लेखक परिचय

संजय द्विवेदी

संजय द्विवेदी

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। संपर्कः अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र) मोबाइलः 098935-98888

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नक्सली समस्या जिस विकराल रूप में आज हमारे सामने है उसने देश की व्यवस्था के सामने कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं। यह सोचना बहुत रोमांचक है कि आखिर ऐसे कौन से हालात हैं जिनमें कोई व्यक्ति किसी अतिवादी विचार से प्रभावित होकर नक्सली बन जाता है। वो कौन से हालात है जिनमें एक सहज-सरल आदिवासी बंदूक उठाकर व्यवस्था को चुनौती देने के लिए खड़ा हो जाता है। अब हालात यह हैं कि नक्सलवादी संगठन लोगों को जबरिया भी नक्सली बना रहे हैं। हर घर से एक नौजवान देने की बात भी कई इलाकों मे नक्सलियों ने चलाई है।बीस राज्यों के 223 जिलों के दो हजार से अधिक थाना क्षेत्रों में फैला यह माओवादी आतंकवाद साधारण नहीं है।

यह सोच बेहद बचकानी है कि अभाव के चलते आदिवासी समाज नक्सलवाद की ओर बढ़ा है। आदिवासी अपने में ही बेहद संतोष के साथ रहने वाला समाज है। जिसकी जरूरतें बहुत सीमित हैं। यह बात जरूर है कि आज के विकास की रोशनी उन तक नहीं पहुंची है। नक्सलियों ने उनकी जिंदगी में दखल देकर हो सकता है उन्हें कुछ फौरी न्याय दिलाया भी हो, पर अब वे उसकी जो कीमत वसूल रहे हैं, वह बहुत भारी है। जिसने एक बड़े इलाके को युद्धभूमि में तब्दील कर दिया है। हां, इस बात के लिए इस अराजकता के सृजन को भी महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए कि इस बहाने इन उपेक्षित इलाकों और समाजों की ओर केंद्र सरकार गंभीरता से देखने लगी है। योजना आयोग भी आज कह रहा है कि इन समाजों की बेसिक जरूरतों को पूरा करना जरूरी है। यह सही मायनों में भारतीय लोकतंत्र और हमारी आर्थिक योजनाओं की विफलता ही रही कि ये इलाके उग्रवाद का गढ़ बन गए। दूसरा बड़ा कारण राजनीतिक नेतृत्व की नाकामी रही। राजनैतिक दलों के स्थानीय नेताओं ने नक्सल समस्या के समाधान के बजाए उनसे राजनीतिक लाभ लिय़ा। उन्हें पैसे दिए, उनकी मदद से चुनाव जीते और जब यह भस्मासुर बन गए तो होश आया।

अब तक नक्सली आतंक के विस्तार का मूल कारण सामाजिक और आर्थिक ही बताया जा रहा है। कुछ विद्वान अपने रूमानीपने में इस नक्सली तेवर में क्रांति और जनमुक्ति का दर्शन भी तलाश लेते हैं। बावजूद इसके संकट अब इतने विकराल रूप में सामने है कि उसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। गरीबी, अशिक्षा, विकास और प्रशासन की पहुंच इन क्षेत्रों में न होना इसका बड़ा कारण बताया जा रहा। किंतु उग्रवाद को पोषित करने वाली विचारधारा तथा लोकतंत्र के प्रति अनास्था के चलते यह आंदोलन आम जन की सहानुभूति पाने में विफल है। साथ ही साथ विदेशी मदद और घातक हथियारों के उपयोग ने इस पूरे विचार को विवादों में ला दिया है। आम आदमी की लड़ाई लड़ने का दावा करने वाली ये ताकतें किस तरह से समाज के सबसे आखिरी पंक्ति में खड़े आदमी की जिंदगी को दुरूह बना रही हैं बहुत आसानी से समझा जा सकता है। स्कूल, सड़क, बिजली और विकास के कोई भी प्रतीक इन नक्सलियों को नहीं सुहाते। इनके करमों का ही फलित है कि आदिवासी इलाकों के स्कूल या तो नक्सलियों ने उड़ा दिए हैं या उनमें सुरक्षा बलों का डेरा है। युद्ध जैसे हालात पैदाकर ये कौन सा राज लाना चाहते हैं। इसे समझना कठिन है। जमीन और प्राकृतिक संसाधनों से आदिवासियों की बेदखली और उनके उत्पीड़न से उपजी रूमानी क्रांति कल्पनाएं जरूर देश के बुद्धिजीवियों को दिखती हैं पर नक्सलियों के आगमन के बाद आम आदमी की जिंदगी में जो तबाही और असुरक्षाबोध पैदा हुआ है उसका क्या जवाब है। राज्य की शक्ति को नियंत्रित करने के लिए तमाम फोरम हैं। राज्यों की पुलिस के तमाम बड़े अफसर सजा भोग रहे हैं, जेलों में हैं। किंतु आतिवादी ताकतों को आप किस तरह रोकेगें। राज्य का आतंक किसी भी आतिवादी आंदोलन के समर्थन करने की वजह नहीं बन सकता। बंदूक, राकेट लांचर और बमों से खून की होली खेलने वाली ऐसे जमातें जो हमारे सालों के संधर्ष से अर्जित लोकतंत्र को नष्ट करने का सपना देख रही हैं, जो वोट डालने वालों को रोकने और उनकी जान लेने की बात करती हैं उनके समर्थन में खड़े लोग यह तय करें कि क्या वे देश के प्रति वफादारी रखते हैं। विश्व की तेजी से बढ़ती अर्थव्यस्था और एक जीवंत लोकतंत्र के सामने जितनी बड़ी चुनौती ये नक्सली हैं उससे बड़ी चुनौती वे बुद्धिवादी हैं जिन्होंने बस्तर के जंगल तो नहीं देखे किंतु वहां के बारे में रूमानी कल्पनाएं कर कथित जनयुद्ध के किस्से लिखते हैं। यह देशद्रोह भी एक लोकतंत्र में ही चल सकता है। आपके कथित माओ के राज में यह मुक्त चिंतन नहीं चल सकता, इसीलिए इस देश में लोकतंत्र को बचाए रखना जरूरी है। क्योंकि लोकतंत्र ही एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें लोकतंत्र के विरोधी विमर्श और आंदोलन भी एक विचार के नाते स्वीकृति पाते हैं।

जिन्हें नक्सलवाद में इस देश का भविष्य नजर आ रहा है वे सावन के अंधों सरीखे हैं। वे भारत को जानते हैं, न भारत की शक्ति को। उन्हें विदेशी विचारों, विदेशी सोच और विदेशी पैसों पर पलने की आदत है। वे नहीं जानते कि यह देश कभी भी किसी अतिवादी विचार के साथ नहीं जी सकता। लोकतंत्र इस देश की सांसों में बसा है। यहां का आम आदमी किसी भी तरह के अतिवादी विचार के साथ खड़ा नहीं हो सकता। जंगलों में लगी आग किन ताकतों को ताकत दे रही है यह सोचने का समय आ गया है। भारत की आर्थिक प्रगति से किन्हें दर्द हो रहा है यह बहुत साफ है। आंखों पर किसी खास रंग का चश्मा हो तो सच दूर रहा जाता है। बस्तर के दर्द को, आदिवासी समाज के दर्द को वे महसूस नहीं कर सकते जो शहरों में बैठकर नक्सलियों की पैरवी में लगे हैं। जब झारखंड के फ्रांसिस इंदुरवर की गला रेतकर हत्या कर दी जाती है, जब बंगाल के पुलिस अफसर को युद्ध बंदी बना कर छोड़ा जाता है, राजनांदगांव जिले के एक सरपंच को गला रेतकर हत्या की जाती है, गढ़चिरौली में सत्रह पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी जाती है तब मानवाधिकारों के सेनानी और नक्सलियों के शुभचिंतक खामोश रहते हैं। उन्हें तो सारी परेशानी उस सलवा जूडूम से जो बस्तर के जंगलों में नक्सलियों के खिलाफ हिम्मत से खड़ा है। पर इतना जरूर सोचिए जो मौत के पर्याय बन सके नक्सलियों के खिलाफ हिम्मत से खड़े हैं क्या उनकी निंदा होनी चाहिए। उनकी हिम्मत को दाद देने के बजाए हम सलवा जूडूम के खिलाफ लड़ रहे हैं। इस बुद्धिवादी जमात पर तरस खाने के अलावा क्या किया जा सकता है।

देश की सरकार को चाहिए कि वह उन सूत्रों की तलाश करे जिनसे नक्सली शक्ति पाते हैं। नक्सलियों का आर्थिक तंत्र तोड़ना भी बहुत जरूरी है। विचारधारा की विकृति व्याख्या कर रहे बुद्धिजीवियों को भी वैचारिक रूप से जवाब देना जरूरी है ताकि अब लगभग खूनी खेल खेलने में नक्सलियों को महिमामंडित करने से रोका जा सके। राजनीतिक नेतृत्व को भी अपनी दृढ़ता का परिचय देते हुए नक्सलियों के दमन, आदिवासी क्षेत्रों और समाज के सर्वांगीण विकास, वैचारिक प्रबोधन के साथ-साथ समाजवैज्ञानिकों के सहयोग से ऐसा रास्ता निकालना चाहिए ताकि दोबारा लोकतंत्र विरोधी ताकतें खून की होली न खेल सकें और हमारे जंगल, जल और जमीन के वास्तविक मालिक यानि आदिवासी समाज के लोग इस जनतंत्र में अपनी बेहतरी के रास्ते पा सकें। तंत्र की संवेदनशीलता और ईमानदारी से ही यह संकट टाला जा सकता है, हमने आज पहल तेज न की तो कल बहुत देर हो जाएगी।

-संजय द्विवेदी

11 Responses to “कोई क्यों बन जाता है नक्सली”

  1. kalhad

    माओवादी सत्ता प्राप्ति के अपने यज्ञ में आदिवासीयो की आहुति दे रहे है. उन्हें आदिवासियों के विकास की नहीं अपनी राजनेतिक भूख की चिंता है. लाखो के आधुनिक हथियार गरीब आदिवासी के हाथो में देकर वो यह भूल जाते है की यही लाखो रूपये अगर वो इन आदिवासीयो के विकास में क्यों नहीं खर्च करते. स्कूल, अस्पताल गिरा के किस विकास की लड़ाई लड़ेंगे. आदिवासी बस सत्ता लोलुपता के यज्ञ में भस्म होने के लिए है, उनकी गरीबी, सरलता रक्त पिपासु को शक्ति प्रदान करती है.

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  2. om prakash shukla

    आपका लेख एकतरफा और पूर्वाग्रह से ग्रसित है अप किस लोकतंत्र की बात केर रहे है जिसमे अपराधियो और भ्रष्टाचार में गले तक दुबे लोग भरे हुए है.लोकतंत्र का मतलब वो लोग क्या समझे जिन्हें सिर्फ अपनी कुर्सी ही सबसे बड़ा जनहित लगता है.चाहे कोई दल हो किसी तरह कोई सम्झुओता केर के अपने स्वार्थ सीधी में लगा है.जहा karodo का lendn केर sarkar bachai jati है और सीबीआई द्वारा धमका केर समर्थन लिया जाता है.जनप्रतिनिधि द्वारा पैसा लेकर पुजीपतियो के हित में सवाल पुचा जाता है हेर loktantrik parumparao की awhelna ker janta dwaea chune bagar kisi ke manoneetker banaye gaye pradhanmantri dwara kisi garsamvadhanic satta dwara nerdesh de kerbagar kisi jabab dehi ke deshi videshi pujipatio ke haq me fasalr liye jate hai.kisano ki upjau jamin chin ker pujipatio ko kuosio ke mol de diya jata hai.mahoday ji अप लोकतंत्र की बात तो mat ही kare तो acha है isi lotantrake bare ma dhumol ne kaha हैहमारे यहाँ लोकतंत्र वो तमाशा है जिसकी जुबान मदारी की भाषा है. ये आदिवासियो को यह कहना की वे तो बड़े संतोषी है उन्हें बरगलाया जा raha है wahi jhuth है jise hamare nata ajadi के bad से ही बोलते ए है परन्तु जब से इन adivasi ilake में lohe और anya khanij का pata chala manmohan chidumberum की jodi jo ghoshit rup से pujipastio की dalali में lagi है,इन इलाको को किसी कीमत पैर vikasitkerne का khyab dikhane में lagi है.आदिवासियो को किसी तरह भागना ही उनका मुख्या अगेंडा है जहा तक सलवा जदुम का सवाल है तो उसके बारे में सर्वोचा न्यायलय ने bahut kuch kah diya है.

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  3. पंकज झा

    पंकज झा.

    हर बात में केवल नेताओं को गाली देने से काम नहीं चलेगा दिव्या जी. सबसे निठल्ले और निकम्मे हम “मध्य” कहे जाने वाले वर्ग हैं. अगर क़ुतुब मीनार भी टेढा हो गया तो भी नेताओं को ही गाली देने के फैशन से हमें बचना चाहिए. अगर सिस्टम में कोई खामी है तो उसको दूर करने की जिम्मेदारी भी केवल नेताओं की नहीं है. अगर हम अपने अपने गिरेबां में झाँक कर देखें तो पता चलेगा कि हममें कितना नागरिक बोध बचा है. संजय जी ने जिस बेहतरीन तरीके से कुछ चीज़ों की ओर इशारा किया है, उसके निहितार्थ को समझना ज्यादा ज़रूरी है बजाय नेताओं को गरियाने के.

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  4. Divya

    nitthalle aur nikkamme neta jab tak rahenge..yahi hoga.

    Vikalp ka abhaav !

    We are forced to tolerate such maggots !

    zeal

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  5. श्रीराम तिवारी

    श्रीराम तिवारी

    sajni ameer sajan gareeb_satta ameer voter gareeb..
    dunia ke bade -bade mahasagron me ek ;hind mahasagar kee charon oor dhoom hai.
    uttar me iske hari-bhari dharti;vandneey jag me
    bharat kee bhoomi hai..
    mansooni havaon ke lom-anulom hote;
    greeshm sang pawaskee ritu rahi zoom hai.
    sharad shishir hemant vasant jahan,
    manmohak ruiton se dev mahroom hai.
    ..him shailnandini sada neera saritae, kal-kal karti kilol machi dhoom hai. hari-bhari vadiya himalaya ki god me, prakratik sampada khanij bharpoor hai. van-upvan phaile phali khetiyan, kyon kuchh malamal baki mazloom hai. Tyag balidanki virasaten bhi kam nahi, keerti-pataka rahi neel gagan choom hai.. Buddhi-gyan-karmyog dharamandhari, atript chanchala-si kyo machal rahi bhoomi hai. Samvedanae bhet chadhi swarthi uttang shring, kaun zimmedar hai sabko maloom hai…..Shriram Tiwari, Indore.

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  6. Rakhi Singh

    “यह सोच बेहद बचकानी है कि अभाव के चलते आदिवासी समाज नक्सलवाद की ओर बढ़ा है। आदिवासी अपने में ही बेहद संतोष के साथ रहने वाला समाज है। जिसकी जरूरतें बहुत सीमित हैं। यह बात जरूर है कि आज के विकास की रोशनी उन तक नहीं पहुंची है। नक्सलियों ने उनकी जिंदगी में दखल देकर हो सकता है उन्हें कुछ फौरी न्याय दिलाया भी हो, पर अब वे उसकी जो कीमत वसूल रहे हैं, वह बहुत भारी है। जिसने एक बड़े इलाके को युद्धभूमि में तब्दील कर दिया है।”

    मैं लेखक के इस विचार से काफी सहमत हूँ . सामाजिक वैज्ञानिकों एवं सामाजिक एक्टिविस्ट्स का यह विचार है की इनेकुँलिटी एवं आभाव के कारन नक्सल पैदा होता हैं . परन्तु तथ्य इस बात को सावित नहीं करता है . अगर ऐसा होता तो राजस्थान , हिमाचल प्रदेश , उतरांचल में नाक्सालिस्म का प्रभाव जयादा होता कयोंकि वहां असामनता एवं आभाव जयादा है. जबकि वहां पर नाक्सालिस्म बिलकुल ही नहीं है. मेरे विचार में मओइस्त विचारधारा जयादा कारगर सिद्ध हुई है नाक्सालिस्म को बढ़ने में. नक्सल प्रभवित राज्यों में मओइस्त विचारधारा का प्रभाव जयादा है. इसलिए नाक्सालिस्म को रोकने के लिए एक सामानांतर विचारधारा चलानी होगी जो इसको काउंटर करे . मेरे विचार में संघ परिवार द्वारा चलाई जा रही वनवाशी कल्याण योजना जैसे प्रोग्राम ही नक्सल को रोकने में सहायक हो सकता है . इस तरह के और भी योजनायें बृहत् स्तर पर शुरू की जानी चाहिए. सरकर को भी ऐसे कार्यक्रम लागु करने चाहिए.

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  7. Dr. Purushottam Meena

    उक्त लेख के लेखक के साथ-साथ मैं ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को सम्बोधित करके कहना चाहता हँू, जिसे इंसाफ एवं समानता की संवैधानिक विचारधारा मैं विश्वास हो। केवल कागजी या दिखावटी नहीं, बल्कि जिसे सच्चा और व्यावहारिक विश्वास हो। तो कृपया बिना किसी पूर्वाग्रह के इस बात को समझने का प्रयास करें कि एक ओर तो कहा जाता है कि हमारे देश में लोकतन्त्र है और दूसरी ओर लोकतन्त्र के नाम पर १९४७ से लगातार नाटक खेला जा रहा है। यदि देश में लोकतन्त्र है तो लोकतन्त्र में समस्त देश के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व होना चाहिये। अन्यथा तो लोकतन्त्र का कोई मायने नहीं रह जाता है। कुछ लोग कहते हैं, कि इस देश में तो लोकतन्त्र नहीं, केवल भीड तन्त्र है। इस विचारधारा के लोगों से भी मेरा सवाल है कि यदि लोकतन्त्र नहीं, भीडतन्त्र है तो केवल दो प्रतिशत लोगों के हाथ में इस देश की सत्ता और संसाधन क्यों हैं? भीडतन्त्र इन दो प्रतिशत लोगों से सत्ता एवं सभी प्रकार के संसाधनों पर से अपना अधिकार छीनती क्यों नहीं है?

    वर्तमान में आदिवासी की दशा, इस देश में सबसे बुरी है। बहुत कम लोग जानते हैं कि आजादी के बाद से आज तक उसका केवल शोषण ही शोषण किया जाता रहा है। कडवा सच तो यह भी है कि दलितों ने भी आदिवासी का शोषण किया है, एससी/एसटी दो वर्ग हैं, लेकिन सरकार की कुनीतियों के चलते, एससी/एसटी हितों के लिये काम करने वाले सभी प्रकोष्ठों पर देशभर में केवल एससी के लोगों ने कब्जा जमा रखा है और एससी/एसटी के हितों की रक्षा एवं संरक्षण के नाम पर केवल एससी के हितों का ध्यान रखा जाता रहा है। केन्द्र या राज्यों की सरकारों द्वारा तो यह तक नहीं पूछा जाता कि एससी एवं एसटी वर्गों के अलग-अलग कितने लोगों का भला किया गया?

    आदिवासियों के उत्थान की कथित योजनाओं के क्रियान्वयन के लिये ऐसे लोगों को जिम्मेदारी दी गयी है, जो आदिवासी को एवं आदिवासियों की समस्याओं के बारे में कुछ नहीं जानते, लेकिन यह अच्छी तरह से जानते हैं कि बिना कुछ किये आदिवासियों के लिये आवण्टित फण्ड को हजम कैसे किया जाता है। ऐसे ब्यूरोके्रट्‌स को दलितों का पूर्ण समर्थन मिलता है। यहाँ यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि दलितों में सभी लोग आदिवासियों के विरोधी या दुश्मन नहीं हैं, बल्कि एक जाति विशेष के कुछे चालाक लोगों ने एससी/एसटी एकता के नाम पर हर जगह कब्जा जमा रखा है। ये लोग एससी की अन्य जातियों के भी शोषक हैं। जिस देश में हर जाति एक राष्ट्रीय पहचान रखती हो, उस देश में एक वर्ग में बेमेल जातियों को शामिल कर देना और दो पूरी तरह से संवैधानिक रूप से भिन्न वर्गों (एससी एवं एसटी) को एक ही डण्डे से हाँकना, किस बेवकूफ की नीति है? यह तो सरकार ही बतला सकती है, लेकिन यह सही है कि आदिवासी को आज तक न तो समझा गया है और न हीं इस दिशा में सार्थक पहल की जा रही है।

    दूसरी ओर केवल दो प्रतिशत लोग लच्छेदार तर्कों के जरिये इस देश को लूट रहे हैं और ९८ प्रतिशत लोगों को मूर्ख बना रहे हैं। मुझे तो यह जानकर आश्चर्य हुआ कि इन दो प्रतिशत लोगों में हत्या जैसे जघन्य अपराध करने वालों की संख्या तुलनात्मक दृष्टि से कई गुनी है, लेकिन इनमें से किसी बिरले को ही कभी फांसी की सजा सुनाई गयी? इसके पीछे भी कोई नकोई समझ तो काम कर ही रही है। जबकि अन्य ९८ प्रतिशत लोगों को छोटे और कम घिनौने मामलों में भी फांसी का हार पहना कर देश के कानून की रक्षा करने का फर्ज बखूबी निभाया जा रहा है। इनमें आदिवासियों की संख्या देखकर तो कोई भी संवेदनशील व्यक्ति सदमाग्रस्त हो सकता है! यदि किसी को विश्वास नहीं हो तो सूचना अधिकार कानून के तहत सुप्रीम कोर्ट से आंकडे प्राप्त करके स्वयं जाना जा सकता है कि किस-किस जाति के, कितने-कितने लोगों ने एक साथ एक से अधिक लोगों की हत्या की और उनमें से किस-किस जाति के कितने-कितने लोगों को फांसी दी गयी और किनको चार-पाँच लोगों की हत्या के बाद भी केवल उम्रकैद की सजा सुनाई गयी।

    यही नहीं आप आँकडे निकाल कर पता कर लें कि किस जाति की महिलाओं के साथ बलात्कार अधिक होते हैं? किस जाति की महिलाओं के साथ बलात्कार होने पर सजा दी जाती है एवं किस जाति की महिला के साथ बलात्कार होने पर मामला पुलिस के स्तर पर ही रफा-दफा कर दिया जाता है या अदालत में जाकर कोई सांकेतिक सजा के बाद समाप्त हो जाता है?
    आप यह भी पता कर सकते हैं कि इस देश के दो प्रतिशत महा मानवों के मामलों में कितनी जल्दी न्याय मिलता है, जबकि शेष ९८ प्रतिशत के मामलों में केवल तारीख और तारीख बस! मानव अधिकार आयोग, महिला आयोग आदि के द्वारा सुलटाये गये मामले उठा कर देखें, इनमें कितने लोगों को न्याय या मदद मिलती है? यहाँ पर भी जाति एवं महामानव होने की महचान काम काम करती है। यह फेहरिस्त बहुत लम्बी है!
    ऐसे असंवेदनशील, असंवैधानिक, विभेदकारी और मानमाने हालातों में आश्चर्य इस बात का नहीं होना चाहिये कि नक्सनवाद क्यों पनप रहा है, बल्कि आश्चर्य तो इस बात का होना चाहिये कि इतना अधिक क्रुरतापूर्ण दुर्व्यवहार होने पर भी केवल नक्लवाद ही पनप रहा है! लोग अभी भी आसानी से जिन्दा हैं! अभी भी लोग शान्ति की बात करते हैं!

    एक झूट की ओर भी ध्यान खींचना जरूरी है वह यह कि नक्लवादियों के बारे में यह कु-प्रचारित किया जा रहा है कि नक्सली केवल आदिवासी हैं! सच्चाई यह है कि हर वह व्यक्ति जिसका शोषण हो रहा है, जिसकी आँखों के सामने उसकी माँ, बहन, बेटी और बहू की इज्जत लूटी जा रही है, नक्सलवादी बन रहा है!
    नक्लवादियों को मारकर इस समस्या से निपटा नहीं जा सकता, क्योंकि बीमार को मार देने से बीमारी को समाप्त नहीं किया जा सकता। यदि बीमारी के कारणों को ईमानदारी से पहचान कर, उनका ईमानदारी से उपचार करें तो नक्सलवाद क्या, किसी भी समस्या का समाधान सम्भव है, लेकिन अंग्रेजों की शोषणकारी आईएएस एवं आईपीएस लॉबी के भरोसे देश को चलाने वालों से यह आशा नहीं की जा सकती कि नक्सलवाद का समाधान सम्भव है। कम से कम डॉ. मनमोहन सिंह जैसे पूर्व अफसरशाह के प्रधानमन्त्री रहते तो बिल्कुल भी आशा नहीं की जा सकती। (१८.०३.२०१०)

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  8. श्रीराम तिवारी

    Shriram Tiwari

    उच्छशिक्षित, बेरोज़गार, असहाय, दिशाहीन, भटका हुआ नवयुवक जो नंगे-भूखे रहकर मार जाना पसंद नही करता और उसे क्रांति का सपना दिखाना जो भले ही रक्त रंजीत हो, वह पसंद करने लगता है, एक बार उस मंद का खा-पी लेने के बाद बाहर निकलना चाहे तो भी निकलना मुश्किल होता है.

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  9. Balkrishan Rajput

    सरकारों को पहले सिर्फ वोटर की जरूरत होती थी किन्तु अब उद्योगपतियों के दबाब मैं उनको अब सिर्फ ऐसे वोटरों की जरूरत है जो उपभोक्ता भी हों. आदिवासी सिर्फ वोटर हैं और उपभोक्ता नहीं बन पाए. और जो उपभोक्ता नहीं है उसकी किसी को परवाह नहीं.

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  10. Vishaal Raka

    सबसे पहले आदिवासिओं को समझने की कोशिश करनी चाहिए अरबों रूपये की लागत से खड़े किये गए सोशल रिसर्च संसथान कब काम आयेंगे. इस देश मैं हर आदमी को उपभोक्ता बनाया जा रहा है. आदिवासी भी हमारे समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा है अमूल्य प्राकृतिक सम्पदा के दोहन के लिए आदिवासिओं को उनकी जगह से हटाना सही है या गलत? ये हमें सोचना होगा. विकास को थोपना भी कान्हा तक जायज है ? ये भी सोचना होगा.

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  11. alok mohan

    देश की सरकार को चाहिए कि वह उन सूत्रों की तलाश करे जिनसे नक्सली शक्ति पाते हैं। नक्सलियों का आर्थिक तंत्र तोड़ना भी बहुत जरूरी है। विचारधारा की विकृति व्याख्या कर रहे बुद्धिजीवियों को भी वैचारिक रूप से जवाब देना जरूरी है

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