लेखक परिचय

सारदा बनर्जी

सारदा बनर्जी

लेखिका कलकत्ता विश्वविद्यालय में शोध-छात्रा हैं।

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images (1)क्या महज महिला दिवस को सेलिब्रेट करके, सलामी ठोककर या नमन करके या उस दिन स्त्री-सम्मान और स्त्री-महिमा की असंख्य बातें करके स्त्रियों का कोई भला हो सकता है? क्या यह ज़रुरी नहीं कि एक दिन नहीं हर दिन स्त्रियों का हो यानि स्त्रियों के पक्ष में हो, स्त्री की समानता के पक्ष में खड़ा हो। स्त्रियों का भला तो तब हो जब हर घर में स्त्री का सही सम्मान(देवी की आड़ में नहीं) हो, उस पर शारीरिक या मानसिक यातना न हो। स्त्री मुक्त हो, उसके पास अपनी अस्मिता हो, उसके पास अपने फैसले हो। स्त्री के हकों को लेकर तो आए दिन मीडिया के विभिन्न माध्यमों में तमाम तरह के बहस हो रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों से लेकर आम जनता तक स्त्रियों के प्रति होते हिंसाचार से तंग है और वे निरंतर इसका विरोध कर रहे हैं। इसका ताज़ा नमूना है दिल्ली में दामिनी गैंगरेप पीड़िता के लिए हज़ारों की तादाद में जनता का एकजूट होना। लेकिन सवाल उठता है कि क्या इन विरोधों का समाज पर कोई असर हो रहा है? क्या स्त्रियों के साथ होते हिंसाचार में कोई कमी नज़र आ रही है? क्या हमारे घरों में स्त्रियों के साथ बदसलूकी की घटनाएं कम हुई है? इसका जबाव है नहीं, नहीं, नहीं।

आँकड़े बताते हैं कि स्त्रियां अभी तक सुरक्षित नहीं है। कहीं पति ने पत्नी पर तेजाब फेंका, कहीं बलात्कार किया, कहीं पत्नी पर शक करके उसे उत्पीड़ित किया, कहीं दूध पीती बच्ची के साथ बलात्कार हुआ, कहीं भाई ने बहन का रेप किया, कहीं राह चलती लड़कियों के साथ छेड़छाड़ की घटना हुई आदि आदि। लेकिन ये किस्से तो घर के बाहर की हैं, घर के अंदर हो रहे उत्पीड़न का हिसाब हमारे पास नहीं होता लेकिन यह सच है कि स्त्रियां हर दिन घरेलू-हिंसा से मुखातिब होती हैं। इससे साबित होता है कि स्त्री-समानता का संवैधानिक अधिकार महज सिंद्धांत बन कर रह गया है वह व्यवहार में तब्दील नहीं हुआ है। साथ ही स्त्री के पक्ष में हो रहे तमाम विरोधों, प्रदर्शनों, जुलूसों का कोई मूल्य नहीं है, सारे के सारे निराधार विरोध प्रमाणित हो रहे हैं क्योंकि अभी भी स्त्रियां पितृसत्ताक समाज के पुंसवादी उत्पीड़न से मुक्त नहीं हो पाई हैं। स्त्रियां आज भी पीड़िता हैं ना कि मुक्ता।

ऐसी ही एक पीड़िता है ‘सोनी सोरी’ जो आदिवासी होने की दर्दनाक सज़ा भुगत रही है। सोनी सोरी एक ऐसी स्त्री है जो आदिवासी पत्रकार, कार्यकर्ता, शिक्षिका होने के साथ-साथ तीन बच्चों की मां भी है। वह एक ऐसी साहसी महिला है जो छत्तीसगढ़ सरकार और खनन कंपनियों के खिलाफ़ बोलने का साहस जुटाई है और इसकी वजह से वह आज तक जेल में है। उसने आदिवासी समुदाय और उनकी परंपरागत ज़मीन पर खनन कंपनियों के कब्ज़े का प्रतिवाद करके अपनी लोकतांत्रिक अधिकार का ही प्रयोग किया लेकिन उसे छत्तीसगढ़ सरकार ने 4 अक्टूबर, 2011 में माओवादी होने के संदेह पर गिरफ़्तार किया हालांकि उसका गुनाह अब तक साबित नहीं हो पाया है। जेल में उसके हौसले को पस्त करने के लिए पुलिस द्वारा उस पर तमाम तरह के शारीरिक, मानसिक और यौन-उत्पीड़न की जी-तोड़ कोशिश हुई है जो एन.आर.एस. मेडिकल कॉलेज, कोलकाता में मेडिकल टेस्ट के दौरान प्रमाणित हो चुका है। अपने साथ हुए इस भयानक उत्पीड़न का ज़िक्र करते हुए सोनी ने 27 जुलाई,2012 सुप्रीम कोर्ट को एक चिट्ठी लिखा और अपने मानवाधिकार के सवाल को उठाया। उसने कोर्ट से आवेदन किया कि उसे दांतेवाड़ा जेल से स्थानांतरित किया जाए। 8 जनवरी,2013 को सुप्रीम कोर्ट ने सोरी को दांतेवाड़ा जेल से जगदलपुर जेल में शिफ़्ट कराने का आदेश दिया।

वस्तुतः सोरी के साथ जिस तरह का ज़ुल्म जेल में हुआ मसलन् उसे नंगा करके उसके शारीरिक अंगों को छूना, पैर में बिजली के झटके देना, उसके यैनांगों में पत्थर घुसाना आदि मानवता को बेहद शर्मसार करने वाली घटनाएं हैं। अगर वह दोषी है या उसका माओवादियों से कोई संपर्क है तो उसे सज़ा देने का प्रावधान संविधान में मौजूद है, उसे बेशक सज़ा मिले लेकिन उसके गुनाह का बिना प्रमाणित हुए उसे जिस तरह की सज़ा दी गई वह किसी भी अपराध के लिए किसी भी देश के संविधान की दंड संहिता में नहीं मिलेगा। उसने चिट्ठी में जिन उत्पीड़नों का ज़िक्र किया है वह अलोकतांत्रिक है, असंवैधानिक है, मानवाधिकार के खिलाफ़ है। इसलिए ज़रुरी है कि सरकार और अदालत संज्ञान ले कि कौन-कौन उसके गुनहगार हैं, उस पर किस-किस तरह के ज़ुल्म हुए हैं और उन अपराधियों को कड़ी से कड़ी सज़ा दें।

स्पष्ट है कि स्त्रियां देश में आज भी सुरक्षित नहीं है, चाहे वह घर में हो, चाहे बाहर या चाहे जेल में हो। उसके अस्तित्व को शरीर के बाहर निकलकर नहीं देखा जाता, स्त्री का अर्थ केवल भोग्या बनकर रह गया है। लोकतंत्र के आने के बाद अहम शर्त यह थी कि स्त्री-पुरुष में एक लोकतांत्रिक संपर्क विकसित हो। स्त्रियों के साथ पुरुषों का लोकतांत्रिक व्यवहार हो चाहे घर हो या बाहर लेकिन ऐसा नहीं हुआ। स्त्री वजूद के मूल्य को नकारा गया और उसे दूसरे दर्जे में रखा गया। वह हाशिए पर रही, उसके फैसले हाशिए पर रहे, उसका अस्तित्व हाशिए पर रहा। यही कारण है कि स्त्रियों पर ज़ुल्म बरकरार रहा, वह पीड़िता ही बनी रही और वह आज तक बनी हुई है। अभी भी वह शोषिता है।

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