लेखक परिचय

गंगानन्द झा

गंगानन्द झा

डी.ए.वी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में वनस्पति शास्त्र के प्राध्यापक के पद से सेवानिवृत होने के पश्चात् चण्डीगढ़ में गत पन्‍द्रह सालों से रह रहे गंगानंद जी को लिखने पढ़ने का शौक है।

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-गंगानंद झा-

islam cartoon

इस्लाम साहब से हमारी मुलाकात कई वर्षों के बाद हुई । अब वे बाकायदा प्रतिष्ठित और सम्पन्न पाकिस्तानी नागरिक और उद्योगपति हो चुके थे, बाकायदे पासपोर्ट, विसा पर आए थे । पाकिस्तान की बातें करते हुए उन्होंने कहा, ‘अरे हम लोग तो बनिया हैं । रोजगार की खातिर दूर-दराज जाना हमारी फितरत रही है सदा से । यहाँ दिल्ली में भी अपने लोग हैं ही । कारोबार के समझौते इस मुल्क के कारबारियों से हो रहे हैं तो विसा की सहूलियत हो जाएगी तो आने जाने का सिलसिला सहज हो जायगा । आखिर में तो लौट कर यहाँ ही आना है, वह जगह कोई हमलोगों के लायक थोड़े ही है । हम तो गांधीजी के रास्ते पर चलनेवाले आदमी हैं । मैं तो वहाँ उन लोगों को बताता हूँ कि कैसे गाँव में हम यहाँ सभी जाति के लोग मिलजुल कर रहते थे. बड़े छोटे का फर्क नहीं । हम अपने घर में आपके बच्चों की बातें किया करते हैं, हसनैन और अयूब के साथ आपके बच्चे खेलते थे , हम उनकी बातें करते हैं ।’

मैंने पूछा, ‘ आप वहां भोजपुरी बोलते हैं ?’  उन्होंने छूटते ही जवाब दिया, ‘ अरे, वहां हमारा भोजपुरी क्लब है जिसमें नियम है कि क्लब के परिसर में रहते हुए भोजपुरी के बजाय कोई दूसरी जबान में बात करने पर जुरमाना भरना पड़ेगा । भोजपुरी भी ठेठ, उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि ‘गते-गते’ की जगह ‘धीरे-धीरे’ बोलना कबूल नहीं होगा ।’

मैंने कुछ कहा नहीं, पर मन ही मन सोचता रहा कि तभी न ये लोग वहाँ आज भी मुजाहिर ही रह गए हैं ।

पाकिस्तान की बात उठी है तो फैजउलहसन साहब की चर्चा टाली नहीं जा सकती । जब पाकिस्तान के निर्माण की घोषणा हुई, वे भारत सरकार के अंकेक्षक के पद पर कार्यरत थे ।

उन्होंने मुझे उन दिनों की बात सुनाते हुए कहा कि हमारी समझ थी कि नए देश में प्रोन्नति के अबाध अवसर होंगे । यह कल्पना भी नहीं थी कि पासपोर्ट वीसा इत्यादि की दीवारें खड़ी हो जाएँगी । हमारे सामने नेपाल का प्रारूप अभी भी है । पाकिस्तान बनने के पहले भी तो हमारा पदस्थापन उन क्षेत्रों में होता ही था । इसलिए जब सरकार की ओर से ऑप्शन माँगा गया तो हमने नए मुल्क का चुनाव किया । अभी भी याद था उन्हें कि बम्बई से कराची जाते हुए जहाज पर खुशी से नाच रहे थे वे लोग ।

मोह-भंग हुआ कराची की जमीन पर पाँव रखने के बाद । फैज साहब ने कहा, ‘ वहाँ पर लगा कि कहाँ वीराने में आ गए हम । यहाँ की मिट्टी, पेड़-पौधे सभी कैसे तो हैं । मैं वहाँ नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद ढूँढ़ रहा था । एक आदमी से पूछा तो उसने बड़ी हिकारत से मेरी ओर देखते हुए कहा कि तुम्हारा नौकर हूँ क्या । शायद उसे हमारा वहाँ आना पसन्द नहीं आया था ।’

फैज साहब को पाकिस्तान रास नहीं आया था । उनकी पत्नी का देहान्त हो गया तो वे काम पर निकले हुए थे और उनकी छः मास की बेटी अपनी सद्य-मृत माँ के पास रो रही थी ।  बेटी को लेकर वे लखनऊ आए जहाँ उसे उसकी खाला के जिम्मे लगाकर पूर्वी पाकिस्तान चले गए के शायद यहाँ सब ठीक-ठाक हो । पर यहाँ भी बात बनी नहीं ।सो वे अपनी संभावनाओं से मुँह मोड़कर लौट आए थे । और अब यहाँ इस्लामिया स्कूल में शिक्षक के पद पर अपनी संभावनाओं से दो-चार हो रहे थे ।

शेख मोहल्ले में रहने से देश-विभाजन के फलस्वरूप मुसलमान परिवारों के द्वन्द्व और त्रासदी की कई और तस्वीरें मिली जो शायद अन्यथा सम्बव नहीं होती । सिसवन के एक परिवार की बात । पाकिस्तान में रोजगार के संभावित विराट सुयोगों के आकर्षण से परिवार के एकमात्र रोजगारी पुरुष ने पूर्व पाकिस्तान का रुख किया । उसकी बूढ़ी माँ ने वहाँ जाने के बाद वापस आने की जिद ठान ली । उनको अपने पुरखों की जमीन में ही मिट्टी चाहिए थी, जहाँ सब लोग रहे थे । बेटे ने कहा कि वह लौट नहीं सकता । तो माँ ने कहा कि उसे वापस पहुँचा दिया जाए, वह परिवार के बगैर  भी अपने गाँव में रहने को तैयार थी क्योंकि मरने पर मिट्टी अपनों के बीच मिलती यहाँ । और यही हुआ , बेटा माँ को गाँव पर गाँव वालों के भरोसे छोड़ गया ।

एक दिन हाशिम साहब के साथ जा रहा था तो रास्ते में एक अधेड़ व्यक्ति को दिखलाकर उसकी कहानी सुनाई उन्होंने मुझे । वह अपने मोहल्ले के पोस्ट-ऑफिस में सहायक के पद पर काम करते थे ।  बाद में उनके बारे में मालूम हुआ कि उनके कंजूस स्वभाव से परेशान उनकी पत्नी अपने तीन बच्चों के साथ भाग कर अपने भाई के पास तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान चली गई थी । वहाँ तकलीफ़ हुई तो फिर लौटकर शौहर के पास आई । परिवार आ जाने से मियाँजी का खर्च बढ़ गया , बचत की राशि कम पड़ने लगी । तो वे पत्नी पर दबाव डालने लगे कि वे लोग पाकिस्तान लौट जाएँ । अन्त में उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट करने की धमकी दी कि पाकिस्तानी नागरिक अवैध तरीके से यहाँ रह रहे हैं । मजबूर होकर उनकी पत्नी मय बच्चों के पाकिस्तान चली गई । इधर अली मियाँ का बैंक-बैलेंस बढ़ता रहा और वे खुद अनाहार एवं लापरवाही के कारण यक्ष्मा से पीड़ित होकर लावारिश मारे गए । सरहाने पोस्ट-ऑफिस का उनका बचत खाता था झिसमें अच्छी खासी रकम जमा थी. उनकी पत्नी और बच्चों की पहुँच से बाहर , क्योंकि उन्होंने विभाग में लिखकर दे दिया था कि वे सब पाकिस्तानी नागरिक हो गए हैं । यह एक मानवीय ट्रैजेडी थी । ‘सूम का धन शैतान खाए ‘ , का जीवन्त दृष्टान्त ।

एक मजेदार घटना की बात करूँ । एक होमियोपैथ डॉक्टर की क्लिनिक में हम बैठे थे । सामने सड़क पर लौंडे का नाच हो रहा था । हाशिम साहब सर घुमाकर गौर से देख रहे थे । मुस्तफा, जो हाशिम साहबके करीबी दोस्त थे, ने चुटकी ली, ‘ का देखअ तारअ ? उ मेहरारु नइखे  ।’ हाशिम साहब ने सर घुमाया और मजे में जवाब दिया, ‘ उ न मेहरारु हअ, न मरद हअ । उ पठान हवै ।’  मुस्तफा मात खा गए थे, कहना न होगा, वे पठान थे ।

रेहान साहब ने एक दिन बातों बातों में कहा कि हमलोगों की पीढ़ी के साथ हमारे बच्चों की पीढ़ी की मानसिकता का फर्क खयाल करने लायक होता है । रेहान उन दिनों जिस बिल्ंडिग में रहते थे उसमें सारे पड़ोसी हिन्दू थे । क्रिकेट की धारावाहिक विवरणी रेडियो से आया करती थी । भारत पाकिस्तान मैच के समय पड़ोस के बच्चों के साथ रेहान के लड़के मैच पर बातें करते तो वे लोग इन्हें पाकिस्तान का हमदर्द बताकर छींटाकशी करते । रेहान साहब ने यह घटना बताकर कहा कि आमिर लोगों की पीढ़ी भौंचक हो जाती है कि क्यों यह समझा जाता है कि उनकी भावनाएँ दूसरे मुल्क के साथ होगी । इस पीढ़ी ने तो पाकिस्तान के साथ कभी अपनी पहचान नहीं समझी । मुझे किश्वर की बात याद आई । किसी साथी ने उससे चिढ़कर कहा था कि तुम्हारी जगह पाकिस्तान में है । किश्वर तो आक्रामक प्रतिक्रिया वाली लड़की रही है । उसने कहा, ‘ क्यों, जैसे तुम यहाँ जन्मे वैसे ही मैं भी, मैं क्यों कहीं जाऊँ ?’

परीक्षा में वीक्षण करते हुए एक लड़के को मैंने चिट का इस्तेमाल करते हुए पाया . उससे कहा कि तुम अपना चिट मुझे दे दो । उसने चिट छिपा लिया और साफ मना कर दिया कि उसके पास कोई चिट नहीं है । मैंने उसे बहुत समझाया । वह नहीं माना । तब मैंने एक प्रयोग किया, उससे कहा, ‘ तुम मुसलमान हो । अब कह दो कि तुम्हारे पास चिट नहीं है . मैं मान जाउँगा ।’ लड़के ने बेबसी से मेरी ओर देखा और चिट अपनी आस्तीन से निकाल कर मुझे दे दिया ।

 

मेरे पिता जब अपने शेख मोहल्ले के आवास में आए तो एक बार मेरे मन में परेशानी हुई थी कि पूजा पाठ करने वाले पिताजी को मुसलमान के घर में पानी का नल तथा स्थान साझा में रहना गवारा नहीं होगा । उनको बतलाया नहीं कि नीचे के भाग में मुसलमान रहते हैं । पर ऐसा हुआ कि पितृपक्ष चल रहा था । पिताजी तर्पण करते थे । तर्पण का कुश उन्होंने प्राचीर के ऊपर रखा था । वह हवा से उड़कर नीचे गिर गया । उन्होंने तलाशने के लिए नीचे झाँका । हाशिम साहब की पत्नी ने उन्हें देखा, वे पर्दानशीन होने के साथ रोबीली भी थीं, । कुछ ऊँटपटाँग बातें बोल गईं । पिताजी ने स्थिर रहते हुए मुझसे पूछा, ‘ मकानमालिक मुसलमान हैं क्या ?’ मैंने हाँ कह दिया ।  बाद में हाशिम साहब से उनकी बातचीत करा दी थी मैंने । जब वे वापस जाने लगे तो मुझसे कहा, ‘ तुम्हारे मकानमालिक अच्छे आदमी लगते हैं । उनसे कहना कि हिन्दू- मुसलमान होना मुख्य बात नहीं होती । आदमी होना बड़ी बात है ।’

एक बात और । इस्लामिया कॉलेज की स्थापना की पृष्ठभूमि । अहमद गनी को मलाल था कि मुसलमानों के स्वयंघोषित नेता होने के बावजूद इस्लामिया स्कूल की समितियों में वे शामिल होने में असफल रहे थे । इसी बीच इस्लामिया सकूल के परिसर में ‘जनता महाविद्यालय’ नाम से कॉलेज की स्थापना हो गई । अहमद गनी इस महाविद्यालय की गवर्निंग बॉडी में जगह नहीं बना पाए । तो उन्होंने एक रास्ता अख्तियार किया । स्कूल परिसर के बाहर जनता महाविद्यालय का बोर्ड लगा था । गनी साहब उधर से आते जाते गरीब मुसलमानों को बोर्ड दिखाते । वे पूछते ,’ क्या है ?’ गनी का जवाब होता, ‘देख लो अपनी ऑंखों से देख लो, इस्लामिया स्कूल ‘विद्यालय’ हो गया । अब हिन्दू लोग इस्लामिया स्कूल के मालिक होंगे। ‘ मुसलमान समाज में सुनगुनी होने लगी । इस्लामिया स्कूल के कर्तृपक्ष ने खतरा भाँपकर कॉलेज वालों को अन्य स्थान तलाशने को कहा । जनता महाविद्यालय राजा सिंह कॉलेज के नाम से दूसरी जगह से काम करने लगा और अहमद गनी ने मुसलमान की अस्मिता की रक्षा करने के लिए इस्लामिया कॉलेज की स्थापना के लिए बगल की मस्जिद के परिसर का सहारा लिया क्योंकि स्कूल वालों ने ग़नी साहब को टीले पर फिर भी चढ़ने नहीं दिया था।

सन 1969 में हमारे राजनैतिक दृश्य-पटल पर वैचारिक उथल-पुथल अत्यन्त तीव्र था । रक्षणशीलता तथा परिवर्तनकामिता के बीच घमासान छिड़ा हुआ था । बात शुरू तो हुई थी सन 1947 से, देश के विभाजित और स्वतन्त्र होने के साथ ही । गणतन्त्र के स्वयंभू पहरेदारों के अनुसार एक ही राजनैतिक दल के लगातार शासन में बने रहने का संकेत है कि गणतंत्र इस देश में जड़ें नहीं जमा पा रहा है, इसलिए आवश्यक है कि कांग्रेस पार्टी शासन से अपदस्थ हो । एक और उलझन थी । विभाजन के फलस्वरूप मुसलमानों का देश पाकिस्तान बना था । तो स्वतंत्र भारत में हिन्दू-मुसलमान का समीकरण कैसा होना है ?

जवाहरलाल नेहरू ने एजेण्डा तय किया था, जिसके इर्द-गिर्द बहस चलती जा रही थी । यह देश हिन्दुओं का जितना है यहाँ के मुसलमानों का भी उतना ही है, न कम न बेशी । बहुत सारे लोग थे, यह बात जिनके गले के नीचे नहीं उतरती थी । बहस चली आ रही थी ।

सन 1964 में पं. जवाहर लाल नेहरू के देहान्त के बाद हतोद्यम विरोधी तथा रक्षणशील राजनैतिक दलों को एक सुयोग सा दिखा था सत्ता प्राप्ति का । डा. राम मनोहर लोहिया का ग़ैर-कांग्रेसवाद का आह्वान , जो अब तक विभिन्न राजनैतिक दलों द्वारा नकारात्मक तथा अव्यावहारिक कहा जा रहा था, आकर्षक और सही नुस्खा लगने लगा था  । इसका सबसे लाभ मिला भारतीय जन-संघ को , जो अब अपांक्तेय नहीं रह गया । कम्यूनिस्ट पार्टियों ने भी जनसंघ को सम्माननीयता दी । भारतीय जन संघ के   अवतरण के समय से ही पं. नेहरू ने बहुसंख्यक समुदाय की सांप्रदायिकता के अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता से अधिक खतरनाक होने की ओर ध्यान दिलाने का अभियान छेड़ा हुआ था ।  इस पृष्ठभूमि में यह स्वाभाविक था कि जन-संघ नेहरू के उत्तराधिकारी श्री लालबहादुर शास्त्री को पैट्रॉनाइज़ करने की हद तक सक्रिय था । संयोगवश शास्त्री का कार्यकाल अत्यन्त संक्षिप्त रहा और नेहरू की बेटी शासन में आ गई । इससे विरोधी दलों की मोर्चाबन्दी में तात्कालिकता आई और सन 1967 के चुनावों में ग़ैरकांग्रेसवाद का कई एक राज्यों में राजतिलक हुआ । फिर सन 1969 में इन्दिरा गांधी ने पलटवार किया तो संघर्ष ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ के दौर में दाखिल हो गया । ये दिन रक्षणशील दलों के लिए लामबंदी के थे ।

इत्तिफ़ाकन इसी बीच एक दिन मैं इस्लामिया स्कूल गया था तो वहाँ जमायते इस्लामिया के मुखपत्र Radiance की एक प्रति उलटने का अवसर मिला । एक आलेख की बातें उल्लेखनीय लगीं । ‘ जनसंघ की तस्वीर भ्रामक तरीक़े से मुसलमानों के सामने पेश की जाती रही है कि ये लोग हमारे दुश्मन हैं । हक़ीक़त तो यह है कि जनसंघ हमारा प्राकृतिक सखा है, क्योंकि हम दोनों ही राजनीति में धर्म की केन्द्रीय भूमिका स्वीकार और सम्मान करते हैं । कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियाँ हमारे उभयनिष्ठ प्रतिपक्ष और शत्रु हैं क्योंकि वे अधार्मिक हैं । वे ही हमें कमजोर करने के लिए जन-संघ की ग़लत तस्वीर पेश कर हमें बहकाना चाहते हैं । हमें उनकी साजिश को समझकर आपस में हाथ मिलाकर इनका मुक़ाबला करना चाहिए ।

सन 1977 में ग़ैरकांग्रेसवाद की परिणति केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार के पदस्थापित होने में हुई ।  भारतीय जन-संघ जनता पार्टी में विलीन होकर पंगत में सम्मिलित हो गया था। एक दिन एक जन-संघी नेता से बातें सुनने हो रही थीं । वे कह रहे थे, ‘इमरजेंसी में जमायत के लीडरान के साथ हमें जेल में रखकर इंदिरा गांधी ने हमारी ऑंखें खोल दीं । वहाँ हमें मिलने और मिल-बैठकर बातें करने का मौक़ा मिला । बात साफ हो गई कि  हिन्दू-मुसलमानों में झगड़ा तो कांग्रेसियों ने लगाया था । देश का विभाजन मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने नहीं, जवाहर लाल नेहरू के कारण हुआ । प्रधान-मंत्री बनने की ललक थी उनकी, मोहम्मद अली जिन्ना के रहते इस महत्वाकांक्षा के पूरे होने की संभावना नहीं थी। देश के दुश्मन कांग्रेस और कम्युनिस्ट हैं, मुसलमान नहीं, सम्प्रदायवाद का हौवा खड़ाकर ये देश को बाँटे रखना चाहते हैं । अब हम मिल-जुलकर रहेंगे ।

श्री जनार्दन तिवारी जन-संघ के स्थानीय विधायक हुआ करते थे, अमार्जित और मुखर व्यक्तित्व के धनी थे वे । प्रोफेसर अजमत अली स्थानीय क़ॉलेज में अंग्रेजी के अध्यापक थे ; विद्यार्थी जीवन से ही समर्पित कम्युनिस्ट । हिन्दूओं के बीच वे इसलिए भी स्वीकार्य थे कि उन्होंने उर्दू नहीं, हिन्दी पढ़ी थी । पर तिवारी जी उन्हें अत्यन्त खतरनाक़ बताते थे क्योंकि वे मुसलमान होने के साथ-साथ कम्युनिस्ट थे । ‘ एक तो मुसलमान , ऊपर से कम्यूनिस्ट, इससे अधिक खतरनाक़ तो कुछ हो ही नहीं सकता । ‘

-अगली किस्त में समाप्य-

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