कमजोर वर्ग के नेता के प्रदेश अध्यक्ष पद से हटते ही क्या लालू की राजद में सवर्णों का बढ़ेगा बोलबाला ?

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

बिहार राजद (राष्ट्रीय जनता दल) में दो कदावर नेताओं के बीच जुबानी जंग थमने का नाम नहीं ले रहा है। हम बात कर रहे हैं राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह और रघुवंश प्रसाद सिंह की। कहने को तो दोनों नेताओं के बीच बेहतर संबंध है, मगर आए दिन दोनों से तरफ से आग उगले जाने से पार्टी के अंदर का पारा चढ़ता-उतरता रहता है। दरअसल राजद जबसे वजूद में आयी उसने पहली बार सवर्ण समुदाय से प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह को बना दिया। लालू ने अगर सवर्ण का कार्ड खेला है तो जरुर कुछ खास है। लेकिन जबसे जगदानंद सिंह को जिम्मेवारी मिली है दोनों नेताओं के बीच चल रहा शीत युद्ध सतह पर आ गया है।

राजद सुप्रीमों लालू प्रसाद के साथ कई आम आए और खास बनने के बाद इनके दामन को छोड़कर चले गए। इसकी फेहरिस्त काफी लंबी है, इसमें इनके स्वजातीय भी कई नेता इसमें शामिल हैं। राजद की स्थापना हुई लालू के साथ जगदानंद सिंह और रघुवंश प्रसाद सिंह लगातार कदमताल करते रहे। इन दोनो नेताओं को पार्टी में अच्छी तरजीह भी मिलती रही है।

लालू प्रसाद बिहार की राजनीति को भांपते हुए पहली बार राजद प्रदेश अध्यक्ष की कमान किसी सवर्ण जगदानंद सिंह को सौंपकर एक राजनीतिक चाल चल दिया है। हलांकि सियासत में इसे राजद की राजनीतिक चाल के रुप में देखी जा रही है। मगर प्रदेश अध्य़क्ष किसी फॉर्वर्ड के बनने को लेकर आपसी विवाद भी बढ़ गया है। एक तरफ रामचंद्र पूर्वे के पद से हटने को लेकर पिछड़े वर्ग में क्षोभ है वहीं जगदानंद सिंह को कमान मिलते ही रघुवंश प्रसाद सिंह को ये बात खल गई और जगदानंद बाबू को ही रघुवंश बाबू लगातार निशाना बनाने लगे। पार्टी के लिए यह वक्त संभलकर चाल चलने की थी मगर राजद एक तरफ पिछड़ों और मुस्लिमों की जहां पार्टी कही जाती है वहीं सवर्ण कार्ड खेलकर बिहार की सियासत को नया रंग दे दिया है।

राजद का शुरुआती दौर से ही दो खेमों में बंटना इसकी नियति में शामिल रहा है। हम आपको याद दिला दें कि लालू-राबड़ी के मुख्यमंत्रीत्वकाल में साधु यादव और सुभाष यादव की चलती चरम पर थी।, इन्हीं का राज चलता था। समय बदला और राजद की बिहार से सत्ता चली गई। नीतीश कुमार सत्ता में आए, उसके बाद राजद के अंदर बिखराव की शुरुआत हुई। समय बदला और राजद के साथ 2015 में लालू और नीतीश साथ चुनावी मैदान में आए। राजद-जदयू ने सरकार मिलकर बनाया लेकिन 20 माह के बाद ही इन दोनों का रिश्ता एक बार फिर टूट गया। अपने पुराने दोस्त के साथ जदयू फिर से भाजपा के साथ सत्ता में बनी रही। लालू प्रसाद के खिलाफ चल रहा मामला उनके गले की फांस बनी और वो जेल चले गए। पार्टी पर एक बार फिर से  संकट गहराने लगा। उसके बाद लालू ने तेजस्वी और तेजप्रताप को आगे किया। इसमें तेजस्वी को कमान सौंप दी, फिर क्या घर में ही शीतयुद्ध की शुरूआत हो गई। भले ही इन दोनों ने अपने बीचे के दरकते रिश्तों  को स्वीकार करे या ना करे लेकिन इतना तो तय है कि सत्ता की कमान संभालने को लेकर दोनों भाईयों में जरुर कहीं न कहीं मनमुटाव है।

आपको बता दें कि शुक्रवार को लालू के आदेश पर राजद दफ्तर पहुंचे रघुवंश ने प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह से बंद कमरे में एक घंटे से अधिक समय तक बातचीत की लेकिन दोनों नेता एक साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं कर सके। जैसे ही बैठक खत्म हुई प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह तेजी से लालू यादव के चैम्बर से निकल लिए और रघुवंश प्रसाद को अकेले ही प्रेस कॉन्फ्रेंस करनी पड़ी। जबकि जगदानंद सिंह अपने चेंबर में अलग से मीडिया से बातचीत की, दोनों नेताओं ने एक साथ बैठकर मीडिया के सवालों का जवाब नहीं दिया। हालांकि दोनों नेता यह कहते रहे कि दोनों के बीच कोई विवाद नहीं है लेकिन एक साथ बैठकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के सवाल पर दोनों नेता जवाब देने से बचते रहे।

राजद अपने एम-वाई (मुस्लिम-यादव) वोट पर पूरी तरह से दावा करती है। वहीं सवर्ण कार्ड खेलने के लिए जगदानंद सिंह को आगे कर दिया है। लेकिन रघुवंश बाबू के बिफरने से राजद कहीं इस बार भी आंतरिक कलह की शिकार न हो जाए इसको लेकर लालू प्रसाद जरुर चिंतित हैं। दोनों नेता अपने-अपने तरीके आपसी विवाद से पल्ला झाड़ रहे हैं। मगर इन दोनों कदावर नेताओं का पार्टी के अंदर विवाद साफ देखने को मिल रहा है। बात चाहे जो भी हो पार्टी की हर गतिविधि से लालू प्रसाद वाकिफ तो जरुर हैं। अब ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर इस तरह से आपसी विवाद से पार्टी जुझता रहा तो महागठबंधन के अन्य साथियों के साथ राजद कैसे सामंजस्य बैठा पाएगा और आगे की लड़ाई एनडीए से कैसे लड़ पाएगा यह मंथन का विषय है।  

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