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gbrdस्मिता सिंह

दुनिया के भगवान कहे जाने वाले सूरज का
इस जगह से कोई वास्ता नहीं रहता
नहीं डालता कभी रोशनी इन अंधेरी गलियों पर
कि वो भी शुचिता की परंपरा को तोड़ नहीं सकता
होठों पर लाली, माथे पर बिंदी सजाये
कतार में खड़ी ये सुहागिनें नहीं
पति नहीं उन्हें तो ‘किसी का भी’ इंतजार है
जो नीलामी की गली में उनकी भी बोली लगाएगा
हर दिन की कमाई या पूंजी कह लो
जिस्म की ताजगी पर ही जीवन का दारोमदार है
‘सभ्य’ लोगों की वासना को मिटाती हर रोज
हवस की ड्योढ़ी पर कुर्बान होना ही नियति है उनकी
श्मसान से भी ज्यादा लाशें
इन बदनाम गलियों में ‘जिंदा’ हैं
इनकी मौत या जिंदगी दोनों ही क्योंकि
कभी तरक्कीपसंद समाज में अहमियत नहीं रखती
सपने देखना ‘काम’ की पाकीजगी पर सवाल है
आजादी का मतलब माग लेना मौत है
उसका हक है कि वह परोसी जाए
और अधिकार है उसके ‘गोश्त’ की अच्छी कीमत
मौत से खौफ नहीं उसे लेकिन
पल-पल मरकर जिंदा रहने से डरती है
बेशर्म होने का नाटक करते-करते
लजाने की खूबी चुक गई कब की
पत्नी, बहन, बेटी और मां
इनका पर्याय वह जानती है लेकिन
वह इनमें से नहीं क्योंकि अनमोल हैं ये
और उसकी तो हर दिन कीमत चुका दी जाती है…

2 Responses to “कौन है वह आखिर”

  1. आर. सिंह

    आर सिंह

    साहिर लुधियानवी ने पच्चास के दशक में लिखा था,”कहाँ हैं ,कहाँ हैं ,जिन्हे नाज है हिन्द पर वो कहाँ हैं?”जिनको ध्यान में रख कर ये पंक्तियाँ लिखी गयी थीं,उनकी दशा पहले से खराब ही हुई हैं.

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  2. N Singh

    Nice but:
    श्मसान से भी ज्यादा लाशें
    इन बदनाम गलियों में ‘जिंदा’ हैं
    इनकी मौत या जिंदगी दोनों ही क्योंकि
    कभी तरक्कीपसंद समाज में अहमियत नहीं रखती
    सपने देखना ‘काम’ की पाकीजगी पर सवाल है
    आजादी का मतलब माग लेना मौत है

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