जल रही हो जिसमें
लौ आत्मज्ञान की
समझ हो जिसको
स्वाभिमान की

हृदय में हो जिसके
करुणा व प्रेम भरा
बाधाओं व संघर्षों से
जो नहीं कभी डरा

अपनी संस्कृति की
हो जिसको पहचान
भेदभाव से विमुख
करे सबका सम्मान

स्वदेश से करे जो
प्रेम अपरम्पार
जानता हो चलाना
कलम व तलवार

राष्ट्र निर्माण में जो
सदैव बने अगुवा
वास्तविक अर्थों में
वही होता है युवा

आलोक कौशिक

Leave a Reply

%d bloggers like this: