लेखक परिचय

राजेश कश्यप

राजेश कश्यप

स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।

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राजेश कश्यप

सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार के ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009’ (आरटीई) के तहत सरकारी व निजी स्कूलों में गरीब बच्चों के दाखिलों में 25 प्रतिशत आरक्षण पर अपनी मुहर लगाकर अत्यन्त सराहनीय एवं स्वागत योग् निर्णय सुनाया है। इससे निजी स्कूलों में भी 6 से 14 वर्ष के गरीब बच्चों को अमीरों के बच्चों के बराबर बैठकर शिक्षा अर्जित करने का मौका मिलेगा। बेहद खेद का विषय है कि आरटीई जैसे कल्याणकारी कानन को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने वाले निजी स्कूलों के संगन अपनी कानून जंग में शिकस्त खाने के बावजूद ‘किन्त’, ‘परन्तु’ के साथ-साथ कई दलीलों व शर्तों का पिटारा खोले हुए हैं। इन समीकरणों से सहज महसूस होता है कि निजी स्कल संचालकों को आरटीई कानून अब भी दिल से स्वीकार नहीं है और सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने आने के बावजूद उनके दिल में गरीब बच्चों के प्रति को हमदर्दी या सहानुभूति पैदा नहीं हुई है।

इन तथ्यों को कोई नहीं नकार सकता है कि शिक्षा के स्तर में जिन मूलभत सुधारों की दरकार थी, उनमें निजी स्कूल खरे उतरे हैं, जबकि सरकारी स्कल काफी पिछड़े हैं। निजी स्कूलों में शिक्षा व्यवस्थित तरीके से दी जा रही है, जबकि सरकारी स्कूलों में सिर्फ औपचारिकता पूरी की जा रही है। निजी स्कूल शत-प्रतिशत परिणाम देने के लिए हरदम प्रयासरत रहते हैं, जबकि सरकारी स्कूलों में यह ललक ना के बराबर देखने में आती है। निजी स्कूलों में बच्चों की प्रतिभा के अनुरूप कार्यक्रम संचालित होते हैं, जबकि सरकारी स्कूलों में सिर्फ खानापूर्ति की जाती है। निजी स्कूल संसाधनों के अभाव में भी अपना शत-प्रतिशत परिणाम देने के लिए प्रयासरत रहते हैं, जबकि सरकारी स्कूलों में संसाधनों की भरमार होने के बावजूद ‘ढ़ाक के तीन पात’ वाले परिणाम ही देखने को मिलते हैं। निजी स्कूलों में बच्चों के अन्दर नैतिकता, अनुशासन और बौद्धिकता स्पष्ट नजर आती है, जबकि सरकारी स्कूलों में अधिकतर बच्चों में उदण्डता, अनुशासनहीनता और आवारगी देखने को मिलती है। इन्हीं भावों के मद्देनजर ही पिछले दिनों आध्यात्मिक गुरू श्री श्री रविशंकर ने अपनी आत्मिक टिप्पणी करते हुए कहा था कि सरकारी स्कूलों को बन्द कर देना चाहिए, क्योंकि इनमें नस्सली तैयार होते हैं। हालांकि बाद में काफी हो-हल्ला मचने के बाद उन्होंने अपनी इस टिप्पणी को वापिस ले लिया था। लेकिन, संभवतः उनके कहने का आशय यही रहा होगा कि निजी स्कूलों के बच्चे होनहार बनते हैं और सरकारी स्कूलों के ज्यादातर बच्चे उदण्ड और आवारा प्रवृति के बनते हैं।

यहां पर निजी स्कूलों का गौरवगान करने का मूल उद्देश्य निजी और सरकारी स्कूलों की वास्तविक हकीकत का बोध करवाना है, ताकि यह सहज अनुमान लगाया जा सके कि क्यों आम व गरीब आदमी भी अब अपने बच्चों को सरकारी स्कूल की बजाय निजी स्कूल में दाखिला दिलवाने की ख्वाहिश रखने लगा है? बच्चे को अपेक्षानुरूप अच्छी शिक्षा मिले और बच्चा अपनी प्रतिभा के बल पर अच्छा मुकाम हासिल करे, यही स्वप्न हर माता-पिता का होता है। उन्हें अपना यह सपना सिर्फ निजी स्कूलों में ही साकार होता क्यों दिखाई देने लगा है? इस यक्ष प्रश्न का जवाब सरकार को हर हालत में देना चाहिए। सरकार को यह बताना चाहिए कि क्यों सरकारी स्कूल शिक्षा के मानकों पर खरा नहीं उतर पा रहे हैं? आखिर क्यों सरकारी स्कूल गरीब व आम बच्चों की शिक्षा केन्द्र के प्रतीक बन गए हैं? सरकारी स्कूलों के तुलनात्मक परिणाम नहीं मिल रहे हैं? सरकार ने आज तक यह समीक्षा क्यों नहीं की है कि सरकारी स्कूलों में तेजी से गिरते शिक्षा स्तर के कौन-कौन से उत्तरदायी कारक हैं? यदि सरकार ने इस तरह की कोई समीक्षा की है तो उन कारकों के समाधान के लिए अभी तक कोई ठोस कदम क्यों नही उठाए हैं? यदि उठाए हैं तो कौन-कौन से हैं? सरकार को इस सवाल का जवाब जरूर देना चाहिए कि आखिर क्यों एक सरकारी स्कूल का शिक्षक भी अपने बच्चे को निजी स्कूल में भेजना पसन्द करता है?

स्मीक्षात्मक तौरपर देखा जाए तो निजी स्कूलों का बहुत बड़ा नकारात्मक पहलू यही है कि उनमें मोटी फीस वसूल की जाती है और समय-समय पर विभिन्न मदों के तहत बहुत बड़ी रकम माता-पिता से ऐंठी जाती है। निजी स्कूलों में भरी-भरकम फीसों, अनुदानों और अन्य खर्चों को वहन करते-करते अभिभावकों का दम निकल जाता है। इसके बावजूद अभिभावक निजी स्कूलों के हाथों सरेआम अपनी जेब कटवाने व पैसा लुटवाने के लिए बाध्य होते हैं। जिन लोगों की मोटी आमदनी होती है, वे भी बच्चे की शिक्षा के भारी-भरकम खर्च का भार ढ़ोते-ढ़ोते हांफने लगते हैं। ऐसे में आम व गरीब आदमी का क्या हाल होता होगा, इसका सहज अन्दाजा लगाया जा सकता है।

कितनी बड़ी विडम्बना का विषय है कि एक गरीब अभिभावक शिक्षा व्यवस्था की चक्की के दो पाटों के बीच बुरी तरह पिस रहा है। एक तरफ सरकारी स्कूलों में अपेक्षानुरूप बच्चों को शिक्षा नहीं मिल रही है और दूसरी तरफ निजी स्कूलों में भारी-भरकम रकम का बन्दोबस्त नहीं हो पा रहा है। यदि किसी न सिकी तरीके से बन्दोबस्त हो भी जाता है तो कर्ज व ब्याज का ग्राफ बेलगाम हो जाता है और ताउम्र अभिशाप बन जाता है। ऐसे में एक गरीब आदमी के सामने अपने बच्चे की शिक्षा का विकल्प आखिर रह क्या जाता है?

यह माना कि कानून के हथौड़े का डर दिखाकर सरकार निजी स्कूलों को गरीब बच्चों के दाखिले के लिए 25 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने के लिए बाध्य कर सकती है। यदि ईमानदारी से सोचा जए तो क्या यह एक तरह से सरकारी ब्लैकमेलिंग नहीं है? क्या इससे गरीबों का कोई हित होगा? यह आरटीई कानून केवल 25 प्रतिशत गरीब बच्चों को ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में सक्षमह ै? यदि हाँ तो फिर शेष 75 प्रतिशत गरीब बच्चों ने सरकार का क्या बिगाड़ा है? उन्हें क्यों गुणवत्ता युक्त शिक्षा हासिल करने से वंचित किया जा रहा है? क्या यह उन मासूम व निर्दोष बच्चों के साथ अन्याय नहीं है?

इन सवालों से इतर, एक और गहरा प्रश्न यह है कि क्या निजी स्कूल संचालक जबरदस्ती थोपे गए 25 प्रतिशत गरीब बच्चों के साथ भी हकीकत में वही व्यवहार करेंगे, जाकि वे अमीरों के बच्चों से करते हैं? क्या निजी स्कूलों में अमीर और गरीब बच्चों की तस्वीर स्पष्ट नजर नहीं आएगी? यदि हाँ तो फिर क्या इससे गरीब बच्चों के आत्म-विश्वास, आत्म-बल और आत्म-स्वाभिमान को जबरदस्त ठेस नहीं लगेगी? यदि ऐसा हुआ तो उसका क्या परिणाम निकलेगा, क्या इस भी बयां करने की आवश्यकता है?

इसमें कोई दो राय नहीं है कि शिक्षा सबका मूलभूत अधिकार है। इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि आरटीई कानून का आज नहीं तो कल निजी स्कूलों को पालन करना ही पड़ेगा। इस बात में भी कोई शक नहीं है है कि निजी स्कूल आरक्षित गरीब बच्चों के साथ दोगला व्यवहार करेंगे। क्योंकि जब तक निजी स्कूल दिल से इस कानून को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक इस शक का अस्तित्व बना रहेगा।

आरटीई कानून के सन्दर्भ में हरियाणा प्रदेश में तो और भी पेचीदा स्थिति बनी हुई है। हरियाणा सरकार निजी स्कूलों पर आरटीई कानून के साथ-साथ नियम 134-ए को लागू करके ‘जले पर नमक छिड़कने’ की कहावत चरितार्थ करती नजर आ रही है। यदि प्रदेश सरकार इस नियम को भी लागू करती है तो दोनों कानूनी धाराओं को मिलाकर निजी स्कूलों को दाखिलों में 50 प्रतिशत सीटें गरीब बच्चों के लिए आरक्षित करनी होंगी। निजी स्कूलों के संचालक प्रदेशभर में कई बड़े महासम्मेलनों के जरिए दो टूक कह चुके हैं िकवे अपने स्कूलों पर ताला लटकाने को तैयार हैं, लेकिन सरकार के इस दोहरे कानून को स्वीकार नहीं करेंगे। ऐसे में यदि सरकार और निजी स्कूल संचालक अपने-अपने निर्णय पर अड़े रहे तो स्थिति कितनी गंभीर और विस्फोटक होगी, इसका भी सहल अनुमान लगाया जा सकता है।

एक तरह से आरटीई कानून का मसला सरकार व निजी स्कूल संचालकों पर ‘सांप के मुंह में छछुंदर’ वाली कहावत सटीक बैठती दिखाई दे रही है। सरकार इस कानून को पूर्णतः लागू करवाए तो मुश्किल और न करवाए तो भी मुश्किल। ठीक उसी तरह निजी स्कूलों के लिए भी यह कानून न उगलते बन रहा है और न निगलते बन रहा है। अब ऐसे में क्या होना चाहिए? यह सबके समक्ष यक्ष प्रश्न बनकर खड़ा हुआ है।

सबसे बेहतर, निर्विदित और दूरगामी कदम यह रहेगा कि सरकार नए सिरे से समीक्षा करे कि आखिर सरकारी स्कूल किन-किन मानकों के आधार पर निजी स्कूलों से मात खा रहे हैं? उन मानकों को कैसे और कब तक पूरा किया जा सकता है? कैसे सरकारी स्कूलों की शिक्षा के स्तर को निजी स्कूलों के तुलनात्मक उठाकर एक आम व गरीब आदमी के दिलो-दिमाग से सरकारी स्कूलों की नकारात्मक छवि को मिटाया जा सकता है? इसमें कोई दो राय नहीं है कि इसके सरकार को शिक्षा प्रणाल में आमूल-चूल परिवर्तन लाने की कड़ी आवश्यकता होगी और कई ऐतिहासिक व प्रभावी अभूतपूर्व कदम कदम उठाने होंगे। निःसंदेह इसके लिए कुछ समय की आवश्यकता होगी। शिक्षा के स्तर में एकरूपता और समता लाने के लिए एक समय-सीमा निर्धरित करना श्रेयस्कर रहेगा।

जब तक लक्ष्य की प्राप्ति हो, तब तक सरकार को गरीब बच्चों की शिक्षा का सालाना खर्च निजी स्कूलों की प्रमुख मांग के अनुरूप अग्रिम भुगतान करने का प्रावधान करना चाहिए। ऐसा करने से एक तरफ निजी स्कूलों में गरीब बच्चों को बराबर का सम्मान हासिल होगा और दूसरी तरफ सरकार के प्राथमिक लक्ष्यों में निर्धारित समय सीमा में सरकारी स्कूलों के स्तर को ऊंचा उठाना, प्रमुखता के रूप में शामिल रहेगा। यदि सरकार ईमानदारी से यह रास्ता अपनाए तो निश्चित तौरपर वह दिन दूर नहीं होगा, जब सरकारी स्कूलों के प्रति आम आदमी का विश्वास पुनः लौट आएगा।

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