इस्लामी संगठन में भारत क्यों ?

इस्लामी संगठन में भारत क्यों ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) के साथ भारत और चीन जैसे देशों को भी जोड़ा जाए, यह सिफारिश बांग्लादेश के विदेश मंत्री ने अभी-अभी की है। आजकल ढाका में इस्लामी देशों के विदेश मंत्रियों का सम्मेलन हो रहा है। अभी तक इस संगठन में उन्हीं देशों को सदस्यता दी गई है, जिनमें मुसलमानों की बहुसंख्या है लेकिन भारत और चीन जैसे कुछ देश ऐसे हैं, जिनमें मुसलमान अल्पसंख्यक हैं लेकिन उनकी संख्या कई मुस्लिम देशों से दुगुनी तिगुनी है। भारत के मुसलमान की संख्या लगभग 18 करोड़ है जबकि इंडोनेशिया की 22 करोड़ और पाकिस्तान की लगभग 20 करोड़ है। बांग्लादेशी मंत्री का कहना है कि भारत-जैसे देश को कम से कम पर्यवेक्षक की सीट तो मिलनी ही चाहिए। दुनिया के सारे मुसलमानों के 10 प्रतिशत मुसलमान अकेले भारत में रहते हैं। बांग्लादेश मंत्री के तर्क में कुछ दम जरुर मालूम पड़ता है लेकिन मैं समझता हूं कि इस तरह के महजब पर आधारित संगठन का सदस्य या पर्यवेक्षक बनना भारत के लिए ठीक नहीं है, फिर वह मजहब चाहे जो हो। एक तो भारत की धर्म निरपेक्ष छवि इससे विकृत होगी। दूसरा, इस्लामी संगठन की बैठकें भारत-पाक दंगल का अखाड़ा बन जाएंगी। तीसरा, इस संगठन से दुनिया के मुसलमानों का कौनसा भला हो रहा है ? यदि यह संगठन जरा-भी प्रभावशाली होता तो सीरिया में मुस्लिम रक्त की नदियां क्यों बहती रहतीं ? ईरान और सउदी अरब में तू-तू— मैं-मैं क्यों चलती रहतीं ? चौथा, तेल की आसान आमदनी के बावजूद दुनिया के मुसलमान इतने अभाव, इतनी अशिक्षा, इतनी असुरक्षा और इतने अविकास से ग्रस्त क्यों रहते? यह ठीक है कि इस संगठन का इस्तेमाल पाकिस्तान भारत-विरोध के लिए करता रहता है लेकिन यह विरोध तो भारत की सदस्यता के बावजूद भी जारी रहेगा।

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