन गांव में एक गुफा से हनुमान के जन्म की किंवदंती जुड़ी है। यह भी आस्था का बड़ा केंद्र है। महाराष्ट्र के नासिक जिले में स्थित अंजनेरी पहाड़ियों की गुफा से भी हमुमान के जन्म की गाथा जुड़ी है। राजस्थान के चुरू जिले के सुजानगढ़, हरियाणा के कैथल और गुजरात के डांग जिले के एक स्थल को भी हनुमान के जन्म की मान्यता प्राप्त है और यहां भक्त हनुमान के बाल स्वरूप की पूजा करते हैं। अतएव मोरारी बापू का यह कथन उचित है कि ‘हनुमान वायु-पुत्र हैं और वायु, हवा या पवन का जन्म स्थल निर्धारित करना असंभव है।’ भारतीय दर्शन तो कहता भी है कि भगवान कण-कण में विराजते हैं, सो हमें उपरोक्त सभी स्थलों को हनुमान की जन्मस्थली मान लेने में कोई आपात्ति नहीं होनी चाहिए ?
‘बाल्मीकी रामायण’ में हनुमान का संबोधन वायु-पुत्र के नाम से ज्यादा है। किष्कंधा कांड में कहा है, ‘केसरी सुमेरू पर्वत के राजा हैं। उनकी पत्नी अंजना हैं। वायुदेव की कृपा से अंजना गर्भधारण करती हैं और हनुमान को जन्म देती हैं।’ हनुमान को ‘शिव-पुराण’ के अनुसार शिव का ‘अंशावतार’ भी माना गया है। इस कथा के अनुसार समुद्र-मंथन के समय जब विष्णु ने मोहिनी अवतार लिया, तब मोहिनी के रूप-लावण्य को देखकर शिव स्खलित हो गए। स्खलन से निकले इस तेज को सप्तार्षियों ने गौतम व अहल्या की पुत्री अंजना के कान में रख दिया। फलतः हनुमान जन्मे। सारलादास के लिखित महाभारत के वनपर्व और उड़िया साहित्य में हनुमान की जन्म-कथा में देवी पार्वती का भी संयोग है। बेटी अंजना से गुस्सा होकर अहल्या ने उसे शाप दिया कि तू जो पुत्र जन्मेगी, वह वानर होगा। इस कारण अंजना ने विवाह नहीं किया और वन में तपस्या करने लगीं। भगवान शिव और पार्वती जब परिणय-सूत्र में बंध गए, तब उन्होंने एक दिन वानर-वानरी का रूप धारण कर मिलन किया। इस अवसर पर शिव के तेज को पार्वती धारण नहीं कर पाईं और तेज धरती पर गिर गया। शिव ने इस तेज को उठाकर वायु को दिया। वायु ने इसे तपस्यारत अंजना को दे दिया। फलस्वरूप हनुमान जन्मे। चूंकि वायु ने शिव की आज्ञा का पालन करते हुए शिव के तेज को अंजना तक पहुंचाया था, इसलिए उन्हें वायु-पुत्र कहा गया। अर्जुन दास कृत ‘रामविभा रामायण’ में इस कथा का थोड़ा परिवर्तित रूप मिलता है। पार्वती ने जब वानरी के रूप में गर्भाधारण कर लिया तो उन्हें यह आशंका हुई कि वे वानर को जन्म देने जा रही हैं। आतएव उन्होंने वायु से निवेदन किया कि वह गर्भस्थ भू्रण को निकालकर किसी अन्य स्त्री को दे दें। इस आज्ञा के फलस्वरूप यह भू्रण केसरी के पत्नी अंजना के गर्भ में स्थापित कर दिया। नतीजतन वानर हनुमान का जन्म हुआ और वे वायुदेव के योगदान के चलते वायु-पुत्र कहलाए।
संस्कृत-ग्रंथों में खगोलीय-गणना के अनुसार हनुमान का जन्म 58 हजार 112 वर्ष पहले त्रेतायुग के अंतिम कालखंड में हुआ था। इस दिन मंगलवार चैत्र-पूर्णिमा थे। चित्रा नक्षत्र के ब्रह्म मुहूर्त में 6 बजकर 3 मिनट हनुमान का जन्म हुआ था। इसीलिए मंगलवार को हनुमान के मंदिरों पर भक्तों का मेला लगता है। हनुमान की प्रसिद्धि भगवान राम के शिरोमणि के रूप में प्रचलित है। इसीलिए राम-दरबार के दुनिया में जितने भी मंदिर हैं, उनकी शोभा व पूर्ति हनुमान के बिना पूरी नहीं होती। जबकि राम-सीता के लव और कुश दो पुत्र भी थे, लेकिन वे राम-दरबार में दिखाई नहीं देते हैं। लव-कुश के मंदिर जहां भी हैं, उनका अस्तित्व पृथक है। राम का स्नेह व अनुराग किसी व्यक्तित्व के प्रति सर्वाधिक है तो वे वायु-पुत्र हनुमान ही हैं। सीता के लिए भी हनुमान सबसे प्रिय, विश्वसनीय और पुत्रवत हैं। हनुमान बाल ब्रह्मचारी होने के साथ चिरंजीवी हैं। हनुमान की पूजा-अर्चना के साथ यह मान्यता जुड़ी है कि वे यदि भक्त पर प्रसन्न हो जाएं तो शत्रु पर विजय का वरदान दे देते हैं। साथ ही अन्य मनोकामनाओं की भी पूर्ति करते हैं।

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