More
    Homeसाहित्‍यलेखभारत का वास्तविक राष्ट्रपिता कौन ? श्रीराम

    भारत का वास्तविक राष्ट्रपिता कौन ? श्रीराम

    तुम्हें देखते ही देशद्रोही भाग खड़े हों

    शूर्पणखा का कार्य अनैतिक और अनुचित था। जिसके अनुचित और अनैतिक कार्य का सही फल लक्ष्मण जी ने उसे दे दिया था। इसके पश्चात अब वे परिस्थितियां बननी आरंभ हुईं जो उस कालखंड की ऐतिहासिक क्रांति का सूत्रपात करने वाली थीं।
    यह घटना राक्षस वंश के लिए ऐसी घटना सिद्ध हुई जिसने उसके विनाश की प्रक्रिया आरंभ कर दी। रामचंद्र जी ने राक्षस वध का संकल्प पहले ही ले लिया था। वह शूरवीर थे ,साहसी और पराक्रमी व्यक्तित्व के स्वामी थे।  युद्ध के मैदान से भागना उन्होंने सीखा नहीं था। उन्होंने भी यह संकल्प ले लिया था कि उनका संपूर्ण जीवन यदि राक्षस वध करने में व्यतीत हो तो उन्हें आनंद प्राप्त होगा।

    महासंकल्प लिया जीवन का,
    आतंक मिटा दूंगा वन से ।
    जो वृत्तियाँ पाप कराती हैं ,
    हटा दूंगा उनको आसन से ।।
    यज्ञ योग से जुड़े मनुज जो,
    भूषण कहलाते वसुधा भर के ।
    जो वेद धर्म के लिए समर्पित
    हर क्षण गाते गीत सनातन के।।
    उनकी रक्षा का भार उठाकर,
    निशंक चलूंगा जीवन पथ पर ।
    रघुकुल की रीत यही है मेरी ,
    निर्वाह करूंगा जीवन भर।।

        वास्तव में महापुरुष अपने संकल्प के साथ जीना सीख लेते हैं। उनके लिए ‘कल्पवृक्ष’ नाम का कोई काल्पनिक वृक्ष नहीं है जो उन्हें ऐसी अद्भुत और अलौकिक चीजों को प्राप्त कराने में सहायक होगा, जिनके लिए संसार का कोई साधारण मनुष्य कभी-कभी सपने ही ले लिया करता है। महापुरुष वही होते हैं जो अपने आप संकल्प का वृक्ष लगाते हैं और उसके मीठे फल खाते हैं । इतिहास संकल्प वृक्ष के लगाने वाले ऐसे महापुरुषों के ही गुणगान किया करता है। जिनके संकल्पों में शिथिलता होती है, वह कभी महान कार्य संपादित नहीं कर पाते। उनके जीवन  शिथिल पड़ जाते हैं और जब चुनौतियां उनके सामने आती हैं तो उन्हें देख कर वे भाग जाते हैं ।
    रामचंद्र जी भी संकल्प वृक्ष के नीचे बैठकर अपनी साधना कर रहे थे। आतंक, आतंकी और आतंकवाद से उन्होंने शत्रुता मोल ले ली थी। अब इन तीनों को मिटाना उनके जीवन का ध्येय हो गया था। यद्यपि कुछ लोगों ने रामचंद्र जी के जीवन चरित्र का उल्लेख करते हुए कुछ इस प्रकार प्रभाव डालने का प्रयास  किया है कि उनके समय में राक्षसी वृत्तियां नगण्य थीं और धार्मिक लोगों का वर्चस्व चारों ओर था। माना कि धार्मिक पुरुषों की संख्या उस समय अधिक थी, परंतु यह भी सत्य है कि  उनके काल में राक्षसी वृत्तियां भूमंडल के अधिकांश भाग पर अपना शासन करने में सफल हो गई थीं। जिससे जनसाधारण का जीवन कठिनाइयों और विषमताओं से भर गया था। जिनका विनाश करने का महा संकल्प श्री राम ने लिया।
        उन्हें यह पता था कि शूर्पणखा के साथ उन्होंने जो कुछ भी किया है उसका परिणाम क्या होगा ? उन्होंने अपने भाई लक्ष्मण से यह कह दिया था कि अब सावधान रहने की आवश्यकता है । क्योंकि यह राक्षसिन निश्चय ही अपने लोगों से जाकर हमारी शिकायत करेगी । जिससे यथाशीघ्र कोई न कोई ऐसा हमला हम पर हो सकता है जिसकी हम आशा नहीं कर सकते।
      यही हुआ भी। जब शूर्पणखा ने जाकर के अपने भाई खर और दूषण को अपनी व्यथा – कथा सुनाई और उन्हें बढ़ा – चढ़ाकर यह बताया कि किस प्रकार दशरथ पुत्र श्री राम और लक्ष्मण ने उसका यह अपमान किया है और उसका अंग भंग कर तुम्हारे पौरुष को चुनौती दी है तो उससे क्रुद्ध होकर खर और दूषण ने श्री राम और लक्ष्मण पर आक्रमण करने के लिए अपने 14 राक्षसों को भेजने का आदेश दिया।

    चौदह राक्षस वेग से पहुंचे राम के धाम।
    दशरथ नंदन ढूंढकर कर दो काम तमाम।।

       यहां पर यह बात स्पष्ट हो जानी चाहिए कि खर और दूषण के द्वारा रामचंद्र जी और उनके भाई लक्ष्मण को समाप्त करने के लिए ही यह आदेश दिया गया था । वे 14  राक्षस वनों में रामचंद्र जी और लक्ष्मण की आरती उतारने के लिए नहीं आ रहे थे, बल्कि उनका सिर उतारने के लिए आ रहे थे। आज की परिस्थितियों पर यदि विचार करें तो 14 राक्षसों या आतंकवादियों के दल को समाप्त करने के लिए बहुत संभव है कि 14 हजार की सेना लगा दी जाए । यह सेना भी आधुनिकतम हथियारों से लैस होगी । परंतु उस समय दो सात्विक वीरों को समाप्त करने के लिए 14 राक्षसों की सेना आ रही थी । इसका अभिप्राय है कि आज आतंकवादियों का भय होता है और उस समय सात्विक वीरों का भय होता था। परिस्थितियां अत्यंत विषम थीं, परंतु इसके उपरांत भी श्रीराम धैर्य और संयम बनाए हुए एक वीर योद्धा की भाँति उन राक्षसों की प्रतीक्षा करते रहे । यदि वह चाहते तो उनके आने से पहले उस स्थान को छोड़ सकते थे, परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसके विपरीत वे वहीं रुके रहे और आने वाली आपदा का सामना करने को ही उन्होंने प्राथमिकता दी। उन्होंने ऐसा भी नहीं किया कि जो राक्षस उनके सामने आने वाले थे उनके सामने वह किसी प्रकार के गांधीवादी सत्याग्रह का ढोंग रचते और उन्हें अपने प्राण आराम से ले लेने देते ।
         रामचंद्र जी यथार्थवादी दृष्टिकोण के व्यक्ति थे। वह जानते थे कि राक्षसों के सामने आह भरने या प्राणों की भीख मांगने से काम नहीं चलेगा, अपितु उनके प्राण लेने से ही काम चलेगा। उन्होंने ऐसे किसी ढोंग या पाखंड को भी नहीं फैलाया कि आतंकवादियों के भी मौलिक अधिकार होते हैं। वह एक ही बात जानते थे कि जो लोग जनसाधारण का जीना हराम करते हैं उनके कोई अधिकार नहीं होते। क्योंकि वह दूसरों के अधिकारों को छीनने की कोशिश करते हुए अपने अधिकार स्वयं ही समाप्त कर देते हैं। जो दूसरों के जीवन का या धन का या  यश और सम्मान का हरण करते हैं वह स्वयं अपने अधिकारों को खो देते हैं।  श्रीराम को यह भली प्रकार  ज्ञात था कि राक्षसों के सामने प्राणों की भीख मांगने का अभिप्राय अपनी कमजोरी को दर्शाना होता है। यही कारण था कि श्रीराम ने यह संकल्प ले लिया कि  जो भी कोई शूर्पणखा के पक्ष में हमसे युद्ध करने के लिए आएगा , उसका हम वीरता के साथ सामना करेंगे। रामचंद्र जी के द्वारा ऐसा संकल्प लेने का एक कारण यह भी था कि शूर्पणखा को सहायता देने वाला या उसके किए गए तथाकथित अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए आने वाला व्यक्ति भी आतंकवादी होगा।

    एक राक्षसी का कौन समर्थक ?
    यह जान गए दशरथ नंदन ।
    निश्चय ही वे लोग बनेंगे ,
    जिनके कारण मचा करुण क्रंदन।।

    जो भी आएगा रणभूमि में
    लौटना कभी नहीं उसका संभव ।
    रणभूमि में उसकी भेंट चढ़ेगी
    आज ऐसा मेरा है निश्चय।।

       कुछ ही समय में वह घड़ी आ गई जब खर और दूषण के भेजे हुए 14 राक्षस आकाश मार्ग से शूर्पणखा के साथ रामचंद्र जी और लक्ष्मण के पास आ पहुंचे। यह एक भयानक राक्षस दल था जो कि रामचंद्र जी और उनके भाई का वध करने के लिए आया था। उनका आने का उद्देश्य स्पष्ट था। जिसे समझने में श्रीराम को तनिक भी देर नहीं लगी।  जैसे ही वे राक्षस श्री राम और लक्ष्मण जी के पास पहुंचे वैसे ही रामचंद्र जी ने अपने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर उन राक्षसों से कहा कि यदि तुम लोग युद्ध करना चाहते हो तो प्रसन्नतापूर्वक जहां के तहां खड़े रहना, भागना मत और यदि अपने प्राण बचाने हों तो हे राक्षसो !  तुम यहां से शीघ्र लौट जाओ। ऐसा कहकर रामचंद्र जी ने उन राक्षसों को अंतिम चेतावनी देते हुए यह स्पष्ट किया कि यदि वे चाहें तो अपने प्राण बचाकर अब भी यहां से जा सकते हैं। शूरवीरता की यह पहचान है कि वह शत्रु को अनावश्यक मारने से बचती है । यदि शत्रु अपनी प्राण रक्षा चाहता है तो प्रत्येक शूरवीर एक बार उसे बचने या भागने का मौका देता है। युद्ध में ऐसा करने की हमारी प्राचीन परंपरा रही है । इसका कारण यही है कि युद्ध में कोई भी निरपराध ना मारा जाए । यदि कोई व्यक्ति अपने आप को युद्ध से बचाना चाहता है तो उसे बचने का अवसर प्रदान किया जाए। युद्ध में वही मारा जाता था जो युद्ध में मरने मारने के लिए उतरता था।
        श्री राम की यह बात सुनकर वे राक्षस अत्यंत क्रुद्ध हो गए। उन्होंने अपने क्रोध पूर्ण शब्दों में रामचंद्र जी से कहा कि हम लोगों के स्वामी खर के क्रोध को प्रदीप्त करने के कारण आज संग्राम में तुम ही हम लोगों के द्वारा मारे जाकर अपने प्राण गंवाओगे। इतना कहकर उन राक्षसों ने अपने अस्त्रों को उठाकर श्री रामचंद्र जी पर आक्रमण कर दिया । वाल्मीकि कृत रामायण से में पता चलता है कि उन राक्षसों के आक्रमण करने पर महातेजस्वी श्रीराम ने सूर्य के समान देदीप्यमान बिना फ़र के बाण राक्षसों पर उसी प्रकार छोड़े जिस प्रकार इंद्र अपना वज्र चलाते हैं।
        रामचंद्र जी के इस प्रकार के बाणों के तीव्र प्रहार को आज से पहले उन 14 राक्षसों ने कभी देखा नहीं था। उन्हें भारत के आर्य राजाओं की सात्विक वीरता का अब से पहले परिचय नहीं हुआ था। आज जब उन्होंने श्री राम को सात्विक वीर की भाटी युद्ध करते हुए देखा तो वह आश्चर्यचकित रह गए । उन्हें युद्ध से पहले तो ऐसा लग रहा था कि जैसे वह रामचंद्र और लक्ष्मण को अपनी मुट्ठी से भींचकर ही मार डालेंगे । यही कारण था कि उन्होंने आवेश में आकर श्री राम जी से यह कह दिया था कि आज वही हमारे द्वारा मारे जाएंगे।
    उन्हें नहीं पता था कि उनकी जीवन लीला अब थोड़ी ही देर की है। रामचंद्र जी ने अपनी क्षत्रिय मर्यादा का पालन करते हुए उन्हें भागने का अवसर दिया था। पर जब देखा कि वह युद्ध में डटकर उनसे दो-दो हाथ करना चाहते हैं तो रामचंद्र जी ने अपने तीखे बाणों से उन्हें शीघ्र ही धराशायी कर दिया। रामचंद्र जी के बाणों के वेग से राक्षसों के हृदय विदीर्ण  हो गए और रुधिर में सने वे भूमि पर इस प्रकार जा पड़े जैसे भीषण शब्द करते हुए बिजली गिरती है। ये राक्षस खून से लथपथ थे । उनकी आकृति बिगड़ गई और वे निर्जीव हो गए।

    “जो बीज पाप के बोते हैं
    वे भक्षक मानवता के होते।
    ऐसे उन हत्यारे लोगों का,
    नहीं बोझ वीर कभी ढोते ।।

    जिनके हृदय में पाप वासना
    स्थायी निवास किया करती ।
    उन नीच पातकों का रण में,
    तलवारें विनाश किया करतीं।।”

         इन 14 राक्षसों को लेकर जब शूर्पणखा श्री राम और लक्ष्मण की ओर चली थी तो उसे भी यह घमंड था कि वह इन राक्षसों के माध्यम से श्री राम और लक्ष्मण का वध करवा देगी।परंतु उसका यह सपना साकार नहीं हुआ। जब उसने अपनी आंखों से उन 14 राक्षसों के शव देखे तो वह अत्यंत दुखी हुई और मूर्छित होकर धरती पर गिर पड़ी।  इस बार श्रीराम ने लक्ष्मण से यह नहीं कहा कि इस मूर्छित महिला की गर्दन उतार दें या उसके साथ कोई भी ऐसा अशोभनीय व्यवहार करें जो कि शास्त्र विरुद्ध हो। यद्यपि वह  यह भली प्रकार जानते थे कि शूर्पणखा को यहां से जीवित छोड़कर वापस भेजना उनके लिए फिर नए खतरों को निमंत्रण देने के समान होगा। परंतु उन्होंने इस बार उसे निर्दोष समझा । वीरता का तकाजा भी यही होता है कि जो शत्रु बिना हथियारों के सामने खड़ा हो उस पर हमला नहीं करना चाहिए। यद्यपि यह भी कहा जा सकता है कि जिस समय शूर्पणखा की नाक काटी गई थी, उस समय भी तो वह बिना हथियारों के थी ?  यहां पर यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि जिस समय शूर्पणखा की नाक काटी गई थी उस समय वह सीता जी पर हमला करने पर आतुर हो गई थी। उसकी उस उद्दंडता का उस समय दण्ड दिया जाना उचित था।
            जब शूर्पणखा ने उन 14 राक्षसों को धरती पर लेटे हुए देखा तो वह एक बार तो स्वयं भी मूर्छित हो गई । इसका कारण केवल एक ही था कि उसने कभी सपने में भी यह नहीं सोचा था कि इन 14 राक्षसों का वध करने में भी श्री राम और लक्ष्मण सफल हो जाएंगे । कुछ समय उपरांत उसे होश आया तो होश में आते ही महानाद करती हुई बड़े वेग से अपने भाई खर के पास पहुंची और सूखी हुई लता के समान वहां जाकर गिर पड़ी। वास्तव में श्री राम और लक्ष्मण की वीरता इस राक्षसिन के लिए एक प्रकार की दलदल बन चुकी थी। वह जितनी शीघ्रता से इसमें से निकलने का प्रयास कर रही थी, उतना ही वह नीचे धँसती जा रही थी। उसके लिए सब कुछ अप्रत्याशित होता जा रहा था और वह समझ नहीं पा रही थी कि आखिर श्री राम और लक्ष्मण का अंत कैसे किया जाए ?
        अब उसे एक बार फिर एक ऐसा नाटक करना था जिससे उसके भाई उसके तथाकथित अपमान का बदला लेने के लिए श्री राम और लक्ष्मण के वध की कोई नई योजना बनाते । उसके रोने, चीखने और चिल्लाने को देख कर उसके भाई खर ने कहा कि मैंने तो तुझे खुश करने के लिए राम और लक्ष्मण का रक्तपान करने के लिए 14 राक्षस भेज दिए थे।  अब तू किस बात के लिए रो रही है?” – इसका अभिप्राय है कि खर और दूषण को अपने उन 14 राक्षसों पर यह पूर्ण विश्वास था कि वे रामचंद्र जी का वध करके ही लौटेंगे और उनकी बहन शूर्पणखा श्री राम और लक्ष्मण का रक्तपान कर लेगी।  खर नाम के उस राक्षस ने अपनी बहन शूर्पणखा को सांत्वना देते हुए कहा कि जब तेरी रक्षा के लिए मैं स्वयं यहां पर उपस्थित हूं तो तुझे इस प्रकार अनाथों की तरह रोने की आवश्यकता नहीं है ? तू मुझे वास्तविकता बता। जिससे मैं राम और लक्ष्मण के वध का प्रबंध कर सकूं। मुझे तेरे आंसू नहीं चाहिए। मैं चाहता हूं कि उस शत्रुओं का विनाश हो , जिन्होंने तेरा यह रूप कर दिया है। मैं नहीं मानता कि हमें कोई चुनौती देने वाला मनुष्य इस वन में आ सकता है । खर ने जो भी कुछ कहा, वह उसके अहंकार को प्रकट कर रहा था और अहंकार ही वह चीज है जो व्यक्ति को नीचे गिराती है।
        खर के इस प्रकार पूछने पर शूर्पणखा ने वह सारी सच्चाई बता दी, जिसके चलते खर के द्वारा भेजे गए 14 राक्षसों का बुरा हाल हो चुका था । उसने रोते-रोते यह बताया कि भाई उन 14 राक्षसों का संहार करने में राम को तनिक भी देर नहीं लगी। शूर्पणखा के इस प्रकार के कथन से स्पष्ट हो गया कि वह श्रीराम की वीरता का लोहा मान चुकी थी। उसने अपने भाई से आगे कहा कि अब तुम्हारे वे 14 राक्षस इस दुनिया में नहीं हैं। मैंने जब उन 14 राक्षसों को धरती पर पड़े देखा तो मुझे बहुत अधिक दु:ख हुआ। मैं अत्यंत भयभीत हो गई और अब भयभीत अवस्था में ही तुम्हारे पास इस आशा से लौटी हूं कि तुम शत्रु का विनाश करने में देर नहीं करोगे।
        उसने कहा कि – “विषादरूपी मगरमच्छों से परिपूर्ण तथा भय रूपी तरंगों से तरंगित महासागर में मैं डूब रही हूं। फिर तू मुझे बचाता क्यों नहीं है ?” वास्तव में शूर्पणखा को अपनी वासना का भूत इस स्थिति तक ले तो आया लेकिन अब वह इससे सम्मानजनक ढंग से निकलना चाहती थी। वह चाहती थी कि शत्रु को बदनाम करके किसी तरीके से उसका अंत करा दिया जाए, अन्यथा लोग उसे ही गलत बताएंगे। यद्यपि उसे यह पता नहीं था कि अब वह अपने ही विनाश के रास्ते पर चल चुकी है। उसने अपने राक्षस कुल का विनाश कराने की नींव रख दी थी।

    राकेश कुमार आर्य
    राकेश कुमार आर्यhttps://www.pravakta.com/author/rakesharyaprawakta-com
    उगता भारत’ साप्ताहिक / दैनिक समाचारपत्र के संपादक; बी.ए. ,एलएल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता। राकेश आर्य जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक चालीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में ' 'राष्ट्रीय प्रेस महासंघ ' के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं । उत्कृष्ट लेखन के लिए राजस्थान के राज्यपाल श्री कल्याण सिंह जी सहित कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित किए जा चुके हैं । सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। ग्रेटर नोएडा , जनपद गौतमबुध नगर दादरी, उ.प्र. के निवासी हैं।

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here

    * Copy This Password *

    * Type Or Paste Password Here *

    12,268 Spam Comments Blocked so far by Spam Free Wordpress

    Captcha verification failed!
    CAPTCHA user score failed. Please contact us!

    Must Read