नारी तुम नारायणी हो नर का सृजनहार

—–विनय कुमार विनायक
नारी के ह्रदय में अमृत, मन में प्यार,
नारी तुम्हारे सामने,बौना है ये संसार!

तुम असीम,अतुलनीय ईश्वरीय शक्ति,
तुलना तुम्हारी नर से करना है बेकार!

तुम्हीं सरस्वती-भगवती-भवानी-मानवी,
तुम अक्षर-जर-शक्ति-संस्कृति आधार!

तुम्हारे सिवा ईश्वर को देखा है किसने,
ईश्वर-अल्ला-भगवान होते हैं निराकार!

राम-कृष्ण-बुद्ध-जिन-ईसा-गुरु-पैगम्बर,
पाए हैं सबने तुम्हारी कोख में आकार!

हिमगिरि सा उतुंग, तुम सागर सी गहरी
तुम दया-माया-ममता-करुणा की आगार!

तुम्हारी हंसी से ये धरती स्वर्ग बनती है,
तुम्हारे ही आंसू खारे सागर के जलधार!

तुम ब्रह्मा की लेखनी,हो शिव का त्रिनेत्र,
तुम हो नारायण के क्षीर सागर की नार!

नारी तुम नारायणी हो नर का सृजनहार,
नारी ना होती तो सृष्टि होती ना साकार!

नारी नहीं तो नर नहीं, नारायण भी नहीं,
नारी बिना सब सूना,मरघट सा है संसार!

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