“यज्ञ-स्वाध्याय-सत्संग आदि के प्रेरक महात्मा दयानन्द वानप्रस्थ”

मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

                महात्मा दयाननन्द जी वानप्रस्थ वैदिक साधन आश्रम तपोवन में दीर्घकाल तक रहे और यहां रहकर साधकों को साधना का प्रशिक्षण देने के साथ यज्ञ, प्रवचन, स्वाध्याय, चिन्तन एवं ध्यान आदि कराते रहे। हमें यहां सन् 1970 के बाद से उनके दर्शन होते रहे। वह यहां समय-समय पर जो यज्ञ कराते थे उनमें भाग लेने का भी हमें अवसर मिलता था। हम यज्ञ में उनके द्वारा वेद-मन्त्रों की व्याख्यायें सुनने के साथ अन्य अनेक महत्वपूर्ण बातें भी सुनते थे और आश्रम के उत्सवों में उनके प्रवचन एवं बोध वचन भी सुनते थे। हममें यह इच्छा उत्पन्न हुई कि हम उनके विषय में कुछ जानें और जो बातें जानी हैं उन्हें हम पाठकों तक पहुंचाना चाहते हैं। महात्मा दयानन्द वानप्रस्थी जी का निजी व सामाजिक जीवन कथनी व करनी की दृष्टि से एक था। वह जो पढ़ते व उचित समझते थे उसे यथावत् अपने जीवन में उतारने व ढालने का प्रयास करते थे। वर्तमान लोगों की तरह उनके दो प्रकार के व्यक्तित्व नहीं थे। वह मन, वचन व कर्म से एक थे। यही कारण था कि जो भी व्यक्ति उनके सम्पर्क में आता था, उनका हो जाता था। उसे उनके सान्निध्य में सुख व शान्ति का अनुभव होता था। वह जो मार्गदर्शन देते थे वह जन्म-जन्मान्तर में उस व्यक्ति के लिये अच्छे परिणामों को देने वाला होता था। उनका जीवन वेदानुकूल था। ऋषि दयानन्द एवं महात्मा प्रभु आश्रित जी के वह सच्चे भक्त व शिष्य थे।

                महात्मा जी का जन्म मुलतान नगर में जनवरी सन् 1912 में हुआ था। वर्तमान में यह स्थान पाकिस्तान का भाग है। हमारे पूवजों के वेद-विद्याभाव व अन्धविश्वासों के अनुगमन का परिणाम पाकिस्तान है। दुर्भाग्य से आज भी ऋषि-पुत्र देशवासी इस अनुभव से कोई नसीहत नहीं ले रहे हैं। वह विनाश के मार्ग अन्धविश्वास, कुरीति व सामाजिक असमानता के मार्ग पर ही चल रहे हैं। ईश्वर इनको व आर्यों को सद्बुद्धि दें जिससे यह अपने सभी दुर्गुण त्याग कर वेदमार्ग को अपना सकें। महात्मा दयानन्द जी के पिता का नाम श्री नन्दलाल जी और माता का नाम श्रीमती सीतादेवी था। आप दो भाई व चार बहिनें थीं। छोटे भाई का नाम विश्वम्भर दास मलहोत्रा था। उनके पुत्र महात्मा शशि मुनि आर्य आर्यसमाज के विद्वान हैं। वानप्रस्थी होकर वह रोहतक में भक्ति साधन आश्रम तथा रोजड़ में वानप्रस्थ साधक आश्रम में अपना जीवन पुण्य कार्यों में व्यतीत करते हैं। महात्मा जी की पत्नी का नाम श्रीमती पद्मावती जी था। आपका एक पुत्र एवं तीन पुत्रियां हैं। पुत्रियां क्रमशः विमला, सन्तोष तथा सुरेन्द्र हैं। पुत्र का नाम डा. सत्यानन्द है जो वर्तमान में अमेरिका में रहते हैं। सत्यानन्द जी के दो पुत्र हैं, वह दोनों भी डाक्टर हैं और अमेरिका में ही निवास करते हैं। महात्मा जी की तरह यह परिवार आर्यसमाज के उतना निकट नहीं है जितना हम अनुमान या अपेक्षा करते हैं। डा. सत्यानन्द जी की पत्नी भी अमेरिका में हैं। वह आजकल जीभ के कैंसर रोग से पीड़ित है। उनका आपरेशन हुआ है। ईश्वर उनको शीघ्र स्वस्थ करें, यह हमारी ईश्वर से प्रार्थना है। डा. सत्यानन्द जी का एक डाइगोस्टिक सेन्टर या पैथोलोजी लैब लखनऊ में है जिसे उनके एक सहयोगी देखते हैं। महात्मा जी की एक पुत्री श्रीमती सुरेन्द्र अरोड़ा जी देहरादून में रहती हैं। महात्मा जी की ही तरह आप व आपका पूरा परिवार भी महात्मा प्रभु आश्रित महाराज से प्रभावित रहा है। आप दोनों पत्नी व पति (पति श्री धर्मभूषण वानप्रस्थ) यज्ञ एवं गायत्री जप में गहरी रुचि रखते रहे हैं। पति दिवगंत हो गये हैं। उन्होंने चारों वेदों के अनेक बार स्वमेव अपने निवास की यज्ञशाला में पारायण यज्ञ किये हैं। बहिन जी का अपने परिवार का राजपुर रोड पर स्थित भव्य निवास है। आर्य विद्वान अतिथियों की सेवा के लिये भी उनके पास कक्ष हैं। घर में यज्ञशाला है और प्रतिदिन यज्ञ होता है। यह भी बता दें कि वैदिक साधन आश्रम तपोवन को जीवन भर अपनी सेवायें देने वाले श्री भोलानाथ आर्य, सहारनपुर श्रीमती सुरेन्द्र अरोड़ा जी के मामा-ससुर लगते थे। श्री भोलानाथ जी का हमारे साथ गहरा आत्मिक संबंध था। बाद के महीनों में हमें उनसे प्रत्येक सप्ताह भेंट एवं वार्तालाप करने का अवसर मिलता रहा। महात्मा दयानन्द जी का देहान्त रोहतक में हृदयाघात होने से हुआ था। उनकी वहां लगभग एक माह तक अस्पताल में चिकित्सा हुई थी। दिनांक 20 फरवरी, 1989 को वह परलोकगामी हुए।

                महात्मा जी ने जीवन में रेलवे में तार बाबू के रूप में सेवा आरम्भ की थी। उनकी शिक्षा उर्दू व अंग्रेजी में हुई थी। वह सन् 1928 के मैट्रिक परीक्षा पास थे। आर्यसमाजी प्रवृत्ति तथा आध्यात्मिक वृत्ति के होने के कारण उन्हें अपने विभाग में प्रोन्नतियां मिलती रहीं जिस कारण वह डी.एस.ओ. जैसे सम्मानित पद पर पहुंच गये थे। जब भी उनकी प्रोन्नति होती थी तो वह इसे ईश्वर की कृपा व उसकी देन मानते थे। उन्हें सन् 1970 में सेवा निवृत्त होना था परन्तु प्रभु आश्रित जी के शिष्यत्व में वह अध्यात्म में गहराई से झुक चुके थे जिस कारण उन्होंने पांच वर्ष पूर्व ही सेवानिवृत्ति ले ली और साधना के लिए देहरादून आ गये थे। सेवानिवृति के समय वह जयपुर में कार्यरत थे और यहीं से उनकी सेवानिवृत्ति हुई थी। यहां उन्होंने एक बड़ा भूखण्ड भी खरीदा था जिस पर दो कमरे बनवाये थे। अपने एकमात्र पुत्र डा. सत्यानन्द जी का विवाह भी आपने देहरादून के इसी मकान में किया था। पड़ोसियों का सहयोग भी उन्हें प्राप्त हुआ था। महात्मा जी का आध्यात्मिक व सामाजिक परिवार काफी बड़ा था इस कारण पुत्र के विवाह में बड़ी संख्या में लोग सम्मिलित हुए थे। मेडीकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद पुत्र लखनऊ में मेडीकल कालेज में लेक्चरर बन गये थे। उनसे महात्मा जी ने पूछा था कि देहरादून के मकान में रहेंगे या नहीं? उसने कहा कि अब तो उन्हें लखनऊ में ही रहना होगा। इस कारण मकान रूपी भौतिक सम्पत्ति को अपनी आध्यात्मिक उन्नति में बाधक समझ कर आपने मात्र 45 हजार में वह समस्त सम्पत्ति बेच दी थी। उस भूखण्ड पर अब चार आवास बने हैं। आज यदि वह भूभाग महात्मा जी के परिवार के पास होता तो वह करोड़ों रुपये मूल्य का था। वैदिक साधन आश्रम तपोवन के सचिव इंजीनियर श्री प्रेम प्रकाश शर्मा जी राजपुर रोड, देहरादून में दून विहार नामक कालोनी में महात्मा जी के भूखण्ड के निकट के भवन में ही रहते हैं।

                महात्मा जी की एक बार पदोन्नति होनी थी। तीन लिखित परीक्षाओं हुईं। इसके बाद इण्टरव्यू के रूप में जिस दिन डैसअप होकर जाना था, वह भूल से सामान्य वेशभूषा कुर्ता-पाजामा में आफीस पहुंच गये। उन्हें अपनी भूल का ज्ञान आफीस पहुंचने पर हुआ। इण्टरव्यू हुआ और महात्मा जी इण्टरव्यू में भी उत्तीर्ण घोषित किये गये। इसे महात्माजी ईश्वर की विशेष कृपा मानते थे जबकि किसी को उन्हें पदोन्नति मिलने की आशा नहीं थी।

महात्मा प्रभु आश्रित जी के सम्पर्क में आने पर महात्मा दयानन्द जी आर्यसमाज में और अधिक सक्रिय हुए। महात्मा जी के नाना जी कट्टर आर्यसमाजी थे तथा नानी जी पौराणिक विचारों की थी। महात्मा जी पर बचपन में अपने नाना जी का अधिक प्रभाव पड़ा जिस कारण वह आर्यसमाज व उसके सिद्धान्तों से परिचित हो गये थे और उन्हें मानते व आचरण भी करते थे। महात्मा जी के पिता जी पौराणिक थे जबकि माता जी आर्यसमाजी विचारों की थीं। लम्बे समय बाद जब महात्मा दयानन्द जी महात्मा प्रभु आश्रित जी के अन्तरंग सम्पर्क में आये तो महात्मा जी ने पूछा कि आपने नौकरी में कभी रिश्वत आदि ली या नहीं? महात्मा जी ने विचार कर उत्तर दिया कि उन्होंने रिश्वत कभी नहीं ली। उनसे पूछा गया कि और किसी प्रकार से रेलवे के साधनों का दुरुपयोग किया हो? महात्मा जी ने बताया कि वह उन कागजों को जो बेकार होते थे परन्तु जिसका पीछे वाला भाग खाली होता था, उन्हें घर लाते थे और अपने बच्चों के स्कूल आदि का रफ काम करने में उनका उपयोग करते थे। कुछ पेंसिले जो घिस जाती थीं उन पर पेन की कैप लगाकर बच्चों को प्रयोग करने के लिये देते थे। महात्मा प्रभु आश्रित जी ने उनसे उनका मूल्य पूछा। महात्मा जी ने गणना कर बताया कि लगभग 500 रुपये से अधिक नहीं होगा। उन्हें इसके लिये अपने विभाग के अधिकारियों को पत्र लिख कर धनराशि जमा करने के लिये कहा गया। प्रभु आश्रित जी ने महात्मा जी को बताया था कि इससे आपकी नौकरी पर आंच भी आ सकती है। महात्मा दयानन्द जी ने कई बार पत्र लिखे परन्तु उत्तर नहीं आया। तब महात्मा प्रभु आश्रित जी के सुझाव पर महात्मा दयानन्द जी के अपने कोटा निवास पर एक वृहद यज्ञ कराया जिस पर 500 वा कुछ अधिक की धनराशि व्यय की गई। यह यज्ञ महात्मा प्रभु आश्रित जी ने कराया था। इसकी साक्षी उनकी पुत्री 80 वर्षीय माता सुरेन्द्र अरोड़ा जी हैं।

महात्मा दयानन्द जी सच्चरित्रता के आदर्श व मूर्त रूप थे। जिन दिनों वह कोटा में कार्यरत थे, तब उन्हें माल ढुलाई के लिए वैगन एलाट करने का काम भी दिया गया था। इस काम में अच्छी खासी आय हो सकती थी। कालोनी में रहने वाली रेलवे अधिकारियों की पत्नियों को भी इसका ज्ञान था। उन्होंने महात्मा जी की धर्मपत्नी को इस बारे में पूछा? अनभिज्ञता व्यक्त करने पर उन्होंने माता पद्मावती जी को पूरी बात बताई। यह भी कहा कि यदि वह रिश्वत नहीं लेते तो उस पैसे को घर में उपयोग न करें अपितु अपनी तीन पुत्रियों के विवाह के लिये फिक्स डिपोजिट करा दें। पद्मावती जी ने यह बात अपने पति को बताई तो महात्मा दयानन्द जी ने साफ इन्कार कर दिया कि मैं इस विष की कमाई को अपने और अपनी पुत्रियों के दुःख का कारण कदापि नहीं बना सकता। जिन दिनों महात्मा दयानन्द जी का स्थानान्तरण मुम्बई में हुआ तो वहां उन्हें आरम्भ के कुछ महीनों में निवास आबंटन नहीं हुआ था। वह रेलवे सैलून कोच में रहते थे। सन्टिंग करने वाले सभी कर्मचारियों को हिदायत थी कि यदि कभी सन्टिंग में सैलून कोच को झटका लगने की सम्भावना हो तो पहले ही महात्मा जी के परिवार को सूचित कर देंवे। एक बार कर्मचारियों से चूक हो गई। वह बताना भूल गये। इसके कारण रसोई में काम करते हुए सन्टिंग के कारण उनके कोच को तेज झटका लगा जिससे उसमें रखी विदेशी क्राकरी गिर कर टूट गई और गैस पर जो भोजन बन रहा था वह भी गिर गया। सम्बन्धित कर्मचारी डर गया। उसने आकर महात्मा जी के परिवारजनों से क्षमायाचना की। महात्मा के साथी कर्मचारियों ने उससे कहा कि जब कल प्रातः महात्मा जी आफीस जायें तो वह उनके घर से निकलते ही उनके पैर पकड़ कर माफी मांग ले। उसने ऐसा ही किया और महात्मा जी ने उसे क्षमा कर दिया। हमने महात्मा जी की पुत्री श्रीमती सुरेन्द्र अरोड़ा जी से भेंट की। उन्होंने बताया कि सर्विस के दौरान उनकी मित्र मण्डल के लोग महात्मा जी का नाम नहीं लेते थे। उनको स्वामीजी कह कर पुकारा करते थे।

महात्मा जी रेलवे विभाग से सेवानिवृत्त होकर सीधे देहरादून आये थे। तपोवन आश्रम यज्ञ एवं साधना आदि के लिये विख्यात उत्तम स्थान था। आप इस आश्रम से जुड़े और इसके सभी कार्यों में अपनी सेवायें देने लगे। उन दिनों आश्रम की अपनी गोशाला नहीं थी। अतः आपने दूध के लिए यहां एक गाय भी पाली थी। आश्रम में जो भोजन बनता था वह आपको अनुकूल नहीं होता था। आपने आश्रम के रसोई के कर्मचारियों को अपने अनुकूल कूछ पदार्थ बनाने का भी अनुरोध किया था। अधिकारियों ने भोजन तथा गाय पालने का विरोध किया। अतः आपने अधिकारियों से विना गिला शिकवा किये राजपुर रोड, जाखन वाले अपने निजी निवास पर आ गये। आश्रम को बाद में आपकी आवश्यकता अनुभव हुई तो वह आपको वहां ले गये। आपने आश्रम को अपनी निःशुल्क सेवायें दीं। आप आश्रम से बाहर अनेक स्थानों पर यज्ञ कराने भी जाते थे। आपका जीवन व कार्यक्रम आपको पूर्ण व्यस्त रखते थे। दक्षिण भारत में चेन्नई के निकट मीनाक्षीपुरम् का जब एक पूरा गांव मुस्लिम मत में परिवर्तित कर दिया गया था तो आप सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान लाला रामगोपाल शालवाले जी के अनुरोध पर एक टीम के साथ वहां गये और सभी धर्मान्तरितों को पुनः वैदिक धर्म में लौटाया था। जनवरी, 1989 में आप गन्नौर से वेद पारायण यज्ञ कराके रोहतक लौटे थे। यहां आपको हार्ट अटैक पड़ा। बाद में अस्पताल में उपचार के चलते दिनांक 20-2-1989 को आपकी मृत्यु हो गई। यज्ञ आपके जीवन का प्रमुख अंग था। जिस निष्ठा एवं योग्यता से आप वेद पारायण यज्ञ कराते थे उसका अनुकूल प्रभाव श्रोताओं पर पड़ता था। आज महात्मा दयानन्द जी जैसे वेद और ऋषि के प्रति निष्ठावान, तपस्वी व त्यागी श्रद्धालु लोगों की कमी है। ऐसे समय में महात्मा दयानन्द जी का जीवन आर्यसमाज के अनुयायियों के लिये प्रेरणादायक हो सकता है। आर्यजन वेदाध्ययन व स्वाध्याय, ईश्वर भक्ति, यज्ञ, सत्संग, सेवा, ध्यान आदि को अपने जीवन का अंग बनाये, इसी से जीवन सफल होगा।

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