Home समाज नर हो, न निराश करो मन को

नर हो, न निराश करो मन को

डॉ. ज्योति सिडाना

आत्महत्या की घटनाएं किसी भी देश या समय के लिए नई नहीं है लेकिन आज कल जिस तरह से ये घटनाएं रोज सामने आ रही हैं ऐसा लगता है कि कोई प्रतिस्पर्धा या खेल चल रहा है. हर आयु वर्ग और हर प्रोफेशन से जुड़ा व्यक्ति चाहे वह विद्यार्थी हो या डॉक्टर, इंजीनियर, प्रशासनिक अधिकारी, पुलिसकर्मी, व्यापारी, फिल्म स्टार, किसान इस खेल में भाग लेने के लिए आतुर हैं और किसी भी हाल में इस खेल को जीतना चाहते हैं. पिछले कुछ दिनों की ही बात करें तो कई फिल्म स्टार्स की मैनेजर रही दिशा सालियान की आत्महत्या, फिल्म स्टार सुशांत सिंह राजपूत (34) की आत्महत्या, टिकटॉक स्टार सिया कक्कड़(16) और दिल्ली विश्विद्यालय की छात्रा (22) व टिकटॉक स्टार की आत्महत्या, राजगढ़ चुरू के पुलिस अधिकारी विष्णुदत्त विश्नोई द्वारा आत्महत्या, झारखंड में 10 साल के बच्चे ने टिकटॉक पर वीडियो बनाने के बाद की आत्महत्या, कोविड-19 के डर से कई लोगों ने आत्महत्या की,एक राष्ट्रीय दैनिक के युवा पत्रकार तरुण सिसोदिया ने कोरोना संक्रमित आने पर जान दे दी  और आज फिर दिल्ली के एम्स अस्पताल में नवनियुक्त मनोचिकत्सक (25) ने आत्महत्या कर ली. ये तो वे घटनाएं हैं जिन पर मीडिया में चर्चा हुई और ऐसी अनेक आत्महत्याएं भी हैं जो मीडिया में स्थान भी नहीं पा सकी उनकी बात तो जाने ही दीजिए. आखिर क्या है ये सब और क्यों हो रहा है? क्या यह राज्य और समाज के लिए चिंता का विषय नहीं है? हर कोई इस तरह की आत्महत्याओं का कारण अवसाद, अकेलापन या तनाव को बता कर अपना पल्ला झाड़ लेता है. सोचने की बात यह है कि क्या इस तरह का संकट देश में पहले कभी नहीं आया या फिर राज्य, समाज और परिवार संस्थाएं इतनी कमजोर हो गई हैं कि किशोर और युवा पीढ़ी की मानसिक स्थिति को समझ पाने में नाकामयाब हो रहे हैं. उनकी किसी भी समस्या का हल इनके पास नहीं है और यह नवीन पीढ़ी हारकर मौत की रह चुन लेती है? जिस देश में युवा पीढ़ी ‘अनिश्चितता के संकट’ का सामना कर रही हो, अपनी जीवन लीला समाप्त करने को बाध्य हो रही हो, उस देश में विकास का कौन-सा मॉडल प्रयुक्त किया जा रहा है? क्या यह बुद्धिजीवियों की चिंता का विषय नहीं है? कल्पना कीजिए कि अगर यह किशोर और युवा पीढ़ी इसी तरह स्वयं को समाप्त करती रही तो हमारा भावी समाज कैसा होगा? कहाँ से आ रही है इनमें इतनी नकारात्मकता, अपने जीवन के प्रति अलगाव, भविष्य के प्रति अनिश्चितता, रिश्तों में असहनशीलता? ऐसा भी नहीं है कि इस पीढ़ी में योग्यता की कमी है या ये पीढ़ी अपने क्षेत्र में सफलता नहीं पा सकी. उपरोक्त सभी  घटनाएँ जिनका यहाँ उल्लेख किया है उनमें से किसी का भी जीवन अभावग्रस्त नहीं था. इसलिए असफलता या समृद्ध न होने को भी इन आत्महत्याओं का कारण नहीं माना जा सकता? इन नवयुवाओं में कुछ तो ‘अनकहा’ है जिसे साझा किए जाने की अति आवश्यकता है. आपको नहीं लगता कि इस संकट से निजात पाने के लिए सभी संस्थानो में (निजी हों या सार्वजानिक दोनों में) एक सघन अभियान चलाने की जरुरत है. जिस तरह देश को स्वाधीनता दिलाने के लिए देश के हर गली, गाँव और कस्बों में अभियान चलाकर लोगों को जागरूक किया गया था उसी तरह इस संकट की घड़ी में भी देश के हर नागरिक की सक्रिय  सहभागिता की आवश्यकता है. राज्य, समाज, परिवार और शिक्षकों को मिलकर कुछ ऐसे प्रयास जल्दी ही करने होंगे ताकि एक सुनहरे स्वप्न को मूर्त रूप दिया जा सके. मैथिलीशरण गुप्त की इन पंक्तियों की सार्थकता आज अधिक प्रासंगिक जान पड़ती है-

संभलो कि सुयोग न जाय चला, कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला

समझो जग को न निरा सपना, पथ आप प्रशस्त करो अपना

अखिलेश्वर है अवलंबन को, नर हो, न निराश करो मन को।

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