लेखक परिचय

नवनीत कुमार गुप्‍ता

नवनीत कुमार गुप्‍ता

लेखक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन स्वायत्त संगठन 'विज्ञान प्रसार' में प्रॉजेक्ट अधिकारी (एडूसेट) के पद पर कार्यरत हैं तथा वर्ष 2010 में इन्हें ''ग्लोबल वार्मिंग का समाधान गांधीगीरी'' पुस्तक के लिए पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा प्रथम मेदिनी पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।

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नवनीत कुमार गुप्ता 

पिछले दिनों बाघ संरक्षित क्षेत्रों में पर्यटन को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर काफी चर्चा हुई है। कोर्ट के फैसले पर एक तरफ जहां पशु प्रेमी खुश थे तो वहीं पयर्टन के क्षेत्र से जुड़े लोगों में मायूसी दिखी। कई लोगों ने इसे रोजी रोटी छिनने की संज्ञा दी। असल में इस पूरे मसले को समझने से पहले हमें बाघों के महत्व को समझना आवश्‍यक है। बाघ पर्यावरण में मौजूद आहार शृंखला की महत्वपूर्ण कड़ी है। यह पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य का प्रतीक है। बाघों की उपस्थिति किसी भी जंगल के संरक्षण की निशानी होती है। जिस जंगल में बाघ होते हैं वहां ग्रामवासी जंगलों के अंदर कम ही जाते थे जिससे वहां के पेड़ कटने से बच जाते हैं। इस प्रकार यदि बाघ बचे रहेंगे तो जंगल भी बचे रहेंगे। हमारे देश में बाघ हिमालय की ऊंचाई में स्थित जंगलों, मैंग्रोव से आच्छादित तटीय क्षेत्रों, रेगिस्तानी क्षेत्रों और दलदली इलाकों सहित देश के अधिकांश भाग में पाए जाते है। बाघ संरक्षित क्षेत्रों से करीब 350 नदियां निकलती हैं। इस प्रकार बाघ वनों के साथ नदी सहित अनेक जलीय तंत्रों की सुरक्षा की निशानी है। वन्यजीव प्रेमियों की लिए यह अच्छी खबर है कि पिछले कुछ सालों के दौरान बाघों की संख्या में सुधार आया है। वर्ष 2010 में की गई गणना में भारत में बाघों की संख्या 1706 पाई गई है। वर्ष 2008 में इनकी संख्या 1411 की थी। हालांकि उस समय सुंदरवन क्षेत्र में गणना नहीं की गई थी।

बाघ हमारा राष्ट्रीय पशु है जिसे अंग्रेजी में टाइगर और संस्कृत में व्याघ्र कहते हैं। व्याघ्र शब्द का अर्थ है ऐसा जीव जिसमें सूंघने की शक्ति उन्नत हो। भारत में मिलने वाले बाघ को रॉयल बंगाल टाइगर के नाम से भी जाना जाता है। असल में ईस्ट इंडिया कंपनी के शिकारियों की बाघ से पहली मुठभेड़ बंगाल में हुई थी तब से ही इसका नाम रॉयल बंगाल टाइगर प्रचलित हो गया। प्रकृति में सभी जीवों का महत्व नियत है। प्रत्येक जीव की अपनी विशेष भूमिका है। बाघ की भी हमारे पर्यावरण में महत्वपूर्ण भूमिका है। बाघ वैज्ञानिक, आर्थिक, सौन्दर्यपरक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिकी महत्व का जीव है। इसलिए इसका संरक्षण आवश्यक है। लेकिन यह दुर्भाग्य ही है कि भारत में दिनों-दिन बाघों की संख्या कम होती जा रही है। भारत विश्व के 13 उन देशों में शामिल हैं जहां बाघ पाए जाते हैं। परंतु अंधाधुंध शिकार के कारण यह संकटग्रस्त जीवों की श्रेणी में रखा गया है। जंगलों के उजड़ने से बाघों के उपयुक्त प्राकृतिक आवास क्षेत्रों में कमी आई है। जंगलों के समाप्त होने से उन जीवों की संख्या में भी कमी आई जिनका बाघ शिकार किया करते थे। इस प्रकार बाघ के सामने शिकार की समस्या के साथ ही आवास का अभाव भी उसकी कमी का कारण रहा। बढ़ती उपज की चाह के कारण बाघ के प्राकृतिक आवास क्षेत्रों तक खेती का विस्तार हुआ है। हालांकि बाघों की कमी के लिए सर्वाधिक उत्तरदायी कारण उनका अवैध रूप से किया गया शिकार है।

आज सभी को यह समझना होगा कि बाघ सहित अन्य सभी वन्य जीव प्रकृति का अनिवार्य हिस्सा हैं। वनों में वन्य जीव स्वतंत्र रूप से विचरण करते हुए अपना जीवन-यापन करते हैं। इसलिए इन जीवों के लिए जंगल आश्रयदाता हैं। लेकिन मानव द्वारा शहरीकरण, कृषि विस्तार, खनन और औद्योगिक गतिविधियों एवं पर्यटन के चलते इन जीवों के प्राकृतिक आवास स्थलों अर्थात वन क्षेत्रों में भारी कमी की गई है। जिससे अपने निवास स्थल नष्ट या संकुचित होने पर और आहार की कमी के कारण वन्य जीव मानव बस्तियों की ओर निकल जाते हैं। फिर मानव और वन्य जीवों का टकराव होता है। प्राकृतिक आवास स्थलों से की जा रही छेड़छाड़ ने वन्य जीवों को मानव की बस्तियों की ओर रुख करने के लिए मजबूर कर दिया है। वो हमारे घर पर हमला करते हैं या हम उनके घर जाकर बस गए हैं, इस बहस का कोई अंत नहीं हैं। वन पर्यटन सहित अन्य माध्यमों से हमारी आय का अहम स्रोत हैं, और यही वन, वन्य जीवों के आश्रय स्थल भी हैं, इन दोनों परिस्थितियों में तालमेल हमें ही बैठाना होगा। क्योंकि सोचने, समझने और निर्णय लेने की क्षमता प्रकृति ने हमें दी है। अब हमें ही तय करना है कि हमारा भविष्य कैसा हो।

बाघ हमारा राष्ट्रीय पशु होने के कारण राष्ट्रीय गौरव का भी प्रतीक है। इसीलिए बाघों के संरक्षण की ओर प्रत्येक व्यक्ति को ध्यान देना होगा साथ ही सरकार को कुछ ऐसे कड़े नियम बनाने होंगे जिनसे संरक्षित क्षेत्रों में रहने वाले बाघों के संरक्षण में देखी जाने वाली लापरवाही दूर हो सके। बाघ संरक्षित क्षेत्रों में पर्यटन को सोच-समझ कर ही बढ़ावा देना होगा। इसके लिए बाघों की सुविधा, उनके व्यवहार एवं प्रवृत्ति को ध्यान में रखते हुए ऐसे प्रयास करने चाहिए ताकि बाघों को नुकसान न पहुंचे। हमें जीव संरक्षण आदि से जुडे़ मॉडल को आधुनिक युग के विकास के मॉडल के साथ जोड़कर एक बीच का रास्ता चुनना होगा, जिससे फिर एक बार बाघ सहित सभी वन्य जीवों सबको आश्रय और सुकून मिल सके और इस बार हमेशा के लिए। नहीं तो एक दिन आने वाली पीढियां ‘एक था टाइगर’ के रूप में प्रकृति के इस अनमोल प्राणी को याद करेंगी।

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