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    Homeसाहित्‍यकवितातुम राम हो और रावण भी

    तुम राम हो और रावण भी

    —विनय कुमार विनायक
    मैं कहता हूं
    तुम राम हो और रावण भी,
    कि गलतियां करने के पहले
    डर जाते हो पिता को यादकर
    खबरदार की तरह सामने देखकर
    कि तुम हो राम होने की ओर अग्रसर!

    कोई झूठ बोलने के पहले होंठों
    और गाल पर टिक जाती तर्जनी अंगुली
    अपनी प्यारी सी भोली मां की तरह
    और याद आ जाती मां की हर सीख
    कि तुम राम बनने की राह में चल रहे हो!

    तुम राम हो
    कि मुख में मिठाई डालने के पहले
    तुम्हें अनायास याद आने लगते हैं
    अपने छोटे भाई-बहन, बच्चे
    और उम्र में छोटे रक्त रिश्तेदार!

    अस्तु अपने राम को होने दो
    अपने अंदर और बाहर चारों दिशाओं में!

    कि टांग दो अपने रावण को
    खूंटी पर अनचाही कमीज की तरह!

    कि अपने राम को हो लेने दो
    शिशु से युवा, बड़ा और बालिग भी,
    और पिता के बाद घर का मालिक भी!

    ताकि तुम त्याग कर सको
    अपने छोटे भाई बहनों,स्वजनों के लिए
    ज्येष्ठांश में मिले
    अधिक जगह जमीन, घर आंगन,
    कृषि फसल,अन्न, धन-धान्य!

    कि तुम हो ना जाओ
    कृपण एक दो हाथ भर जमीन,
    अन्न धन स्वर्ण-आभूषण के खातिर!

    कि अपने राम को होने दो कुछ और बड़ा,
    युवा से प्रौढ़, प्रौढ़ से वृद्ध होने तक!

    ताकि तुम निभा सको,
    अपनी संततियों के लिए पितृ धर्म,
    बेटे को अपने कंधे से बड़ा कर सको,
    बेटियों को बचा सको और पढ़ा सको,
    बेटे-बेटियों को आत्म निर्भर बना सको!

    कि यह एक मातृ-पितृ ऋण है तुमपर
    कि तुम कुछ हद तक राम बन गए हो!

    इसके बाद कुछ मानवीय सामाजिक,
    राष्ट्रीय,सांस्कृतिक ऋण है तुम्हारे उपर,
    कि तुम दीन-हीन के दुःख को बांट सको!

    राष्ट्र के प्रति एक ऋण है तब से,
    जब तुम धरती पर दो पग पर खड़े हुए,
    अन्य चतुष्पद प्राणियों से उपर उठकर!

    ये अपनी धरती मां का ऋण है
    जिसको तुम चुकता कर सकते हो,
    बार्डर को दुश्मनों से महफूज रखकर,
    या संत, सिपाही, साहित्यकार बनकर!
    —विनय कुमार विनायक

    विनय कुमार'विनायक'
    विनय कुमार'विनायक'
    बी. एस्सी. (जीव विज्ञान),एम.ए.(हिन्दी), केन्द्रीय अनुवाद ब्युरो से प्रशिक्षित अनुवादक, हिन्दी में व्याख्याता पात्रता प्रमाण पत्र प्राप्त, पत्र-पत्रिकाओं में कविता लेखन, मिथकीय सांस्कृतिक साहित्य में विशेष रुचि।

    2 COMMENTS

    1. श्री मान रस्तोगी साहब! हौसला अफजाई करने के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद! आप बहुत अच्छी कविता लिखते हैं। आपकी कविताओं को मैं प्राथमिकता के साथ पढ़ता हूं, साधुवाद! आपका—विनय कुमार विनायक

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