उत्तर प्रदेश में गौशालाओं की स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन ?

 बृजनन्दन राजू 

गौसेवा व गौरक्षा के विषय पर सरकार को ही सारा दोष देना ठीक नहीं है। क्योंकि सब कुछ सरकार के भरोसे संभव नहीं है। गोशाला में अगर सरकारी कर्मचारियों ने ध्यान नहीं दिया तो स्थानीय समाज क्या कर रहा है। क्या हम राम और कृष्ण के वंशज सिर्फ कहलाने के लिए ही हैं। क्योंकि कोई भी बड़ा कार्य बगैर जनसहयोग के सफल नहीं हो सकता। यही कारण है कि सरकारी संरक्षण में संचालित गौशालाएं पशुधन की रक्षा योग्य रीति से नहीं कर पा रही है। प्रदेश का दुर्भाग्य है कि जहां पर युगों से गौरक्षा की उज्जवल परम्परा रही हो उस राम और कृष्ण के देश में अमूल्य गोधन की निर्ममता से मौत हो रही हैं। राम सिंह कूका जैसे गोभक्त, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी और आचार्य बिनोबा भावे जैसे स्वाधीनता सेनानियों महर्षि दयानन्द सरस्वती,स्वामी करपात्री जी महाराज,पूज्य प्रभुदत्त ब्रह्मचारी और श्रीगुरू जैसे आध्यिात्मिक विभूतियों की तीव्र कामना रही है कि हर हाल में गौरक्षा होनी चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने प्रतिनिधि सभा में गौरक्षा के विषय में एक बार नहीं बल्कि सात बार प्रस्ताव पास किया है। 
सन् 1985 ई. में विश्व हिन्दू परिषद ने गोवंश हत्या बन्दी हेतु राष्ट्रव्यापी प्रखर आन्दोलन शुरू किया था। ऐसा ही एक और आन्दोलन विश्व मंगल गौग्राम यात्रा का था। इस आन्दोलन के माध्यम से संघ के स्वयंसेवकों ने समाज में जागृति लाने का काम किया। 
 उत्तर प्रदेश सरकार गौरक्षा के प्रति संजीदा है। योगी ने मुख्यमंत्री बनते ही पहला काम प्रदेश में चल रहे अवैध बूचड़खानों को बंद कराने का काम किया था। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के पहले जहां उत्तर प्रदेश देश में सबसे बड़ा गोमांस निर्यातक प्रदेश था वहीं उन्होंने मुख्यमंत्री बनते ही गोमांस निर्यात पर रोक लगाने का काम किया। लेकिन इस सच्चाई से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में गौवंश आश्रय स्थल के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की गयी है। उसके अन्दर व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं है। अधिकांश आश्रय स्थल में पानी के पीने और वर्षा व धूप से बचने की भी व्यवस्था नहीं है। 

मुख्यमंत्री योगी ने कहा था कि गौशाला संचालन के लिए एक समिति बनेगी। समिति ही गौशाला का संचालन जन सहयोग से करेगी। सरकार आर्थिक मद्द करेगी। सरकार ने तो धन उपलब्ध करा दिया धन का बंदरबांट हुआ लेकिन धरातल पर कार्य नहीं हुआ। सरकारी योजनाओं को जमीन पर पहुुुंचाने की जिम्मेदारी अधिकारी की होती है। नौकरशाहोें ने अपने बचाव के लिए केवल कागजी खानापूर्ति की। जिन जिलों के अधिकारियों ने ठीक ढ़ंग से रूचि लेकर जनभागीदारी से कार्य शुरू किया वहां अच्छे परिणाम निकलकर सामने आ रहे हैं। जिन जिलों में लापरवाही हुई वहां जांच होनी चाहिए और अधिकारियों को दण्डित किया जाना चाहिए। 
कई जिलों में अच्छा काम हुआ है। गोसेवा व जल संरक्षण के क्षेत्र में ललितपुर के जिलाधिकारी मानवेन्द्र सिंह द्वारा की गयी पहल काबिले तारीफ है। उन्होंने न केवल जन सहयोग से एक आदर्श गौशाला बनायी है बल्कि जनभागीदारी की बदौलत वहां की स्थानीय ओडी नदी को सदानीर बनाने में सफलता हासिल की है। पानी के संकट से जूझ रहे क्षेत्र के लिए यह नदी वरदान बन गयी है। इसके लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा दो राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित भी किया जा चुका है। 
ललितपुर बुंदेलखण्ड क्षेत्र में आता है। वहां पर अन्ना प्रथा पुरानी परम्परा है। मानवेन्द्र सिंह ने उससे निपटने की ठानी। स्थानीय नागरिकों के साथ बैठक की और योजना बनाई। लोगों ने खुले दिल से सहयोग किया। ललितपुर की गौशाला में इस समय करीब पांच हजार गाय हैं। गायों के लिए रहने खाने पानी से लेकर पेयजल की उत्तम व्यवस्था है। उसकी गिनती प्रदेश की उत्तम गौशालाओं में होती है। जिलाधिकारी के सदप्रयासों का परिणाम यह रहा कि स्थानीय नागरिकों की समिति गौशाला की चिंता करती है। समाज में बहुत बड़ी शक्ति होती है। अगर समाज खड़ा हो जाये तो बड़ी से बड़ी समस्या हल हो सकती है। आज समाज को जगाने की जरूरत है। आज जरूरत है कि अन्य जिलों के अधिकारी मानवेन्द्र सिंह से प्रेरणा लें और समाज को साथ लेकर कार्य करने की आदत डालें। सरकार को भी चाहिए कि ऐसे अधिकारियों का उत्साहवर्धन करे और जिन जिलों में गाय की मौत हुई है वहां केे जिलाधिकारी को दण्डित करें। ललितपुर की आदर्श गौशाला में प्राकृतिक बाड़ के लिए किनारे नींबू और करौंदे की झाड़ियां लगायी गयी हैं। परिसर करीब पांच किलोमीटर का है। चारों तरफ वृक्षारोपण कराया गया है। मैदान में चरने के लिए घास लगायी गयी है। 
विश्व हिन्दू परिषद द्वारा अयोध्या के कारसेवक पुरम में संचालित श्रीराम गौशाला में सैकड़ों गाय हैं। वहां से काफी मात्रा में दूध का उत्पादन होता है। लोग गौशाला से ताजा दूध भी खरीदकर ले जाते हैं। इसके अलावा उस गौशाला का शुद्ध घी,दूध दही तथा छाछ का सेवन वहां पर संचालित वेद विद्यालय के बटुक करते करते हैं। इसी तरह मणिराम दास जी की छावनी और दिगम्बर अखाड़ा की गौशाला की गिनती भी समृद्ध गौशालाओं में होती है। भाजपा के राज्यसभा सदस्य रवीन्द्र किशोर की देहरादून में गौशाला है। गौशाला में सब देशी गाय ही हैं। उनकी गौशाला में बने देशी घी की मांग विदेशों में अधिक है। वह दो हजार से पच्चीस सौ रूपये किलो में गाय का घी बेचते हैं।   
नागपुर की देवलापर गौशला है। गौशाला में गौ उत्पाद आधारित दन्तमंजन, धूप बत्ती, मच्छर कॉइल, नहाने का साबुन, केश तेल, वर्मी कम्पोस्ट, जैविक कीट नियंत्रक और अन्य पंचगव्य उत्पादों का निर्माण किया जाता है। यही नहीं इसका प्रशिक्षण भी गौशला में युवाओं को दिया जाता है। देश भर के हजारों किसान वहां से प्रशिक्षण ले चुके हैं। इसी तरह बाबा रामदेव की गौशाला है। वैसे पतंजलि के विभिन्न उत्पादों की देश विदेश में मांग निरन्तर बढ़ती जा रही है। लेकिन यह कम लोग ही जानते हैं कि बाबा रामदेव ने पशुओं के लिए शक्तिधारा,यकृतामृत,मल्टीविटामिन,शक्तिधारा और थनेला निल जैसे दवाएं गौ आधारित उत्पाद से तैयार किया है। उनका प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है। 

उत्तर प्रदेश में सुविधाओं के अभाव में हजारों गौवंश की मौत का मुद्दा संसद में भी उठाया गया। सबका पालन पोषण करने वाले गाय जिसे कामधेनु कहा गया है। उसके जीवन पर ही आज संकट है। मुख्यमंत्री ने प्रदेशभर में गोशाला खोलने के आदेश के साथ बजट भी आवंटित कर दिया लेकिन उस योजना को धरातल पर नहीं उतारा गया। जल्दबाजी में शासन के निर्देश पर अधिकारियों ने चारा भूषा व पेयजल की स्थाई व्यवस्था किये बगैर गौवंश आश्रय स्थल खोल दिया। जिस गाय के प्रति हमारी उसको चिंता सरकार के भरोसे छोड़ दिया है। यह प्रवृत्ति ठीक नहीं है। सबसे बड़ी दिलचस्प बात यह है कि इतनी मात्रा में गौवंश की हो रही मौत के बावजूद गौ प्रेमी चुप हैं क्या उन्हें यह सब दिखाई नहीं पड़ रहा है। 
आजमगढ़,मिर्जापुर प्रयागराज,अयोध्या, प्रतापगढ़, जौनपुर,हरदोई,बाराबंकी,सीतापुर,लखीमपुर गोंडा और मिर्जापुर जनपदों की गौशालाओं में दर्जनों की संख्या में गायों की मौत हुई है। जिन जगहों पर गायों की मौत हुई है, वहां के कई संबंधित अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है लेकिन इससे समस्या का समाधान होने वाला नहीं है। जहां भी गायों की मौत हुई है वह गौवंश आश्रय स्थलों में हुई हैं। बरसात में पशुओं में बीमारी भी फैलती है। बीमारी फैलने से रोकने के लिए पशुओं का टीकाकरण किया जाता है लेकिन गोशाला के पशुओं का ही टीकाकरण नहीं हुआ। अगर  टीकाकरण हुआ होत तो आज यह नौबत नहीं आती।  सरकार ने न सिर्फ बजट में करीब ढाई सौ करोड़ रुपये का प्रबंध गोशालाओं के निर्माण और गायों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए किया है बल्कि गायों के नाम पर शराब और टोल पर अतिरिक्त कर भी लगाए हैं इसके बावजूद व्यवस्था बेपटरी है। 

       बृजनन्दन राजू 
       8004664748
(लेखक प्रेरणा शोध संस्थान नोयडा से जुड़े हैं)

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