लेखक परिचय

बी एन गोयल

बी एन गोयल

लगभग 40 वर्ष भारत सरकार के विभिन्न पदों पर रक्षा मंत्रालय, सूचना प्रसारण मंत्रालय तथा विदेश मंत्रालय में कार्य कर चुके हैं। सन् 2001 में आकाशवाणी महानिदेशालय के कार्यक्रम निदेशक पद से सेवा निवृत्त हुए। भारत में और विदेश में विस्तृत यात्राएं की हैं। भारतीय दूतावास में शिक्षा और सांस्कृतिक सचिव के पद पर कार्य कर चुके हैं। शैक्षणिक तौर पर विभिन्न विश्व विद्यालयों से पांच विभिन्न विषयों में स्नातकोत्तर किए। प्राइवेट प्रकाशनों के अतिरिक्त भारत सरकार के प्रकाशन संस्थान, नेशनल बुक ट्रस्ट के लिए पुस्तकें लिखीं। पढ़ने की बहुत अधिक रूचि है और हर विषय पर पढ़ते हैं। अपने निजी पुस्तकालय में विभिन्न विषयों की पुस्तकें मिलेंगी। कला और संस्कृति पर स्वतंत्र लेख लिखने के साथ राजनीतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक विषयों पर नियमित रूप से भारत और कनाडा के समाचार पत्रों में विश्लेषणात्मक टिप्पणियां लिखते रहे हैं।

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ramanuja acharya

बी एन गोयल

भक्ति, आस्था और अध्यात्म भारतीय मनीषा के स्थायी भाव हैं। भक्ति का समारंभ कब तथा कैसे हुआ, इस बारे में विद्वानों में काफी मतभेद है। साधु समाज में एक दोहा प्रचलित है।

 

भक्ति द्रविड़ ऊपजी,    लाये   रामानन्दा ।

परगट कियो कबीर ने, सात द्वीप नौ खंडा ।।

 

भागवत पुराण में भक्ति स्वयं नारद जी से कहती है –     ‘उत्पन्ना द्राविड़े चाहम कर्णाटे वृद्धिमागता’ अर्थात मैं द्रविड़ देश में जन्मी और कर्णाटक में विकसित हुई। भक्ति किस स्थान पर जन्मी और कहाँ इस का विकास हुआ, इस पर यदि चिंता न भी करें–यह एक तथ्य है कि भक्ति का आविर्भाव प्रमुख रूप से दक्षिण भारत में हुआ। पाँचवी से लेकर नवीं शताब्दी तक दक्षिण भारत में भक्ति का काफी बोलबाला था। यह बात आलवार संतों के साहित्य से भी  प्रमाणित है। दक्षिण में आलवार संतों की अपनी परंपरा है। ये संत प्रायः समाज के निम्न और दबे वर्ग के होते थे। इन की शिक्षा दीक्षा भी अधूरी ही होती थी। शिक्षा, वंश और वैभव का दंभ न होने के कारण ये संत विनीत स्वभाव के होते थे। दीन हीन भाव से ही ये सदा भगवान के चरणों में समर्पित होते थे।

“मैं न अपनी इंद्रियों को जीत पाया हूँ, मैं सभी तरह से भी वेदों के प्रति अनभिज्ञ हूँ।

मेरा जन्म भी    द्विजातिकुल में नहीं हुआ। इस कारण हे भगवान, मुझे आपके                      प्रकाशमान चरणों के अतिरिक्त अन्य किसी शक्ति का भरोसा नहीं है।“

 

ये भाव थे आलवार संतों के। इन्हीं संतों कि भक्ति परंपरा के उत्तराधिकारी और दक्षिण के वैष्णव आचार्य रामानुज का जन्म 1017 में पेरांबूदूर में हुआ। यह समय था जब दक्षिण की भक्ति से परिपूर्ण जनता शंकराचार्य के अद्वैतवाद सिद्धांतों से निराश थी। इसी की प्रतिक्रिया स्वरूप वैष्णवाचार्यों ने द्वैत और विशिष्टद्वैत की खोज की। विशिष्टद्वैत दर्शन का प्रथम विवेचन यमुनाचार्य ने किया था। इन का समय था सन 916 से 1014 तक का। इन को श्री रंगम के अध्यक्ष और विशिष्टद्वैत दर्शन के संस्थापक माना जाता है। रामानुज इन्हीं के उत्तराधिकारी बने।

 

रामानुज के पिता का नाम सोमैया जी और माता का नाम कांति मती था। इन की माता अत्यधिक शुद्ध, सात्विक और धार्मिक विचारों की थी। इन के पिता का देहांत इन के बाल्यकाल में ही हो गया था। अतः इन का लालन पालन मुख्यतः इन की माता ने ही किया। माता ने ही इन्हें वेदों के अध्ययन के लिए उस समय के अद्वैत दर्शन के आचार्य कांची वासी यादव प्रकाश के पास कांचीपुरम भेजा। परिस्थिति वश इन का अपने गुरु यादव प्रकाश से उपनिषदों की व्याख्या पर मतभेद हो गया। कहते हैं कि छान्दोग्य उपनिषद की व्याख्या पर इन का अपने गुरु से मतभेद हो गया था। पूरे घटना क्रम से ये अत्यंत दुःखी हुए और रात्रि में ही आश्रम से निकल गए। लेकिन रात्रि में जंगल के रास्ते से जाते हुये ये रास्ता भटक गए। वहीं जंगल में इन्हें एक शिकारी दंपति मिले। रामानुज ने जब दंपति से रास्ता पूछा तो उन्होने इन को साथ आने के लिए कहा। थोड़ी दूर चलने के बाद दंपति ने इन से पानी लाने के लिए कहा। रामानुज जब पानी लेकर लौटे तो देखा कि दंपति वहाँ से गायब था। थोड़ी देर रामानुज ने प्रतीक्षा की लेकिन कहीं कुछ पता नहीं चला। इतनी देर में सुबह हो गई। चिड़िया चहचहाने  लगी। लेकिन दंपति का कहीं अता पता नहीं था। इन्हें आभास होने लगा कि दंपति और कोई नहीं स्वयं लक्ष्मी और नारायण ही थे। इस के पश्चात इन का संपर्क कांचीपुरम मठ के आचार्य कांचीपूर्ण से हुआ। कांचीपूर्ण का स्थान उस समय के संत समाज में सर्वोच्च माना जाता था। अतः इन्होंने उन को अपना गुरु बनाया।

 

अपने नाम और गुणों के कारण रामानुज को लक्ष्मण का अवतार माना जाता है और इन्होंने भी अपने अग्रज की सेवा को ही अपने जीवन का लक्ष्य मान लिया था। कहा जाता है कि श्री कांची महापूर्ण स्वामी ने इन का दीक्षा संस्कार कोदंड राम मंदिर अर्थात वेंकटाचल तिरुपति में श्री विग्रह के समक्ष सम्पन्न किया था। उस समय इन की आयु 32 वर्ष थी। कांचीपूर्ण ने इन्हें नया नाम दिया – यति राज। इसी समय इन की भेंट पूर्व गुरु आचार्य यादव प्रकाश से एक संत समागम में हुयी। आचार्य प्रकाश ने इन्हें शास्त्रार्थ और आध्यात्मिक ज्ञान में अत्यधिक निपुण पाया। उसी समय आचार्य प्रकाश ने इन्हें अपना गुरु मान लिया। रामानुज ने उन्हें वैष्णव प्रबंध लिखने का अनुरोध किया। अस्सी वर्षीय आचार्य प्रकाश ने ग्रंथ लिखा और उस का नाम रखा  “यतिधर्मासम्मुच्चय”।

 

इस समय तक संत यमुनाचार्य काफी वृद्ध हो गए थे । उन्हें तलाश थी एक ऐसे विद्वान युवक की जो श्रीरंगम मठ का अध्यक्ष बन सके और उन के विशिष्टद्वैत का संवर्धन कर सके। यमुनाचार्य ने अपने शिष्यों से इस बात की चर्चा की। उन्होने रामानुज के बारे में सुन रखा था लेकिन इन से भेंट कभी नहीं हुयी थी। एक दिन अपना अंत समय समीप जान कर यमुनाचार्य ने रामानुज से बिना मिले ही उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया लेकिन परिस्थिति ऐसी बनी कि यह सुन कर रामानुज उन से मिलने जब श्रीरंगम पहुँचे तो संत यमुनाचार्य निर्वाण कर चुके थे। रामानुज पर इस बात का गहरा प्रभाव हुआ कि उनके भरसक प्रयत्नों के बाद भी यमुनाचार्य की उन से भेंट नहीं हो सकी थी और इस पर भी यमुनाचार्य ने उन्हें अपना मानस शिष्य मान लिया था और उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। अपने प्रस्थान से पूर्व आचार्य ने रामानुज के लिए कुछ निर्देश भी छोड़ दिये थे।

कहा जाता है कि जब रामानुज श्रीरंगम पहुँचे, उन्होने देखा कि मुनिवर यमुनाचार्य महाप्रयाण कर चुके हैं लेकिन उनके दाहिने हाथ की तीन उँगलियाँ मुड़ी हुई थी। रामानुज को आश्चर्य हुआ – उन्होने वहाँ उपस्थित शिष्यों से पूछा – क्या महा ऋषि की उँगलियाँ सदैव ऐसी ही थी। सभी ने एक स्वर से कहा – नहीं ऐसा कभी नहीं था। तब रामानुज ने निष्कर्ष निकाला कि महा ऋषि उन के लिए तीन निर्देश छोड़ गए हैं। (1) व्यास के ब्रह्म सूत्र का विशिष्टद्वैत भाष्य तैयार करना। क्योंकि विशिष्टद्वैत दर्शन शिष्यों को अभी तक मौखिक पढ़ाया जाता था। (2) विष्णु पुराण के रचयिता मुनि पाराशर का नाम प्रसिद्ध करना। और (3) संत सद गोप को भी अमरत्व प्रदान करना। रामानुज अत्यधिक द्रवित हो गए और उन्होने आचार्य का अंतिम संस्कार करने से पहले उन के निर्देश पालन करने की शपथ ली। आश्चर्य की बात थी कि जैसे जैसे रामानुज ने एक एक निर्देश पालन करने की शपथ ली उसी क्रम में ही उन के हाथ की उँगलियाँ सीधी होती चली गई।

 

रामानुज श्रीरंगम मठ के अध्यक्ष होने के बाद भी यही समझते रहे कि उन की शिक्षा अभी अधूरी है । वे तिरुकोत्तित्यूर के संत नाम्बि के पास आठ अक्षरों के मंत्र ‘औम नमो नारायण’ की दीक्षा लेने गए । नाम्बि इस के लिए तैयार नहीं थे। कहा जाता है कि रामानुज ने श्रीरंगम से मदुरै तक की इसी काम के लिए 18 बार पैदल यात्रा की, आचार्य नाम्बि से दीक्षा देने की प्रार्थना की और हर बार आचार्य ने उन्हें लौटा दिया। अंत में रामानुज की ज़िद्द देख कर आचार्य दीक्षा देने के लिए तैयार हुये लेकिन शर्त लगा दी – ‘रामानुज यह मंत्र किसी और को नहीं देंगे। यह सिर्फ इन्हीं के लिए है।‘ रामानुज मान गए और दीक्षा ली। समय रहते रामानुज ने देखा कि मंत्र बहुत ही प्रभावशाली और उपयोगी है। उन्होने देखा कि समाज में हर व्यक्ति दुःखी है। किसी न किसी समस्या से ग्रस्त है। इन के दुखों को दूर करने का एक ही उपाय है – इन्हें सद पथ दिखाना, अच्छे जीवन के बारे में समझाना।

 

इन्होंने जन साधारण को समझाना शुरू किया और सभी से इस मंत्र का पाठ करने को कहा । यह एक प्रकार से गुरु के निर्देश का उल्लंघन था। लेकिन उन कि मान्यता थी कि जन कल्याण के लिए ऐसा करना समाज की आवश्यकता है । इस से आचार्य नाम्बि नाराज हो गए। रामानुज ने आचार्य से विनती की कि “गुरुदेव आप मुझे जो चाहें दंड दें, मुझे स्वीकार है परंतु यदि आप के बताए मंत्र से लाखों लोगों के दुखों का निस्तारण हो सकता है तो मैं आप का दंड बार बार स्वीकार कर सकता हूँ। गुरु जी मैं मंत्र लेते समय मन ही मन आप को स्मरण करता हूँ , नमन करता हूँ और आप को धन्यवाद देता हूँ। ये जितने भी लोग इस से लाभान्वित होते हैं सब आप के ऋणी हैं।“ यह सुन कर आचार्य नाम्बि प्रसन्न हुए और रामानुज को आशीर्वाद दिया। आचार्य नाम्बि गोष्ठी पूर्ण के नाम से भी प्रसिद्ध थे।

 

इस समय तक रामानुज कि गिनती प्रसिद्ध आचार्यों में होने लगी थी। उन्होने ‘श्री भाष्य’ के नाम से ब्रह्म सूत्र की व्याख्या लिखी। इस के अतिरिक्त इन्होंने ‘वेदान्त सार’, ‘वेदान्त संग्रह’ ‘वेदान्त दीप’ ‘शरणागत गद्य’ ‘श्री रंग गद्य’ ‘श्री वैकुंठ ग्रंथ’ और ‘नित्य ग्रंथ’ की रचना की। वेदान्त के निर्गुण, निराकार, ब्रह्म को सगुण, साकार, भक्तों का पालन हार, विश्व का नियंता, और नियामक बना दिया।

 

रामानुज ब्राह्मण धर्म और आलवार दोनों ही परम्पराओं के प्रति आस्थावान थे। दोनों के तत्वों को एकाकार करके ही उन्होने विशिष्ट मार्ग का रास्ता दिखाया। उन की सबसे बड़ी देन है – ज्ञान, भक्ति और कर्म में समन्वय स्थापित करना। इन सब में भक्ति का स्थान सर्वोच्च है। ईश्वर के सगुण रूप को प्रस्तुत कर समता, स्वतन्त्रता और पवित्रता का उपदेश दिया। लगभग 400 ई पू बोधायन ने ब्रह्म सूत्र की व्याख्या की थी। उसी को आधार मान कर रामानुज ने ‘श्री भाष्य’ के नाम से ब्रह्म सूत्र का प्रतिपादन किया। इन की वैष्णव शाखा ‘श्री संप्रदाय’ के नाम से प्रसिद्ध हुयी।

 

भक्ति मार्ग के प्रचार प्रसार के लिए रामानुज ने पूरे देश की यात्रा की। विशेष रूप से काशी, कश्मीर और बदरी नाथ आदि सभी धार्मिक स्थलों की यात्रा की। लौटते समय तिरुपति गए। वहाँ उन्होने देखा कि शैव और वैष्णव मतावलंबी परस्पर झगड़ रहे हैं। वहाँ रहकर इन्होंने इन झगड़ो को समाप्त किया। दक्षिण भारत के सभी धार्मिक स्थलों पर होते हुए श्रीरंगम पहुँचे और स्थायी रूप से वहीं बस गए। वहाँ रह कर वैष्णव दर्शन पर अनेक पुस्तकें लिखी। उन्होने लाखों लोगों को भक्ति मार्ग में दीक्षित किया। राम तीरथों में इन की विशेष भक्ति थी। कहते हैं ये अयोध्या दर्शन के लिए भी गए और चित्रकूट धाम का पुनरुद्धार भी कराया था। ‘श्री भाष्य’ की रचना इसी स्थान पर रह कर की थी।

 

रामानुज ने विशिष्टद्वैत का जो दर्शन प्रस्तुत किया वह शंकराचार्य के द्वैत वाद से भिन्न था । यद्यपि वह कोई नया दर्शन नहीं था। रामानुज ने कहीं ऐसा कहा भी नहीं कि वे कोई नया मौलिक दर्शन दे रहे हैं। वास्तव में विशिष्ट अद्वैत में ईश्वर अनुभूति पर बल दिया जाता है। यह पूरा दर्शन भक्ति पर आधारित है। रामानुज ने वेदान्त के ब्रह्म में ईश्वरत्व आरोपित किया । इन का ईश्वर सृष्टि का नियंता, कर्ता, भक्तों का रक्षक और विश्व का पालन हार है। रामानुज ने सिद्ध किया कि भक्ति की शिक्षा केवल तमिल प्रबंध से ही नहीं वरन प्रस्थानत्रयी अर्थात वेदान्त सूत्र, उपनिषद और गीता से भी मिलती है। उनके अनुसार –‘ज्ञान योग की साधना सीमित साधना है। उस में आत्मा इतना ही जान सकती है कि वह शरीर से भिन्न है, किन्तु “मैं परमात्मा का अंश हूँ“- इस अनुभूति तक जाने के लिए आत्मा को प्रेम का मार्ग पकड़ना होगा और भक्ति का आश्रय लेना होगा।

 

कृष्णायः वासुदेवाय: देवकीनंदनाय: चा ।

नंदगोपकुमाराय:  गोविंदाय:   नमोनम: ॥

 

संत रामानुज ने 120 वर्ष की दीर्घायु प्राप्त की

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