सूक्ष्म ईश्वर और जीवात्मा स्थूल आंखों से दिखाई क्यों नहीं देते?’

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godमनमोहन कुमार आर्य,

हम इस संसार के सभी स्थूल पदार्थों को अपनी आंखों से देखते हैं और उनकी रचना और उससे होने वाले लाभ व हानियों को विचार कर जानते हैं। आंखों से जो पदार्थ हम देखते हैं वह सृष्टि में स्थूल हुआ करते हैं। अनेक सूक्ष्म पदार्थों को आंखें देख नहीं पाती। जल को हम आंखों से आसानी से देखते हैं परन्तु उष्णता के कारण जल का जो वाष्पीकरण होता रहता है वह वाष्प हमें दिखाई नहीं देती। इसी प्रकार से वायु जिसको प्राणों के रूप में प्रतिक्षण व प्रतिपल शरीर के भीतर ले रहे होते हैं वह भी हमें आंखों से दिखाई नहीं देती। उसका अनुभव हमें त्वचा के स्पर्श से हुआ करता है। इसी प्रकार गन्ध का नासिका से ग्रहण होता है परन्तु आंखों से यह दिखाई नहीं देती। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि आंखों से वही पदार्थ दिखाई देते हैं जो स्थूल एवं आकारवान होते हैं। सूक्ष्म एवं आकाररहित पदार्थ आंखों से दिखाई नहीं देते हैं। अतः मनुष्य को कार्य-कारण सिद्धान्त के आधार पर आंखों से दिखाई न देने वाले पदार्थों को जानने का प्रयत्न करना चाहिये जिससे उन्हें जानकर लाभान्वित हुआ जा सके।

हम मनुष्यों व सभी प्राणियों को देख कर उन्हें मनुष्य, अमुक अमुक पशु, पक्षी व जलचर आदि में चिन्हित करते हैं। हम इन प्राणियों के शरीरों व आकृतियों को ही देखते हैं। क्या इनके शरीर व आकृतियां ही यह प्राणी हैं अथवा इनमें अन्य कोई सूक्ष्म अदृश्य सत्ता व पदार्थ विद्यमान है। इस अदृश्य सत्ता का अनुमान तब होता है जब किसी मनुष्य वा पशु-पक्षी आदि प्राणी की मृत्यु होती है। मृत्यु हाने पर सक्रिय प्राणी निष्क्रिय व निस्तेज हो जाता है और उसका शरीर विनाश को प्राप्त होने लगता है। इसका परीक्षण व विचार करने से ज्ञात होता है कि शरीर में एक जीवात्मा नाम का चेतन पदार्थ होता है जिसे वेद आदि प्राचीन शास्त्रों में जीवात्मा कहा गया है। उसके होने पर शरीर में जीवन की विद्यमानता सहित आवश्यक क्रियायें होती रहती हैं और उस जीवात्मा का शरीर से सम्बन्ध टूटने व विच्छेद हो जाने पर उस जीवात्मा के शरीर की मृत्यु हो जाती है। यह जीवात्मा सूक्ष्म व आकारहीन तो है ही, इसके साथ इसका भार भी नगण्य होता है। इस कारण मृत्यु से पूर्व व बाद में शरीर का भार समान ही हुआ करता है। शरीर में आत्मा एक बिन्दुवत व अणु परिमाण वाला होता है। योग समाधि में इसका दर्शन वा साक्षात्कार होता है। जब तक मनुष्य जीवित रहता है, परिवार व अन्य लोग उससे बोलचाल आदि का व्यवहार करते हैं परन्तु मृत्यु होने के बाद उसका बोलना, सुनना, स्पर्श करना व गन्ध का ग्रहण करना आदि सब बन्द हो जाते हैं। जीवित मनुष्य समझ जाता है कि इस शरीर में जो मनुष्य व उसका जीवात्मा था, वह इस शरीर से निकल कर कही चला गया है। उस आत्मा को बुलाने व उसे शरीर में पुनः प्रविष्ट कराने का ज्ञान व उपाय सृष्टि के आरम्भ से अब तक किसी को पता नहीं चले। यह अपौरुषेय कार्य है जिसे मनुष्य चाह कर व प्रयत्न कर भी नहीं कर सकता। हां, विचार करने पर वह ईश्वर व प्रकृति की व्यवस्था को कुछ कुछ समझ अवश्य सकता है। मृत्यु के इस विवरण व उस विचार करने से ज्ञात होता है कि जीवात्मा नाम का एकदेशी, अल्पज्ञ, ससीम, ज्ञान व कर्म करने व शरीर से कर्म व क्रियाओं को कराने वाला एक चेतन तत्व शरीर में होता है। इसका अस्तित्व तर्क सिद्ध है। यह जीवात्मा मूल पदार्थ है जिसका उपादान व निमित्त कारण ईश्वर व प्रकृति आदि अन्य कोई पदार्थ नहीं है। इसे इस गुण के कारण आंशिक रूप से स्वतन्त्र होने के कारण स्वयंभू कह सकते हैं।

हम जानते व अनुभव करते हैं कि यह सूर्य, चन्द्र, पृथिवी व अन्य सभी ग्रहों व उपग्रहों आदि से युक्त ब्रह्माण्ड मनुष्य के द्वारा निर्मित नहीं हो सकता। स्वयं मनुष्य भी न तो अपनी इच्छानुसार जन्म ले सकता है और न ही मृत्यु को प्राप्त कर सकता है। मनुष्य योनि में जीवात्मा विचार कर कर्म करने में स्वतन्त्र व फल भोगने में परतन्त्र है। सह जीवात्मा एकदेशी, ससीम व अल्पज्ञ भी है, अतः सृष्टि रचना करने में वह सर्वथा असमर्थ है। प्रश्न उत्पन्न होता है कि इस संसार की रचना किससे से हुई है? कौन इस सृष्टि की रचना का निमित्त कारण और कौन व क्या इसका उपादान करारण है। इसका उत्तर विचार कर भी प्राप्त किया जा सकता है और वेदादि शास्त्ऱों के अध्ययन से भी इसका यथार्थ व सत्य उत्तर प्राप्त होता है। वह उत्तर यह है कि इस सृष्टि की रचना उपादान कारण त्रिगुणात्मक सत्, रज व तम गुणों वाली प्रकृति से हुई है जिसका निमित्त कारण अर्थात् बनाने वाला एक चेतन पदार्थ जो निराकार, सर्वातिसूक्ष्म, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ व सर्वशक्तिमान है, उससे हुई है। उसने यह सृष्टि किससे, कैसे व क्यों उत्पन्न की, तो इन प्रश्नों के उत्तर भी हमें वैदिक साहित्य में सन्तोषजनक प्राप्त होते हैं। सृष्टि किससे उत्पन्न हुई है, का उत्तर है कि ईश्वर ने अपने सर्वान्तर्यामी, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ और सर्वव्यापक स्वरूप से इस सृष्टि की रचना की है। किस पदार्थ वा उपादान कारण से हुई, इसका उत्तर है कि इसकी रचना मूल प्रकृति जो सत्, रज व तम गुणों वाली है, उससे हुई है। ईश्वर को सृष्टि रचने का ज्ञान व सामथ्र्य कब व कैसे प्राप्त हुआ, इसका उत्तर है कि ईश्वर अनादि व नित्य है। सर्वज्ञ होने के कारण वह अनादि काल से इस सृष्टि की रचना करता आ रहा। उसे इसका सदा से पूर्ण ज्ञान है और यह सृष्टि उसने पूर्व कल्प अर्थात् इस सृष्टि से पूर्व प्रलय से पूर्व रची सृष्टि के अनुरुप विधि वा विज्ञान एवं अपनी सर्वशक्तिमत्ता के गुण से रची है। ईश्वर नित्य है, अतः उसका ज्ञान व सामथ्र्य भी नित्य है। उसमें कभी न्यूनाधिक नहीं होता और न कभी होगा। इसी प्रकार आगे के कल्पों में भी अनन्त काल तक सृष्टि की रचना व प्रलय होती रहेगी। सृष्टि की रचना क्यों की गई, का उत्तर है कि यह ईश्वर ने अपनी शाश्वत प्रजारुप जीवात्माओं को उनके पूर्व कल्पों व जन्मों के कर्मों का सुख-दुःख रूपी फल देने के लिए रची है।

यह उत्तर हमें वेद और वैदिक साहित्य से मिलता है। इसकी प्रामणिकता इस बात से है कि प्राचीन काल के ऋषियों की बुद्धि आज कल के मनुष्यों की तुलना में कहीं अधिक पवित्र व गुणग्राहकता में बहुत अधिक थी। वह योग, ध्यान व समाधि के द्वारा सृष्टि के गुप्त रहस्यों को जान लेते थे। चूंकि इस सृष्टि रचना विषयक सिद्धान्त व प्रक्रिया का युक्ति व प्रमाणों से समुचित खण्डन आज के वैज्ञानिकों द्वारा नहीं किया गया है, अतः यह प्रामाणिक ज्ञान है। देश व विश्व के वैज्ञानिकों को अपना ध्यान वेद एवं वैदिक साहित्य में उपलब्ध ज्ञान व सिद्धान्तों पर केन्द्रित कर इसकी परीक्षा कर इस पर अपने विचार व्यक्त करने चाहिये। यदि वह ऐसा नहीं करते तो वह वेदों के सृष्टि रचना के सत्य सिद्धान्त को अकारण, बिना विचार किए न मानने वाले माने जायेंगे जो कि उनके लिए उचित नहीं होगा।

हम संसार में देखते हैं कि वैज्ञानिकों ने भौतिक व रसायन आदि विज्ञान के आधार पर नये उपयोगी पदार्थों व कला यन्त्रों की रचनायें की हैं जिससे सारा संसार लाभान्वित है। परन्तु इसके साथ हम यह निवेदन करना चाहते कि वैज्ञानिकों ने मनुष्य व प्राणियों के शरीरों में निवास करने वाले चेतन तत्व जो कि अनादि, अनुत्पन्न, अमर, अजर सहित ज्ञान व कर्मों को करने की सामथ्र्य से युक्त है, उस जीवात्मा के अनुसंधान हेतु कोई विशेष प्रयास नहीं किया जबकि भारत में इससे सम्बन्धित प्रभूत साहित्य विद्यमान है। यदि वह जीवात्मा व ईश्वर को अभौतिक मानकर उस पर विचार और अनुसंधान करना नहीं चाहते तो उन्हें जीवात्मा व ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार करने का कोई अधिकार हमारी दृष्टि में नहीं है। हमें इस बात का भी आश्चर्य है कि वैज्ञानिक आध्यात्म विज्ञान की उपेक्षा करते हैं। इसका कारण कहीं उनका किसी रूप में पश्चिम के ईसाईमत के प्रति मोह व पूर्वाग्रह तो नहीं है। यदि ऐसा नहीं है तो आध्यात्म विज्ञान की पश्चिम जगत के वैज्ञानिकों एवं विचारको द्वारा उपेक्षा समझ में न आने वाला काम है। जहां तक आत्मा के व्यवहार व गुणों का प्रश्न है, पश्चिम के मनोविज्ञान ने इसका विचार किया है। मनोविज्ञान विषयक उनके निष्कर्षों को स्वीकार किया जा सकता है परन्तु हमें लगता है कि उन्हें मनोविज्ञान के अध्ययन के साथ ईश्वर व जीवात्मा के वेद एवं वैदिक साहित्य में विद्यमान सत्य स्वरूप, गुण, कर्म व स्वभाव को भी जानने का प्रयत्न करना चाहिये। इससे उनकी सभी शंकाओं का निराकरण व समाधान भली प्रकार से हो सकता है।

ईश्वर व जीवात्मा अति सूक्ष्म पदार्थ हैं। सभी मनुष्य जीवात्मा के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं जबकि वह उसे आंखों से दृष्टिगोचर नहीं होती। इसी प्रकार ईश्वर भी सामान्य मनुष्यों द्वारा अपने कर्तृत्व व रचनाओं से ही जाना व देखा जाता है। संसार के सभी अपौरुषेय कार्य व रचनायें तथा उनके संचालन व पालन सहित मनुष्य आदि समस्त प्राणी जगत की उत्पत्ति व उनके कर्मों का विधान कर उन्हें नियमों में रखने के कारण ईश्वर का अस्तित्व भी जीवात्मा के अस्तित्व की ही भांति सर्वथा सिद्ध है। यदि ईश्वर को मन व बुद्धि के द्वारा जानने का प्रयत्न किया जाये तो तर्क, अनुमान व प्रत्यक्ष प्रमाणों के आधार पर ईश्वर का निभ्र्रान्त ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। ईश्वर का प्रत्यक्ष ज्ञान का प्रयोग हमने इस कारण से किया है कि मनुष्य को गुणी का नही अपितु गुणों का ज्ञान होता जिससे वह मानता है कि उसने गुणी का प्रत्यक्ष कर लिया। इसी प्रकार मनुष्य आदि प्राणियों को देखकर जीवात्मा और सृष्टि उत्पत्ति, स्थिति व प्रलय व कर्म-फल व्यवस्था आदि अपौरुषेय कार्य को देखकर गुणी, ईश्वर व प्रकृति का भी प्रत्यक्ष होता है। हम आशा करते हैं कि पाठक ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति, इस त्रैतवाद के सिद्धान्त को इन सत्ताओं व तत्वों के आंखों से दिखाई न देने पर भी अस्वीकार नहीं, अपितु स्वीकार करेंगे जिससे उन्हें अपने कर्तव्य निर्धारित करने में सुविधा होगी।

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