लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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trainनोबेल पुरस्कार विजेता साहित्यकार सर विद्यासागर नयपाल के बारे में मैंने सुना है कि वे जहां भी जाते हैं, वहां के आंतरिक भागों की यात्रा प्रायः रेलगाड़ी में एक सामान्य व्यक्ति की तरह करते हैं। उनका मानना है कि आम जनजीवन को जानने और समझने का यह सबसे अच्छा तरीका है। मैं भी इसका समर्थक हूं।

पिछले दिनों हरिद्वार से आते समय रेलगाड़ी के जिस डिब्बे में मैं बैठा, उसमें भीड़ कुछ कम थी। एक महिला अपने दस साल के बच्चे के साथ थी, तो एक सूटधारी सज्जन अपनी युवा पत्नी के साथ। एक सेठ जी के साथ उनका मुनीम भी था। और भी कई लोग थे। ऊपर की बर्थ खाली देख मैं वहां लेट गया।

थकान के कारण काफी देर बाद मेरी आंख खुली। गाड़ी खतौली स्टेशन पर खड़ी थी। लोग आ-जा रहे थे। सामने वाली सीट पर बैठे सज्जन ने उतरते समय अपना सामान नीचे से निकाला, तो एक पांच रु. का चमकता हुआ नया सिक्का उसके साथ रगड़ता हुआ डिब्बे के बीच में आकर स्थापित हो गया। उन सज्जन ने अपनी ऊपर वाली जेब पर हाथ लगाया। शायद आश्वस्त होना चाहते थे कि वह सिक्का उनका है या नहीं ?

उनके चेहरे से साफ पता चल रहा था कि सिक्का उनका नहीं है। फिर भी वे उसे उठाना तो चाहते थे; पर दसवर्षीय बच्चे ने सिक्के को नीचे से निकलता देख लिया था। वे सज्जन मन मार कर रह गये। गाड़ी भी सीटी दे रही थी। अतः उन्होंने अपना सामान उठाया और नीचे उतर गये।

गाड़ी चलने पर मैंने कनखियों से देखा, कई लोगों की निगाह उस सिक्के पर थी; पर उसे उठाकर सबके सामने कोई चोर भी बनना नहीं चाहता था। मुझे बचपन में पढ़ी एक कहानी याद आ गयी, जिसमें किसी संन्यासी के वरदान से एक निर्धन लकड़हारा पशु-पक्षियों की भाषा समझने लगा था। उसने दो पक्षियों की आपसी बातचीत सुनकर राजा की मरणासन्न बेटी के रोग की दवा बतायी और भरपूर पुरस्कार पा लिया था। काश, मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ हो जाये, तो मैं जान सकूं कि सबके मन में क्या विचार चल रहे हैं ?

मैं बर्थ से नीचे उतरा, तो मेरा सिर पंखे से टकरा गया। इस टक्कर से मुझे लगा मानो मुझे कुछ दिव्य शक्तियां मिल गयी हैं। मुझे कुछ हल्की-हल्की आवाजें सुनायी देने लगीं। ऐसा लगा कि इस सिक्के को लेकर लोगों के मन, बुद्धि और हृदय में संघर्ष हो रहा है। मैंने अपना ध्यान उस ओर लगा लिया। पहली आवाज सेठ जी की थी। वे अपनी अन्तरात्मा से बात कर रहे थे।

– क्यों, मैं यह सिक्का उठा लूं ?

– छिः-छिः, इतने बड़े सेठ होकर पांच रु. के सिक्के पर निगाह खराब कर रहे हो ?

– यह सिक्का नहीं, साक्षात लक्ष्मी है; और लक्ष्मी सबके पांवों में ठोकर खाये, यह तो उसका अपमान है।

– अपमान की बात तुमने भली कही; पर किसी और की लक्ष्मी को उठाना चोरी नहीं होगी ?

– पर मेरा मन नहीं मान रहा।

– तो फिर पूछ क्यों रहे हो ? जो मर्जी हो, वह करो।

इतना कहकर अन्तरात्मा चुप हो गयी। सेठ ने चारों ओर देखा। सब अपने आप में मग्न थे; पर वह बच्चा, जिसने सिक्का नीचे से निकलते हुए देखा था, लगातार उनकी ओर ही देख रहा था। सेठ मन मारकर चुपचाप ऊंघने लगा।

थोड़ी देर बाद एक दूसरी आवाज सुनायी दी। अब मुनीम जी अपनी अंतरात्मा से पूछ रहे थे।

– क्योेें, मैं यह सिक्का उठा लूं ?

– हां-हां; उठा लो। सेठ जी के हिसाब में गड़बड़ करते समय मुझसे पूछते हो क्या, जो अब पूछ रहे हो ?

– पर गड़बड़ करना तो सेठ जी ने ही सिखाया है। यदि में दो नंबर का हिसाब बनाकर उनके एक लाख रु. बचा देता हूं, तो दस हजार अपने लिए निकालने में क्या बुरा है ?

– पर उस दिन छोटा मुनीम जब पांच सौ रु. घर ले जाता हुआ रंगे हाथ पकड़ा गया था, तब तो तुम बहुत बढ़-चढ़कर आदर्श बघार रहे थे ? उसके भी तो बाल-बच्चे हैं।

– तुम बात को समझा करो। चोरी करना बुरा नहीं है; पर चोरी करते हुए पकड़े जाना बुरा है। यदि मैं उस दिन उसका साथ देता, तो सेठ जी को मुझ पर भी शक हो जाता।

– तो सिक्का उठा लो। यहां तो तुम्हारी चोरी नहीं पकड़ी जाएगी। कोई देख भी नहीं रहा है।

– देख क्यों नही रहा ? उस बच्चे की निगाह सिक्के की तरफ ही है। उसे पता है कि वह सिक्का मेरा नहीं है।

– तो फिर तुम भी सेठ जी की तरह आंख मंूद लो। क्यों अपने साथ मुझे भी परेशान कर रहे हो ?

अन्तरात्मा की बात मानकर मुनीम जी झपकी लेने लगे। मैंने समय काटने के लिए एक पत्रिका खोल ली; पर मेरा मन उस सिक्के के बारे में हो रही क्रिया-प्रतिक्रिया जानने का इच्छुक था। अबकी बार सूटधारी सज्जन की बारी थी; पर वे अपनी अन्तरात्मा से नहीं, अपितु पत्नी से बात कर रहे थे।

– देखो, पांच रु. का सिक्का बीच में पड़ा है ?

– हां, न जाने किसका है। काफी देर से पड़ा है।

– मन कर रहा है, मैं उसे उठा लूं।

– क्या करोगे उठाकर। पड़ा रहने दो।

– कोई तो उठाएगा ही। हम उठा लें, तो अगले स्टेशन पर चाय के साथ बिस्कुट भी ले लेंगे। वरना सूखी चाय पीनी पड़ेगी।

– लेकिन उस बच्चे का पूरा ध्यान इस तरफ ही है। वह ताक में बैठा है। जिसने भी सिक्का उठाया, वह चिल्ला पड़ेगा। फिर पांच रु. के लिए क्या मन खराब करना ?

– ठीक कहती हो। दो साल पहले तुम्हारे ऊपर मन खराब किया था, उसका फल आज तक भोग रहा हूं। पति ने चुहल किया।

– हटो, शरारती कहीं के ? पत्नी ने उसके घुटने पर हल्का सा हाथ मारा और हंस पड़ी।

कुछ देर बाद मेरठ आ गया। वहां भी कुछ लोग उतरे और चढ़े। एक लड़का झाड़ू लेकर आया और डिब्बा साफ करने लगा। उसने सिक्का देखकर पूछा कि ये किसका है ? किसी ने जवाब नहीं दिया, तो उसने सिक्का जेब में डाला और झाड़ू कन्धे पर रखकर विजयी सेनापति की तरह नीचे उतर गया।

– विजय कुमार

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3 Comments on "पांच रुपये"

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बी एन गोयल
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बी एन गोयल
एक साधारण स्थिति में मानसिक उलझनों का अच्छा निरूपण किया है . श्री सिंह ने मलेशिया की चर्चा की है – मुझे नौकरी में रहते हुए विभिन्न यूरोपीय और अन्यः देशों में जाने का अवसर मिला लेकिन ऐसी उलझन कहीं नहीं दिखाई दी. अभी भी अमेरिका में हूँ, पार्क में कुछ न कुछ पड़ा दिखाई दे जाता है लेकिन किसी को न उठाने की चिंता और न देखने की. कल ही पार्क में युवा वाली वाल खेल रहे थे – बेंच पर कोई अपना सेल फ़ोन भूल गया – थोड़ी देर बाद आकर वह ले भी गया – उस के… Read more »
बी एन गोयल
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बी एन गोयल

एक भारतीय की मानसिक उलझन का अच्छा निरूपण है. हम सब पाक साफ़ हैं जब तक की हम पकडे नहीं जाते. आर सिंह साब ने मलेशिया की बात कही है – मुझे भी विदेश में – कुछ देशों में जाने और रहने का अनुभव है और अभी मैं अमेरिका में हूँ – यह उलझन वहां नहीं है.

आर.सिंह
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यह वाकया पढ़ कर मुझे अभी पंद्रह बीस दिनों पहले की घटना याद आ गयी.यहाँ इस समय मलेशिया में मैं जहाँ रहता हूँ,वह जंगलों और पहाड़ियों से घिरी हुई एक छोटी सी कॉलोनी है.उसी में एक किनारे क्लब और एक छोटा जिम भी है.जिम मैं अक्सर शाम को जाता रहता हूँ.उस शाम को जब मैं एक्सी साइकिल के पास पहुंचा तो वहां जब उसमे बोतल के लिए बने जगह परअपना चश्मा उतार कर रखने लगा तो देखा किउसमे दस रिङ्गेत(एक रिङ्गेत=१५ रूपये ) का एक नोट पड़ा हुआ है.मैं जिम में उस समय अकेला था,अतः किसी से पूछ भी नहीं… Read more »
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