डा. राधेश्याम द्विवेदी

विश्व नदी दिवस प्रतिवर्ष सितम्बर के अन्तिम रविवार को मनाया जाता है। अभी हाल ही में 24 सितम्बर 2017 को भारत सहित विश्व के अनेक क्षेत्रों में यह पूरी श्रद्धा के साथ परम्परागत रुप में मनाया गया है। आगामी वर्ष 2018 में 30 सितम्बर को, 2019 में 29 सितम्बर को तथा 2020 में 27 सितम्बर को विश्व नदी दिवस मनाया जाएगा। इस दिवस को मनाने की शुरुवात 2005 से प्रारम्भ हुयी है। नदियां मानव जीवन का अभिन्न अंग हुआ करती हैं। यह समारोह भारत सहित विश्व अनेक देश व नगरों में प्रायः मनाया जाता है। इस मौके पर ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, पोलैंड, दक्षिण अफ्रीका, मलेशिया और बांग्लादेश में कार्यक्रम का आयोजन होते रहते हैं। लाखों लोग, दर्जनों देश और अनगिनत अंतर्राष्ट्रीय संगठन विश्व नदी दिवस में अपने अपने तरह से योगदान करते हैं। यह लोगों को नदियों का आनंद उठाने का मौका प्रदान करता है। साथ ही यह समारोह नदियों और झरनों को बचाने के लिए महत्वपूर्ण ढंग से जागरूकता भी फैलाता है। गलत नीतियों, मानव द्वारा फैलाए जा रहे प्रदूषण और कई स्वार्थियों के कारण अनेक नदियां आज मृतप्राय होती जा रही हैं। प्रदूषित और बीमार इन नदियों को आज संरक्षित करने की जरूरत है। प्राचीन सभ्यतायें नदियों के किनारे ही विकसित :-विश्व की सभी प्राचीन सभ्यतायें नदियों के किनारे ही विकसित, पुष्पित और पल्लवित हुई है। नदियां जहां स्वच्छ जल का संवाहक होती हैं वहीं आखेट, कृषि, पशुपालन तथा यातायात का संवाहिका भी होती हैं। एशिया महाद्वीप का हिमालय पर्वत अनेक नदियों का उद्गम स्रोत हुआ करता है। गंगा, यमुना, सिन्धु, झेलम, चिनाव, रावी, सतलज, गोमती, घाघरा, राप्ती, कोसी, हुबली तथा ब्रहमपुत्र आदि सभी नदियों का उद्गम स्रोत हिमालय ही रहा है। ये सभी हिन्द महासागर में जाकर अपनी लीला समाप्त करती हैं। हिन्दू धर्म में नदियों को देवी के रूप में भी मानवीकरण कर पूजा जाता है। प्रतिमाविज्ञान तथा शिल्पशास्त्र के ग्रंथों, मन्दिरों, स्मारकों तथा संग्रहालयों में इनके अनेक स्वरुपों की परिकल्पना तथा कलात्मक चित्रण प्रस्तुत किया गया है।

भारत के साथ विश्व के अनेक देशों में जल तत्व की महत्ता दर्शायी गयी है। विश्व नदी दिवस भारत का कोई अपना मौलिक कार्यक्रम नहीं है। प्रायः देखा गया है कि मई जून माह की गरमी तथा जुलाई अगस्त के बरसात से भू संरचना की वास्तविक स्थिति बिगड़ जाती है। इन्हें पुनः संतुलित करने तथा इन प्राकृमितक संसाधनों को साल भर तक अक्षुण्य बनाये रखने के लिए सितम्बर माह के अतिंम रविवार को विश्व नदी दिवस का आयेजन किया जाता है। इस समय तक नदियों तथा पा्रकृतिक जंगलों में अनेक आवश्यक प्राकृतिक परिवर्तन आ जाता है इसे नियमित व शोधन करने के लिए यह आयोजन किया जाता है। इस आयोजन के माध्यम से नदी की शुद्धता के बारे तें जन जागरुकता तथा उसे तरह तरह से शोधन परिमार्जन तथा स्वच्छ तथा स्थाई बनाये रखने के लिए एक अभियान के जरिये प्रयास किये जाते हैं। जिसमें लोग पूरी क्षमता व सामर्थय के अनुरुप अपनी सहभागिता निभाते हैं। खतरों से जूझती नदियां :- जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और औद्योगिक विकास आदि के कारणों से दुनिया के अधिकांश देशों की नदियां खतरों से जूझ रही हैं। नदी दिवस के अवसर पर दुनिया भर में शैक्षिक और जन-जागरूकता की गतिविधियों पर ध्यान दिये जाने की बातें सुनाई देती है। नदियों व झरनों को साफ रखना और नदियों के किनारे समारोहों का आयोजन किये जाने की वकालत सुनने को मिलती है। दुनिया भर में कई नदियां खतरे से जूझ रही हैं और इन्हें बचाने के लिए जो प्रयास किए जा रहे हैं, जो पर्याप्त नही हैं। इसके लिए नागरिको का संवेदनशील बनना जरूरी है। प्रतिवंधित घातक कीटनाशकों एवं खेती में उपयोग किए जाने वाले उर्वरक के कारण नदी सहित सभी परंपरागत जलस्रोतों एवं उसमें वास करने वाले जीवों का अस्तित्व खतरे में है। लोगों द्वारा रसायनिक खादों व कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग को बंद किया जाना चाहिए।

नदी को पुनर्जिवित करने के लिए लोक संगठनों के माध्यम से जागरूकता और निरंतर आवाज उठाने की आवश्यकता है। जल कार्यकर्ताओं और पर्यावरणविद भारत के विभिन्न अंचलों में विभिन्न नदियों यथा गंगा यमुना नर्वदा कावेरी आदि के संरक्षण से जुड़े मुद्दों पर परिचर्चायें , सेमीनार तथा विचार विमर्श करते रहते हैं। सरकारी तौर पर खानापूर्ति तो हो जाती है पर वास्तविक रुप में इस पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता जितना दिया जाना चाहिए। राज्य और केंद्र सरकार इन नदियों को बचाने के लिए गंभीर दिखती नहीं है। यमुना संरक्षण के विवधि प्रयास- प्राचीन साहित्य में नदियों को बड़े आदर व सम्मान से देखा जाता था। मनुस्मृति में जलप्रदूषण करनेवाले को मृत्यु देने की बात कही गई है। ब्रजक्षेत्र में कुएं के पानी खारा होन के कारण क्षेत्र की अधिकांशतः जनता नदी जल पर ही आश्रित रहती थी। इसी कारण नदी के तटों पर सामन्तों व अमीरों ने अपनी हवेलियां, बाग और महल बनवा रखे थे। बाबर, अकबर तथा शाहजहां के पीने के पानी का मुख्य स्रोत नदियां ही होती थीं। मध्यकाल में यमुना नदी का जल मोतियों की तरह स्वच्छ, अमृत सा निर्मल रहता था। इसी कारण ताजमहल के लिए वर्तमान जगह का चयन किया गया है। शाहजहां के दरबारी कवि पण्डित राज जगन्नाथ ने गंगा और जमुना से सम्बन्धित गंगा लहरी और अमृत लहरी नामक काव्यों में 10-10 लहरियां लिख रखी है। यमुना को अमृत लहरी के रुप में महिमा मण्डन कर यमुना के महत्व को दर्शाया गया है। प्राचीन और मध्यकाल में यमुना में असीमित जल संचय रहता था। यह हमेशा बहते रहने के कारण स्वच्छ तथा तरोताजा रहता था। हमने वैज्ञानिक प्रगति व विकास के नाम पर इस पर बांध बनाकर अपनी बहुमूल्य संस्कृति का विनाश कर डाला है। अब तो यह सूखी रेखा जैसे हो गयी है। उल्टे इसमें गन्दे नालों को डालने से इसकी स्थिति बद से बदतर हो गई है। इसके जलचर बनस्पतियां सब के सब काल कवलित होती जा रही हैं। आगरा में यमुना नदी का सूखा हुआ तल ताज महल तथा अन्य नदी में तट पर स्थित स्मारकों की नींव पर गलत प्रभाव डाल सकता है।

यमुना और देश की अन्य नदियों की समस्याओं पर लोगों का ध्यान केंद्रित किया जाएगा, आगरा, मथुरा और वृंदावन के कार्यकर्ता इस दिवस को समूह चर्चा, नदी का दौरा और जनसभाओं के रुप में मनाते है। किसी किसी वर्ष यमुना नदी में बाढ़ देखी जा सकती है अन्यथा तो यह सूखी सी ही रहती है। बेकार प्रबंधन और जल संचय न होने के कारण बारिश का सारा पानी नीचे समुद्र में चला जाता है। ताजमहल के पीछे रेत का टापू बन गया है। इसमें गन्दगी ही ज्यादा दिखती है। आगरा वाटर वर्क्स से लेकर दशहरा घाट तक पानी तो नहीं केवल बदबूदार सीवर का जल ही दिखाई देता है। रामास्वामी आर अय्यर का योगदान – मुद्दा नदी का हो या जलनीति का, कार्यक्रम छोटा हो या बड़ा बाल सुलभ सरलता.. मुस्कान लिये दुबले-पतले-लम्बे-गौरवर्ण श्री रामास्वामी आर अय्यर सहजता से इसे निभाते रहे हैं। भारत सरकार के जलसंसाधन सचिव के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान ही 1987 में भारत की पहली राष्ट्रीय जल नीति बनना शुरु हुआ है। गुजरात सरकार और मोदी जी का प्रिय, सरदार सरोवर बाँध को 1987 में मंजूरी दिलाने में तत्कालीन पर्यावरण एवं वन सचिव श्री टी एन शेषन के साथ मिलकर श्री रामास्वामी आर. अय्यर द्वारा मुख्य भूमिका निभाई गयी है। नदी और पानी के लिये उनकी अनेक उपलब्धियाँ हैं। प्रथम जल नीति और सरदार सरोवर बाँध दोनों ही क्रमशः पानी और नदी की समृद्धि के भारतीय ज्ञानतंत्र के अनुकूल नहीं थे। श्री रामास्वामी आर. अय्यर ज्यों-ज्यों पानी और नदी को समझते गए, वे पानी और नदी के अनुकूल होते गए।

वह सरकार या समाज के पक्ष में होने की बजाय, नदी और पानी के पक्ष में हो गए। सेवानिवृत्ति के पश्चात नई दिल्ली के ‘सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च’ में अवैतनिक प्रोफेसर के रूप में भी उन्होंने किसी निजी स्वार्थ बस नहीं लगे थे। वह पानी और नदी की पैरवी आजीवन करते रहे। विश्व बैंक, विश्व बाँध आयोग और इंटरनेशनल वाटर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट (कोलंबो) तथा संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (नई दिल्ली) में सलाहकार तथा मृत्यु के समय तक संयुक्त राष्ट्र महासचिव सलाहकार बोर्ड के पानी और विपदा से जुड़े उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समूह के सदस्य के अलावा श्री अय्यर ने कई अन्य महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ सम्भाली थी। वह ‘नर्मदा बचाओ अभियान’ के सदस्य थे। आंतरिक व बाहरी दबाव के बगैर संस्थागत् बदलाव संभव नहीं होते। इस विचार को अपनी धारणा और व्यवहार में उतारने के कारण श्री अय्यर को सम्मान भी मिला और प्यार भी। विद्वता व गंभीरता के साथ-साथ, प्रेम व सहजता से जिंदगी जीने के उनके इस अंदाज की तारीफ होनी ही चाहिए। श्री अय्यर की प्रेरणा से ही डब्लयू डब्ल्यू एफ इंडिया, इनटेक, सैंड्रप, टाक्सिक लिंक और पीसी इंस्टीट्युट चैरिटेबल ट्रस्ट ने प्रथम ’भारत नदी सप्ताह’ का आयोजन किया था। इंटरनेशनल रिवर्स, लोक विज्ञान केन्द्र के अलावा हिंदी वाटर पोर्टल की मातृसंस्था अग्र्घ्यम ने भी इसमें सहयोग की भूमिका निभाई थी। श्री अय्यर ने कहा था -’’नदियां, पानी से अधिक कुछ हैं। नदियां हमारे सामाजिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक ताने-बाने का ऐसा हिस्सा हैं, जिन्हे इस ताने-बाने से अलग नहीं किया जा सकता।’’ वह नदियों के प्रवाह को बाधित करने, बाढ़ क्षेत्र पर अनधिकृत निर्माण, सतत् प्रदूषण तथा नदी की आर्थिक घुङसवारी करने के आधुनिक रवैये से दुखी थे।“ अन्य प्रयास – इसी प्रकार जल पुरुष राजेन्द्र सिंह का प्रयास भारत के विभिन्न अंचलों में जल के शोधन तथा संरक्षण के लिए निरन्तर चलता रहता है।

नदी जल जोड़ो अभ्यिान के माध्यम से श्री संजय सिंह की उपयोगिता को नजरन्दाज नहीं किया जा सकता है। यमुना के शुद्धिकरण एवं निर्मलीकरण के लिए पंडित अश्विनी कुमार मिश्र के संयोजन में श्रीगुरु वशिष्ठ मानव सर्वांगीण विकास सेवा समिति आम जनता में वर्ष 1990 से सक्रिय है। सेवा समिति ने जन जागरुकता, स्वयंसेवियों तथा स्थानीय प्रशासन के सहयोग से आगरा के एक दर्जन घाटों के स्वच्छता के लिए प्रयास शुरु कर रखा है। इसके लिए जन प्रतिनिधियों व प्रशासनिक अधिकारियों का सहयोग प्राप्त करने की कोशिस किया गया। इनमें एतिहासक बलकेश्वरघाट का पुनरुद्धार करके एक आदर्शघाट के रुप में अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है।

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