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    Homeराजनीतियोगी के देशराग पर कांग्रेस का विलाप क्यों?

    योगी के देशराग पर कांग्रेस का विलाप क्यों?

    प्रवीण दुबे
    ”सूप बोले सो बोले छलनी क्या बोले जिसमें बहात्तर छेद देश की सबसे पुरानी और सर्वाधिक समय तक सत्तासीन रहने वाली कांग्रेस और उसकी कुछ पिछलग्गू पार्टियां धर्मनिरपेक्षता, सांप्रदायिकता, अल्पसंख्यक संरक्षण जैसे विषयों पर कुछ बोलती हैं तो सहसा ही ऊपर लिखी कहावत याद आ जाती है। वास्तव में कांग्रेस ने आजादी के पहले और आजादी के बाद इन विषयों को लेकर जो चरित्र प्रस्तुत किया क्या उसके चलते उसे इन विषयों पर किसी से भी कुछ भी कहने का अधिकार है?
    वर्तमान की बात करें तो कांग्रेस सहित देश के कुछ तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादी राजनैतिक दल गोरखपुर से भाजपा के सांसद योगी आदित्यनाथ के बयानों को लेकर हायतौबा मचाए हुए हैं। आगे बढऩे से पहले इन बयानों पर नजर डालना बेहद आवश्यक है।
    yaकहते हैं कि मुसलमानों की संख्या जहां भी 10 प्रतिशत से ज्यादा है, वहां दंगे होते हैं। जहां इनकी संख्या 35 फीसदी से ज्यादा है वहां गैर मुस्लिमों के लिए कोई जगह नहीं है। एक अन्य बयान में आदित्यनाथ कहते हैं कि अगर वह हममें से एक को मारेंगे तो यह उम्मीद रखना छोड़ दें कि वह सुरक्षित रहेंगे। अगर वह शांति से नहीं रहते हैं तो हम उन्हें सिखाएंगे कि शांति से कैसे रहा जाता है। हमले और धर्मान्तरण के मामले में हिन्दू समुदाय मुसलमानों को अब जैसे को तैसा के अंदाज में जवाब देगा। संन्यासी के तौर पर मैं ऐसी असुर शक्तियों को दंडित कर सकता हूं। यदि मेरे एक हाथ में माला है तो दूसरे में भाला है।
    लव जिहाद पर बोलते हुए योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि लव जिहाद के जरिए देश को मुस्लिम राष्ट्र बनाने का षड्यंत्र चल रहा है। उन्होंने कहा था कि अगर देश में आपको रहना है तो भारतीय संस्कृति और सभ्यता का सम्मान भी करना पड़ेगा। एक अन्य वीडियो में योगी आदित्यनाथ यह कहते दिखाई देते हैं अगर वो प्रेम जाल में फंसाकर एक हिन्दू लड़की का धर्म परिवर्तन कराते हैं तो हम उनकी सौ लड़कियों को हिन्दू बनाएंगे। योगी आदित्यनाथ ने जो कुछ कहा वास्तव में वह कितना सच है अथवा कितना गलत, कितना सांप्रदायिक है अथवा कितना धर्मनिरपेक्ष सवाल यह नहीं है। सवाल तो सबसे बड़ा यह है कि स्वयं को धर्मनिरपेक्ष कहने वाली कांग्रेस और समाजवादी जैसे राजनीतिक दलों के नेताओं के पेट में इससे मरोड़ क्यों उठ रही है? वे योगी के बयानों को उत्तरप्रदेश में होने वाले उपचुनावों से जोड़कर बवाल क्यों मचा रहे हैं?
    जो लोग ऐसा कर रहे हैं उनसे पूछा जाना चाहिए कि क्या कांग्रेस ने कभी इस तरह के बयान नहीं दिए? क्या कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टीकरण के चलते देश के करोड़ों हिन्दुओं की भावनाओं को आहत नहीं किया? यहां हम कुछ ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करेंगे जिनसे यह सिद्ध होता है कि योगी आदित्यनाथ ऐसे बयान देने को क्यों मजबूर हुए। इतना ही नहीं इससे यह भी सिद्ध होता है कि कांग्रेस को योगी के बयान पर तनिक भी बवाल मचाने का नैतिक अधिकार नहीं है।
    सबसे पहला उदाहरण उस कांग्रेस नेता का है जिसने लगातार दस वर्षों तक इस देश के प्रधानमंत्री पद की कुर्सी संभाले रखी। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहनसिंह ने इस पद पर काबिज रहते एक सार्वजनिक कार्यक्रम में बोलते हुए कहा था कि इस देश के सभी संसाधनों पर पहला हक इस देश के अल्पसंख्यकों अर्थात मुसलमानों का है। एक प्रधानमंत्री का यह तुष्टीकरण भरा बयान आखिर क्या इंगित करताहै?
    बात यहीं समाप्त नहीं होती जरा याद करिए कांग्रेस के जयपुर अधिवेशन को यहां कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और देश के तत्कालीन गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने हिन्दुओं पर जो निशाना साधा था वह कितना निदंनीय और घृणित था शिन्दे ने हिन्दुओं के लिए भगवा आतंकवादी शब्द का इस्तेमाल करके कांग्रेस की हिन्दू विरोधी मानसिकता को पूरी दुनिया के सामने उजागर किया था।
    यहां कांग्रेस के दिग्गज नेता और पार्टी महासचिव दिग्विजय सिंह के मुस्लिम तुष्टीकरण और हिन्दू विरोधी मानसिकता का जिक्र करना भी प्रासंगिक होगा। दिग्विजय सिंह ने एक तरफ मुस्लिम तुष्टीकरण में बाटला हाउस एनकांउटर को फर्जी ठहराया था। और इसमें मारे गए आतंकवादियों के घर जाकर आंसू भी टपकाए थे। दिग्गीराजा के मुस्लिम प्रेम के  उदाहरण यहीं समाप्त नहीं होते पूरे देश ने टेलीविजन पर यह देखा है कि दिग्विजय सिंह ने ओसामा और हाफिज जैसे आतंकवादियों को किस प्रकार ‘जीÓ लगाकर आदर दिया था। कांग्रेस नेताओं के यह तो चंद किस्से ही हैं यदि पूरा इतिहास खंगाला जाए तो नेहरू से लेकर मनमोहन तक पूरी कांग्रेस अपने शासन काल में मुस्लिम वोट बैंक को अपनी तरफ करने के लिए इस देश के मूल निवासी हिन्दुओं के साथ छल-कपट की राजनीति करती रही और हिन्दू तथा हिन्दुत्व के खिलाफ जहर उगलती रही। ऐसी कांग्रेस को यदि योगी आदित्यनाथ के बयान सांप्रदायिक नजर आ रहे हैं तो यह देखकर बेहद आश्चर्य होता है।
    योगी आदित्यनाथ के जिस बयान पर कांग्रेसी सहित इस देश के तथा कथित धर्मनिरपेक्षता वादी सर्वाधिक विधवा विलाप कर रहे हैं उसमें योगी ने कहा कि जहां मुस्लिम आबादी बढ़ती है दंगे वहीं होते हैं?
    डॉ.पीटर हैमण्ड की पुस्तक ”स्लेवरी टेररिज्य एण्ड इस्लाम-द हिस्टोरिकल रुट्स एण्ड कण्टेम्पररी थे्रट तथा लियोन यूरिस की पुस्तक ”द हज ÓÓका अध्ययन करने पर मुस्लिम जनसंख्या को लेकर किए गए अध्ययन पर चौकानें वाले तथ्य सामने आते हैं जिनसे योगी आदित्यनाथ के बयान में कही बात को बल मिलता है। इन पुस्तकों के मुताबिक जब तक किसी देश में अथवा क्षेत्र में मुस्लिम आबादी 2 प्रतिशत के आसपास होती है, तब वे एकदम शांतिप्रिय कानून पसंद अल्पसंख्यक बनकर रहते हैं। जैसे कि अमेरिका में 0.6, आस्टे्रलिया में 1.5, कनाडा में 1.9, चीन में 1.8, इटली 1.5 तथा नार्वे में 1.8 प्रतिशत। जब मुस्लिम जनसंख्या 2 से 5 के बीच पहुंच जाती है तब वे अन्य धर्माविलंबियों में अपना धर्मप्रचार शुरू कर देते हैं, जिनमें अक्सर समाज का निचला तबका और अन्य धर्मों से असंतुष्ट हुए लोग होते हैं जैसे कि डेनमार्क में 2 प्रतिशत, जर्मनी में 3.7, ब्रिटेन में 2.1, स्पेन में 4 और थाइलैण्ड में 4.6 प्रतिशत।
    मुस्लिम जनसंख्या के 5 प्रशित से ऊपर हो जाने पर वे अपने अनुपात के हिसाब से अन्य धर्माविलंबियों पर दबाव बढ़ाने लगते हैं और अपना प्रभाव जमाने की कोशिश करने लगते हैं। उदाहरण के लिए वे सरकारों व शॉपिंग माल पर हलाल का मास रखने का दबाव बनाने लगते हैं। वे कहते हैं कि हलाल का मांस न खाने से उनकी धार्मिक मान्यताएं प्रभावित होती हैं। इस कदम से कई पश्चिम देशों में खाद्य वस्तुओं के बाजार में मुस्लिमों की तगड़ी पैठ बनी उन्होंने कई देशों के सुपर-मार्केट के मालिकों को दबाव डालकर हलाल का मांस रखने को बाध्य किया। दुकानदार भी धंधे को देखते हुए उनका कहा मान लेता है अधिक जनसंख्या का फैक्टर यहां से मजबूत होना शुरू हो जाता है। ऐसा जिन देशों में हो चुका वह हैं। फ्रांस जहां मुस्लिम 8 प्रतिशत, फिलीपीन्स 6 प्रतिशत, स्वीडन 5.5, स्विटजरलैण्ड 5.3, नीदरलैंड 5.8तथा त्रिनिदाद और टौबेगो 6 प्रतिशत।
    इस बिन्दु पर आकर मुस्लिम सरकारों पर यह दबाव बनाने लगते हैं कि उन्हें उनके क्षेत्रों में शरीयत कानून के मुताबिक चलनेे दिया जाए। जब मुस्लिम जनसंख्या 10 प्रतिशत से अधिक हो जाती है तो वे उस देश, प्रदेश, राज्य अथवा क्षेत्र विशेष में कानून व्यवस्था के लिए परेशानी पैदा करना शुरू कर देते हैं। शिकायतें करना शुरू कर देते हैं। छोटी -छोटी बातों पर विवाद दंगे, तोडफ़ोड़ पर उतर आते हैं। चाहे वह फ्रांस के दंगे हों, डेनमार्क का कार्टून विवाद हो या फिर एस्टर्डम में कारों का जलाना हरेक विवाद को समझबूझ बातचीत से खत्म करने के बजाए और बढ़ाया जाता है। जैसे कि गुयाना में 10 प्रतिशत मुस्लिम, इसराइल में 16 प्रतिशत, केन्या में 11 प्रतिशत और रुस मुस्लिम आबादी 15 प्रतिशत के कारण हुआ।
    जब मुस्लिम जनसंख्या 20 प्रतिशत से ऊपर हो जाती है तब विभिन्न सैनिक शाखाएं जिहाद के नारे लगाने लगती हैं असष्णुता और धार्मिक हत्याओं का दौर शुरू हो जाता है। जैसे इथोपिया में 32 प्रतिशत भारत में 22 प्रतिशत।
    मुस्लिम जनसंख्या के 40 प्रतिशत के ऊपर पहुंच जाने पर बड़ी संख्या में सामूहिक हत्याएं, आतंकवादी कार्रवाइयां चलने लगती हैं। जैसे बोस्निया में 40 प्रतिशत चांड में 54.2 प्रतिशत, लेबनान में 59 प्रतिशत। जब मुस्लिम जनसंख्या 60 प्रतिशत से ऊपर हो जाती है तब अन्य धर्मावलंबियों का जातीय सफाया शुरू किया जाता है उदाहरण (भारत का कश्मीर)जबरिया मुस्लिम बनाना, अन्य धर्मों के धार्मिक स्थल तोडऩा जजिया जैसा कोई अन्य कर वसूलना आदि किया जाता है जैसे अल्वानिया में 70 प्रतिशत, मलेशिया में 62 प्रतिशत कतर में 78 प्रतिशत और सूडान में 75 प्रतिशत। जनसंख्या के 80 प्रतिशत से ऊपर हो जाने के बाद सत्ता शासन प्रायोजित जातीय सफाई की जाती है। सभी प्रकार के हथकंडे अपनाकर जनसंख्या को 100 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा जाता है। जैसे बांग्लादेश 83 प्रतिशत, मिस्त्र 90 प्रतिशत, गाजा पट्टी 98 प्रतिशत, ईरान, ईराक, जॉर्डन, मोरक्को, पाकिस्तान, सीरीया आदि।
    मुस्लिम जनसंख्या 100 प्रतिशत यानी कि दार-ए इस्लाम होने की स्थिति में वहां सिर्फ मदरसे होते हैं और सिर्फ कुरान पढ़ाई जाती है और इसे अंतिम सत्य माना जाता है। जैसे अफगानिस्तान, सउदी अरब, सोमालिया, यमन आदि।
    यदि इन आंकड़ों को तथ्थों को सही मान लिया जाए तो भारत में मुस्लिम जनसंख्या 22 प्रतिशत हो जाने की स्थिति बेहद गंभीर कही जा सकती है। ऐसे हालात में योगी आदित्यनाथ के बयान पर हाय तौबा मचाने के बजाए इस स्थिति पर गंभीरता से विचार की जरुरत है। रही बात कांग्रेस की तो उसके लिए यही कहा जा सकता है रस्सी जल गई पर बल नहीं गए।

    प्रवीण दुबे
    प्रवीण दुबे
    विगत 22 वर्षाे से पत्रकारिता में सर्किय हैं। आपके राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय विषयों पर 500 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से प्रेरित श्री प्रवीण दुबे की पत्रकारिता का शुभांरम दैनिक स्वदेश ग्वालियर से 1994 में हुआ। वर्तमान में आप स्वदेश ग्वालियर के कार्यकारी संपादक है, आपके द्वारा अमृत-अटल, श्रीकांत जोशी पर आधारित संग्रह - एक ध्येय निष्ठ जीवन, ग्वालियर की बलिदान गाथा, उत्तिष्ठ जाग्रत सहित एक दर्जन के लगभग पत्र- पत्रिकाओं का संपादन किया है।

    2 COMMENTS

    1. गुनाहों से भरे अपने गिरहबान में देखना किसको अच्छा लगता है?आज़ादी के बाद से कांग्रेस का तो इतिहास ही यही रहा है , हमेशा मुसलमानो को दूसरी पार्टियों को सांप्रदायिक होने का हब्बा दिखा कर वोट लिए , आज जब मोदी उनके लिए कुछ कर रहें हैं, और मुल्क में शांति है तो कांग्रेस उन्हें भड़काती है ,भा ज पा की हर बात में उसे साम्प्रदायिकता की गंध ही आती है,क्योंकि वही उसके खुद की नाक में समाई हुई है

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