लेखक परिचय

कुलदीप सिंह "राघव"

कुलदीप सिंह "राघव"

युवा पत्रकार एवं लेखक अमर उजाला समाचार पत्र से जुडे हैं

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कुलदीप सिंह राघव

बीते महीने लंदन ओलंपिक में भारत ने पहली बार छह पदक जीतकर इतिहास रच दिया। भारत के खाते में दो रजत और चार कांस्य पदक शामिल हुए। भारत के लिए पहलवान सुशील कुमार और शूटर विजय कुमार ने रजत पदक और गगन नारंग, सायना नेहवाल, एम सी मैरीकॉम और योगेश्वर दत्त ने कांस्य पदक जीता। इनकी जीत के साथ पूरा भारत जश्न में डूब गया। केंद्र और राज्य सरकारों ने विजेताओं की झोली भरने में कोई कसर नहीं छोडी। किसी ने सम्मान में गाडी़ दी तो किसी ने नोटो की गड्डी और किसी ने गौरव सम्मान। मैं भी मानता हूं कि ये खिलाडी़ सम्मान के योग्य हैं। लेकिन आपको नहीं लगता कि पिछले मंगलवार को कर्नाटक के जिस अपाहिज ने ओलंपिक के समकक्ष पैरालंपिक खेलों की ऊंची कूद स्पर्धा में रजत पदक जीता उसे भी यही सम्मान मिलना चाहिए। लंदन में गिरीश ने वो काम किया जिससे किसी भी अपाहिज को अपनी स्थिति पर शर्मिंदा नहीं होना पडेंगा। क्या बांए पैर से विकलांग गिरीश होशनगारा का यह जज्बा सलाम करने के काबिल नहीं है। लेकिन बडे दुर्भाग्य की बात है। इस जज्बे का सम्मान न तो हमारे देश ने किया और नही देश की मीडिया ने। ओलंपिक पदक विजेताओं की जीत की घोषणा होते ही सभी मीडिया चैनलों पर शुभकामनांए आने लगती थीं। पदक विजेताओं के घर का नजारा दिखाने के लिए रिपोर्टर जी जान लगाता था। एंकर भी गर्मजोशी से पदक विजेता का नाम बार बार बताते थे। इसी प्रकार पदक विजेता की जीत के साथ ही सम्मान की घोषणा होने लगती थी। लेकिन जब गिरीश ने लंदन में भारत का नाम रोशन किया तो न तो किसी चैनल ने उसका घर दिखाया और नही वो गिरीश किसी अखबार की लीड़ खबर बन पाया। वाह रे मेरा भारत देश !

 

पदक जीतने के बाद भी गिरीश करोडपति नहीं बना है। जिस गिरीश के घर की आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं हैं। उसके लिए भारतीय पैरालंपिक समिति ने मात्र 10 लाख रुपये देने की घोषणा की। इस खिलाड़ी के पदक की उपेक्षा की चौतरफा निंदा के बाद खेलमंत्री अजय माकन नींद से जागे और गिरीश को साई में नौकरी की बात कही है। लेकिन वास्तव में यह गंभीर विषय है। देश के लिए पदक जीतने वाले इस अपाहिज की मदद के लिए जितने हाथ आगे आने चाहिए थे वो नहीं आए।

 

पूरे देश को मिलकर इस गंभीर विषय पर विचार करना चाहिए। हांलांकि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र भाई मोदी ने गिरीश के जज्बे को सलाम किया। कर्नाटक सरकार के साथ साथ केंद्र सरकार को आगे आकर इस हौंसले की हौंसलाअफजाई करनी चाहिए, राष्ट्रपति महोदय को भी अन्य पदक विजेताओं की भांति इस विजेता को भी सम्मानित करना चाहिए। गिरीश जैसी प्रतिभाएं आज देश के कोने कोने में छिपी हुई और दबी हुई पडी हैं जो संसाधनों के अभाव में पनप नहीं पा रही हैं। इन प्रतिभाओं को विश्व पटल पर छाने के लिए सरकार द्वारा किसी खास पहल की आवश्यकता है

One Response to “अपाहिज के पदक की उपेक्षा क्यों…”

  1. mahendra gupta

    सच में लानत है इस मीडिया को, उन सरकारों और प्रतिष्ठानों को जो उस समय तो इतना गरज रहे थे ,और आज चुप है.जब की इस पदक विजेता को ज्यादा सम्मान और पुरस्कार दिया जाना चाहिए था.मैं उन लोगों के श्रम व प्रयासों तथा विजय को कम नहीं अंक रहा,लेकिन यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि यह भी उसी प्रकार रजत पदक जीत कर आया है,महत्वपूर्ण इसलिए है कि निर्धन परिवार से जहाँ रोटियों के भी लाले हों वहां विकलांग होते हुए भी तैयारी कि और पदक प्राप्त किया.सलाम है इस खिलाडी के जीवट को,उस कि विजय को.लानत है उन खिलाडियों को भी जिन्होंने करोड़ों रुपये जेब में डाले ,पर उसे अपनी और से पुरुस्कृत करना तो दूर , डर के मारे सरकार को याद दिलाना भी भूल गए.अपनी विजय में वे शायद इतना डूबे हैं कि शायद उन्हें पता भी नहीं होगा कि उनसे भी ज्यादा महत्वपूर्ण पदक विजेता भी है. नेहवाल ने जो कार्य किया वह उन खिलाडियों को अब भी एक सबक है,यदि वे समझे और ग्रहण करें.

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