विश्व शक्तियां भी मान रही है भारत की विदेश नीति का लोहा

                राकेश कुमार आर्य
वर्तमान समय में भारत की छवि वैश्विक मंचों पर बहुत तेजी से सुधरी है। यह पूरे देश के लिए गर्व और गौरव का विषय हो सकता है कि इस समय हमारे देश का सम्मान करना विश्व शक्तियां अपना सौभाग्य मान रही हैं। जबकि एक समय वह था जब हमारे देश के प्रधानमंत्री को हमारे पड़ोसी देश का प्रधानमंत्री एक देहाती महिला कहकर उसकी खिल्ली उड़ाता था । उस समय न केवल पाकिस्तान में अपितु सारे विश्व में हमारे देश के प्रधानमंत्री की  ‘देहाती महिला ‘ के रूप में खिल्ली उड़ाई गई थी।  सचमुच वह हमारे लिए बहुत ही लज्जाजनक दौर था  ,पर अब वह स्थिति नहीं रही है ।अब तेजी से वैश्विक नेताओं की दृष्टि में भारत का सम्मान बढ़ा है । भारत की राय जानना और भारत की राय को गंभीरता से सुन कर उस पर अमल करना इस समय प्रत्येक वैश्विक नेता के लिए अनिवार्य सा हो गया है । अब उन्हें ‘ देहाती महिला ‘ भारत के  प्रधानमंत्री के रूप में नहीं दिखाई देती ,अपितु  अब उन्हें लगता है कि कोई लौहपुरुष भारत की गद्दी पर बैठा है।भारत के पक्ष में समय और परिस्थितियों के बदलने का एक उदाहरण यहां पर यह दिया जा सकता है कि अफगानिस्तान में शांति वार्ता में भारत की भूमिका और विचार को जानने के लिए अमेरिका के विशेष प्रतिनिधि स्वयम अमेरिका से चलकर भारत आये ।अमेरिका के  प्रतिनिधि जाल्माई खलिलजाद ने दिल्ली पहुंच कर भारत सरकार के प्रतिनिधियों से  इस गंभीर समस्या पर विस्तृत वार्ता की । यह तभी संभव हुआ जब  अमेरिका ने यह  समझ लिया कि अफगानिस्तान की समस्या के समाधान में भारत की भूमिका को  उपेक्षित नहीं किया जा सकता और  भारत की तालिबान को लेकर बढ़ती आशंकाओं का निराकरण भी किया जाना आवश्यक है । अमेरिकी  सोच में भारत के प्रति कितना परिवर्तन आ चुका है  इसका पता इससे चलता है  कि उसके प्रतिनिधि ने  बड़ी दृढ़ता के साथ यह स्पष्ट कर दिया कि  तालिबान  को लेकर भारत की शंका आशंकाओं का समाधान किया जाना आवश्यक है  , साथ ही अफगानिस्तान के संबंध में  भारत के पक्ष को  नजरअंदाज नहीं किया जा सकता । अफगानिस्तान के बारे में अपनी नीतियों को स्पष्ट करते हुए इसके पूर्व  रूस ने भी है स्पष्ट कर दिया था  कि अफगानिस्तान में तालिबान की समस्या के समाधान में भारत  की महत्वपूर्ण भूमिका है ।जिसे साथ लेकर ही समाधान  खोजा जा सकता है । इसी प्रकार के विचार ईरान के भी भारत और तालिबान को लेकर रहे हैं । उसने भी भारत के महत्व को स्वीकार किया है ।अब ये तीन देश यदि तालिबान के बारे में भारत को महत्वपूर्ण समझ रहे हैं तो हमारे पड़ोसी पाकिस्तान के दिल में आग लगनी स्वाभाविक है , पर वर्तमान में भारत की विदेश नीति इतनी सफल कही जा सकती है कि पाकिस्तान चाहे जितना जले, उसके जलने से कहीं आग लगने वाली नहीं है। बडी बात यह है कि अफगानिस्तान की वर्तमान सरकार विश्व की शक्तियों अमेरिका और रूस के शांति प्रयासों से सशंकित तो अवश्य है , पर अफगानिस्तान सरकार  भारत की ईमानदारी  और मानवतावादी सोच  से  पूर्णतया सहमत है । वह जानती है कि भारत की विदेश नीति में कहीं पर भी छल ,कपट  नहीं है । क्योंकि यह देश प्राचीन काल से ही छल, कपट , ईर्ष्या, घृणा और द्वेष जैसी अमानवीय  नीतियों को कभी  भी अपनी नीतियों का अंग नहीं बनाता ,  बल्कि इसके स्थान पर वह  इस प्रकार की बातों को अनीति  और अधर्म मानकर त्याज्य समझता है । इसलिए अफगानिस्तान की सरकार भारत के हस्तक्षेप को अपने लिए उचित और अनिवार्य मन रही है।  अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई ने स्पष्ट कहा है कि जब तक भारत की सर्वश्रेष्ठ  भूमिका उसकी तालिबानी समस्या के समाधान में  सबको स्वीकार्य नहीं होगी नहीं होगी, तब तक अफगानिस्तान में शांति के प्रयास सफल नहीं होंगे । हामिद करजई ने संसार की शक्तियों से अफगानिस्तान में भारत की भूमिका को बढाने की मांग की है।  यहां पर यह भी उल्लेखनीय है कि भारत के पक्ष में ऐसी परिस्थितियां  तब भी बन रही हैं जब चीन और पाकिस्तान मिलकर  भारत को कहीं पर भी उभरने नहीं देना चाहते हैं । वह नहीं चाहते हैं कि भारत की भूमिका  किसी भी वैश्विक मंच पर महत्वपूर्ण सिद्ध हो या कहीं भी भारत ऐसा दिखाई दे कि जिससे उसके व्यक्तित्व में विशिष्टता  झलकने लगे । इससे स्पष्ट हो जाता है कि अब भारत के वह दिन लग चुके हैं जब उसे अपनी सही बात के लिए भी विश्व मंचों पर गिड़गिड़ाना पड़ता था । अब वह दीनता का प्रदर्शन ना करने वाला राष्ट्र बन चुका है। अब उसकी आवाज में कड़कपन होता है, गंभीरता और स्पष्टता होती है । उसकी बात को कहे जाते समय विश्व मंचों पर लोग ध्यान से सुनते हैं। अब से 5 वर्ष पूर्व भारत एक खुशामदी देश माना जाता था। अब भारत  खुशामदी देश की स्थिति से ऊपर निकल आया है । 5 वर्ष के काल में इतना परिवर्तन आ जाना किसी भी देश के लिए बहुत ही गौरव का विषय होता है।जो विश्व शक्तियां  कभी भारत  की बातों का उपहास किया करती थी , वह आज भारत को सुनना चाहती हैं । जब भारत कभी  किसी विश्व मंच पर आतंकवाद के विरुद्ध  कुछ बोलता था , तो लोग उसे गंभीरता से नहीं लेते थे ,पर आज की स्थितियां ऐसी हैं कि  अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप  न केवल भारत को गंभीरता से ले रहे हैं , अपितु पाकिस्तान को  बहुत ही कठोर दृष्टि से देख रहे हैं  और उसके प्रति अपनी कठोरता का प्रदर्शन करने से भी नहीं हिचक रहे हैं । अमेरिकी राष्ट्रपति से शिकायत के बाद पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री को देहाती औरत की संज्ञा दी थी। हम अपने प्रधानमंत्री की आलोचना कर सकते हैं , उसकी नीतियों में कमी निकाल सकते हैं , यह  हमारे देश के भीतर का मामला है। परंतु हमारे देश के एक भद्र प्रधानमंत्री को पड़ोसी शत्रु देश का प्रधानमंत्री  ‘ देहाती महिला ‘ कहे और उस पर हम कुछ भी ना कर पाए-  तो यह उस समय के दौर की हमारे लिए सबसे अधिक लज्जाजनक स्थिति थी।  आज अधिकांश देश यह मान रहे हैं कि कश्मीर का प्रश्न भारत और पाकिस्तान का द्विपक्षीय प्रश्न है । इस पर हम कुछ नहीं कह सकते और ना ही कुछ कर सकते हैं । इससे पाकिस्तान विश्व मंचों पर अलग-थलग पड़ गया है और शत्रु देश को विश्व मंचों पर अलग-थलग डाल देना सचमुच किसी भी देश की सफल विदेश नीति का ही परिचायक होता है । तब कोई भी विश्व नेता यदि भारत का दौरा करता था तो वह भारत के बाद पाकिस्तान जाना भूलता नहीं था ।पाकिस्तान के प्रति अमेरिका की यह नीति तो बहुत ही स्पष्ट थी ।उसका कोई भी राष्ट्रपति भारत में  आकर कुछ बोलता था और 10 – 20 घंटे बाद पाकिस्तान में जाकर कुछ और बोल देता था  ,जिससे भारत की बात कमजोर पड़ जाती थी।उस काल में विश्व की शक्तियां भारत के स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होती थी, कश्मीर के प्रश्न पर विश्व की शक्तियां भारत की एकता और अखंडता पर कुठाराघात करती थीं, भारत की अस्मिता के साथ खिलवाड करती थीं। यहां तक कि कश्मीर में हम जिस प्रकार आतंकवादियों  से निपटने का प्रयास कर रहे थे , उसे भी विश्व शक्तियां मानव अधिकारों का हनन कहकर  हमें डांटती डपटती थीं । वही विश्व शक्तियां आज न केवल अपना विचार बदल चुकी हैं,  अपितु भारत को सदा पाकिस्तान के साथ रख कर तुलना करने की अपनी  अनीति पूर्ण सोच और एकपक्षीय मानसिकता को आत्मघाती मान रही हैं। अब उन्हें यह अनुभव होने लगा है कि  भारत की सोच में और भारत की नीतियों में मानवतावाद है , और भारत सचमुच  ऐसी परिस्थितियों से दो-चार है जो उसकी एकता और अखंडता के लिए  खतरा पैदा कर सकती हैं ।ऐसा परिवर्तन तभी संभव हुआ है जब भारत अपने पक्ष को सफलतापूर्वक विश्व नेताओं के समक्ष प्रस्तुत करने में सफल हो पाया है ।  भारत को और भारत के नेतृत्व को गंभीरता से समझ कर ही डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में पाकिस्तान को लताड़ते हुए यह कह दिया है कि पाकिस्तान उनके लिए किसी काम का नहीं है ।उन्होंने ऐसा तभी कहा है जब उन्होंने यह समझ लिया है कि पाकिस्तान दोमुंहा देश है , जिसकी नीतियों में भी दोरंगापन है  वह कहता कुछ और है तो करता कुछ और है ।साथ ही अमेरिका अब यह भी भली प्रकार समझ गया है कि विश्व में आतंकवाद का पोषक यदि कोई देश है तो वह पाकिस्तान है ।यही करण है कि विश्व की लोकतांत्रिक शक्तियों को मजबूत करने के लिए अब डोनाल्ड ट्रंप भारत को एक महत्वपूर्ण सहयोगी देश के रूप में देख रहे हैं । पाकिस्तान बार-बार कहता रहा है कि अफगानिस्तान में कोई भी शांति के प्रयास उसके सहयोग और समर्थन के बिना संभव नहीं हो सकते हैं। परंतु संसार के किसी भी देश के  नेता के गले अब पाकिस्तान की यह बात उतर नहीं रही है ,सारा विश्व समझ चुका है  कि पाकिस्तान  सच्चाई क्या है ? पाकिस्तान हिंसा के  नाम पर पिछले 70 – 72 वर्ष से विश्व का मूर्ख बनाता आ रहा है । उसने पहले दिन से ही हिंसा का व्यापार किया है , जिससे वह अब बच नहीं सकता और अब परिस्थितियां ऐसी बन भी चुकी हैं कि जब पाकिस्तान स्वयं अपने किए का फल भोगने की दहलीज पर आ चुका है । ऐसी स्थिति में उसे लाकर फंसा देना भारत की सफल विदेश नीति का ही एक परिणाम है।तालिबान को पाकिस्तान आज भी समर्थन और संरक्षण देता है। तालिबान का नेता मुल्ला उमर पाकिस्तान में ही मरा था। मुल्ला उमर की जब पाकिस्तान में मृत्यु हुई थी तब यह स्वीकार कर लिया जाना चाहिए था कि मुल्ला उमर पाकिस्तान  के संरक्षण में  ही रह रहा था । आज पाकिस्तान कंगाल हो चुका है पर आतंकवाद को हथियार बना कर विश्व शक्तियां पाकिस्तान को कर्ज देने के खिलाफ  होती जा रही हैं। विश्व शक्तियों के विरोध के कारण कंगाल पाकिस्तान को विश्व के नियामकों से कर्ज नहीं मिल पा रहा है।  अफगानिस्तान के भीतर भारत की भूमिका को निर्णायक और सर्वश्रेष्ठ क्यों माना जा रहा है ?  इसके पीछे कोई एक नहीं  अपितु कई कारण हैं । कभी अमेरिका चाहता था कि भारत भी अफगानिस्तान में अपनी सेना खड़ी करे और तालिबान के विरुद्ध भारतीय सेना युद्ध में सम्मिलित रहे। इसके पीछे कारण यह था कि आतंकवाद से लड़ने में भारतीय सेना को विशिष्ट अनुभव और कौशल प्राप्त है। केवल इतना ही नहीं अपितु विश्व के कई भागों में शांति सेना के रूप में भारतीय सेना ने अपना प्रभुत्व स्थापित किया था। पर भारत ने तालिबान के साथ युद्ध में उलझने से  असहमति व्यक्त की थी । अफगानिस्तान के रचनात्मक विकास को भारत ने प्रमुखता दी है। अफगानिस्तान की संसद से लेकर, सामरिक रूप से अति महत्वपूर्ण सड़कों का निर्माण भी भारत ने किया है। सबसे बडी बात यह है कि अफगानिस्तान में पुलिस और सेना की व्यवस्था को प्रशिक्षित करने और दक्ष बनाने में भारत ने बडी भूमिका निभायी है। आज भारत अफगानिस्तान को सर्वाधिक सहायता देने वाले देशों में अग्रणी है। इस कारण अफगानिस्तान की सरकार और अफगानिस्तान की जनता के बीच में भारत की छवि एक सहायक  और समय पर काम आने वाले सहृदय मित्र की बनी है। यह छवि इतनी गहराई से अपना स्थान बना चुकी है कि भारत के शत्रु भी अब भारत का कुछ बिगाड़ने की स्थिति में नहीं है ।बड़ी कठिनता और परिश्रम से प्राप्त इस सम्मानजनक स्थिति को बनाए रखने के लिए भारत की समस्त राजनीति को सही दिशा में सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ना होगा ।सभी दल मिलकर विदेश नीति के संदर्भ में एकमत होकर राष्ट्र नीति अपनाने पर बल दें। यदि सरकार विदेश नीति के क्षेत्र में सही दिशा में आगे बढ़ रही है तो हमें ऐसा आचरण करना चाहिए जैसे हमारी सबकी एक राष्ट्रीय सरकार है , ना कि किसी एक दल विशेष की सरकार ।  ऐसी सोच और चिंतन से ही हम सब एक घाट पर पानी पी सकेंगे ।आज जब हम लगभग हर बिंदु पर बिखरे पड़े हैं , तब विदेश नीति के बिंदु पर एक हो जाना समय की बहुत बड़ी आवश्यकता है।  हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि तालिबान भारत विरोधी है ।वह भारत के निर्माणात्मक और सहयोगी दृष्टिकोण को भी अपने लिए उचित नहीं मानता है। अफगानिस्तान में उसका फिर से सिर उठाना भारत के लिए खतरनाक सिद्ध हो सकता है ।ऐसे में तो यह और भी आवश्यक हो जाता है कि भारत के समस्त राजनीतिक दल भारत की विदेश नीति पर एकमत होकर सरकार का सहयोग करें  । सरकारें आती जाती रहती हैं ,कल सरकार कांग्रेस की भी आ सकती है। हमारा कहना उसके लिए भी यही होगा कि वह भी गौरवपूर्ण विदेश नीति का अनुसरण करें और उन पर आज की भांति ही आगे बढ़े । उस पर भाजपा भी उसको सहयोग करे ।आज के जिस स्तर पर भारत खड़ा है वह उसे विश्व गुरु बनाने की दिशा में बहुत सक्रियता से आगे बढ़ाने में सक्षम हुआ है । अतः मिलकर इस स्थिति को और भी उत्तम बनाने की आवश्यकता है।

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