लेखक परिचय

मृत्युंजय दीक्षित

मृत्युंजय दीक्षित

स्वतंत्र लेखक व् टिप्पणीकार लखनऊ,उप्र

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5 अप्रैल श्री रामनवमी पर विशेषः-

मृत्युंजय दीक्षित

भारत विविधतापूर्ण भाषा संस्कृति वाला देश है। देश को एक सूत्र में पिरोकर रखने के लिए ऐसे नेतृत्व की सदैव आवश्यकता रही है जो समस्त विविधताओं में समन्वय स्थापित कर सामाजिक व्यवस्था में समरसता बनाएं रख सकें। इस दृष्टि से मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्रीराम सामाजिक समरसता के अग्रदूत हैं। हमारे वेद तथा धर्मषास्त्रों में धर्म के स्वरूप व आचार- विचार की विवेचना तो हैं किन्तु सामाजिक जीवन में उसकोे व्यवहार में कैसे लाया जाये इसका आदर्ष उदाहरण भगवान श्रीराम के जीवन चरित्र में ही दृष्टिगोचर होता है।  समस्त  लौकिक व अलौकिक गुणों का समावेष भगवान श्रीराम के जीवन में स्पष्ट होता है। वह अन्यत्र दुर्लभ है। एक साधारण मनुष्य के रूप मेें समस्त सामाजिक, नैतिक, राजनैतिक, मर्यादाओं का जैसा पालन श्रीराम ने किया है वैसा कोई अन्य उदाहरण विश्व साहित्य में भी उपलब्ध नहींे है।

विपरीत परिस्थितियों में जीवन से हार मान लेने वाले निराश-हताश व्यक्तियों केे लिए भगवान श्रीराम का जीवन एक प्रेरणा का स्रोत है। उनके जीवन में कई बार ऐसी विषम परिस्थितियां उत्पन्न हुई जिनमें सामान्य व्यक्ति या तो निराषा या हताषा के गर्त में गिरकर अपना जीवन नष्ट कर लेता है अथवा ईष्र्या -क्रोध के वषीभूत होकर पारिवारिक तथा सामाजिक सदाचार व नैतिक मर्यादाओं का उल्लंघन कर बैठता है।लेकिन भगवान श्रीराम ने इन विपरीत परिस्थितियों में न केवल सदाचार व नैतिक मर्यादाओं की प्रतिष्ठा की  अपितु समन्वय तथा समरसता की भावना भी मजबूत की।

ये भगवान श्रीराम ही थे जिन्होनें  राज्याभिषेक के समय विमाता कैकेयी द्वारा चैदह वर्ष के वनवास के आदेष को न केवल सहर्ष स्वीकार किया अपितु कैकेयी के प्रति  भी उनके मन में किंचित भी क्रोध, द्वेष या प्रतिकार की भावना भी उत्पन्न नहीं हुई। वे माता कौषल्या की भांति ही कैकेयी के प्रति भी आदर, स्न्ेाह का भाव रखते रहे। अनुज लक्ष्मण जब कैकेयी की निंदा करते हैं तो वे तुरंत लक्ष्मण को रोकते हंै।

साथ ही भाई भरत व षत्रुघ्न के प्रति उनके मन में संशय को भी दूर करते हैं। अनुज भरत व शत्रुघ्न जब वनवास के लिए मन्थरा दासी व कैकेयी के प्रति अपना क्रोध प्रकट करते हैं तब श्रीराम उन्हें भी षांत करते हैं। परिवार में समरसता स्थापित करने का ऐसा कोई उदाहरण नहीं है।

श्रीराम के वनवास के दौरान उत्तर से दक्षिण तक विभिन्न जातियों व वर्गो  के मध्य परस्पर प्रेम व विष्वास की भावना का संचार किया। निषादराज गुह के यहां रूककर और उन्हें गले लगाकर भगवन श्रीराम ने सामाजिक समरसता का ही संदेष दिया है। इतना ही नहीं षबरी के झूठे बेर खाकर  प्रेम व स्नेह का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया है। समाज के पिछड़े, दलित, वंचित लोग भी सम्मानपूर्ण जीवन के अधिकारी हंै यह षिक्षा श्रीराम के जीवन का आदर्ष हैं । इसी प्रकार केवट को पारिश्रमिक देने की बात भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। बिना पारिश्रमिक दिए किसी श्रमिक से कार्य करवाना भी अन्याय है , निर्धनों का षोषण है । गुणवान व वीर्यवान होने के साथ ही भगवान श्रीराम  धर्म व अर्थतत्व को भी जानते हैं।

समाजिक समरसता की स्थापना के लिए भगवान श्रीराम ने सदा न्याय का साथ दिया  और अन्याय के विरूद्ध खड़े हुये। इसका संुदर उदारहण बालिवध का प्रसंग है। बालि ने जब धर्म की दुहाई देते हुए श्रीरामजी के कार्य को अन्याय बताया तो उन्होनें उसकी बात का खण्डन करते हुए कहा कि -”बालि तुम्हें तुम्हारे पाप का ही दण्ड मिला है। तुमने अपने छोटे भाई की स्त्री को जो तुम्हारी पुत्रवधू के समान है बलपर्वूक रख लिया है। अतः तुम्हें दण्ड  देकर मैनें राजधर्म, मित्रधर्म एवं प्रतिज्ञा का पालन किया है।“

अपने इन्हीं गुणों के कारण भगवान श्रीराम रीछ भालू और वानरों की सेना संगठित करने में सफल हुए इतना ही नहीं उन्होनें अपने षरणागत रक्षा रूपी धर्म का पालन करते हुए रावण को छोड़कर आए उसके लधुभ्राता विभीषण को अपनाने में एक क्षण भी नहीं लगाया। इसके साथ ही भगवान श्रीराम कृतज्ञ हैं। मन पर नियंत्रण होने के कारण वे दूसरों के द्वारा किये गये अपराधों को भी भुला देते हैें। किन्तु यदि कोई किसी प्रकार एक बार भी उपकार कर देता है तो उसी से वे संतुष्ट रहते हैं और उसको याद रखते हैं। राज्याभिषेक के बाद हनुमान जी को विदा करते हुए कहते हैं -“ हे कपिश्रेष्ठ! मुझ पर तुम्हारे ऐसे उपकार हैं कि  उनमें एक- एक के बदले अपने प्राण तक दे सकता हूं। फिर भी शेष उपकारों के लिए मुझे तुम्हारा ऋणी बनकर ही रहना होगा।” कपिवर तुमने जो भी उपकार किए हैं वे सब मेरे शरीर में ही विलीन हो जाएं अर्थात तुम पर कभी कोई विपत्ति आए ही नहीं। मनुष्य विपत्तियों में पड़ने पर ही प्रत्युपकार का पात्र बनता है।”

सामाजिक समन्वय को स्थापित करते हुए श्रीरामचन्द्र जी ने राजधर्म का निर्वाहन जिस परिपक्वता से किया उसके कारण ही रामराज्य आज की एक आदर्ष राज्य संकल्पना है , जिसमें प्रजा में ष्षारीरिक तथा भौतिक किसी भी प्रकार के कोई कष्ट नहीं थे। सदभाव सदविचार तथा सदभावना और परमार्थ हीह परम लक्ष्य होने के कारण  प्रजा में परस्पर प्रेम व स्नेह था। छोटे- बड़े ऊॅच- नीच  के कारण भेदभाव नहीं था। आर्थिक विषमता नहीं थी। चोरी, डकैती और दुराचार  जैसे जघन्य अपराध नहीं होते थे। अतः प्रजा सभी प्रकार से सुख का अनुभव करती हुई धर्माचरण में निमग्न थी। इसलिए मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्रीराम आज भी जन-जन के नायक व आराध्य है। जिनके चरणों में भक्त अपना तन- मन- धन समर्पित करके इहलोक और परलोक को सफल बनाते हैं। भगवान श्रीराम  ही नहीं अपितु पूरे श्रीराम दरबार  के सभी सदस्य मर्यादा और अनश्षासन का अनुपम उदाहरण हैं। भगवान श्रीराम के जीवन को यदि आज का युवा आदर्श मान कर चले तो आज भी रामराज  स्थापित होने में कतई देर नहीं लगेगी। बस आवश्यकता है भगवान श्रीराम के जीवन के आदर्शो को आधुनिक शैली में अपनाने की।

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