“जिंदगी के जीरो” बन रहे पर्दे के हीरो

विवेक कुमार पाठक

निर्देशक आनंद एल राय की फिल्म जीरो के साथ शाहरुख खान फिर बॉलीवुड के पर्दे पर लंबे अरसे बाद दिखेंगे। एक बौने के किरदार में हिन्दी सिनेमा के करोड़ों प्रेमी मेरठ के 38 साल के बउआ बने शाहरुख खान न केवल नायक के फ्रेम में दिखेंगे बल्कि वे बॉलीवुड की सबसे खूबसूरत अभिनेत्रियों में शुमार अनुष्का शर्मा और कटरीना कैफ से इश्क लड़ाते भी नजर आएंगे।आनंद एल राय की यह फिल्म फिर विकलांगता को कमतर मानने वाली मानसिकता पर प्रहार है। यह फिल्म मेरठ के 38 साल के बौने युवक बउआ को कठिनाइयों से जूझने वाला प्रेरक हीरो तो नहीं बताती मगर प्यार मोहब्बत की लड़ाई में बउआ को बौनेपन पर विजेता जरुर साबित करती है। आनंद एल राय ने इस फिल्म ने हंसी मजाक और सहज संवादों से बौनेपन का मजाक उड़ाने वालों को अपने आप में मजाक साबित कर दिया है। वो दुनिया जो कद की उंचाई कमजोर रहने पर इंसान को कमतर आंकती है वहां बउआ की जज्बातों और सपनों भरी मोहब्बत सिनेदर्शकों के रोमांच को बढ़ाने वाली है।
 मेरठ का बउआ जीरो में दो खूबसूरत प्रेमिकाओं के प्रेम में किस कदर आता है ये देखना जीरो फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण रहेगा।फिल्म में रचनाधर्मी निर्देशक तिंग्माशु धूलिया बउआ के पिता के रुप में पर्दे पर अदाकारी करते नजर आएंगे।शारीरिक कमतरी पर यह फिल्म दरअसल एक रचनात्कक और संवेदनाशील फिल्मी प्रवाह का हिस्सा है। इससे पहले आप कॉमेडी के लिए मशहूर राजपाल यादव को मैं मेरी पत्नी और वो में कुछ ऐसे ही फ्रेम में देख चुके हैं। फिल्म का टाइटल ही पूरी फिल्म का ताना बाना रहा। राजपाल ने खुद से लंबी हीरोइन के साथ लीड रोड में इस फिल्म से बौने किरदार की कशमकश को भरपूर पेश किया।उपर की ये दोनों फिल्म जहां कॉमेडी और लव इमोशन्स के जरिए दर्शकों का मनोरंजन करती दिखीं तो शारीरिक विकलांकता पर प्रेरक कहानियां भी हिन्दी सिनेमा में निरंतर बढ़ रही हैं। बर्फी में रणवीर कपूर, प्रियंका चोपड़ा और इलियाना की लव कैमिस्ट्री हम सबने खूब देखी है। आमिर खान की तारे जमीन पर दर्शील सफारी अपनी फिल्मी मां टिस्का चोपड़ा से लेकर करोड़ों मां की आंखों में आंसू लाने वाले नन्हें नायक रहे थे। फिल्म में बताया था कि कैसे नीचे गिरता टूटता तारा भी कम चमकीला नहीं था। जरुरत हमेशा हमारे आपके इस आसमानी समाज को उन्हें थामने की रहती है।  संजय लीला भंसाली की ब्लैक में रानी मुखर्जी की बिना तड़क भड़क वाली अदाकारी भी देश भर में खूब देखी गई थी। हमें हिन्दी सिनेना ने गूंगे बहरे इकबाल को गांव से शहर तक तेज बॉलर बनते दिखाया तो हकलाते अजय देवगन मैं ऐसा ही हूं फिल्म में कमतर पिता और बेटी के जज्बातों को रोशन करते दिखे। राकेश रोशन ने कोई मिल गया फिल्म के जरिए ऋतिक रोशन को विकलांगकता के बाबजूद सर्वप्रिय नायक बनकर पर्दे पर उतारा। ऐसी तमाम फिल्में विकलांगों का मजाक बनाने वाले समाज के हृदयहीन लोगों पर कड़ा प्रहार करती दिखती हैं। कोई मिल गया फिल्म का ही एक यादगार संवाद ही ले लीजिए। जिसमें 5वीं का विकलांग छात्र रोहित 10वीं क्लास के सवाल शिक्षक के सामने फटाफट हल करके भावपूर्ण शब्दों में कहता है कि आपने कहा था न कि जाओ अपने बाप से सीखकर आओ तो सर मैं ये सब अपने पापा से सीखकर आया हूं। ऐसे तमाम संवाद हमारी संवेदनाहीन होती दुनिया के सामने विकलांगों के मन की बात विजयी भाव के साथ रखते नजर आते हैं। सिनेमा में ऐश्वर्या ऋतिक की गुजारिश, स्पर्श से लेकर तमाम फिल्में इसी धारा को मजबूत करती आयीं हैं। धारा में बहुत फिल्में हैं सो ठीक वक्त पर उनका जिक्र फिर कभी।फिलहाल मेरठ के बउआ के प्रेम और प्रेम त्रिकोण देखने का समय है तो बउआ की जीवटता और दिलेर मोहब्बत को पर्दे पर देखने का आनंद लीजिए।

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