लेखक परिचय

शादाब जाफर 'शादाब'

शादाब जाफर 'शादाब'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

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आज हमारी युवा पीढी को न जाने क्या हो रहा है माँ बाप और टीचरों की जरा जरा सी बातो और डाट फटकार पर खुदकुशी और मारपीट की खबरें बहुत तेजी से सुनने को मिल रही हैं। अभी पिछले दिनों ही एक छात्र की करतूत ने गुरू शिष्य परंपरा को ही कलंकित कर के रख दिया। अध्यापक के जरा सा डांटने पर गुस्साए छात्र ने उन्हे चाकू मार कर लहूलुहान कर दिया। ये घटना 3 अक्तूबर 2011 की सहारनपुर के बड़गांव के आदर्श इंटर कालेज के कक्षा 11 में भौतिक विज्ञान के अध्यापक जगदेव के साथ स्कूल के पहले घंटे में ही घटित हुर्इ। दरअसल अध्यापक जगदेव जैसे ही क्लास में पहुंचे तो उन्होने देखा कि क्लास में कुछ कुर्सियां उल्टी सीधी पडी थी उन्होने छात्रों से क्लास की उल्टी कुर्सियों को सीधा करने को कहा किन्तु कुर्सियां सीधी करने छात्र सुमित ने अपनी तोहीन समझा और उसने ऐसा करने से मना कर दिया। अध्यापक जगदेव ने उसे जब डाटा तो वो चिढ़ गया और उसने जेब से चाकू निकालकर अध्यापक जगदेव पर हल्ला बोल दिया। ये कोर्इ अकेली घटना नहीं अपने सहपाठियों और अध्यापकों के साथ कम उम्र युवाओं द्वारा हिंसक घटनाओं की तादाद दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही हैं। आखिर ऐसा क्यो हो रहा है। एक ओर जहां इन घटनाओं से बच्चों के परिजन परेशान हैं वही ये घटनाएँ देश और समाज के लिये भी चिंता का विषय बनता जा है। दरअसल इन घटनाओं की वजह बहुत ही साफ और सच्ची है जो बच्चे ऐसी घटनाओ को अन्जाम दे रहे हैं उन के आदर्श फिल्मी हीरो, हिंसक वीडियो गेम, माता पिता द्वारा बच्चो को ऐश-ओ-आराम के साथ महत्वाकांशी दुनिया की तस्वीरों के अलावा जिन्दगी के वास्तविक यथार्थ बताएं और दिखाये नही जा रहे हैं। संघर्ष करना नही सिखाया जा रहा। हां सब कुछ हासिल करने का ख्वाब जरूर दिखाया जा रहा हैं। वह भी कोर्इ संघर्ष किये बिना। दरअसल जो बच्चे संघर्षशील जीवन जीते हैं उनकी संवेदनाएं मरती नहीं हैं वे कठिन परिस्थितियों में भी निराश नहीं होते और हर विपरीत परिस्थिति से लडने के लिये तैयार रहते हैं। कुछ घटनाओं के पीछे शिक्षा और परीक्षा का दबाव है तो कुछ के पीछे मात्र अभिभावकों और अध्यापकों की सामान्य सी डाट, अपने सहपाठियों की उपेक्षा अथवा अंग्रेजी भाषा में हाथ तंग होना। मामूली बातों पर गम्भीर फैसले ले लेने वाली इस युवा पीढी को ना तो अपनी जान की परवाह है और ना ही उन के इस कदम से परिवार पर पड़ने वाले असर की उन्हे कोर्इ चिंता है।

यदि हम थोड़ा पीछे देखे तो 9 फरवरी 2010 को कानपुर के चकेरी के स्कूल के आर एजुकेशन सेंटर के कक्षा 11 के छात्र अमन सिह और उस के सहपाठी विवेक में किसी बात को लेकर मामूली विवाद हो गया। मामला स्कूल के प्रिंसीपल तक पहुँचा और उन्होने दोनों बच्चो को डाट कर समझा दिया किन्तु अगले दिन अमन सिंह अपने चाचा की रिवाल्वर बस्ते में छुपाकर स्कूल ले आया और उसने क्लास में ही अपने सहपाठी विवेक को गोली मार दी। स्कूल या कालेज में इस प्रकार की घटना का ये पहला मामला नही है। 18 सितम्बर 2008 को दिल्ली के लाडो सराये में एक छात्र द्वारा एक छात्रा की हत्या गोली मार कर कर दी गर्इ थी, 18 सितम्बर 2008 को ही मध्य प्रदेश के सतपाडा में एक छात्रा को उसके ही सहपाठियों ने जिन्दा जला दिया था, 16 फरवरी 2008 को गाजियाबाद के मनतौरा स्थित कालेज में एक छात्र ने अपने सहपाठी को गोली मार दी थी, 11 फरवरी 2008 को दिल्ली ही के कैंट सिथत सेंट्रल स्कूल में एक छात्र द्वारा अपने सीनियर को मामूली कहासुनी पर चाकू मार दिया था। नवंबर 2009 में जम्मू कश्मीर के रियासी जिले में आठवीं क्लास की मासूम छात्रा के साथ लगभग 18 साल की उम्र के आसपास के 7 स्कूली बच्चों ने रेप किया सब के सब आरोपी युवा बिगडे रर्इसजादे थे। बच्चों और युवाओं में दिन प्रतिदिन हिंसक दुष्प्रवृति बढती ही जा रही हैं। अभिभावक हैरान परेशान हैं कि आखिर बच्चों की परवरिश में क्या कमी रह रही है। अपने लाडलो को समझाने बुझाने में कहा खोट है कहा चूक रहे हैं हम।

आज देशभर के शिक्षकों, मनोचिकित्सकों, और माता पिताओ के सामने बच्चो द्वारा की जा रही रोज रोज स्कूलो में हिंसक घटनाओं से नर्इ चुनौतियाँ आ खडी हुर्इ हैं। आज बाजार का सब से अधिक दबाव बच्चो और युवाओ पर है। दिशाहीन फिल्में युवाओ और बच्चो को ध्यान में रखकर बनार्इ जा रही हैं। जब से हालीवुड ने भारत का रूख किया है स्थिति और बद से बदतर हो गर्इ हैं। बे सिर पैर की एक्शन फिल्मे सुपरमैन, डै्रकूला, ट्रमीनेटार, हैरीपौटर जैसी ना जाने कितनी फिल्मे बच्चो के दिमाग में फितूर भर रही हैं। वहीं वान्टेड, दबंग, बाडीगार्ड, बाबर, अब तक छप्पन, वास्तव, आदि हिंसा प्रधान फिल्मे युवाओ की दिशा बदल रही हैं। आज का युवा खुद को सलमान खान, शाहरूख खान, अजय देवगन, रितिक रोशन, शाहिद कपूर, अक्षय कुमार की तरह समझता हैं और उन्ही की तरह एक्शन भी करता है। ये तमाम फिल्मे संघर्षशीलता का पाठ पढाने की बजाये यह कह रही हैं कि पैसे के बल पर सब कुछ हासिल किया जा सकता है, छल, कपट, घात प्रतिघात, धूर्तता, ठगी, छीना झपटी, कोर्इ अवगुण नही हैं इस पीढी पर फिल्मी ग्लैमर, कृत्रिम बाजार और नर्इ चहकती दुनिया, शारीरिक परिवर्तन, सैक्स की खुल्लम खुल्ला बाजार में उपलब्ध किताबें, ब्लू फिल्मो की सीडी डीवीडी व इन्टरनेट और मोबार्इल पर सेक्स की पूरी क्रियाओं सहित जानकारी हमारे किशोरों को बिगाडने में कही हद तक जिम्मेदार हैं। इस ओर किशोरों का बढता रूझान ऐसा आकर्षण पैदा कर रहा हैं जैसे भूखे को चंद रोटी की तरह नजर आता है।

गुजरे कुछ वर्षों मे हमारे घरो की तस्वीर तेजी से बदली हैं पिता को बच्चो से बात करने की, उनके पास बैठने और पढार्इ के बारे में पूछने की फुरसत नहीं। माँ भी किट्टी पार्टियों, शापिंग घरेलू कामो में उल्झी हैं। आज के टीचर को शिक्षा और छात्र से कोर्इ मतलब नही उसे तो बस अपने ट्यूशन से मतलब है। फिक्र है बडे बडे बैंच बनाने की एक एक पारी में पचास पचास बच्चो को ट्यूशन देने की। शिक्षा ने आज व्यापार का रूप ले लिया हैं। दादा दादी ज्यादातर घरों में हैं नही। बच्चा अकेलेपन, सन्नाटे, घुटन और उपेक्षा के बीच बडा होता है। बच्चे को ना तो अपने मिलते हैं और ना ही अपनापन। लेकिन उम्र तो अपना फर्ज निभाती हैं बडे होते बच्चो को जब प्यार और किसी के साथ, सहारे की जरूरत पडती हैं तब उस के पास मा बाप चाचा चाची दादा दादी या भार्इ बहन नही होते। होता है अकेलापन पागल कर देने वाली तनहाई या फिर उस के साथ उल्टी सीधी हरकते करने वाले घरेलू नौकर।

ऐसे में आज की युवा पीढी को टूटने से बचाने के लिये सही राह दिखाने के लिये जरूरी है कि हम लोग अपनी नैतिक जिम्मेदारी को समझे और समझे की हमारे बच्चे इतने खूंखार इतने हस्सास क्यो हो रहे हाइना। जरा जरा सी बात पर जान देने और लेने पर क्यो अमादा हो जाते हैं इन की रगो में खून की जगह गरम लावा किसने भर दिया है। इन सवालो के जवाब किसी सेमीनार, पत्र पत्रिकाओ या एनजीओ से हमे नही मिलेंगे। इन सवालो के जवाबो को हमे बच्चो के पास बैठकर उन्हे प्यार दुलार और समय देकर हासिल करने होंगे। वास्तव में घर को बच्चे का पहला स्कूल कहा जाता है। आज वो ही घर बच्चो की अपनी कब्रगाह बनते जा रहे हैं। फसल को हवा पानी खाद दिये बिना बढिया उपज की हमारी उम्मीद सरासर गलत है। बच्चो से हमारा व्यवहार हमारे बुढापे पर भी प्रश्न चिन्ह लगा रहा है। आज पैसा कमाने की भागदौड में जो अपराध हम अपने बच्चो को समय न देकर कर रहे हैं वो हमारे घर परिवार ही नही देश और समाज के लिये बहुत ही घातक सिद्ध हो रहा है।

 

 

 

 

8 Responses to “युवा पीढी नही देश का भविष्य बिगड़ रहा है ?”

  1. ankur agarwal

    आज हमारी युवा पीढी को न जाने क्या हो रहा है माँ बाप और टीचरों की जरा जरा सी बातो और डाट फटकार पर खुदकुशी और मारपीट की खबरें बहुत तेजी से सुनने को मिल रही हैं। अभी पिछले दिनों ही एक छात्र की करतूत ने गुरू शिष्य परंपरा को ही कलंकित कर के रख दिया। अध्यापक के जरा सा डांटने पर गुस्साए छात्र ने उन्हे चाकू मार कर लहूलुहान कर दिया। ये घटना 3 अक्तूबर 2011 की सहारनपुर के बड़गांव के आदर्श इंटर कालेज के कक्षा 11 में भौतिक विज्ञान के अध्यापक जगदेव के साथ स्कूल के पहले घंटे में ही घटित हुर्इ। दरअसल अध्यापक जगदेव जैसे ही क्लास में पहुंचे तो उन्होने देखा कि क्लास में कुछ कुर्सियां उल्टी सीधी पडी थी उन्होने छात्रों से क्लास की उल्टी कुर्सियों को सीधा करने को कहा किन्तु कुर्सियां सीधी करने छात्र सुमित ने अपनी तोहीन समझा और उसने ऐसा करने से मना कर दिया। अध्यापक जगदेव ने उसे जब डाटा तो वो चिढ़ गया और उसने जेब से चाकू निकालकर अध्यापक जगदेव पर हल्ला बोल दिया। ये कोर्इ अकेली घटना नहीं अपने सहपाठियों और अध्यापकों के साथ कम उम्र युवाओं द्वारा हिंसक घटनाओं की तादाद दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही हैं। आखिर ऐसा क्यो हो रहा है। एक ओर जहां इन घटनाओं से बच्चों के परिजन परेशान हैं वही ये घटनाएँ देश और समाज के लिये भी चिंता का विषय बनता जा है। दरअसल इन घटनाओं की वजह बहुत ही साफ और सच्ची है जो बच्चे ऐसी घटनाओ को अन्जाम दे रहे हैं उन के आदर्श फिल्मी हीरो, हिंसक वीडियो गेम, माता पिता द्वारा बच्चो को ऐश-ओ-आराम के साथ महत्वाकांशी दुनिया की तस्वीरों के अलावा जिन्दगी के वास्तविक यथार्थ बताएं और दिखाये नही जा रहे हैं। संघर्ष करना नही सिखाया जा रहा। हां सब कुछ हासिल करने का ख्वाब जरूर दिखाया जा रहा हैं। वह भी कोर्इ संघर्ष किये बिना। दरअसल जो बच्चे संघर्षशील जीवन जीते हैं उनकी संवेदनाएं मरती नहीं हैं वे कठिन परिस्थितियों में भी निराश नहीं होते और हर विपरीत परिस्थिति से लडने के लिये तैयार रहते हैं। कुछ घटनाओं के पीछे शिक्षा और परीक्षा का दबाव है तो कुछ के पीछे मात्र अभिभावकों और अध्यापकों की सामान्य सी डाट, अपने सहपाठियों की उपेक्षा अथवा अंग्रेजी भाषा में हाथ तंग होना। मामूली बातों पर गम्भीर फैसले ले लेने वाली इस युवा पीढी को ना तो अपनी जान की परवाह है और ना ही उन के इस कदम से परिवार पर पड़ने वाले असर की उन्हे कोर्इ चिंता है।

    यदि हम थोड़ा पीछे देखे तो 9 फरवरी 2010 को कानपुर के चकेरी के स्कूल के आर एजुकेशन सेंटर के कक्षा 11 के छात्र अमन सिह और उस के सहपाठी विवेक में किसी बात को लेकर मामूली विवाद हो गया। मामला स्कूल के प्रिंसीपल तक पहुँचा और उन्होने दोनों बच्चो को डाट कर समझा दिया किन्तु अगले दिन अमन सिंह अपने चाचा की रिवाल्वर बस्ते में छुपाकर स्कूल ले आया और उसने क्लास में ही अपने सहपाठी विवेक को गोली मार दी। स्कूल या कालेज में इस प्रकार की घटना का ये पहला मामला नही है। 18 सितम्बर 2008 को दिल्ली के लाडो सराये में एक छात्र द्वारा एक छात्रा की हत्या गोली मार कर कर दी गर्इ थी, 18 सितम्बर 2008 को ही मध्य प्रदेश के सतपाडा में एक छात्रा को उसके ही सहपाठियों ने जिन्दा जला दिया था, 16 फरवरी 2008 को गाजियाबाद के मनतौरा स्थित कालेज में एक छात्र ने अपने सहपाठी को गोली मार दी थी, 11 फरवरी 2008 को दिल्ली ही के कैंट सिथत सेंट्रल स्कूल में एक छात्र द्वारा अपने सीनियर को मामूली कहासुनी पर चाकू मार दिया था। नवंबर 2009 में जम्मू कश्मीर के रियासी जिले में आठवीं क्लास की मासूम छात्रा के साथ लगभग 18 साल की उम्र के आसपास के 7 स्कूली बच्चों ने रेप किया सब के सब आरोपी युवा बिगडे रर्इसजादे थे। बच्चों और युवाओं में दिन प्रतिदिन हिंसक दुष्प्रवृति बढती ही जा रही हैं। अभिभावक हैरान परेशान हैं कि आखिर बच्चों की परवरिश में क्या कमी रह रही है। अपने लाडलो को समझाने बुझाने में कहा खोट है कहा चूक रहे हैं हम।

    आज देशभर के शिक्षकों, मनोचिकित्सकों, और माता पिताओ के सामने बच्चो द्वारा की जा रही रोज रोज स्कूलो में हिंसक घटनाओं से नर्इ चुनौतियाँ आ खडी हुर्इ हैं। आज बाजार का सब से अधिक दबाव बच्चो और युवाओ पर है। दिशाहीन फिल्में युवाओ और बच्चो को ध्यान में रखकर बनार्इ जा रही हैं। जब से हालीवुड ने भारत का रूख किया है स्थिति और बद से बदतर हो गर्इ हैं। बे सिर पैर की एक्शन फिल्मे सुपरमैन, डै्रकूला, ट्रमीनेटार, हैरीपौटर जैसी ना जाने कितनी फिल्मे बच्चो के दिमाग में फितूर भर रही हैं। वहीं वान्टेड, दबंग, बाडीगार्ड, बाबर, अब तक छप्पन, वास्तव, आदि हिंसा प्रधान फिल्मे युवाओ की दिशा बदल रही हैं। आज का युवा खुद को सलमान खान, शाहरूख खान, अजय देवगन, रितिक रोशन, शाहिद कपूर, अक्षय कुमार की तरह समझता हैं और उन्ही की तरह एक्शन भी करता है। ये तमाम फिल्मे संघर्षशीलता का पाठ पढाने की बजाये यह कह रही हैं कि पैसे के बल पर सब कुछ हासिल किया जा सकता है, छल, कपट, घात प्रतिघात, धूर्तता, ठगी, छीना झपटी, कोर्इ अवगुण नही हैं इस पीढी पर फिल्मी ग्लैमर, कृत्रिम बाजार और नर्इ चहकती दुनिया, शारीरिक परिवर्तन, सैक्स की खुल्लम खुल्ला बाजार में उपलब्ध किताबें, ब्लू फिल्मो की सीडी डीवीडी व इन्टरनेट और मोबार्इल पर सेक्स की पूरी क्रियाओं सहित जानकारी हमारे किशोरों को बिगाडने में कही हद तक जिम्मेदार हैं। इस ओर किशोरों का बढता रूझान ऐसा आकर्षण पैदा कर रहा हैं जैसे भूखे को चंद रोटी की तरह नजर आता है।

    गुजरे कुछ वर्षों मे हमारे घरो की तस्वीर तेजी से बदली हैं पिता को बच्चो से बात करने की, उनके पास बैठने और पढार्इ के बारे में पूछने की फुरसत नहीं। माँ भी किट्टी पार्टियों, शापिंग घरेलू कामो में उल्झी हैं। आज के टीचर को शिक्षा और छात्र से कोर्इ मतलब नही उसे तो बस अपने ट्यूशन से मतलब है। फिक्र है बडे बडे बैंच बनाने की एक एक पारी में पचास पचास बच्चो को ट्यूशन देने की। शिक्षा ने आज व्यापार का रूप ले लिया हैं। दादा दादी ज्यादातर घरों में हैं नही। बच्चा अकेलेपन, सन्नाटे, घुटन और उपेक्षा के बीच बडा होता है। बच्चे को ना तो अपने मिलते हैं और ना ही अपनापन। लेकिन उम्र तो अपना फर्ज निभाती हैं बडे होते बच्चो को जब प्यार और किसी के साथ, सहारे की जरूरत पडती हैं तब उस के पास मा बाप चाचा चाची दादा दादी या भार्इ बहन नही होते। होता है अकेलापन पागल कर देने वाली तनहाई या फिर उस के साथ उल्टी सीधी हरकते करने वाले घरेलू नौकर।

    ऐसे में आज की युवा पीढी को टूटने से बचाने के लिये सही राह दिखाने के लिये जरूरी है कि हम लोग अपनी नैतिक जिम्मेदारी को समझे और समझे की हमारे बच्चे इतने खूंखार इतने हस्सास क्यो हो रहे हाइना। जरा जरा सी बात पर जान देने और लेने पर क्यो अमादा हो जाते हैं इन की रगो में खून की जगह गरम लावा किसने भर दिया है। इन सवालो के जवाब किसी सेमीनार, पत्र पत्रिकाओ या एनजीओ से हमे नही मिलेंगे। इन सवालो के जवाबो को हमे बच्चो के पास बैठकर उन्हे प्यार दुलार और समय देकर हासिल करने होंगे। वास्तव में घर को बच्चे का पहला स्कूल कहा जाता है। आज वो ही घर बच्चो की अपनी कब्रगाह बनते जा रहे हैं। फसल को हवा पानी खाद दिये बिना बढिया उपज की हमारी उम्मीद सरासर गलत है। बच्चो से हमारा व्यवहार हमारे बुढापे पर भी प्रश्न चिन्ह लगा रहा है। आज पैसा कमाने की भागदौड में जो अपराध हम अपने बच्चो को समय न देकर कर रहे हैं वो हमारे घर परिवार ही नही देश और समाज के लिये बहुत ही घातक सिद्ध हो रहा है।

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  2. आर. सिंह

    R.Singh

    मैं डाक्टर साहब से अनुरोध करूंगा कि वे मेरी टिप्पणी के उतरार्ध को एक बार पुन: देखे

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  3. Bipin Kumar Sinha

    हमें बच्चों का मनोविज्ञान पढना होगा हमने ही यह सूरत पैदा की है और हमें ही इस समस्या का हल निकालना होगा यह बात सही है कि आज की पीढ़ी धैर्यवान कम है शोर्ट कट इन्हें ज्यादा पसंद आता है ये हर चीज पा लेना चाहते है चाहे वह किसी भी तरह से हो जायज तरीके से हो या नाजायज
    तरीके से.इसमें भी मैं उनका दोष कम हम माता पिता और अभिवावक का ज्यादा है हम अपने आप में इतने मशगूल हो गए कि ये भी खबर न रही कि हमारे अलावे भी कोई है वर्तमान कल में सुचना का एक महा विस्फोट हुआ है और इन्टरनेट का इसमें ज्यादा योगदान है इसलिए आज कि पीढ़ी पुराने सामाजिक मानदंडो पर एक सवालिया निगाह रखती है मै यह नहीं कहूँगा कि यह बाजारवाद या उपभोक्ता वाद का परिणाम है
    यह स्वाभाविक परिणति है बात कुछ और है
    हमने पुराने मूल्यों कि जगह तर्क संगत नये मूल्यों का निर्माण नहीं किया यह पीढ़ी दरअसल संक्रमण के एक नये दौर से गुजर रही है उसने खोया तो बहुत पर पाया कुछ नहीं मै इस पीढ़ी के युवको को जब दकियानूसी धार्मिक परम्पराओ को फालो करते देखता हूँ तो यह सोचने को विवश हो जाता हूँ कि इनकी तर्क शक्ति कहा गई उदहारण के तौर पर दहेज़ लेना .यह प्रथा उनके इस विचार को बल देती है कि इस माध्यम से हर वह चीज पी जा सकती है जिसे पाने में साधारण तौर से काफी समय
    लग सकता है हा इसके लिए बिक्री का बैल कहलाने में कोई गुरेज नहीं माँ बाप बोली लगाते है और ये बिकने के लिए हट बाजार में खड़े हो जाते है इसके लिए भी हम ही जिम्मेदार है हमने इनके अन्दर जमीर पैदा
    करने कि कोशिश नहीं की हमारे शाश्त्रों में दम एक शब्द है जिसका अर्थ स्वयं का शमन होता है दमन नहीं .शमन से तात्पर्य है
    दुसरे का इंतजार पहले करना फिर अपने बारे में सोचना आज यह कही दिखाई देता है
    वे कहेंगे अरे यार सब चलता है इतना सोचना नहीं .
    अंत में मै कहना चाहूँगा हमें स्वयं को भी बदलना होगा और एक नाजी पेश करनी होगी चाहे इसके लिए कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़े .मै उस शिक्षक की जगह होता तो कुर्सी मै ही सीधी कर देता उसने आदेश तो दिया गुरु शिष्य परम्परा जैसा पर व्यवहार में वैसा कभी नहीं रहता होगा सम्मान तो चाहता होगा पर सम्मान देना नहीं जनता होगा
    बिपिन कुमार सिन्हा

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  4. डॉ. मधुसूदन

    dr. madhusudan

    आदरणीय सिंह साहब जी पूछते हैं||
    ==>डाक्टर मधुसूदनजी आपके विचार तो वाकई सराहनीय हैं,पर आपने कभी यह भी सोचा कि इनको अमल में कैसे लाया जाएगा?
    (५) संघ का प्रचारक आज भी ऐसे आदर्श से प्रेरित है| जैन मुनि, बुद्ध भिक्षु, और हिन्दू संन्यासी –ऐसे ही आदर्शोंसे प्रेरित देखता हूँ| इसीका विस्तार होना चाहिए|एक चाणक्य भी देश बचा पाया था|
    (६) सात्त्विकता की अपनी प्रेरणा होती है|

    वास्तव में यह सोचने की भी चुनौती ही है; हम सबके सामने| लेकिन मुझे इस रास्तेसे अधिक कल्याणकारी और चिरस्थायी रास्ता दिखाई नहीं देता| क्या आपको दिखाई देता है?
    कैसे अमल किया जाए? रोग का उपाय पता होना पहली बात है| फिर उसका अमल|
    परम्परा हमीने तोड़ दी थी| तो उसे वापस लाना कठिन ज़रूर है| यह चुनौती तो है ही| नकारा नहीं जा सकता| शोर्ट कट भी इसे कैसे सुलझाएगा? क्या आपके पास उत्तर है?
    कुछ बिंदु ध्यान में आए, सो लिख दिए|
    क्या और कोई रास्ता है?

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  5. आर. सिंह

    R.Singh

    डाक्टर मधुसूदनजी आपके विचार तो वाकई सराहनीय हैं,पर आपने कभी यह भी सोचा कि इनको अमल में कैसे लाया जाएगा? कहाँ तो लोग क़ानून कि धज्जियां उड़ा देते हैं और कहाँ आप वैसे समाज से यह उम्मीद लगा रहे हैं कि वह भारत के चार आश्रमों के अनुसार चलेगा.इतनी दूर तक जाने की आवश्यकता नहीं,लोग केवल अपने अपने आचरण सुधार लें और युवकों के सामने व्यक्तिगत रूप में सही अच्छा उदाहरण पेश करें,युवक अपने आप अच्छे मार्ग को अपना लेंगे.ऐसे भी आज के अधिकाँश युवक इस मामले में अपनी पिछली पीढी से अच्छे हैं.चंद युवक जो बेलगाम हैं और जो पूरे युवा पीढी को बदनाम कर रहे हैं वे उनकी संताने हैं जो खुद भी नीचता के उदाहरण हैं.उनके संतानों से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं? ऐसा शायद ही कोई उदाहरण मिलेगा ,जिसमे सच्चरित्र बाप का बेटा छुरा और पिस्टल के साथ पकड़ा जाए.

    Reply
  6. डॉ. मधुसूदन

    dr. madhusudan

    कारण लगता है, की हमारी समाज व्यवस्था गड़बड़ा गयी है|
    (१) चार आश्रम –ब्रह्मचर्याश्रम सही प्रकार आचारा नहीं जा रहा| गृहस्थाश्रम धन के पीछे भाग रहा है| वानप्रस्थ भी आचारा नहीं जा रहा| और संन्यास भी कोई(अल्प सन्यासी परम्परा ज़रूर है) आचरता नहीं|
    (२) जब बहुसंख्य जनता इन आश्रमों का आचरण करेगी, तो आप ही आप युवाओंके सामने सही मूल्य प्रस्थापित होंगे|
    (३) हर व्यक्ति जब सोचेगा की एक दिन वानप्रस्थ और संन्यास भी अपनाना है, और मृत्यु भी आनी है, तो भौतिक वस्तुओंके प्रति लालसा भी कम होगी| भ्रष्टाचार भी घटेगा, जीवन मूल्य भी परिमार्जित होंगे|
    आमूल चुल बदलाव आवश्यक है|
    (४) मान लीजिए, कि अम्बानी, प्रेमजी, मुलायम, लालूप्रसाद, अडवानी जैसे लोगों को कल वानप्रस्थ और संन्यास लेना पड़ेगा; यह जानकारी हो तो आप ही आप निश्चित ही संयम से बर्ताव होना शुरू हो जायगा| भौतिकता की पकड़ ढीली होगी, समाज सुदृढ़ होगा, भ्रष्टाचार भी ख़तम ना भी हो, तो घट ज़रूर जायगा| बाल और युवा अपने दादा, नाना को वानप्रस्थ और संन्यास लेते देखेंगे तो उनके आदर्श भी परिशुद्ध होंगे| समाज और देश आदर्श व्यवस्था की और बढेगा|
    कहीं हमने अपने आदर्शों को त्याग कर गलती कर ली है?
    आप क्या सोचते हैं?

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  7. SARKARI VYAPAR BHRASHTACHAR

    स्नेह धारा पूछ रही है की
    रामलीला मैदान में भारत के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने आरती उतारने से मना किया …. मोदीके एक टोपी न पहनने पर ‘SECULARISM ‘ का शोर मचाने वाला मीडिया इस पे चुप है… क्या आप मानते हो कि मीडिया ‘DOUBLE STANDARD” अपना…ता है????
    क्योकि मीडिया रात दिन मेहनत करता है पिज्जा ,बर्गेर ,जंक फ़ूड में गाय और सूअर का मांस खाता है ….सरकारी भ्रष्टाचारियो से करोडो रूपया खाता है …कांग्रेस सरकार का पालतू कुत्ता है …..इसलिए उनपर नहीं भोकेगा ….. शुद्ध हिंदी में कहे तो रखेल, लौंडी,वैश्यायो , को जब तक सच्चा असली पैसा और झूठा प्यार बिस्तर पर मिलता रहे वह मुह नहीं खोलती है ..जब एक से ज्यादा खसम हो तो डबल नहीं मल्टी स्टेंडर्ड अपनाना पड़ता है …….
    बापूजी( आशाराम बापूजी ) देश के ७०%शहरी और ५०% ग्रामीण युवा १४ से ५० वर्ष आयु वर्ग के भगत सिंह ,चंद्रशेखर आजाद,राजगुरु,सुभाष चन्द्र बॉस ,आदि आदि को भारत सरकार ने विदेशी कंपनियों के गाय और सूअर के मांस और चर्बी से बने पिज्जा,बर्गर,जंक फ़ूड ,नुडल्स खिला खिला कर सेकुलर बना दिया है युवाओं को चोरी ,चुगली,(मीडिया),कलाली (बड़े बड़े बार और सरकारी शराब दुकाने ),दलाली (रिश्वत खोरी और कालाबाजारी ) और छिनाली (मुन्नी की बदनामी,शीला की जवानी,पाश्चात्य विदेशी/देशी नंगी नंगी माडल्स ) टीवी सिनेमा और इन्टरनेट पर सिखा रहे है ताकि इनका ध्यान चोरी,चुगली,कलाली,दलाली और छिनाली में लगा रहे और इन्हें सरकार का ७० हजार लाख करोड़ डालर का सरकारी व्यापर दिखाई नहीं दे…… पहले महात्मा गाँधी बर्बाद कर गया और अब अन्ना गाँधी महात्मा और राष्ट्र पिता बन्ने के चक्कर में सेकुलर दलालों के जाल में फंस गया है….इस लिए हे मेरे देश के हिन्दू युवा जागो…बीती ताहि बिसार दे ,,,,अब देश की सुध लो….गाय और सूअर के मांस से बने विदेशी और मुस्लिम बेकरियो में बने जंक फ़ूड का त्याग करो ,,,, चोरी,चुगली,कलाली,दलाली और छिनाली के सरकारी कांग्रेसी सेकुलर जाल में फंसने स्वयं और दुसरे युवा भाई बहनों की रक्षा करो …आत्म रक्षा ही देश रक्षा है….हम सुधरेगे जग सुधरेगा ……देश में अलख जगाना है विदेशी कंपनियों और लुच्चे भारतीय पाकिस्तानियों और बंगलादेशियो और पाकिस्तानी जेहादी विचारधारा वाले इंडियन मुहाजिरो को भगाना है….वन्देमातरम
    सरकारी व्यापर भ्रष्टाचार

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  8. आर. सिंह

    R.Singh

    जाफर साहब इन युवकों में इस तरह बढती हुई हिंसा और अनुशासन हीनता का कारण ढूँढने दूर जाने की जरूरत नहीं.आपने अपने लेख में ही इन कारणों पर भी प्रकाश डाला है.माता पिता और तथाकथित गुरुजन यानी शिक्षक अपने को सुधार लें,तो ऐसे उदंड युवक समाज में दिखेंगे ही नहीं.फिल्मों का प्रभाव उतना नहीं होता जितने अपने बडो का प्रभाव होता है.अब मैं आपको एक चुटकुला सुनाता हूँ.आप को शायद बुरा लगे की इतने गंभीर विषय में चुटकुले का क्या काम?पर सुनिए तो सही.हरियाणा के एक स्कूल में एक पिता श्री अपने पुत्र के बारे में जानने के लिए पहुंचे.शिक्षक ने बातचीत के दौरान उनके पुत्र को भी बुला लिया.पुत्र के सामने ही शिक्षक ने कहा की आपका बेटा बहुत तेज है.पढ़ाई लिखाई में बहुत अच्छा कर रहा है,पर बात बात पर इसको गाली देने की आदत है.इसको ठीक करना होगा.पिता ने बगल में बैठे पुत्र के पीठ पर एक धौल जमाया और एक मोटी सी गाली देते हुए बोले तुमने यह सब कहाँ से सीखा?शिक्षक तुरत बोले ,मैं समझ गया की इसने यह सब कहाँ से सीखा.अब मैं ही इसको ठीक करूंगा

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