लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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rape256dd__1181448822                                 योन शोषण, उत्पीड़न, महिलाओं के प्रति हिंसा,  छेड़छाड़,   दुराचार और बलात्कार की घटनायें हमेशा होती रहीं है  पर पिछले दिसम्बर 16 को हुए जघन्य अपराध ने देश को हिला कर रख दिया। ये अपराध फिर भी नहीं रुक रहे । रोज़ अख़बारों की सुर्खियाँ बन रहे हैं।  जिस तरह ये अपराध बढ़े हैं और मीडिया ने इनकी रिपोर्टिग भी ज़्यादा   की है, तो चर्चा भी बहुत हुई हैं, हो  रही है। ये चर्चा कभी पुलिस की भूमिका पर, कभी कानूनी व्यवस्था पर, कभी लड़कियों के  पहनावे को लेकर, कभी उत्तेजक फिल्मो या फैशन पत्रिकाओं में छपने वाली अर्धनग्न तस्वीरों को लेकर हुईं जो हमेशा एकोन्मुखी रही।किसी ने अपराधी के लियें मृत्युदण्ड मांगा किसी ने उसका विरोध किया । किसी ने कहा  लड़कियाँ जीन्ज़ न पहने, सलवार कमीज़ पहने,  कहीं उनके लियें ओवरकोट पहनने का आदेश दे दिया गया।

इस समस्या की जड़े बहुत गहरी हैं, इसे समझने के लियें अलग अलग कोणों से समस्या को समझने की कोशिश करनी पड़ेगी। एकोन्मुखी विचारधारा लेकर चलने से कुछ भी हासिल नहीं होगा। कोई व्यक्ति जो है, उसके पीछे अनुवाँशिक कारणो के अलावा उसके परिवेश का बहुत बड़ा हाथ होता है। हर व्यक्ति  कुछ जन्मजात गुण दोष लेकर पैदा होता है, उसके आसपास के माहौल, घर परिवार संगी साथियों का उसके व्यक्तित्व के विकास में बड़ा हाथ होता है।

कोई अपराध करता है तो कहीं न कहीं उसके तार उसकी परवरिश से जुड़े होते हैं, हमेशा नहीं तो अधिकतर ऐसा  होता है। जिन परिवारों में अपने बच्चों के सामने पिता उनकी मां को मारता पीटता हो, बहन के पैदा होने पर मायूसी छा जाय, वहाँ बच्चा औरतों का सम्मान करना सीखे इसकी अपेक्षा कम ही की जा सकती है। जहाँ बेटों को  नवाबों की तरह पाला जाय लड़कियों को बोझ की तरह वहाँ संभावना यही होगी कि लड़कियों में हीनता  की भावना होगी और आत्मविश्वास कम होगा।  लड़को में अपने पौरुष पर अर्थविहीन अहंकार होगा । लड़कों की यही भावना उनसे नारी पर अपराध करने पर मजबूर करती है। संगी साथियों पर अपने पौरुष का तेज दिखाने के लियें वो किसी भी हद तक गिर सकते हैं। लड़की ने क्या पहना है, लड़की की उम्र क्या है यह बेमानी हो जाता है इसलियें कभी बच्चियाँ, कभी   प्रौढ़ महिलायें  ,तो कभी कभी गर्भवती महिलायें भी इस दरिंदगी का शिकार हो जाती हैं।

यह भी ज़रूरी नहीं है कि जिस माहौल में महिलाओं को सम्मान न मिलता हो वहाँ का बेटा भी उनका सम्मान न  करे। संभव है कि वह पिता के प्रति विद्रोह कर दे।  अपनी मां बहनो व अन्य महिलाओं को इज़्जत दे , उनकी रक्षा करे। कभी कभी बेटों के अर्थविहीन पौरुष को उनकी  मां ही बढ़ावा दे देती है, बेटे के विवाह के समय अपनी असुरक्षा की भावना के चलते, सभी औरतों के लियें एक ग़लत  धारणा डालने की कोशिश की जाती है जैसे ‘’पत्नी को नियंत्रण में रखना’’ इत्यादि। इन बातों का सीधा सीधा असर अपराध की दुनियाँ में नहीं ढ़केलता पर बार बार दोहराई गई बातें , सुनी गई बातें व्यक्ति की मानसिकता को प्रभावित करती हैं।

पुरुष को स्त्री से ‘ना’ सुनना  किसी भी रिश्ते में या बिना रिश्ते के भी पसन्द नहीं आता, अतः किसी लड़के ने किसी लड़की से दोस्ती या प्रेम का हाथ  बढ़ाया और लड़की ने ‘ना’ कह दिया तो उसका आत्म सम्मान ऐसे चटकता है कि वो कभी लड़की पर तेज़ाब फेंक देता है, कभी दुराचार करता है या क़त्ल कर देता है, या ऐसी कोशिश करता है। इस प्रकार का आचरण केवल विकृतकामी  व्यक्ति ही कर सकता है। साधारण मानसिकता वाला व्यक्ति किसी महिला के प्रति आकर्षित हो सकता है पर कभी    भी दुर्व्यवहार नहीं कर सकता।

बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण कभी कभी एक एक कमरे मे आठ दस लोग रहने को मजबूर होते हैं, जिनमें पुरुष, स्त्रियाँ, बूढ़े,  जवान और बच्चे सब शामिल होते हैं, जिनकी आँखो से कुछ छुपा नहीं होता। बच्चे के मन में कब कौन ग़लत धारणा बैठ जाय कहा नहीं जा सकता, इन्ही परिवारों का कोई व्यक्ति नशे में किसी महिला से ग़लत हरकत करदे कहा नहीं जा सकता। मेरे कहने का यह अर्थ भी नहीं है कि बड़े बड़े घरों में रहने वालों के यहाँ कुछ ग़लत नहीं हो सकता।

कई बार शहरों में रोटी रोज़ी की तलाश में दूरदराज़ के इलाकों से लोग आते हैं जो अपने परिवार को साथ नहीं रख पाते, उनका कुँठाग्रस्त होना स्वाभाविक है, शराब या नशीली दवाओं के प्रभाव में अपना संतुलन और धैर्य खो देते है और कोई राह चलती महिला  उनकी हवस का शिकार हो जाती है, इस संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता।

एक तरफ़ कम सुविधाओं के साथ पले बढ़े युवक ऐसे अपराध करते हैं तो दूसरी तरफ कुछ अमीरजादे भी है जिनके पास  धन तो है पर परिवार से सही ग़लत में अंतर करने के संस्कार नहीं मिले हैं। सब कुछ हासिल करना वो अपना  अधिकार समझते हैं जो ख़रीद सकते हैं ख़रीद लेते हैं, जो बिकाऊ नहीं है उसे शक्ति के बल पर हासिल करना चाहते हैं, चाहें वो कोई 16-17 साल की अपरिचित या परिचित लड़की ही क्यों न हो। इनके पकड़े जाने पर इनके प्रभावशाली  माता पिता हर कोशिश करके इन्हे बचा लेते हैं, ये फिर अपराध करते हैं और बार बार इन्हे बचाया जाता है। ये  महिलाओं के साथ बदसलूकी को अपना अधिकार समझ लेते हैं।

ये अपराध अभी हो रहे हैं पहले नहीं होते थे ऐसा नहीं है। पहले परिवार की इज़्जत बचाने के लियें ऐस मामलों को घर में ही दबा दिया जाता था, पोलिस और न्यायालयों में भद्दे सवालों से बचने के लियें रिपोर्ट ही नहीं की जाती थी। मीडिया  भी इतना शक्तिशाली नहीं था। आज अनेक लोग इसे पाश्चात्य सभ्यता का असर मान रहे हैं। पश्चमी देशों में भी  ये अपराध होते हैं और हमारे देश में भी, पश्चिमी सभ्यता का रोना धोना बेकार है। बदलते समय के साथ बदलाव होते है।  कुछ पुराना छूटता है तो कुछ नया जुड़ता है। बदलावों को रोकना न संभव है न वाँछनीय। बदलावों को स्वीकार करके एक सुरक्षित जीवन सभी नागरिकों को मिलना चाहियें ।

पाश्चात्य सभ्यता से पता नहीं क्यों लोग इतना डरते हैं, पुरुष भी तो अब धोती कुर्ते की जगह पैंट शर्ट पहनते हैं। पहले महिलायें घर में रहती थीं इतना बाहर नहीं जाती थी, इसलिये साडी शौल और दुपट्टा संभाल पाती थी।  आज जब भाग भाग कर कभी मैट्रो पकड़नी होती है, कभी बस, कभी हाथ में किताबों का बैग होता है, तो कभी लपटोप, ऐसे में वो अगर जीन्स और टीशर्ट या शर्ट और ट्राउज़र पहन लेती हैं तो लोगों को क्यों आपत्ति होती है? जब महिलायें घूँघट में रहती थी तब भी बलात्कार होते थे, जिस अनुपात में जनसंख्या बढ़ी है उसी अनुपात में  महिलाओं के प्रति होने वाले अपराध बढ़े हैं। चीन जापान तथा अन्य एशियाई देशों की महिलाये भी अब अपनी  पारम्परिक पोशाक बहुत कम पहनती हैं, तो भारतीय महिलाओं को सलवार कुर्ता या साड़ी पहनने की हिदायत क्यों  देदी जाती है ? जीन्स टीशर्ट और शर्ट ट्राउज़र पुरुषों की तरह महिलाओं के लियें भी अब अंतर्राष्ट्रीय पहनावा बन चुके हैं।

पहनावे में शालीनता होनी चाहये और अवसर के अनुकूल होना चाहिये।  आज कल लड़कियाँ घर मे तो बैठी नहीं रहतीं, यदि वो बैडमिन्टन खेलेंगी तो शौर्ट्स भी पहनेंगी, कोई नृत्य करेंगी तो पोशाक उसके अनुरूप होगी, तैरना है तो स्विमसूट भी पहनेंगी तो अगर कुछ ख़ास अवसरों पर वो बैक   लैस पोशाक पहनलें तो बुरा क्या है ?सड़क या गली मे या बाजार मे तो वो ये कपड़े पहन कर नहीं घूमती दिखतीं।

धरती पर लड़कों को भी रहना है और लड़कयों को भी, साथ पढ़ना है, फिर साथ काम करना है दोनो के बीच मे दीवार तो नहीं खींची जा सकती। दोनो को ही अपना व्यवहार संयत रखने के लियें तैयार करने की ज़रूरत है। पुरुष और  महिलाओं दोनो को ही हक़ है कि वह अपनी पसन्द के कपड़े पहने, आकर्षक लगें ।  आकर्षक लगने का या आकर्षित होने का यह मतलब नहीं है कि आप उसे पाना चाहें या हासिल करें या हासिल करने की कोशिश करें। फिल्म के पर्दे पर सुन्दर नायिका सब को आकर्षित करती है पर उसे हासिल करने का ख़्याल नहीं आता।   इसी तरह लड़कों को भी संवेदनशील और  सुग्राही (sensitise)   बनाने की ज़रूरत है कि वो किसी भी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध हासिल करने, छेड़ने या अभद्र व्यवहार करने की कोशिश न करें।यह कोई अपना पौरुष दिखाने का तरीक़ा नहीं है। ऐसा करने से उन्हे तो सज़ा मिलेगी ही उनका पूरा परिवार भी शर्मिन्दगी मे जियेगा।

कुछ लोग इन अपराधों के लियें फिल्मो, टी.वी., विज्ञापन और फैशन की दुनियाँ या पत्रिकाओं के कवर पर छपी अर्द्धनग्न तस्वीरों को ज़िम्मेदार मानते हैं।  अब हम इन्हे दुनियाँ से हटा तो नहीं सकते,  कभी सुझाव आते हैं,  कि कवर पर ऐसी कोई तस्वीर हो तो वो लिफाफे में बन्द होनी चाहिये और उसपर ‘केवल वयस्कों’  के लियें लिखा होना चाहये।  ऐसा करने से तो किशोरों का ध्यान उस तरफ और जायेगा,   प्रतिबन्धित चीज़ तो ज़्यादा आकर्षित करती है। किशोरावस्था में लड़के लड़कियों के शरीर में बदलाव आने के कारण वो ये तस्वीरें ज़रूर देखेंगे   ,फिर कुछ देर कल्पना जगत (fantasy) में रहलेंगे तो कुछ बुरा नहीं है,  सामान्य है।  माता पिताओ को युवाओं को खेलकूद तथा अन्य रचनात्मक कार्यों में व्यस्त रहने के लियें प्रोत्साहन देना चाहिये, जिससे इस उम्र की अतिरिक्त शक्ति  सृजनात्मक कामो में लगे न  कि अपराध या  विनाशकरी कामो में।

लड़कियों को अपनी सुरक्षा के लियें चौकन्ना रहने की ज़रूरत है। कुछ छोटी छोटी चीज़े जैसे सेफ्टीपिन हेयरपिन या पैपर स्प्रे बचाव मे सहायक हो सकते हैं। ख़तरे का आभास होते ही वहाँ से भागने की कोशिश करें। कभी भी किसी  अनजान आदमी से लिफ्ट न लें। कोई मार्शल आर्ट सीखें तो बहुत अच्छा है।सुनसान रास्तो पर न जायें।कार चलाते  समय शीशा न खोले तो अच्छा है।

माता पिता को बचपन से ही बच्चों को अच्छे और बुरे स्पर्श की पहचान सिखानी चाहिये छोटे बच्चों के व्यवहार मे कोई असमान्यता दिखाई दे तो उनसे पूछना चाहिये, पर बच्चा डरे नहीं खुलकर बात करे ऐसा माहौल बनाना चाहिये।बड़े होने पर लड़कियों मे अच्छे बुरे स्पर्श की समझ आजाती है। हाथ मिलाना या गले लगना आधुनिक जीवन के अभिवादन का तरीक़ा बन गया है, यदि किसी व्यक्ति के स्पर्श मे असहजता महसूस हो तो दूर से ही नमस्ते कर सकती हैं। अपना व्यवहार संयत और शालीन बनाकर रखने की ज़रूरत है।जिन पर्टियों पीना पिलाना होता है वहाँ और अधिक सतर्क रहने की ज़रूरत है।

जब कोई लड़की स्वेच्छा से अपने मंगेतर प्रेमी, बौयफ्रैन्ड,  लिव इन पार्टनर या किसी भी व्यक्ति द्वारा शादी के वादे के झाँसे मे आकर उससे साथ शारीरिक संबध बनाती है तो इसके लियें दोनो ही ज़िम्मेदार होते हैं। ऐसी स्थिति मे रिश्ता टूटने पर , कारण चाहें जो भी हों, लड़की  लड़के पर बलात्कार का आरोप कैसे लगा सकती है ? इस पर विचार करना बहुत ज़रूरी है। एक वयस्क लड़की को शादी और शादी के वादे का अंतर मालूम होता है और अपनी स्वेच्छा से किये गये काम की ज़िम्मेदारी मे वो भागीदार होती है।

महिलाओं की सुरक्षा के लियें समुचित पोलिस प्रबंध होना ज़रूरी है। जहाँ महिलायें देर तक काम करती हैं उन कम्पनियों के मालिकों को उनकी सुरक्षा का समुचित प्रबंध करना उनकी ही ज़िम्मेदारी है। कैब के ड्राइवर पूरी छानबीन के बाद रखने चाहियें। देर रात को उनके घर के दरवाज़े तक पंहुचाना भी ज़रूरी है।स्कूल की बसों और वैन मे ड्राइवर और क्लीनर के साथ एक महिला कर्मी को तब तक रहना ज़रूरी होना चाहिये, जब तक आख़िरी बच्चे को  उसके बस स्टौप पर न उतार दिया जाय।

नाइट क्लब, पब्स या डिस्कोथिक मे जाने से किसी को रोका तो नहीं जा सकता पर सरकार द्वारा उनके मालिकों पर सुरक्षा की ज़िम्मेदारी के लियें दबाव बनाये रखना भी ज़रूरी है, जिससे कुछ अप्रिय और दुर्भाग्यपूर्ण न  घट जाये।

यदि कोई अपराध हो जाता है तो पोलिस को पूरी संवेदनशीलता के साथ रिपोर्ट लिखनी चाहिये,गैर ज़रूरी सवाल न पूछे जाँय तो अच्छा है।न्यायालयों को ये मामले जल्दी निबटाने चाहियें। पीड़िता को शारीरिक इलाज के साथ काँउसैलिग मिलनी भी ज़रूरी है।

अपराधी को अपराध के अनुसार, देश के कानून के तहद कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिये।अपराधी की जेल मे ही मनोचिकित्सक या अपराध विशेषज्ञ मनोवैज्ञानिक द्वारा जाँच होनी चाहिये।  उसके इलाज का प्रबंध होना आवश्यक है , जिससे वो सज़ा समाप्त होने के बाद समाज मे पुनः स्थापित हो सकें।यदि  चिकित्सकों को लगे कि  अपराधी की प्रवृत्ति मे सुधार संभव ही नही है तो उसे आजीवन जेल मे रखना कानून के हिसाब से ज़रूरी  होना चाहिये। ऐसा न हो कि वो बाहर आते ही समाज के लियें फिर ख़तरा बन जायें।

4 Responses to “कौन है ज़िम्मेदार ?”

  1. विजय निकोर

    आदरणीय बीनू जी:
    अभी-अभी आपके इस लेख पर नज़र गई, और पढ़ना अच्छा लगा।
    आपने बहुत परीश्रम से इस समस्या के इतने सारे दृष्टिकोण दिखाए हैं,
    उन पर अपने विचार दिए हैं, तभी तो यह लेख इतना पठनीय बना है।
    बधाई।
    विजय निकोर

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  2. इक़बाल हिंदुस्तानी

    iqbal hindustani

    बीनू जी आपने उम्दाह लेख लिखही. आपको .bdhaaसवाल ये है के ये सब लागू kaiseho

    Reply
    • Binu Bhatnagar

      लेखक लिख सकता है..जन चेतना फैला सकता है, इससे आगे उसके हाथ मे कुछ नहीं होता। लेख पसन्द आया
      इसके लियें धन्यवाद।

      Reply

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