लेखक परिचय

संजय द्विवेदी

संजय द्विवेदी

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। संपर्कः अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र) मोबाइलः 098935-98888

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-पार्टी में पीढ़ीगत परिवर्तन के प्रतीक हैं नए राष्ट्रीय अध्यक्ष-

-संजय द्विवेदी-
amit_ shah

भारतीय जनता पार्टी के नए अध्यक्ष अमित शाह की ताजपोशी सही मायने में दल की बदलती हुई राजनीति की बानगी पेश करती है। एक समय के साथ चलती हुयी पार्टी किस तरह से अपने राजनीतिक नेतृत्व और सांगठनिक नेतृत्व में बदलाव करती है, भाजपा इसका उदाहरण है। नरेंद्र मोदी को सरकार और अमित शाह को संगठन की कमान सौंपने की घटना यही बताती है।

अमित शाह नए जमाने के नेता हैं और गुजरात से लेकर उत्तर प्रदेश तक अपने संगठन कौशल, प्रबंधन क्षमता और चुनावी रणनीति के जानकार के रूप धाक जमा चुके हैं। जाहिर तौर पर किसी भी राजनीतिक दल के लिए ऐसा व्यक्ति उपयोगी ही कहा जाएगा। उनकी नियुक्ति पर भाजपा के भीतर कम, बाहर ज्यादा हाहाकार है। यह बताता है अमित शाह में विरोधियों को भी संभावनाएं दिख रही हैं। एक ही राज्य से आने के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वे गुजरात मंत्रिमंडल में भी अभिन्न सहयोगी रहे हैं। यानि सत्ता और संगठन की राह अब एक होगी। वे अलग-अलग मार्गों पर नहीं चलेंगे और सुर भी एक होगा।

भाजपा एक अलग तरह से चलने वाला संगठन है। यह एक परिवार के बजाए आरएसएस के ‘विचार परिवार’ से आए लोगों द्वारा चलाई जाने वाली पार्टी है। राजनीतिक क्षेत्र में होने के नाते भाजपा ने समय-समय पर विचारधारा से समझौते किए और सत्ता पाई। कई नीतियों पर आज भी भाजपा और संघ के मतभेद सामने आते रहते हैं। किंतु आरएसएस के लोग यह मानते रहे कि अल्पमत में होने के नाते भाजपा का ऐसा करना मजबूरी है। किंतु इस बार पूर्ण बहुमत की सरकार पाकर संघ का आशावाद चरम पर है। वह किसी कीमत पर इस अवसर को गंवाना नहीं चाहता है। उसे पता है कि सत्ता की राह रपटीली होती है और यह फिसलन भरा रास्ता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आकर्षक नेतृत्व और प्रभावी भाषणकला के बावजूद कुछ ऐसी बातें है जो सरकार की छवि बनाने के लिए जरूरी हैं। इसलिए पहले दिन से ही मंत्रियों से लेकर सांसदों तक को सहयोगियों को सावधानी से चुनने की हिदायतें दी जा रही हैं। पार्टी के सत्ता में आने के बाद दल का प्रभावशाली नेतृत्व सरकार में जा चुका है। ऐसे समय में संगठन की शक्ति को सहेजने और अपनी चुनावी मिशनरी को सजग रखने के लिए एक ऐसे व्यक्तित्व की जरूरत थी, जिसमें नरेंद्र मोदी की छवि भी दिखे और वह नरेंद्र मोदी को भरोसे में लेकर सरकार से प्रभावी फैसले भी करवा सके। अमित शाह की जगह कोई भी अध्यक्ष होता तो उसे नरेंद्र मोदी के ‘यस मैन’ सरीखा ही व्यवहार करना पड़ता अन्यथा टकराव के रास्ते खुल जाते। किंतु अमित शाह की शख्सियत ऐसी है कि वे नरेंद्र मोदी के सामने अपनी बात न सिर्फ रख सकते हैं बल्कि मनवा भी सकते हैं। वहीं संगठन में उनकी भूमिका इसलिए प्रभावी होगी क्योंकि यह माना जाएगा कि शाह जो कह रहे हैं, उसमें मोदी की सहमति जरूर होगी। यह सही मायने में भाजपा के एक सुनहरे दौर की शुरूआत है। जहां सत्ता और संगठन पर दो अलग-अलग और प्रभावी शख्सियतों की उपस्थिति के बावजूद उनमें संघर्ष नहीं समन्वय देखने को मिलेगा।

भाजपा जैसी पार्टी में संघ के आए प्रचारकों और पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं का खासा प्रभाव है, किंतु आप भाजपा के संविधान को देखें तो वह दरअसल अध्यक्ष को बहुत शक्तिमान बनाता है। सही मायने में यह अध्यक्ष का ही दल है। पार्टी में विचारों की बहुलता के बावजूद एक समन्वय दिखता है। शायद इसीलिए भाजपा ने देश के किसी भी राजनीतिक दल से ज्यादा अध्यक्ष बनाए और हटाए हैं। शेष दलों में दशकों तक कोई परिवर्तन नहीं होता और कई में तो लोग मृत्यु तक अध्यक्ष बने रहते हैं किंतु भाजपा लगातार बदलती हुयी पार्टी है और एक नदी की धारा की तरह चल रही है। विचारधारा के प्रति कभी आक्रामक और कभी समझौतावादी रूख अपनाने के बावजूद अब वह पूरी तरह से सत्ता का दल बन चुकी है, इसमें संदेह नहीं है। उसके पास आज नेताओं की एक लंबी श्रृंखला है जिनमें हर जाति, वर्ग, धर्म तथा क्षेत्रीयताओं का नेतृत्व मौजूद है। अपने भौगोलिक और सामाजिक विस्तार को उसने साबित भी किया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अमित शाह एक रणनीतिकार होने के नाते एक इसे और आगे बढ़ाएंगे। गुजरात, उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रयोग के बाद अमित शाह दरअसल भाजपा की उम्मीदों का चेहरा भी हैं। यह भी महत्व की बात है कि शाह केंद्रीय मंत्रिमंडल में जाने के बजाए दल के अध्यक्ष के रूप में कार्य करना स्वीकार करते हैं। इससे पता चलता है कि नरेंद्र मोदी और उनके रणनीतिकारों की नजर में संगठन की सतत सक्रियता बनाए रखने का भी मानस बना हुआ है।

नरेंद्र मोदी सरकार के प्रयोग पर दरअसल आरएसएस का बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। इसलिए वह इस अवसर को खोना नहीं चाहता। पहले प्रचारक प्रधानमंत्री की सफलता से उसका राजपथ मजबूत बनेगा, वहीं जनता के मन में उसकी विचारधारा के प्रति आस्था बनेगी। आप देखें तो संघ राजनीति के प्रति इतिहास के समूचे समय में इतना उत्सुक कभी नहीं दिखा। क्योंकि चाहे-अनचाहे यह बात लोगों तक पहुंच चुकी है, इस सरकार को बनाने में संघ का प्रत्यक्ष योगदान बहुत ज्यादा है। इसमें संघ का बेहतर पक्ष यह है कि वह व्यक्तियों की नहीं, नीतियों की बात कर रहा है। उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह फ्री हैंड दिया है कि वे व्यक्तियों के चयन में तो अपनी चलाएं पर नीतियों से समझौता न करें। नीतियों और कार्यक्रमों को लेकर संघ की बातचीत के शुभ फलितार्थ देश को प्राप्त होंगें, इसमें दो राय नहीं हैं। एक दल के नाते भाजपा के अध्यक्ष पद पर अमित शाह की ताजपोशी बताती है, भाजपा सत्ता पाकर अभी भरी और संतुष्ठ नहीं हैं। सरकार आने पर आमतौर पर संगठन हाशिए पर और दरकिनार कर दिया जाता है। यह फैसला बताता है भाजपा सत्ता पाकर बहुत ज्यादा मुदित नहीं है वह अपने संगठन को और बेहतर और प्रभावी बनाना चाहती है, तभी उसने आलोचनाओं को दरकिनार करते हुए ‘चुनावी समर-2014’ में अपने सबसे बेहतर सेनापति साबित हुए अमित शाह को संगठन का ताज पहनाया है। यह अमित शाह के लिए पुरस्कार भी है और अपेक्षित परिणाम लाने की चुनौती भी। उनके लिए उन इलाकों में भाजपा का कमल खिलाने की चुनौती अभी भी है, जहां आज भी भाजपा का शून्यकाल चल रहा है। दक्षिण के राज्यों और पूर्वोत्तर पर उन्हें ज्यादा फोकस करने के साथ, जीती हुयी जमीनें भी बचाने के जतन करने होगें। इसके साथ ही जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं वहां भाजपा को अपेक्षित सफलता भी दिलानी होगी। संगठन का मंच तो हमेशा कांटों का ताज होता है, पार्टी सत्ता में हो तो यह चुनौती और कठिन हो जाती है। अमित शाह ने बहुत सारे संकटों को पार कर यहां तक की यात्रा की है, उनका दिल्ली आना उन्हें कितना रास आता है इस सवाल के जवाब के लिए थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा।

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