यादव राजवंश ने की है करौली राज्य की स्थापना

                           आत्माराम यादव पीव

       महाराजा करौली सुप्रख्यात यदुवंश के है। करौली राज्य की स्थापना यादववंश के महाराजा जिन्द्र्पाल यादव ने की है इसलिए कहा जा सकता है की करौली का अति प्राचीन इतिहास है। पौराणिक कथानक से पता चलता है कि मथुरा के राजा यदु के पुत्र जिन्द्र्पाल के द्वारा अपनी राजधानी बियाना (जो अभी भरतपुर में है) को परिवर्तित कर करौली राज्य किया। महाराज जिन्द्र्पाल यादव प्रपौत्र सन 995 में राजगद्दी पर बैठे तब बियाना का किला बनवाया गया। वर्ष 1327 में महाराजा अर्जुनदेव ने राजगद्दी संभाली तब 21 वर्ष बाद नीन्दार पर अधिकार करने के बाद उन्होने मथुरा जिले कि 24  परगनों पर यदुवंश का ध्वज फहराया। महाराज जिन्द्र्पाल का करौली राज्य का सपना 1348 में पूर्ण हुआ ओर करौली पर इस राजवंश की कई पुश्तों ने राज्य किया जिसमें महाराज गोपालसिंह यादव ने सन 1533 से 1569 तक राज्य किया ओर दिल्ली के सम्राट अकबर की अधीनता स्वीकार करके उनके कहने पर दौलताबाद में दाऊदखाँ से युद्ध कर उसे पराजित किया जिसपर सम्राट अकबर ने प्रसन्न होकर रणजीत नगारा भेंट किया जो अभी तक करौली में मौजूद होना बताया गया है। दौलताबाद फतह होने पर अकबर ने महाराज गोपालसिंह यादव को अजमेर का किलेदार बना दिया तथा आगरा किले की नीव आपके द्वारा ही रखी गई थी ओर बहादुरपुर का किला आपने बनवाया था। आपकी पीढ़ी में 6 पीढ़ी बाद महाराज धर्मपाल यादव हुये जो बड़े ही बहादुर थे ओर आए दिन मीणा समाज के लोगों द्वारा करौली राज्य को हथियाने का प्रयास होता तो आपकी तलवार उन्हे रोके रखती ओर करौली को राजधानी बनाए रखा। हिण्डौन नगर करौली जिले की सबसे बडी नगरी है। सम्भवतः यह भूमि हिरण्यकश्यप व भक्त प्रहलाद की कर्म भूमि रही है। यहां पर आज भी नृसिंह मन्दिर, प्रहलाद कुण्ड, हिरण्यकश्यप के महल, बावड़ियों के अवशेष हैं। यहां से कुछ दूरी पर कुण्डेवा, जगर, दानघाटी पौराणिक स्थान है। जनश्रुतियो के अनुसार महाभारत कालीन हिडिम्बा नामक राक्षसी की कर्मस्थली भी यही क्षेत्र रहा था।  पुरानी देशी रियासत करौली से 23 किलोमीटर दक्षिण में अरावली पर्वत श्रृंखला के त्रिकूट पर्वत की चोटी पर बने कैलादेवी मंदिर का इतिहास भी पुराना है। गोस्वामी केदारगिरी द्वारा 1114 ई0 में कैलादेवी की प्रतिमा की स्थापना किए जाने के बाद इस क्षेत्र के तत्कालीन यादवकुल के  राजा ने कैलादेवी के साथ इसी मंदिर में प्रति स्थापित किया। 1348 ई0 में करौली की स्थापना के बाद मंदिर की सार-संभाल करौली के यादवराजकुल द्वारा की जाने लगी। अकबर के दौलतवाद विजय अभियान पर करौली नरेश गोपालदास के साथ जाने से पूर्व कैलादेवी की मनौती मानने पर विजयी होने का प्रसंग मॉ पर अटूट श्रद्वा से जुडा हुआ है। कैलादेवी जहाँ शक्तिस्वरूपा है, वहीं उसका गण लांगुरिया भैरव स्वरूप है। इसकी प्रतिभा देवी मंदिर के सामने बनी हुई है। मेले के अवसर पर गाये जाने वाले लोक गीत लांगुरिया को ही सम्बोधित करके गाये जाते है।

सन 1724 का वह समय था जब इस राज्य का महाराजा गोपालसिंह राजगद्दी पर बैठे तब वे नाबालिग थे। महाराजा के मंत्रीगण अपने राजा के प्रति वफादार थे। करौली शहर का विकास आपके द्वारा किया आया ओर आसपास शहर पनाह बनवाने से प्रजा का अपने राजा के प्रति अटूट प्यार रहा। महाराज गोपालसिंह धर्म कर्म पर ज्यादा विश्वास करते थे ओर उन्होने तब गोपालमंदिर, कल्याणजी का नया मंदिर ओर मदनमोहन जी का मंदिर बनवाए । जयपुर के राजघराने से नाता जोड़कर आपने अपनी बहिन कि शादी महाराज जयसिंह के साथ की। समय को देखते हुये महाराज गोपालसिंह ने सबलगढ़ के किले को जीत कर यादवों कि पताका लहराई। इतना ही नही ग्वालियर के आसपास भी अपनी विजय का डंका बजवाते रहे आपकी बहादुरी के चर्चे दिल्ली के दरवार तक पहुचे। दिल्ली मुगल दरबार ने सन 1753 में बुलवाया ओर मुगल सम्राट ने आपको “महिमुरातीव”” से नाबाजा गया। आपके द्वारा करौली में बनाए गए 2 विशाल भवन आज भी आपकी याद दिलाते है। सन 1757 को आपका देहांत हो जाने के बाद करौली में आपकी याद में बने स्मारक के रूप में एक छत्री आज भी करौली के राजाओ में आपका विशेष गौरव रखती है। आपके बाद आपके पुत्र महाराजा प्रतापपाल राजसिंहासन पर विराजमान हुये जो 1837 से 1850 तक राजकाज संभालते रहे। महाराजा कोटा के साथ आपने अपनी छोटी बहिन का विवाह किया। आपके राज परिवार को अनेक विपत्तियों ने आकार घेर लिया तब आपके उत्तराधिकारी महाराज नरसिंह पाल ने अंग्रेज़ लेफ्टिनेंट मांकमेसन से सहायता ली ओर  अंग्रेज़ फोज का साथ मिलने पर अंग्रेजों से आपकी मित्रता जगजाहिर रही।

       जहा एक ओर देश में 1857 की क्रांति का ज्वर शबाव पर था ओर हरेक देशवासी अंग्रेजों को देश से खदेड़ने में लगे थे तब महाराजा प्रताप सिह के स्थान पर महाराजा मदनपाल करौली के राज्य सिंहासन पर विराजमान थे ओर उन्होने अंग्रेजों के सहायक के रूप में भूमिका निभाई। तत्कालीन गवर्नर जनरल 5 जून 1857 को करौली राज्य की ओर से की गई सहायता पर प्रसन्न होकर 25 हजार रुपए मासिक देने का बचन दिया ओर आपकी मुक्त कंठ से तारीफ की गई।  1857 के क्रांतिकारी नाबाब वजीर मोहम्मद खा की अगुआई में करौली सीमा के पास हिडोन सहित आसपास की पहाड़ियों पर अपना अधिकार जमा चुका था तब करौली की फोजों ने हमला कर नाबाव वजीर खाँ को मार डाला ओर उनके साथियों को कैद कर अंग्रेजों को सौंप दिया जिन्हे अंग्रेजों ने कत्ल कर दिया। यह अलग बात थी की आपके बहनोई कोटा के महाराज ने अग्रेज़ अफसरो को मारने के साथ क्रांतिकारियों का साथ दिया तब अंग्रेजों के कहने पर आपने अपने अपने बहनोई के खिलाफ अग्रेजों के पक्ष मे मोर्चा खोल दिया। 2 दिसंबर सन 1859 को तत्कालीन वाइसराय लार्ड केनिग ने अंग्रेजों के साथ दिये जाने के कारण 20 हजार रुपए का उपहार ओर कर्ज माफ किया वही आपको 17 तोपों की सलामी दी गई। यही कारण था की 1862 मे आपको गोद लेने की सनद अंग्रेज़ सरकार ने दी ओर सन 1866 में जी॰सी॰एस॰ आई॰ की पदवी से नवाजा गया।  महाराज मदनपाल के बाद महाराजा लक्ष्मणपाल करौली के सिंहासन पर विराजे किन्तु नशे के आदि होने से वे जल्द ही काल के गाल में चले गए उनके बाद महाराजा जयसिंहपाल ओर महाराजा अर्जुनपाल ने शासन किया। महाराज अर्जुनपाल के बाद भंवरपाल, देवबहादुर पाल यदुकुल चन्द्र्भल जीसीआई ई करौली का शासन करने लगे। आपको शिकार का बड़ा शौक था तभी आपने लगभग 300 शेरों का शिकार किया। आपने मदनपुर रुंडकपुर के तालाब बनवाए ओर हिंडोन ओर करौली के बीच नदी पर पल बनवाया।  करौली में 7 स्कूल बनवाए जिसमें एक हाई स्कूल है इस प्रकार आपके द्वारा करौली राज्य में एक दर्जन स्कूल बनवाए जो आपकी आज भी याद ताजा करते है। 

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