मजदूरों के एकीकरण से विस्थापन तक

मई दिवस के अवसर पर

प्रमोद भार्गव

जो मई दिवस दुनिया के मजदूरों के एक हो जाने के पर्याय से जुड़ा था, भूमण्डलीकरण और आर्थिक उदारवादी नीतियों के लागू होने के बाद वह किसान और मजदूर के शोषण और विस्थापन से जुड़ता चला गया। मई दिवस का मुख्य उद्देश्य मजदूरों का सामंती और पूंजी के शिकंजे से बाहर आने के साथ उद्योगों में बराबर की भागीदारी भी थी। जिससे किसान-मजदूरों को राज्यसत्ता और पूंजी के षड्यंत्रकारी कुचक्रों से छुटकारा मिल सके। लेकिन भारत तो क्या वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भी ऐसा संभव हुआ नहीं। भारतीय परिदृश्य में यही कारण है कि करीब पौने दो सौ जिलों में आदिवासी व खेतिहर समाज में सक्रिय नक्सलवाद भारतीय राष्ट्र-राज्य के लिए चुनौती बना हुआ है। ओड़ीसा में एक भाजपा विधायक और छत्तीसगढ़ से कलेक्टर का अपहरण करके नक्सलवादियों ने संविधान के दो स्तंभ विधायिका और कार्यपालिका को सीधी चुनौती पेश की है। दरअसल कथित औद्योगिक विकास के बहाने वंचित तबकों के विस्थापन का जो सिलसिला तेज हुआ है, उसके तहत आमजन आर्थिक बद्हाली का शिकार तो हुआ ही, उसे अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने के भी संकट से जुझना पड़ा है। मसलन एक ओर तो उसकी अस्मिता कुंद हुई जा रही है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक नीतियों ने उसकी आत्मनिर्भरता को भी परावलंबी बनाकर मई दिवस की सार्थकता को वर्तमान परिदृश्य में दरकिनार ही किया है।

फिरंगी हुकूमत के पहले भारत में यूरोप जैसा एकाधिकारवादी सामंतवाद नहीं था और न ही भूमि व्यक्तिगत संपत्ति थी। भूमि व्यक्तिगत संपत्ति नहीं थी इसलिए उसे बेचा अथवा खरीदा भी नहीं जा सकता था। किसान भू-राजस्व चुकाने का सिलसिला जारी रखते हुए भूमि पर खेती-किसानी कर सकता था। यदि किसान खेती नहीं करना चाहता है तो गांव में ही लागू गणतंत्र के आधार पर सामुदायिक स्तर पर भूमि का आवंटन कर लिया जाता था। इसे माक्र्स ने एशियाई उत्पादन प्रणाली नाम देते हुए किसानी की दृष्टि से श्रेष्ठ प्रणाली माना था। किंतु अंग्रेजों के भारत पर वर्चस्व के बाद भू-राजस्व व्यवस्था में दखल की जो शुरूआत हुई उसने भूमि के साथ निजी स्वामित्व के अधिकार जोड़ दिए। भूमि के निजी स्वामित्व के इस कानून से किसान भूमि से वंचित होने लगा। इसके बाद किसान की हालत लगातार बद्तर होती चली गई।

पूंजीवाद के देश में विकास के साथ-साथ मजदूरों का शोषण बढ़ा। उनसे 12 से 14 घंटे तक काम लिया जाता था यही स्थिति यूरोप के देशों बहुत पहले से जारी थी। लिहाजा वहां काम के घंटे 8 करा देने की मांगे के साथ मई दिवस का संघर्ष परवान चढ़ा बाद में यह मजदूर वर्ग के जीवन का हिस्सा बन गया। करीब 10 हजार साल पहले खेती के हुए विकास क्रम के साथ ही दास, अर्धदास, गुलाम, दस्तकार और दूसरे महनत कसों को अपने खून-पसीने की कमाई सौंपने के लिए मजबूर होना पड़ता था। श्रमिक इसी शोषण से मुक्ति के लिए एक हुए इस आंदोलन की शुरूआत अमेरिका में हुई। फिलाडेल्फिया के बढईयों ने 1791 में 10 घंटे काम के बदले 8 घंटे काम की मांग रखी। 1830 आते-आते यह आंदोलन दुनिया के मजदूरों का प्रमुख आंदोलन बन गया। आज भी यह धन्ना सेठों को डराता है। यही बजह रही कि इसे वैश्विक ग्राम के चेहरे में परिवर्तित करके कमोबेश खत्म कर दिया गया।

भारत में आजादी के बाद सही मायनों में खेती, किसान और मजदूर को बाजिव हकों का इंदिरा गांधी ने अनुभव किया। नतीजतन हरित क्रांति की शुरुआत हुई और कृषि के क्षेत्र में रोजगार बढ़े। 1969 में इंदिरा गांधी द्वारा निजी बैंकों और बीमा कंपनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। इस व्यवस्था से किसानों को खेती व उपकरणों के लिए कर्ज मिलने का सिलसिला शुरु हुआ। शिक्षित बेरोजगारों को भी अपना लघु उद्योग लगाने के लिए सब्सिडी के आधार पर ऋण दिए जाने की मुकम्मल शुरुआत हुई। आठवें दशक के अंत तक रोजगार और किसानी के संकट हल होते धरातल पर नजर आए। लिहाजा ग्रामीणों में न असंतोष देखने को मिला और न ही शहरों की ओर पलायन हुआ।

इंदिरा गांधी के बाद ग्राम व खेती-किसानी को मजबूत किए जाने वाले कार्यक्रमों को और आगे बढ़ाने की जरुरत थी ? लेकिन उनकी हत्या के बाद उपजे राजनीतिक संकट के बीच राजीव गांधी ने कमान संभाली। उनका विकास का दायरा संचार क्रांति की उड़ान में सिमटकर रह गया। बाद में पीवी नरसिंह राव सरकार के वित्त मंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह ने आर्थिक सुधारों के बहाने अमेरिकी नीतियों से उपजे नव उदारवादं को लागू करके किसान व मजदूर हितों को पलीता ही नहीं लगाया औद्योगिक और प्रौद्योगिक विकास के बहाने किसान, मजदूर और आदिवासियों को विस्थापन के लिए विवश कर दिया। जिसके चलते भूमिहीनता बढ़ी और सीमांत किसान ऐसा शहरी मजदूर बनकर रह गया कि आज उसके पास अपनी आवाज बुलंद करने के लिए किसी मजबूत संगठन की छत्रछाया ही नहीं बची है।

भू-मण्डलीकरण के हितों को भारतीय धरती पर साध्य बनाने के लिए डब्ल्यू.टी.ओ. पर हस्ताक्षर करने के साथ ही हमने किसान और मजदूर के हित गिरवी रख दिए। नतीजतन कृषि और किसान तो बदहाल हुए ही अंधाधंधु जीएम यानी संशोधित बीजों, रासायनिक खादों और कीटनाश्कों का इस्तेमाल कर जमीन की उर्वरा शक्ति भी हमने खो दी। आनुवंशिक फसलों को तो मनुष्य के लिए स्वास्थ्य की दुष्टि से भी हानिकारक माना जा रहा है, बावजूद हम विश्व व्यापार संगठन के करार से बंधे होने के कारण हानिकारक वस्तुओं के इस्तेमाल पर अंकुश लगाने में लाचार दिखाई दे रहे हैं।

एक तरफ हम किसान-मजदूर को बड़े बांध, उद्योग, सेज, माॅल और एक्सप्रेस हाई-वे के लिए खेती योग्य भूमि से बेदखल करने में लगे हैं, वहीं दूसरी तरफ नगदी, फसलों की शर्त पर बायोडीजल के लिए रतनजोत, ज्यादा पैदावार के लिए बीटी कपास आदि ऐसे पौधे लगाए जाने के लिए प्रोत्साहित करने में लगे हैं, जिन्हें बनाए रखने के लिए ज्यादा सिंचाई की जरुरत तो पड़ती ही है, साथ ही वे जमीन की आर्दता और उर्वरा शक्ति का भी खात्मा कर देते हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियां खुदरा व्यापार में दखल देने के साथ कार्पोरेट फार्मिंग पर भी गिद्ध दृष्टि लगाए हैं। कुछ अर्थशास्त्री और सरकारी नीतियों के निर्माता कृषि का आधुनिकीकरण किए जाने के बहाने सरकार पर दबाव बना रही हंै कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को पूंजी निवेश के लिए तैयार किया जाए। इस मश्विरे को उदारीकरण के परिप्रेक्ष्य में देखने वाली कई राज्य सरकारों ने तो अनुबंध खेती की नीति के आधार पर बिन्दु ही तलाशना शुरु कर दिए हैं। लेकिन भला हो आर्थिक उदारीकरण के सूत्रधार मनमोहन सिंह का कि उन्होंने खेती और किसान की दशा सुधारे जाने की दृष्टि से इस निवेश को उचित नहीं ठहराया है। यह सही भी है कि अनुबंध खेती से न किसान के हित साधने वाले है और न ही खाद्याान्न सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है। पंजाब और उड़ीसा में अनुबंध खेती का प्रयोग किया भी गया लेकिन नतीजे संतोषजनक नहीं आए। दरअसल पूंजीनिवेश करने वाली संस्था फसल की ज्यादा उत्पादकता लेने के लिए एक ओर तो हर नई तकनीक का उपयोग करती है, दूसरी ओर खेत के रकबे में गहरे नलकूपों का खनन कर जल का भरपूर दोहन भी कर लेती है। जब खेत की उर्वरा क्षमता और भू-जल समाप्त हो जाते हैं तो अनुबंध तोड़ने में कंपनी को कोई देर नहीं लगती। तय है इस कारनामे की महत्ता में किसान और खेत की चिंता तभी तक है जब तक दोहन की प्राकृतिक उपलब्धता सुनिश्चित रहे। लेकिन काॅर्पोरेट फार्मिंग के विरुद्ध जब तक कोई नीतिगत फैसला लेने की इच्छाशक्ति मनमोहन सिंह नहीं जता पाते तब तक किसान और खेती के प्रति चिंता के कोई अर्थ नहीं रह जाते।

भूमण्डलीकरण प्रथा के लागू होने के बाद बदहाल हुई खेती और किसान की आम बजट में पहली बार सुध ली गई, साठ हजार करोड़ की कर्जमाफी करके। देश में ऋणग्रस्त परिवारों की कुल संख्या कृषक परिवारों के कुल संख्या के 48 प्रतिशत है। इससे जाहिर है कि ऋणमाफी के ये प्रावधान किसानों के लिए हितकारी हैं। जबकि रिजर्व बैंक की माने तो औद्योगिक घराने राष्ट्रीयकृत बैंकों को अब तक दस लाख करोड़ से भी ज्यादा का चूना लगा चुके हैं और हमारी सरकारें इन कर्जों को नॉन पर्फामिंग एसेट मद में डालकर इन घरानों को ऋणमुक्ति का प्रमाण-पत्र देती चली आ रही हैं। ऋणग्रस्त के अभिशाप के चलते लाखों किसानों ने तो आत्महत्या की लेकिन किसी उद्योगपति ने ऋण अभिशाप से मुक्ति के लिए आत्महत्या की हो ऐसी जानकारी अभी तक नहीं है ?

यदि किसान और मजदूर की आत्मनिर्भरता को बढ़ाना है तो उसके आर्थिक सशक्तीकरण का ख्याल रखना होगा और किसान को आर्थिक रुप से सशक्त बनाने के लिए भू-मण्डलीकरण के मार्फत अमल में लाई गई नीतियों से मुक्ति पानी होगी। मजदूर दिवस की सार्थकता कमजोर क्रय शक्ति वाले किसान और मजदूर के आर्थिक सशक्तिकरण में थी, किंतु आधुनिक विकास के बहाने चार करोड़ से भी ज्यादा लोगों का विस्थापन हो चुकने के बावजूद मजदूर आंदोलनों की सार्थकता कहीं देखने में नहीं आ रही है। इससे लगता है मई दिवस को मनाया जाना रस्म-अदायगी भर रह गया है।

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