आपदाकाल में भी आखिर ओछी राजनीति क्यों

दीपक कुमार त्यागी
एक तरफ तो हमारा प्यारे देश की जनता कोरोना वायरस संक्रमण की बेहद घातक बीमारी से जूझ रही है, वहीं दूसरी तरफ देश के कुछ प्रतिष्ठित राजनेताओं के द्वारा राजस्थान में सरकार गिराने बचाने व अपनी दल की सरकार बनाने का खेल चल रहा है, जिसको देश के मौजूदा  हालात के अनुसार बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए था। देश पिछले कुछ दिनों से बहुत तेजी के साथ बढ़ते संक्रमण के कारण अब संक्रमित देशों की श्रेणी में तीसरे पायेदान पर पहुंच गया है, आम लोग संक्रमण से त्रस्त हैं, वही भयंकर आपदा के समय में भी देश के कुछ राजनेता राजनीति करने में मस्त हैं। जिस समय हमारे देश के सभी जाब़ाज कोरोना वारियर्स अपनी जान को जोखिम में डालकर घातक कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की जान बचाने में व्यस्त हैं। वो कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण को रोकने के लिए अपनी तरफ से हर संभव प्रयास पूर्ण मेहनत के साथ दिल से कर रहे हैं, लेकिन फिर भी वायरस तेजी से लोगों को अपनी चपेट में लेकर रोजाना कुछ लोगों को असमय काल का ग्रास बना रहा है। हमारे जाब़ाज डॉक्टर व अन्य स्टाफ मरीजों के साथ वायरस के इर्द-गिर्द रहकर लगातार लोगों के जीवन बचाने की तैयारी में युद्ध स्तर पर जुटे हुए हैं। वहीं दूसरी पहलू देखें तो कुछ समय पहले देश की जनता को इस घातक कोरोना वायरस से बचाने के लिए लगाए गये बेहद आवश्यक लॉकडाउन के चलते देश में सब कुछ बंद होने के कारण हमारी अर्थव्यवस्था खस्ताहाल हो गयी है, जिसके चलते देश में आज बहुत सारे लोगों के सामने रोजीरोटी का बेहद गंभीर संकट अचानक से उत्पन्न हो गया है, हालांकि केन्द्र व राज्य सरकारें इस बेहद गंभीर स्थिति से निपटने के लिए लगातार धरातल पर तरह-तरह के प्रयास कर रही हैं। लेकिन कही न कही सरकार के वो सभी प्रयास स्थिति की गंभीरता के चलते अभी नाकाफी साबित हो रहे हैं। भयावह आपदा के चलते देश के हुए इस हाल को देखकर हर वर्ग के लोग अपना, अपने बच्चों व नातेदारों के भविष्य के बारे में सोच-सोच कर बहुत ज्यादा चिंतित व परेशान हैं। 
इस बेहद गंभीर हालात में कुछ दिनों तक तो देश के अधिकांश राजनीतिक दलों के राजनेता भी एकजुट होकर आम जनता के बारे में बहुत चिंतित नजर आये थे, वो आम लोगों की मदद करने से लेकर हर काम में बेहद तत्पर नजर आये थे। लेकिन कुछ समय बाद से ही हमारे देश में कभी भी ना रुक पाने वाली राजनीति के चलते देश में फिर से ओछी आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति महामारी के बेहद गंभीर संकट काल में भी शुरू हो गयी और वो जब से आज तक भी लगातार जारी है। 15-16 जून की रात को लद्दाख की गलवान घाटी में जब से धोखेबाज चीन ने अपनी कुटिल कायराना धोखेबाजी वाली चाल चली है, उसके बाद उत्तर प्रदेश के कानपुर में विकास दूबे कांड और अब राजस्थान में सरकार गिराने व बनाने का षडयंत्र, उसके चलते देश में नेताओं में आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति फिर से एकबार अपने चरम पर पहुंच गई है। जबकि हमारे देश को इस समय कोरोना से लोगों की जान बचाने से लेकर के विभिन्न मोर्चों पर बहुत ज्यादा गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। देश को इस समय बेहद भयंकर कोरोना आपदा, खस्ताहाल अर्थव्यवस्था, चीन, पाकिस्तान व नेपाल के साथ सीमा पर जारी विवाद से एक साथ जूझ रहा है। लेकिन हम सभी के लिए बहुत अफसोस की बात यह है कि गंभीर चुनौतियों के वक्त में भी एकजुट होने की जगह देश के चंद राजनेताओं ने अपनी ओछी राजनीति को तरजीह देकर फिर से अपनी बेहद घातक राजनैतिक चालें चलकर अपने स्वार्थों को पूरा करने के लिए राजस्थान जैसी राजनीतिक बिसात बिछानी शुरू कर दी हैं। हालांकि यह अलग बात है कि बेहद घातक कोरोना महामारी से बचने के चलते इन दिनों हमारे देश के राजनेताओं की कार्यशैली व भाषा में भी एक बहुत बड़ा नया बदलाव नजर आ रहा है, कभी जनता के बीच में खड़े रहकर बात करने के लिए आतुर रहने वाले राजनेता आज जनता के बीच जाने से बच रहे हैं, आज वो जीवन की सुरक्षा की खातिर वर्चुअल जनसंवाद कार्यक्रम का आयोजन कर रहे हैं, आज वो लोगों से मिलने के लिए हाईटेक होकर डिजिटल मीडिया व विभिन्न प्रकार के सोशल मीडिया के प्लेटफार्म का उपयोग कर रहे हैं। लेकिन हम सभी आम देशवासियों के मन को पीड़ा देने वाली बात यह है कि घातक कोरोना वायरस संक्रमण के बहुत ही भयानक आपदाकाल व सीमाओं पर बेहद तनावपूर्ण स्थिति होने के बाद भी देश के कुछ राजनेता आम दिनों की तरह से ही ओछी राजनीति करने से बिल्कुल भी बाज नहीं आये, उनको ना तो कोरोना से जूझते देशवासियों की चिंता है, ना ही सीमाओं की रक्षा करते माँ भारती के वीर जाबांज सपूतों की कोई चिंता है। वो कभी मध्यप्रदेश में सरकार बनाने व गिराने के नाम पर, मजदूरों के घर भेजने के नाम पर, कभी मजदूरों के भोजन के नाम पर, कभी गरीबों के राशन के नाम पर, कभी मजदूरों की बसों के नाम पर, कभी छात्रों की बसों के नाम पर, मजदूरों की रेल के नाम पर, बीस लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज के नाम पर, कोरोना के टेस्ट के नाम पर, कोरोना के इलाज के नाम पर, खस्ताहाल कोरोना अस्पतालों के नाम पर, पीपीई किट व मास्क के नाम पर, मौलाना साद व मरकज के नाम पर, खतरें में पड़ी आम लोगों की रोजीरोटी के नाम पर और अब हाल ही में गलवान घाटी में सेना के शहीद हुए 20 जाबांज माँ भारती के सपूतों की शहादत के नाम पर, वर्ष 1962 के चीन युद्ध के नाम पर, जवाहरलाल नेहरू के नाम पर, राजीव गांधी फॉउंडेशन को मिले चीनी चंदे के नाम पर, पीएम केयर को मिले चीनी कम्पनियों से चंदे के नाम पर, कुटिल चालबाज चीन की कायराना हरकतों के नाम पर और अब बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारी के नाम पर, विकास दूबे के नाम पर और अब राजस्थान में सरकार गिराने व बनाने के नाम पर हर वक्त जबरदस्त ढंग से केवल और केवल राजनीति करते नजर आये। देश की मौजूदा परिस्थितियों में अधिकांश राजनेताओं का रवैया देखकर यह स्पष्ट नज़र आता है कि उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता में देश व समाज के हित बिल्कुल भी नहीं हैं, बल्कि अपने व अपने दल के राजनीतिक हित प्राथमिकता में हैं। जब चीन जैसा मक्कार दुश्मन देश हमारी सीमाओं पर लगातार अतिक्रमण करने का प्रयास कर रहा हो व रोकने पर खूनी झड़प करके परेशान करने की सोच रहा हो, जिस समय हम सभी देशवासियों व हमारे सभी राजनेताओं को एकजुट होकर चालबाज चीन के खिलाफ बुलंद आव़ाज उठानी चाहिए, जब हम सभी देशवासियों को एकजुट होकर चीन, पाकिस्तान, नेपाल व भयंकर कोरोना महामारी के मोर्चे पर इकट्ठा होकर लड़ना चाहिए, उस समय भी हमारे देश के शीर्ष पदों पर विराजमान पक्ष व विपक्ष के कुछ राजनेता आरोप-प्रत्यारोप की ओछी राजनीति में बहुत ही ज्यादा व्यस्त हैं, देश के चंद बेहद खास व ताकतवर लोग अपनी व अपने दलों की स्वार्थ पूर्ति के लिए आम जनमानस को बरगलाने में बहुत ज्यादा व्यस्त हैं।
*भयावह आपदा के समय में कुछ लोगों की वजह से बने देश के मौजूदा राजनीतिक हालात पर अगर निष्पक्ष रूप से विचार किया जाये, तो हमारे बड़े बुजुर्गों की एक बहुत पुरानी कहावत अपनी आँखों देखी सत्य होती नज़र आती है, वो अक्सर कहते है कि हमारे देश में राजनीति का स्तर बहुत ज्यादा गिर गया है, हालात ऐसे हो गये है कि अब एक बहुत पुरानी कहावत “लाशों पर भी राजनीति की जाती है” सत्य होती दिख रही है।*
आज इस बेहद कटु कहावत वाली स्थिति का सबसे बड़ा उदाहरण चंद लोगों की वजह से स्वयं हमारा अपना प्यारा देश भारत बन गया है, जहां पर कोरोना जैसी गंभीर बीमारी के आपदाकाल के समय में भी कुछ राजनेता लोगों की लाशों पर भी राजनीति करने से बिल्कुल भी बाज नहीं आ रहे हैं। वैसे तो हमारे देश भारत में राजनीति हर समय चलती रहती है, लेकिन कोरोना के आपदाकाल में ओछी राजनीति की शुरुआत फरवरी-मार्च में ही मध्यप्रदेश में सरकार बचाने, गिराने व बनाने के उद्देश्य के साथ नेताओं के द्वारा हो गयी थी, लेकिन उसके बाद से अब तो ओछी राजनीति की चाल बहुत ज्यादा तेज हो गयी है, अगर हम इस दौर में देश में घटित एक-एक घटनाक्रम पर नजर डालें तो जब लॉकडाउन के चलते सब कुछ थम गया था और लोग अपनी व अपने परिजनों की जान बचाने की खातिर घरों में सुरक्षित रहने के लिए बैठे थे, तब भी देश में राजनीति लगातार चलती रही, जिसके चलते ही देश में ओछी राजनीति भी नहीं रुकी थी। देश में कोरोना के इलाज से लेकर टेस्ट के मसले, वेंटिलेटर, आक्सीजन सिलेंडर, अस्पताल के बेड, अस्पताल के बिल, मरीजों की देखरेख में लापरवाही और न जाने क्या-क्या मुद्दे खड़े करके, उन सभी पर आरोप-प्रत्यारोप की ओछी राजनीति लगातार जमकर हुई और जो अभी तक भी लगातार जारी है। देश में आबादी के अनुपात के हिसाब से कोरोना के टेस्ट तो बहुत कम हुए हैं लेकिन देश में कोरोना व चीन की आड़ में राजनीति बहुत जमकर हुई है, केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक सत्ता पक्ष व विपक्ष ने भयंकर आपदा के वक्त में भी किसी भी मौके पर राजनीतिक लाभ लेने के लिए मौके का फायदा उठाकर “चौका मारने” में किसी भी प्रकार की कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। आज हमारे सामने विचारणीय प्रश्न यह है कि देश जब बहुत सारे मोर्चों पर बेहद मुश्किल की घड़ी से संघर्ष कर रहा है भयंकर आपदा के वक्त में जब देश में राजनीति बिल्कुल भी नहीं होनी चाहिए थी, तब राजनीति हमारे देश के कुछ राजनेताओं की कृपा से अपने स्तर को गिरने के चरम पर आखिर क्यों व कैसे चली गयी है!
।। जय हिन्द जय भारत ।।।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

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