संसद की आवाज़ क्यों नहीँ बनती बेटियां  ?

संसद की आवाज़ क्यों नहीँ बनती बेटियां  ?

प्रभुनाथ शुक्ल

समाज में बेटियों की सुरक्षा को लेकर हम जिस
जिस चौराहे पर खड़े हैं , उसके दाहिने तरफ़ बेटियों की उपलब्धि का अनंत आकाश है तो  दूसरी तरफ़ पुरुष समाज के चारित्रिक पतन का अकल्पनीय गहरी गर्त। कामनवेल्थ में बेटियां सोना लूटती हैं और देश उनके साथ बलात्कार होता है। कन्याभ्रूण हत्या और बलात्कार आधुनिक भारत की सामजिक त्रासदी है। ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट शहर में हाल में  ख़त्म हुए  21वें राष्ट्रमंडल खेलों के की बात कर रहे हैं।  भारत के लिए यह उम्मीद भरा आगाज रहा। देश की बेटीयों ने अपने को बेहतर साबित करने का कोई मौका नहीँ छोड़ा। अपने दमदार प्रदर्शन से खिलाड़ियों ने 26 स्वर्ण, 20 रजत और 20 कांस्य पदक सहित 66 पदकों के साथ देश को तीसरा स्थान दिलाया। जिसमें बेटीयों का किरदार अहम रहा। लेकिन यह विसाल जीत आखिर किस काम की। जिन  खुशियों में हमारे समाज को सहभागी बनना चाहिए उसमें हम खल नायक बन रहे हैं। आये दिन बेटीयों से बलात्कार और उनकी हत्याएं हो रही हैं।हमारे समाज की नैतिकता गिर गई है। सामाजिक मापदंडों का पतन हो चला है। तकनीकी और शैक्षिक रुप से जितने हम मजबूत और सभ्य हो रहे हैं, सामाजिक नैतिकता उतनी ही नीचे गिर रही है। बदलते दौर में सामाजिक सम्बन्ध की कोई परिभाषा नहीं बची है जो लांछित न हुईं हो। हम आधुनिक सोच का डंका पीट प्रगतिवादी होने का खोखला दम्भ भर रहे हैं। सामाजिक मनोवृत्ति में ऋणात्मक गिरावट दर्ज़ की जा रही है। समाज में असुरक्षा की भावना घर कर गई है। बेटियों की सुरक्षा को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। महिलाएँ और बेटियाँ घर से लेकर कार्यस्थल और सड़क पर असुरक्षित हैं। हर मां-बाप की सबसे बड़ी चिंता उसकी बेटी है। बेटी बचाओ, बेटी बढ़ाओ का नारा शर्मिंदा हो रहा है।राष्ट्रमंडल और दूसरे खेलों के ज़रिए बेटीयों ने यह मिथक तोड़ा है की कौन कहता है कि भारत की बेटियों में दम नहीं है। देश के खिलाड़ियों में पदक जीतने की क्षमता नहीं है। इस तरह के सवालों का जवाब  बेटीयों ने बखूबी दिया है।साइना की सनसनी,मल्लेश्वरी का पंच विनेश फोगाट के दंगल ने जहाँ कोहराम मचा दिया। वहीं 35 साल की  मैरीकॉम ने तो राष्ट्रमंडल खेलों का अपना पहला स्वर्ण पदक जीता। इस जीत से पांच बार की विश्व चैंपियन और एशियन गेम्स की स्वर्ण पदक विजेता मैरी ने हर बार अपने ऊपर उठते सवालों का जवाब दिया। महिला वर्ग में 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में 16 वर्षीय मनु भाकर द्वारा जीता गया स्वर्ण पदक सबसे अधिक महत्वपूर्ण रहा। यह उनका पहला राष्ट्रमंडल खेल था। जबकि संजिता चानू का पुराना अनुभव स्वर्णिम कामयाबी के रूप मे काम आया। मीराबाई चानू और वाराणसी के एक छोटे से गाँव की बेटी पूनम यादव ने भी पहली बार स्वर्ण पदक हासिल कर बेटीयों के जलवे को कायम रखा। इसके अलावा दीपिका और जोशना भारत की स्क्वैश सुपरगर्ल्स के रुप में उभरी जबकि टेबल टेनिस में मनिका बत्रा स्टार बनकर एक नई उम्मीद के रुप में सामने आयीं। इसके अलावा बैडमिंटन से साइना नेहवाल के अनुभव ने जहाँ भारत को जीत दिलाई । देश की उभरती पहलवान साक्षी मलिक ने अखाडे़ में दमखम दिखा कर ओलंपिक में मैडल लाकर साबित कर दिया कि  बेटियां भी कुश्ती में देश का नाम पूरी दुनिया में रोशन कर सकती हैं। ओलंपिक की कांस्य पदक विजेता साक्षी मलिक ने उम्मीद की एक नई लौ जलाया है।सात समंदर पार भारतीय बेटियां कल्पना से परे बेहतर उम्मीद की उड़ान भर रही थी। हाथों में देश के तिरंगे को लेकर नया अभिमान और आयाम गढ़ रही थी। जबकि हमारा समाज कठुआ ,  उन्नाव और सूरत में उनकी इस उपलब्धि और राष्ट्रीय स्वभिमान को अपनी हवस के नीचे रौंद रहा था। कठुआ पर भी राजनीति हो रही है । बेटीयों को भी धर्म और जाति में बाँटा जा रहा है। बलात्कारी को भी धर्म विशेष से जोड़ा जा रहा है। हमारे लिए यह कितने शर्म की बात है। एक मासूम बेटी को न्याय दिलाने बजाय राजनीति की जा रही है। कोई हमें यह बताए भारत में ऐसा कौन सा धर्म और समुदाय है जिसकी बेटी के साथ यह घिनौना महापाप न किया गया हो। समाज का हर समुदाय पीड़ित है फ़िर बलात्कार को हिन्दू – मुस्लिम में बाँटने की साजिस क्यों कि जा रही है ? भारत की बहादुर बेटियां समाज से यह सवाल पूँछ रही हैं कि हमने तो देश, परिवार , समाज को पूरा जीवन समर्पित कर दिया है। फ़िर उन्हें सिर उठा कर गर्व से जीने क्यों नहीँ दिया जा रहा। सड़क से लेक देवालय तक वह सुरक्षित क्यों हैं ? उनके अधिकार को क्यों कुचला जा रहा है। लाखों गिद्ध उनकी कोमल मांस नोचने को क्यों बेताब हैं। समाज में सीलभंग की स्पर्धा चल रही है। सबसे सुरक्षित जगह घर की चहारदीवारी भी बेटीयों को घूरती है। सड़क पर तरह – तरह की निगाहें उस पर एक साथ चुभती हैं। वह राह चलते गर्दन तक नहीँ घूमा सकती है।  लाड़ – प्यार और आलिंगन की स्नेहिल स्पर्श को भी वह नहीँ पढ़ पाती। जाने किस दिशा से उस पर हमला हो जाए कहना मुश्कील है। भारत की निर्भया , कठुआ की आसिफा , उन्नाव और सूरत की बेटियां सवाल पूँछ रही हैं ।  इसका जवाब क्या हमारे पास है। यूएन को इस मसले पर खुलकर आना पड़ा है। इससे बड़ा दुर्भाग्य हमारे लिए और क्या हो सकता है। निर्भया फंड में दो हजार करोड़ रुपए की वृद्धि होने के बावजूद जमीनी स्तर पर महिलाओं की सुरक्षा पर कोई ठोस नीति नहीं बन पाई। 2014 में एक अध्ययन में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए जिसमें पता चला कि देश भर में 52 फीसदी लड़कियों के साथ घर से स्कूल जाते या वापस आते हुए छेड़छाड़ होती है। जबकि स्कूल या कॉलेज जाते हुए 32 फीसदी लड़कियों का पीछा किया जाता है। निर्भया की घटना के बाद समाज की नींद टूटी है।  बेटियां खुली सड़क पर बिंदास चल सकेंगी।  कोई आंख उन्हें नहीँ घूरेगी , लेकिन ऐसा नहीँ हुआ। सामाजिक मनोवृत्ति में ऋणात्मक गिरावट दर्ज़ की जा रही है। हालात यहाँ तक पहुँच गए हैं कि राज्यों को फांसी जैसे कानून बनाने पड़ रहे हैं। राजस्थान , मध्यप्रदेश और हरियाणा में बलात्कार पर फांसी की सजा है। यूपी की योगी सरकार ने भी नाबालिग से बलात्कार पर फांसी की सजा का प्राविधान केंद्र को भेजने पर विचार कर रही है। 2017 में पूरे भारत में 16,863 नाबालिग बालिकाओं के साथ दुष्कर्म के मामले दर्ज किए गए हैं। 2016 में दुष्कर्म के कुल मामले 39,068 हुए । जिसमें 18 साल से कम आयु की लड़कियों की संख्या 16,863 थी । जबकि 6 साल से कम आयु की लड़कियों के साथ दुष्कर्म के 520 मामले हुए। 6 से 12 साल के बीच की 1596 मासूम ऐसी घटना की शिकार हुईं । 12 से 16 साल की उम्र में यह आंकड़ा चार अंकों यानी 6091 पहुँच गया। 16 से 18 साल  की लड़कियों से जुड़ी 8656 घटनाएं हुईं।बलात्कार रोकने के अब तक के सारे कानून बौने साबित हो रहे हैं। बलात्कार का मनोविज्ञान समझने में मनोचिकित्सक, सरकार और समाज सभी फेल हो चुके हैं। देश में कानून के बाद भी इस त्रासदी का हल होता नहीं दिख रहा। समाज में असुरक्षा की भावना घर कर गई है। बेटियों की सुरक्षा को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। महिलाएँ और बेटियाँ घर से लेकर कार्यस्थल और सड़क पर असुरक्षित हैं। हर मां-बाप की सबसे बड़ी चिंता उसकी बेटी है। लेकिन शर्म की बात है की दलित उत्पीड़न और आरक्षण संसद और नेताओं की पीड़ा बन जाता है । लेकिन बेटीयों की सुरक्षा पर कभी संसद नहीँ थमती और शोर- गुल नहीँ होता, क्यों ? इस पर भी विचार करना जरूरी है।

 

1 thought on “ संसद की आवाज़ क्यों नहीँ बनती बेटियां  ?

  1. कठोर कानून व समय सीमा में सजा जरूरी है।सजा भी सार्वजनिक जगह पर हो ।

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