लेखक परिचय

डाँ. रमेश प्रसाद द्विवेदी

डाँ. रमेश प्रसाद द्विवेदी

कनिष्ठ अनुसंधान फैलो लोक प्रशासन व स्थानीय स्वशासन विभाग नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर

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“हमारे समाज में कोई सबसे अधित हताश हुआ है तो वे महिलाएं ही हैं और इस बजह से हमारा अंधःपतन भी हुआ हैं महिलापुरूष के बीच जो फर्क प्रकृति के पहले है और जिसे खुली आंखों से देखा जा सकता है, उसके अलावा मैं किसी किस्म की फर्क को नही मानता’’   महात्मा गांधी

भारत में अतीत से ही नारी का सर्वोपरी स्थान रहा हैं परंतु गत वर्षो में महिलाओं की स्थिति में काफी बदलाव आया हैं। नारी एक वह पहलू हैं जिसके बिना किसी समाज की रचना संभव नही हैं। समाज में नारी एक उत्पादक की भूमिका निभाती हैं। नारी के बिना एक नये जीव की कल्पना भी नही कर सकते अर्थात नारी एक सर्जन हैं, रचनाकार हैं। यह कुल जनसंख्या का लगभग आधा भाग होती हैं फिर भी इस पित्रसत्तात्मक समाज में उसे ही दृष्टि से देखा जाता हैं। पुत्र जन्म पर हर्ष तथा पुत्री जन्म पर संवेदना व्यक्त की जाती हैं। भारतीय समाज में आज भी पुत्रों को पुत्रियों से अधिक महत्व दिया जाता हैं। “यत्र नार्यस्तु पुज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’’ अर्थात जहां नारी की पूजा होती हैं वहां देवता निवास करते हैं। विविध प्रतिवेदनों के अध्ययन से ज्ञात हुआ कि गत वर्षों में महिलाओं के मानवाधिकार का जितना उलंघन हुआ है, शायद पहले ऐसा कभी नहीं हुआ होगा।

2001 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंखया 1,028737,436 है जिसमे ग्रामीण जो विश्व के प्रतिशत में 16.44 प्रतिशत है। 1000 में से 933 महिलाएं है। आजादी के 63 वर्षो के बाद भी महिलाओं की साक्षरता 64.8 प्रतिशत है, जिसमें 53.7 महिलाएं व 75.3 प्रतिशत पुरूष है। महाराष्ट्र के संदर्भ में देखें तो यहां की जनसंख्या 9,68,78,627 है। 5,57,77,647 ग्रामीण एवं 4,11,00,980 नगरीय जनसंख्या है। इस राज्य का लिगांनुपात 1000 में से 922, कुल साक्षरता 76.9 प्रतिशत है जिसमें 86.0 पुरूष एवं 76.0 महिलाओं का है।

केन्द्र एवं राज्य सरकारो ने इस संबंध में कई प्रयास किए हैं किंतु इसमें वे पूर्णरूपेण सफल नही हो पाए हैं। जाहिर हैं योजनाओं की सफलता के लिए उसके लाभार्थियों का सहयोग भी उतना ही अहमियत रखता हैं जितनी कि अन्य बाते। समाज व राज्य की विभिन्न गतिविधियों में पर्याप्त सहभागिता के बावजूद इनके साथ अभद्र व्यवहार, घरेलू हिंसा, कार्यस्थल, सडको, सार्वजनिक यातायात एवं अन्य स्थलों पर होने वाली हिंसा में वृद्धि हुई हैं। इसमें शारीरिक, मानसिक एवं यौन शोषण भी शामिल हैं। दैनिक समाचार पत्रों में दिनब-दिन की घटनाएं छपी होती जो महिलाओं के साथ होती है जैसे बलात्कार, दहेज के लिए बहू को जलाना, प्रताड़ित करना तथा बालिका का भ्रूणहत्या। यह सच हैं कि आज महिलाओं ने अपने आपको मुख्य धारा में शामिल कर लिया हैं परंतु उनके इस विकास में उनकी दृ इच्छा शक्ति के साथ मीडिया और भारतीय फिल्मों का भी अत्यंत योगदान हैं जिसके मानसिक तौर पर नारी को निरंतर विकास की ओर गतिशील किया हैं। भारतीय संस्कृति में महिलाओं को समाज में सबसे ऊचा दर्जा दिया गया हैं। वैदिक युग में पिता अपनी पुत्री के विवाह के समय उसे आिशर्वाद देता था कि वह सार्वजनिक कार्य और कलाओं में उत्कष्टता प्राप्त करे। सभ्यता के अनेक महत्वपूर्ण पडाव महिलाओं की उसी ओजस्विता और रचनात्मकता पर आधारित रहे हैं। वस्तुतः भारत दुनिया के उन थोडे से देशों में से हैं जहां की संस्कृति और इतिहास में महिलाओं को सम्मानजनक स्थान प्राप्त हैं और जहां मनुष्य कों मनुष्य बनाने में उनके योगदान को स्विकार किया गया हैं किंतु विभिन्न कारणों से कालांतर में भारतीय समाज में स्ति्रयों की पारिवारीक सामाजिक स्थिति निरंतर कमजोर होती हैं और पुरूष समाज द्वारा आरोपित मर्यादा और अधिनता स्विकार करने हेतु विवश कर दिया गया हैं।

19वी सदीं में बदलाव आना प्रारंभ हुआ जब नवजागरण काल में भारतीय फलक पर अनेक सुधारवादी व्यक्तित्व सक्रिय हुए। बंगाल में राजा राममोहन राय ने जहां सती प्रथा के खिलाफ मुहिम चलाई वही ईश्वरचंद्र विद्यासागर और गुजरात में दयानंद सरस्वती ने स्त्री शिक्षा और विधवा विवाह जैसे मुद्दों को लेकर काम किया। महाराष्ट्र में सन 1848 में सावित्री बाई फुले ने लडकियों हेतु प्रथम स्कूल पुणे में खोला। नारी उत्कर्ष की दिशा में यह एक विशष्ट प्रयास था फलतः समूचे भारत की महिलाओं में एक नई चेतना जागृत होने लगी।

20वी सदीं में इस प्रक्रिया को ठोस धरातल और भक्ति भारत में आजादी के बाद मिली। भारत के संविधान ने महिलाओं को समाज की एक महत्वपूर्ण इकाई माना और इन्हें नागरिकता, वयस्क मताधिकार और मूल अधिकारों के आधार पर पुरूषों के बराबर दर्जा तथा समान अधिकार प्रदान किए, किंतु वास्तविक शक्ति महिलाओं से अब भी दूर थी। खासकर ग्रामीण एवं जनजातीय समाजों की महिलाओं से। संविधान के अनुच्छेद 39 में की गई व्यवस्था के अनुसार राज्य अपनी नीति का विशष्टतया इस प्रकार संचालन करेगा कि सुनिश्चित रूप से पुरूष और स्त्री सभी नागरिकों को समान रूप से जीविका के पर्यात साधन प्राप्त करने का अधिकार हों अतः भारतीय सरकार ने वर्ष 2001 को राष्ट्रीय महिला सशक्तीकरण वर्ष के रूप में मनाने का फैसला किया।

73 वां संविधान संशोधन ने स्थानीय निकायों में 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करके अधिकार संपन्न बनाने का अवसर प्रदान किया है अभी हाल ही में महिलाओं के लिए कुछ राज्यों में आगामी स्थानीय निकायों के चुनाव के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया जा चुका है और कुछ राज्यों में स्थानीय निकायों के चुनाव भी संपन्न कराये जा चुके है और कुछ राज्यों में करवाये जाने का प्रावधान किया जा रहा है, जिससे महिलाओं की सभी क्षेत्रों में सहभागिता बेगी। भारत ने इस प्रक्रिया की शुरूवात करते हुए ग्रामिण अंचलों और विभिन्न समुहों की महिलाओं को शक्ति संपन्न बनाने की दिशा में यह एक क्रांतिकारी कदम साबित हुआ। इन जनतांत्रिक इकाइयों से जुडी महिलाएं जैसे जैसे अपनी अधिकारों के प्रति जागरूक होती जाएगी उनके अधिकार वंचित की प्रक्रिया भी उसी गति से थमती जाएगी।

भारतीय समाज में महिला की भूमिका को बडा ही महत्व का स्थान था फिर भी उसे मानव अधिकार नही था उसे अपनी इच्छा से रहने नही दिया जाता था। समाज के नियमों पर और एक सीमित ही दिशा से चलने की अनुमती थी। इस तरह हर वक्त अपनी इच्छाओं का बलिदान देना पडता था। वैसे ही भारतीय समाज में स्ति्र व पुरूषों को समान अधिकार नही थे। महिलाएं यह पुरूषों की तुलना में बहुत ही कमजोर मानी जाती थी। कुछ अंतराल के बाद महिलाओं की स्थिती में परिवर्तन आने लगा। इसका कारण अंग्रेजो के शासन को माना जाएगा।

भारत में अंग्रेजो के शासन काल से भारत में हर क्षेत्र में बहुत ही तेजी से परिवर्तन आने लगा। स्त्री पुरूषों में जो भेद दिखाई देते थे वे दूर होने लगे और दोनो के लिए समान अधिकार दिये गये। इस कारण स्ति्रयों को सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक क्षेत्रों में समान अधिकार दिये गये। महिलाओं को पने की अनुमति दी गई फिर भी आज हम देखते हैं कि ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को पाया जाता हैं लेकिन उसे नौकरियां अर्थार्जन करने की अनुमति नही दी जाती। अधिकतर गांवों में देखा जामता है कि 80 प्रतिशत परिवार संयुक्त ही रहता हैं इसका कारण घर के काम व घर के अलावा खेती में काम करने की अनुमति दी जाती हैं। महिलाओं का अर्थार्जन करने की अवसर या अधिकार यह भारत में औद्योगिकरण के बाद ही दिया गया। औद्योगिकरण के कारण एैसी परिस्थिती तैयार हुई जिसके कारण महिलाओं को भी अर्थार्जन करने की जरूरत लगने लगी।

नारी समाज का एक अभिन्न अंग हैं। अतित से नारी का समाज में सर्वोपरी स्थान रहा हैं। उसे सुख और समृद्धी का प्रतिक माना जाता रहा हैं परंतु गत वर्षो में महिलाओं के मानवाधिकारों का जितना उल्लंघन हुआ हैं शायद पहले कभी नही हुआ होगा। गत वर्षे दिल्ली में हुए देश भर के पुलिस महानिदेशकों के सम्मेलन में बोलते हुए उपप्रधानमंत्री श्री लालकृष्ण आडवानी ने दिल्ली के पुलिस आयुक्त को चेतावनी दी और इस बात पर दुःख प्रकट किया कि सीटी फोर्ट ऑडिटोरियम के बाहर स्विस महिला के साथ हुए बलात्कार के अपराधियों को पुलिस अब तक पकड नही पायी हैं। उन्होंने कहां कि एैसी घटनाओं से विदेशों में भारत की छवि खराब होती हैं एवं जिस समाज में स्ति्रयां सुरक्षित न हो, वह समाज स्वतंत्र और सभ्य होने का दावा नही कर सकता। विदेशी राजनयिक के साथ बलत्कार की घटना सम्भव ही इसलिए हो सकी क्योंकि देश में और खासतौर से राजधानियों और महानगरों में बलात्कार की घटनाएं तेजी से ब रही हैं और कम से कम प्रशासन के स्तर पर इसके प्रति कोई संवेदनशीलता नही हैं। भारतीय पुलिस तथा प्रशासन को इस योग्य नही बनाया गया कि वह मानवाधिकारों की रक्षा करना अपना कर्तव्य माने इसलिये पुलिस में हिंसा, हत्या और बलत्कार को गंभीरता से लेने की प्रवृत्ति पैदा ही न हो सकी।

वर्तमान में भारतीय महिलाएं समाज व राज्य की विभिन्न गतिविधियों में पर्याप्त सहभागिता कर रही हैं परंतु इससे उनके प्रति घरेलु हिंसा के अलावा कार्यस्थल पर सडको एवं सार्वजनिक यातायात के माध्यमों में व समाज के अन्य स्थलों पर होने वाली हिंसा में भी वृद्धि हुई हैं। इसमें शारीरिक, मानसिक व यौन सभी प्रकार की हिंसा शामिल हैं। प्रताडना, छेडछाड, अपहरण, बलत्कार, भ्रुण हत्या (यौन उत्पीडन, दहेज मृत्यु, दहेज निषेद व अन्य) यह अन्याय पूरे राष्ट्रीय स्तर पर होते हैं पर इनमें उत्तर प्रदेश सबसे आगे हैं। मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा ने भेदभाव को न करके सिद्घांत की अतिपुष्टि की थी और घोषित किया था कि सभी मानव स्वतंत्र पैदा हुए हैं और गरिमा एवं अधिकारों में समान हैं तथा सभी व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के, जिसमें लिंग पर आधारित भेदभाव भी शमिल हैं। फिर भी महिलाओं के विरूद्ध अत्यधिक भेदभाव होता रहा हैं।

सर्वप्रथम 1946 में महिलाओं की परिस्थिती पर आयोग की स्थापना की गई थी। महासभा ने 7 नवंबर 1967 को महिलाओं के विरूद्ध सभी प्रकार के भेदभाव की समाप्ति पर अभिसमय अंगीकार किया। 1981 एवं 1999 में अभियमय पर एैच्छिक नवाचार को अंगीकार किया जिससे लैंगीक भेदभाव, यौन शोंषण एवं अन्य दुरूपयोग से पिडित महिलाओं को अक्षम बनाएगा। मानव अधिकारो की रक्षा के लिए एवं संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र के उद्देश्य को दृष्टिगत रखते हुए भारत में मानवाधिकार आयोग का गठन किया गया हैं। भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार सम्मेलनों आर्थिक एवं सामाजिक परिषद एवं महासभा के अधिवेशनों में मानवाधिकार मुद्दों पर सक्रिय रूप से भाग लिया हैं। मानव अधिकार संरक्षण अधिनीयम, 1993 की धारा 30 में मानव अधिकारों के उल्लंघन संबंधी शीघ्र सुनवाई उपलब्ध कराने के लिए मानव अधिकार न्यायालय अधिसुचित करने की परिकल्पना की गई हैं। आन्ध्र प्रदेश, असम, सिक्किम, तमिलनाडु और उत्तरप्रदेश में इस प्रकार के न्यायालय स्थापित भी किए जा चुके हैं। यहां यह कहना उचित होगा कि जब से मानवाधिकार संरक्षण कानून बना हैं और राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन हुआ हैं, नारी की स्थिति समाज में और अधिक सुदृ होने लगी हैं। अब महिलाउत्पीडन की घटनाओं में भी अपेक्षाकृत कमी आई हैं। हमारी न्यायिक व्यवस्था ने भी नारी विषयक मानवधिकारो की समुचित सुविधा की हैं। आज महिलाएं कर्मक्षेत्र में भी आगे आई हैं। वे विभिन्न सेवाओं में कदम रखने लगी हैं लेकिन जब कामकाजी महिलाओं के साथ यौन उत्पीडन की घटनाएं होने लगी तो न्यायपालिका ने उसमें हस्तक्षेप कर यौन उत्पीडन की घटनाओं पर अंकुश लगाना अपना दायित्व समझा। विशाका बनाम स्टेट ऑफ राजस्थान, ए. आई. आर. 1997 इस. सी. उमा का इस सम्बंध में एक महत्वपूर्ण मानना हैं। उल्लेखनीय हैं कि महिलओं के प्रति निर्दयता को उच्चतम न्यायालय ने एक निरंतर अपराध माना हैं। पति द्वारा पत्नी को अपने घर से निकाल देने तथा उसे मायके में रहने के लिए विवश करने पर आपराधिक कृत्य का मामला दर्ज किया गया हैं। महिलाओं के सिविल एवं संवैधानिक अधिकारो पर विचार करते हैं। संविधान के अनुच्छेद 15 में यह प्रावधान किया गया हैं कि धर्म, पुलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर किसी नागरिक के साथ विभेद नही किया जायेगा। अनुच्छेद 16 लोक नियोजन में महिलाओं को भी समान अवसर प्रदान करता हैं। समान कार्य के लिए समान वेतन की व्यवस्था की गई हैं। महिलाओं को मात्र महिला होने के नाते समान कार्य के लिए पुरूष के समान वेतन देने से इंकार नही किया जा सकता हैं। उत्तराखंड महिला कल्याण परिषद बनाम स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश, ए. आई. आर. 1992 एस. सी. 1965 के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा महिलओं को समान कार्य के लिए पुरूष के समान वेतन एवं पदोन्नती के समान अवसर उपलब्ध कराने के दिशा निर्देश प्रदान किये गये हैं। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 18 स्ति्रयों को सम्पत्ति में मालिकाना हक प्रदान करती हैं। श्रम कानून महिलाओं के लिए संकटापन्न यंत्री तथा रात्रि में कार्य का निषेध करते हैं। मातृत्व लाभ अधिनियम कामकाजी महिलाओं को प्रसुति लाभ की सुविधाएं प्रदान करता हैं। दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 125 में उपेक्षित महिलाओं के लिए भरण पोषण का प्रावधान किया गया हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर नारी विषयक मानवाधिकारों को विभिन्न विधियों एवं न्यायिक निर्णयों में पर्याप्त संरक्षण प्रदान किया गया हैं। बदलते परिवेश में संविधान में 12वे संशोधन द्वारा अनुच्छेद 51 के अंतर्गत नारी सम्मान को स्थान दिया गया और नारी सम्मान के विरूद्ध प्रथाओं का त्याग करने का आदशर अंगीकृत किया गया हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तथा राष्ट्रीय महीला आयोग नारी सम्मान की रक्षा एवं सतत प्रयासरत हैं।

भारतीय संविधान, राज्य व केन्द्र सरकार, पंचायती राज व्यवस्था आदि के माध्यम से महिलाओं पर हाने वाले अपराध व अत्याचार के निदान के लिए निरन्तर प्रयास किया जा रहा है लेकिन महाराष्ट राज्य में महिलाओं पर अत्याचार सुचारू रूप से फलफूल रहा है। वर्ष 200910 में 16620 हजार महिलाओं ने पुलिस विभाग का सहारा लिया है। ग्रामीण समाज की तुलना में सुशिक्षित व शहरी भाग में अत्याचार का प्रमाण पाया गया। इस राज्य की विधि रिपोर्ट व प्रकाशित समाचार पत्रों के अध्ययन से ज्ञात हुआ कि महिलाओं पर दहेज की मांग को लेकर मराठवाड़ा क्षेत्र में मामले पाये गये है। राज्य सरकार द्वारा महिलाओं का घरेलू हिंसा नियंत्रण के लिए विविध स्तर पर जनजागरूकता कार्यक्रम कियान्वित किया जाता है। देश में दहेज लेने वालों पर कानूनी कार्यवाई का प्रावधान किया गया है। यवतमाल जिले में वर्ष 2010 में पारिवारिक कलह से त्रस्त 1200 महिलाओं के अपनी जीवनलीला समाप्त कर चुकी है। यवतमाल 75, अहमदनगर व पूना ग्रामीण में 69 एवं मुमंबई शहर में 68 मामले दर्ज करवाये गये है। इन जिलों में महिलाओं को आत्महत्या करने के लिए दबाव डाला गया है। इस घटना के लिए यह जिला राज्य की तुलना में प्रथम स्थान पर है।

महिलाओं के प्रति हिंसा विश्वव्यापी घटना बनी हुई हैं जिससे कोई भी समाज एवं समुदाय मुक्त नही हैं। महिलाओं के प्रति भेदभाव इसलिए विद्यमान हैं क्योंकि इसकी जडे सामाजिक प्रतिमानों एवं मूल्यों में जमी हुई हैं। वैसे तो महिलाओं के विरूद्ध हिंसा के कारणों को समाप्त किये बिना उसका पूर्ण निदान संभव नही पर यदि पाश्चात्य एवं विकसीत देशों पर दृष्टिपात करे तो एैसा लगता हैं कि इसका कारण मानविय संरचना व स्वभाव में अंतनिहित होने के कारण जड से इसका उन्मुलन सम्भव नही हैं। प्रत्येक स्थल व प्रत्येक प्रकार की महिला विरोधी हिंसा के लिए समाज और समाज और राज्य दोनों को ही अपना नैतिक एवं विधिक उत्तरदायित्व निभाना पडेगा। व्यवहारिक स्वरूप यही मांग करता हैं कि एक एैसी सामाजिक पहल हों जिससे महिलाओं के प्रति पूरे समाज की सोच बदले।

भारत में महिला हिंसा के भयानक स्वरूप के विरूद्ध संघर्ष के लिए और जन जागृति पैदा करने के लिए एक व्यापक अभियान चलाया जाना चाहिए। भारत जैसे विकासशील देश में मानव अधिकार का मुद्दा एक एैसा मुद्दा हैं जिसके लिए दीर्घकालिन नीति तथा सरकार एवं गैर सरकारी संगठन से सहयोग की जरूरत हैं। आकाशवाणी तथा दूरदशर्न दोनों मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता लाने की दिशा में प्रभावी एवं सक्रिय भूमिका निर्वाह कर सकते हैं हम सभी की जिम्मेदारी है कि महात्मा गॉधी के इस वाक्य ‘स्वतंत्र भारत को एैसा होना चाहिए कि कोई महिला कश्मीर से कन्याकुमारी तक अकेली घुम ले और उसके साथ कोई अशोभनीय घटना न हों’। को साकार करने का निरन्तर प्रयास करना आवश्यक है साथ ही सभी को महिलाओं को जीवन का आधा अंग मानकर स्वीकार करना चाहिए।

संदर्भ:-

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3 .ण्भारत : 2010

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6. ण्स्वाउंज डंतंजीप कंपसल रू 24 क्मबमउइमत 2010

7. ण्भारतीय समाज में नारी : रमा शर्मा व एम के मिश्रा अर्जुन पब्लिशंग हाउस दिल्ली, 2010

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