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    Homeसाहित्‍यकविताकाश कि तुम विषपायी होते शिव के जैसे

    काश कि तुम विषपायी होते शिव के जैसे

    —विनय कुमार विनायक
    कल तक जो पानीपी-पीकरकोस रहे थे
    दलित आदिवासी पिछडे़जन कोमत दो,
    शिक्षा और नौकरी में आरक्षण,वही आज
    आरक्षण का अमृत पान कर चुप क्यों हैं?

    काश कि तुम विषपायीहोते शिव के जैसे,
    एक शिव हीहैं जो बिना वर्ण-जाति विचारे
    सबको वरदान देते, खुद कालकूटपी लेते,
    सबको अमृत पिलाने वाले, खुद नहीं पीते!

    आरक्षण तबतक बुरा जबतकनहीं मिला,
    आरक्षण नहीं, आरक्षित जातियों से गिला,
    आरक्षण संगआरक्षितों को गालियां मिली,
    क्या तुमजातियों की घृणित गाली लोगे?

    आज शस्त्र और शास्त्र दूषित लगता क्यों?
    अगर पूर्वमें मानव को मानव समझे होते,
    जितनी गालियां दी तुमनेउससे राहत देते,
    काश कि तुमविषपायी होते शिव के जैसे!

    आरक्षितों ने आरक्षण पाया है नहींसिर्फ
    शिक्षा,दीक्षा, रोजगार पाने के लिए, बल्कि
    यह हर्जाना है गालियों का जो तुमने दिए,
    काश कि तुम विषपायी होते शिव के जैसे!

    विनय कुमार'विनायक'
    विनय कुमार'विनायक'
    बी. एस्सी. (जीव विज्ञान),एम.ए.(हिन्दी), केन्द्रीय अनुवाद ब्युरो से प्रशिक्षित अनुवादक, हिन्दी में व्याख्याता पात्रता प्रमाण पत्र प्राप्त, पत्र-पत्रिकाओं में कविता लेखन, मिथकीय सांस्कृतिक साहित्य में विशेष रुचि।

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