“वैदिक धर्म और आर्यसमाज मुझे क्यों प्रिय है?”

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

हम बचपन में अपने माता-पिता द्वारा बतायी व कही गयी बातों को मानते थे। वह सनातनी पौराणिक मत के
अनुयायी थे। यह मत व विचारधारा उन्हें अपने माता-पिता व पूर्वजों से
प्राप्त हुई थी। हम जब बड़े हुए तो हमारा सम्पर्क एक समान वय के पड़ोसी
मित्र श्री धर्मपाल सिंह जी से हुआ जो हमारे ही स्कूल में कला वर्ग के
विद्यार्थी थे। श्री धर्मपाल सिंह आर्यसमाजी परिवार से थे तथा आर्यसमाज
के सक्रिय सदस्य थे। उन दिनों हम विज्ञान वर्ग में अध्ययन करते थे। दैवीय
कृपा से हमारा सम्पर्क हुआ और हम मित्र बन गये। इन दिनों हमारी आयु
लगभग 17 वर्ष की थी। सायं के समय हम दोनों ंमित्र स्थानीय धार्मिक व
सामाजिक संस्थाओं में भ्रमण करने जाते और वहां विद्वानों के उपदेश
श्रवण करते थे। उन दिनों पौराणिक विद्वान भी अपनी बातों को तर्क व युक्ति के आधार पर प्रस्तुत करने का प्रयत्न करते थे।
हम घर में माता-पिता के साथ सायंकालीन ‘ओ३म् जय जगदीश हरे’ एवं मां दुर्गा एवं लक्ष्मी आदि की आरतियां भी गाया करते
थे। यदा-कदा अपने माता-पिता जी के साथ स्थानीय प्रमुख धार्मिक स्थानों पर भी जाया करते थे। हमारे मित्र श्री धर्मपाल सिंह
हमें जिन-जिन संस्थाओं में ले जाते थे वहां विद्वानों के प्रवचन सुनकर हमारा ज्ञानवर्धन होता था और हमें लगता था कि
उनकी बातें लाभदायक एवं श्रवणीय हैं। कुछ समय बाद वह हमें आर्यसमाज मन्दिर धामावाला देहरादून के रविवारीय सत्संग
में भी ले जाने लगे। यहां भी हम यज्ञ, भजन व प्रवचन में हम भाग लेते थे। आर्यसमाज के विद्वानों की बातें भी हमें अच्छी
लगती थीं। हमने आर्यसमाज से कुछ लघु पुस्तिकायें भी लीं और उन्हें पढ़ा। आर्यसमाज में जाना लगभग नियमित हो गया
था। इस बीच जो आर्यसमाज में वेद कथायें एवं उत्सव हुए, उसमें भी हमने भाग लिया था। इसका परिणाम यह हुआ था कि हमें
आर्यसमाज की विचारधारा एवं मुख्य-मुख्य सिद्धान्तों का ज्ञान हो गया। आर्यसमाज के कुछ लोग सम्पर्क में आकर हमारे
मित्र बन गये और समय के साथ इनसे सम्बन्धों में और अधिक निकटता होती गई। यह सभी लोग आर्यसमाज के अच्छे
विद्वान थे। इन सबकी संगति में आर्यसमाज हमें अच्छा लगने लगा। श्री धर्मपाल सिंह जी प्रायः नियमित रूप से हमारे घर
आते और घण्टों बातें करते। उनके विचार हमारे परिवार के सभी लोगों को अच्छे लगते थे। इससे हमें आर्यसमाज को जानने,
समझने और आर्यसमाज के निकट आने में सहायता मिली।
आर्यसमाज का तीसरा नियम बताता है कि ‘वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ाना-पढ़ाना और सुनना-
सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।’ यह नियम तब हमें उतना समझ नहीं आया था जितना अब हम इसे समझते हैं। विश्व में
अगण्य धार्मिक एवं सामाजिक संगठन व संस्थायें हैं लेकिन कोई संस्था वेद को आर्यसमाज के समान महत्व नहीं देती। इसके
अनेक कारण हैं। इन कारणों में एक कारण सभी संस्थाओं में विद्यमान अज्ञान, अविद्या व अन्धविश्वास आदि तथा संस्था के
अविद्यायुक्त संस्कार आदि भी हैं। एक कारण यह भी लगता है कि वह उस सौभाग्य से वंचित है जो वेदों को जानने व मानने
वालों को प्राप्त होता है। आर्यसमाज वेदों को ईश्वरीय ज्ञान मानता है। सत्यार्थप्रकाश में वेद सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर से किस
प्रकार से चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा को प्राप्त हुए, इसका युक्तिसंगत एवं व्यवहारिक वर्णन है। चार
ऋषियों ने वेदों का ज्ञान ब्रह्मा जी को कराया और इन ऋषियों के द्वारा अन्य सभी मनुष्यों को वेदों का ज्ञान प्राप्त हुआ और
परम्परा से महाभारत काल तक प्राप्त होता रहा। वेदों का महत्व क्यों है? इसका प्रथम कारण तो वेदों का ईश्वर से प्राप्त होना
है। वेदों में ही ईश्वर एवं जीवात्मा सहित सृष्टि के उपादान कारण प्रकृति का यथार्थस्वरूप वर्णित है। वेदोत्पत्ति के बाद ईश्वर
का साक्षात्कार किये हुए ऋषियों ने वेदों की मान्यताओं व सिद्धान्तों की व्याख्यायें की और उनका मौखिक व ग्रन्थ लेखन

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आदि के द्वारा प्रचार किया। इसमें हम जहां वेदांग ग्रन्थों को ले सकते हैं वहीं उपनिषद एवं दर्शनों सहित मनुस्मृति, सुश्रुत,
चरक आदि अनेक ग्रन्थ हैं। रामायण एवं महाभारत भी भारत के स्वर्णिम इतिहास के ग्रन्थ हैं। विश्व के किसी अन्य देश में
ऐसे ऐतिहासिक ग्रन्थ नहीं मिलते। रामायण एवं महाभारत में तत्कालीन वैदिक समाज व्यवस्था का दिग्दर्शन भी प्राप्त होता
है। वेदों में सबसे महत्वपूर्ण ईश्वर व जीवात्मा का सत्य स्वरूप एवं मनुष्यों के कर्तव्यों व अकर्तव्यों का ज्ञान प्राप्त होना है।
वेदों से जो ज्ञान प्राप्त होता है उसका उल्लेख ऋषि दयानन्द ने अपने विश्वप्रसिद्ध ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में किया है। संसार के
किसी प्राचीन ग्रन्थ से वैदिक ज्ञान की कोई समानता व तुलना नहीं है। वेद ही सर्वश्रेष्ठ, सर्वोपयोगी एवं आचरणीय ज्ञान सहित
कर्तव्य शास्त्र के ग्रन्थ हैं। वेदों के अध्ययन से आत्मा शुद्ध, निर्मल व पवित्र होती है। बुराईयां व कुसंस्कार दूर होते हैं। ईश्वर से
निकटता होती है। मनुष्य ईश्वरोपासना करने की प्रेरणा प्राप्त करता है। सभी प्रकार के मानसिक विकारों एवं अशुभ चिन्तन से
मनुष्य बचता है और शारीरिक पतन को रोककर अपने स्वास्थ्य पर ध्यान केन्द्रित कर अपने बल व आयुवृद्धि को प्राप्त
करता है।
वेदभक्तों व वेदों का अध्ययन करने वालों को ईश्वर की विशेष कृपा प्राप्त होती है। हमने किसी वेदभक्त एवं वेदमार्ग
पर चलने वाले व्यक्ति को अभावग्रस्त एवं किसी बड़े रोग आदि से पीड़ित नहीं देखा। इसका कारण वैदिक विधि से
ईश्वरोपासना एवं अग्निहोत्र यज्ञ आदि कार्य हो सकते हैं। सत्यार्थप्रकाश एवं वेदों का अध्ययन करने से मनुष्य को
ईश्वरोपासना का तर्कसंगत आधार विदित होता है। अग्निहोत्र-यज्ञ करना सभी गृहस्थ मनुष्यों का कर्तव्य हैं। अग्निहोत्र-यज्ञ
से वायु, जल, पर्यावरण की शुद्धि सहित रोगों से रक्षा, स्वस्थ जीवन एवं दरिद्रता का निवारण होने के साथ ईश्वर से सुखों की
प्राप्ति होती है। हमने आर्यसमाज के सक्रिय सदस्यों में से किसी को दुर्व्यस्नों से ग्रस्त नहीं देखा। कोई भी व्यक्ति मांस,
मछली, मदिरा, अंडों एवं धू्रमपान आदि का सेवन नहीं करता। इन तामसिक एवं रोगकारक पदार्थों से आर्यसमाज के लोग
मुक्त रहते हैं जिससे उनका लोक और परलोक दोनों सुधरता है जबकि इनका सेवन करने वालों का लोक व परलोक दोनों
बिगड़ते हैं। हमने आर्यसमाज से जुड़कर वेदों का स्वाध्याय करने की प्रेरणा प्राप्त की और वेद सहित अनेक विद्वानों के ग्रन्थों
को पढ़ा है। इससे हमें जो ज्ञान हुआ वह निश्चय ही सुख व सन्तोष प्रदान करता है। यदि हम आर्यसमाजी न बने होते तो आज
हम जिस ज्ञान को प्राप्त हैं एवं जितना वेद विद्याओं से परिचित हुए हैं, वह न हो पाते। वेदों के अध्ययन के साथ ही हमें देश
विदेश में प्रचलित सभी मत-मतान्तरों की अविद्यायुक्त बातों का भी ज्ञान हुंआ है। इन लोगों के पास किताबी ज्ञान सहित
विज्ञान व धन आदि का कितना भी संग्रह क्यों न हो, इन लोगों को वर्तमान जन्म के कर्मों के आधार पर मिलने वाली परजन्म
की प्राणी योनियों व उनके सुख-दुःख की दृष्टि से निश्चय ही हानि होगी। हम इस जन्म में जितना अशुभ कर्मों से बचे रहेंगे
और जितना शुभकर्मों को करेंगे, उतना ही हमें परजन्म में लाभ होगा। अतः आर्यसमाज का सदस्य बनकर और इसकी
विचारधारा और सिद्धान्तों को अपनाकर हमें इस जन्म व परजन्म दोनों में लाभ दृष्टिगोचर हो रहा है जिससे हम सन्तोष का
अनुभव करते हैं।
आर्यसमाज हमें इसलिये भी अधिक प्रिय है कि आर्यसमाज अविद्या, अन्धविश्वासों, पाखण्डों, कुरीतियों, मिथ्या
परम्पराओं तथा सामाजिक बुराईयों से दूर है। आर्यसमाज ईश्वर के सत्यस्वरूप का प्रचार प्रसार करता है और सत्य उपासना
का भी धारक एवं वाहक है। आर्यसमाज अतार्किक एवं वेदविरुद्ध मूर्तिपूजा, अवतारवाद, फलित ज्योतिष, मृतक श्राद्ध,
जन्मना-जातिवाद, सामाजिक असमानता आदि का खुल कर विरोध करता है। आर्यसमाज का स्वर्णिम नियम है कि ‘अविद्या
का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये।’ समाज और देश की सभी समस्याओं का कारण अविद्या है। आर्यसमाज में हमें
वेद और शास्त्राध्ययन करने की स्वतन्त्रता है और ऐसा करके यहां सभी सदस्य ज्ञानी एवं वेदप्रचारक होते हैं। आर्यसमाज का
संगठन अन्य संस्थाओं के समान किसी अज्ञानी व अविद्यायुक्त आचार्य के चेलों के समान नहीं है। आर्यसमाज के विद्वान
सभी सदस्यों की शंकाओं का तर्कयुक्त समाधान करते हैं। सभी सदस्यों को यह अधिकार है कि वह किसी भी मान्यता व
विचार को मानने से पहले उसकी परीक्षा कर सकते हैं और उसके विद्यायुक्त होने सहित देश, समाज और प्राणी मात्र के लिये

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हितकारी होने पर ही स्वीकार करें। अन्य संस्थाओं में उनके आचार्यों द्वारा जो कहा गया है व उनकी पुस्तकों में लिखा है,
उसकी सत्यता की समीक्षा व परीक्षा नहीं की जा सकती और अनावश्यक एवं देश व समाज के लोगों के लिये हानिकारक होने
पर भी उसे छोड़ा नहीं जा सकता। आर्यसमाज की कोई मान्यता किसी मनुष्य या प्राणीमात्र के हितों के विरुद्ध नहीं है। सभी
ज्ञान, तर्क व युक्ति से संगति रखती हैं। ऋषियों दयानन्द के देश की स्वतन्त्रता विषयक प्रेरक वचनों तथा आर्यसमाज के
लोगों की आजादी के आन्दोलन में सबसे अधिक भागीदारी के कारण ही देश स्वतन्त्र हुआ था। आर्यसमाज दलितों व स्त्रियों
को भी वेदाधिकार व सम्मान देकर उन्हें अपने गुरुकुलों व शिक्षण संस्थाओं में अध्ययन कराकर उनका भी कल्याण करता है।
आर्यसमाज के जीवन दर्शन से अनेक पिछड़े व दलित बन्धुओं को लाभ हुआ है। दलितों के हितों के लिये आर्यसमाज ने अपने
आरम्भ काल में संघर्ष भी किये हैं। वेदों की विचारधारा है कि जन्म से सभी शूद्र होते हैं तथा संस्कारों व अपने गुण, कर्म व
स्वभाव से वह द्विज अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य बनते हैं। आर्यसमाज एकमात्र ऐसा संगठन है जिसने दलितों को भी
वेदज्ञान कराकर जन्मना ब्राह्मणों से कहीं अधिक विद्वान ब्राह्मण बनाया है। ऐसे विद्वानों ने वेदों पर महत्वपूर्ण ग्रन्थ भी
लिखे हैं और वेदप्रचार में प्रशंसनीय सहयोग दिया है।
इन सभी व अन्य अनेक कारणों से आर्यसमाज मुझे सबसे अधिक प्रिय है। हम ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज
सहित ईश्वर का धन्यवाद करते हैं कि हमें आर्यसमाज का एक सेवक बनने का सुअवसर व सौभाग्य प्राप्त हुआ है। जो बन्धु
आर्यसमाज से जुड़े हैं, वह अन्यों कि तुलना में अधिक सौभाग्यशाली है। आर्यसमाज के लोगों का वर्तमान एवं भविष्य सुरक्षित
एवं गौरवपूर्ण है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला-2
देहरादून-248001
फोनः09412985121

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