लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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suicideआत्महत्या एक ऐसा भयंकर लव्ज़ जिसके सुनते ही हमारी आँखों के आगे एक भयानक मंज़र सामने आता है। कोई भी तब नहीं मरता जब वो सबसे हार जाता है, वो तब मौत के आग़ोश में जाता है जब वो खुदसे हार जाता है। कहने को तो ये मनचाही मौत होती है,पर ये एक ऐसी स्थिति है जहाँ हम अनचाहे और अनपेक्षित हालातों का सामना करते हैं। एक खुशनुमा ज़िन्दगी का भयावह और त्रासद अंत। हमें इस धरती पर जन्म लेने में पूरे नौ महीने लगते हैं,और फिर एक गलती से सभी को रोता बिलखता छोड़ जाते हैं। हमें हमेशा यही लगता है कि परेशानियों से भागकर हम उनसे जीत जाएंगे, पर उनसे भागकर हम उनसे बच नहीं सकते। क्या सचमे आज के युग में मनुष्य के पास सहनशक्ति ख़त्म हो गई है।हमारा असंतोषी और असहाय व्यव्यहार ही हमें इतना कुंठित बना रहा है।
आज के वक्त में धैर्य और समझदारी धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है। इस बदलते दौर ने परस्पर संवाद को कमतर किया है, क्या हुआ दुनिया में ये, आत्महत्या करना भी कितना आसान हुआ जा रहा है आजकल,हम मनुष्य पता नहीं क्यों हर समस्या का समाधान सिर्फ आत्महत्या ही समझते है,जब हमें कुछ रास्ता,कुछ उपाय नज़र नहीं आता, जब सब कुछ धुंधला हो जाता है,आँखों के आगे अँधेरा छा जाता है,
तब हमें एक रास्ता नज़र आता है जिसे हम आत्महत्या कहते हैं।
ऐसा लगता है जैसे हमारी आखिरी मंज़िल वही है,वही है जो चीख चीख कर हमें बुलाती है,हम रुख लेते हैं ऐसी राह की तरफ जिसपर हमारे अपनों के रिश्ते-नातों की लाशें बिछी रहती हैं,पर हम अपनी मंज़िल की ओर इतने वशीभूत हो जाते हैं कि हम वापस जाना ही नहीं चाहते,इस ढोंगी,पाखंडी समाज से रुखसत लेना चाहते हैं। हम ये नहीं देखते हैं कि हमसे भी बदतर कई लोगों की ज़िंदगियाँ हैं,और भी कई हैं जिनकी समस्याएं हमसे कहीं अधिक हैं।
पर नहीं हम तो इतने आत्मकेंद्रित होते हैं कि हम चाहते हैं बस एक गहरी नींद में हमेशा हमेशा के लिए सो जाना जहाँ से हमें कोई भी जगा नहीं सकता,कोई उठा नहीं सकता उस नींद में जिसमें हम बेकाबू हो जाते हैं,खो जाते हैं एक ऐसे मतलबी सपने में जहाँ हम अपने अलावा किसी और के बारे में नहीं सोचते हैं,हम नहीं सोचते हैं उनके बारे में जिन्होंने अपना सारा जीवन सिर्फ और सिर्फ हम पर खर्च कर दिया है। अपनी सारी खुशियाँ,सारी कमाई सिर्फ हम पर न्योछावर कर दी है,जिन्होंने अपनी सारी उम्मीदें सिर्फ आपसे बाँध कर रखी हैं। कभी एक वक्त का खाना भी खाया,केवल एक उम्मीद में की बाद में हम उनको खाना खिलाएंगे,पर नहीं हम इतने कमजोर होते हैं,इतने मतलबी होते हैं की हमें अपने अलावा कुछ नज़र नहीं आता,छोटी छोटी बातों पर सिर्फ एक रास्ता नज़र आता है मौत।
आखिर हम क्यों इतने मायूस,इतने बुझ जाते हैं,कि कोई उम्मीद ही नहीं रखते हैं,हम क्यों अपने दिमाग के गर्भाशय में ऐसे नकारात्मक ख़याल पालते हैं,आखिर क्यों हमारा मन हमें कुछ समझाना चाहता है पर हम उसकी एक नहीं सुनते हैं। क्यों हम भूल जाते हैं,कि हम अकेले नहीं है जो मौत की गोद में जा रहे हैं,हम उन्हें भी साथ लेजाते हैं,जो हमारे अपने होते हैं,क्यों कुछ पल या सालों के रिश्तों के लिए हम अरसों के रिश्तों का गला घोंट देते हैं,
आत्महत्या कोई समस्या का समाधान नहीं है बल्कि ये एक ऐसी मानसिक प्रवृति है जो तेज़ी से बढ़ती जा रही है। एक ऐसी बिमारी जिसमे युवा,बुज़ुर्ग और बच्चे सभी ग्रसित हैं। सारी समस्याओं का समाधान हमारे भीतर ही रहता है,बस ज़रूरत है तो थोड़ा आत्मचिंतन करने की। हम हमारी सारी परेशानियों और सारी समस्याओं के ज़िम्मेदार खुद ही होते हैं,तो समाधान भी हमें ही निकालना चाहिए। याद रखना चाहिए कि कोई भी दर्द कोई भी तकलीफ इस ज़िन्दगी से बड़ी नहीं है। माना हर इंसान के जीवन में कई ठोकरें आती हैं,कई उठक पठक आती हैं। एक वक्त आता है जब लगता है सब ख़त्म हो गया है,हम गिर चुके हैं,लंगड़े हो चुके हैं। पर उस वक्त,उस पल हमें उठना चाहिए हमें एक कठोर निर्णय लेना चाहिए,सोचना चाहिए कि ग़लती कहाँ हुई और उस ग़लती, उस समस्या को ख़त्म करने बारे में सोचना चाहिए बजाय जीवन ख़त्म करने के। बस एक बार इतना सोचलें की जो जीवन क़ो ख़त्म करने जा रहे हैं क्या वाकई में इस जीवन में सिर्फ उन्ही का हक़ है। कोई और उनके सुख दुःख में साथी नहीं रहा कोई और जीवन में कभी उनके साथ नहीं रहा,कोई और कभी उनके वयक्तित्व को निखारने में सहयोगी नहीं रहा। जब हम अपनी हर ख़ुशी में अपने लोगों को शामिल करते हैं, तो दुःख में क्यों नहीं,हमें चाहिए कि अपने घनिष्ठ लोगों से,माता पिता से बात करें उन्हें समझाएं कि आप जीवन में चाहते क्या हैं,और कितनी समस्याओं से आप ग्रस्त हैं,बस फिर देखिये किस तरह आपको एक नया रास्ता मिलता है,एक राहत मिलती है। जब एक उजाले की महीन सी रेखा पूरे अँधेरे को काट सकती है,एक चींटी एक हाथी को मार सकती है,सिर्फ एक जलते दिए की उम्मीद में कोई रात भर सर्दी के मौसम में ठन्डे पानी में खड़ा रह सकता है,दलदल में फंस जाने पर बाहर आने लिए हम पूरी कोशिश करते हैं, तो फिर मौत को क्यों उसके वक्त से पहले न्योता देते हैं,जब सब कुछ मुमकिन हो सकता है तो फिर क्या नहीं हो सकता,बस मन में दृढ़ निश्चय और विशवास होना चाहिए फिर हम दुनिया की हर मुसीबत से जीत सकते हैं।
प्रशांत मिश्रा,

 

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