लेखक परिचय

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

Posted On by &filed under जन-जागरण, समाज.


सुरेश हिन्दुस्थानी

किसी भी देश की प्रगति में प्रतिभा विकास का बहुत बड़ा योगदान रहता है। अगर प्रतिभा का विकास का कोई कार्यक्रम नहीं रहता तो उस देश की प्रगति रुक जाएगी, यह निश्चित है। भारत में आरक्षण की प्रक्रिया प्रतिभा विकास में बहुत बड़ा अवरोधक है। वास्तव में होना यह चाहिए कि जिस प्रकार से हम अपने बच्चों में प्रतिभा विकास करने के कई मार्ग अपनाते हैं, उसी प्रकार से थोड़ा विस्तृत सोचने पर यह बात सामने आती है कि भारत देश भी अपना ही देश है, जो व्यक्ति इस भाव के साथ सोचता है, उसे राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान के लिए उपाय तलाश करते हुए देखा जा सकता है। वर्तमान में हमारी संकुचित सोच के चलते देश में कई प्रकार की समस्याओं का जन्म हुआ है। हम केवल अपने भले के बारे में सोचकर कार्यवाही करते हैं, तब हम अपनी राष्ट्रीय समस्याओं का परित्याग कर देते हैं। आज हम बड़ा क्यों नहीं सोच पा रहे हैं? क्या हमारे सोच का यह संकुचन वास्तव में हमारे देश की प्रगति में बाधक तो नहीं बन रहा, अगर यह सत्य है तो हमें अपने सोच का विस्तार करना चाहिए और अपने देश की समस्याओं के निर्दालन के बारे में सामूहिक रूप से चिन्तन करना चाहिए।

आज हमारे देश की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि हम अपने उत्थान के लिए सरकारी प्रयासों पर निर्भर हो गए हैं। छोटी छोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए हम सरकार से मांग करने लगते हैं। यह निर्भरता ही व्यक्ति को कुछ नहीं करने के लिए ही प्रवृत करती है। आरक्षण का सहारा व्यक्ति और समाज की क्षमताओं को कमजोर ही करती है। जाट समाज ने आंदोलन का मार्ग अपनाकर भले ही अपनी मांगें मनवा ली हों, लेकिन यह कदम उनके समाज को कमजोर करने वाला ही है, जिसका परिणाम देर सवेर उनको दिखाई देगा।

वर्तमान में हरियाणा की राजनीति में जाट आरक्षण का मामला आग की तरह से चला, इस आरक्षण की मांग के आंदोलन के चलते कई स्थानों पर हिंसक घटनाएं भी सामने आईं। इस पर सवाल यह आता है कि क्या आरक्षण मांगने का यह तरीका उचित है? अगर नहीं तो फिर हम और हमारा समाज इस प्रकार के आंदोलनों को करने की ओर प्रवृत क्यों हो रहा है। ऐसे आंदोलनों से हम अपने समाज के अंदर स्वार्थ भावना को विकसित करने का काम कर रहे हैं। ऐसे में यह बात सर्व विदित है कि आरक्षण के सहारे समाज किसी न किसी रूप से कमजोर ही होता है। वास्तव में होना यह चाहिए कि हम अपने समाज के भीतर प्रतिभा विकास के कार्यक्रमों का संचालन करें, जिससे हम समय के साथ अपने कदम बढ़ा सकें।

विश्व के विकसित देशों की बात की जाए तो यह दिखाई देता है कि वहां शैक्षणिक विकास के साथ साथ प्रतिभा विकास के कई कार्यक्रमों का संचालन किया जाता है। वहां किसी भी प्रकार का कोई आरक्षण नहीं है। यह बात सर्वविदित है कि किसी भी समाज को बौद्धिक रूप से कमजोर करना है तो आरक्षण का सहारा दे दीजिए, उसके बाद किसी को भी कुछ करने की जरूरत नहीं है, वह समाज अपने आप ही समय से काफी पीछे रह जाएगा। वर्तमान में हमारे देश में जिस प्रकार का जातिवाद का उभार दिखाई देरहा है, वह देश को कमजोर करने वाला कदम ही है। इसमें सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि हम वसुधैव कुटुम्बकम के भाव को भूलते जा रहे हैं। राष्ट्रीय उत्थान के भाव हमारे मन से गायब होते जा रहे हैं। हमारे देश की राजनीतिक कार्य पद्धति ने हमारे सोच को इतना सीमित कर दिया है कि हम राष्ट्र के बारे में सोच ही नहीं पा रहे हैं। विश्व के किसी भी देश में जहां राष्ट्रीय भाव सर्वोपरि होता है, वहां प्रगति के बारे में कुछ भी करने की आवश्कता नहीं होती, वहां केवल राष्ट्रीय प्रगति ही प्रमुख लक्ष्य होता है, इसके अलावा कुछ भी नहीं। इसके अलावा विश्व के विकसित देशों के व्यक्ति अपनी प्रगति के लिए सरकारी प्रयासों पर निर्भर नहीं रहते। हम भी उस प्रकार के प्रयास कर सकते हैं। और करना भी चाहिए।

आरक्षण आंदोलन के सहारे जो आंदोलन किया गया, उसमें अब राजनीतिक तड़का भी लगता दिखाई दे रहा है। हरियाणा में जाट आरक्षण की मांग और गुजरात में पटेल समाज द्वारा की गई आरक्षण की मांग निश्चित ही राज्य की सरकारों के विरोध में उठाया गया कदम है। इससे पहले राजस्थान में गुर्जर समुदाय ने भी आरक्षण की मांग के चलते पूरे देश के रेल यातायात को बाधित किया था, रेल मार्ग तक उखाड़ दिए थे। आंदोलन का यह तरीका इसलिए भी ठीक नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इससे राष्ट्रीय संपत्ति का नुकसान ही होता है। हम जानते हैं कि देश की जितनी भी सरकारी संपत्ति है, उसकी सुरक्षा का अधिकार जनता का है। इसलिए सीधे तौर यही कहा जाएगा कि उसका नुकसान भी सीधे सीधे जनता का ही नुकसान है।

हरियाणा में जाट समाज के आरक्षण आंदोलन के चलते 50 से अधिक सड़क परिवहन निगम की बसों को आग के हवाले कर दिया, इसके अलावा कई ऐसी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया, जिनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी सीधे तौर पर जनता की भी है, लेकिन वर्तमान में भारत की जनता इन्हीं राष्ट्रीय संपत्तियों को नुकसान पहुंचाकर केवल अपना ही नुकसान कर रही है। इसका खामियाजा आने वाले समय में जनता को भुगतना पड़ेगा। आंदोलन करने वाले लोगों को संभवत: इस बात की जानकारी नहीं होगी कि उन्होंने कैसे पूरे देश को प्रभावित किया है। इस आंदोलन के कारण कई रेलगाडिय़ों का संचालन ठप करना पड़ा, सड़क यातायात बंद हो गया। जरा अनुमान लगाइये कि इससे देश को कितना नुकसान हुआ। देश में इस प्रकार के आंदोलन के कारण भले ही एक समाज को लाभ मिलता हो, लेकिन राष्ट्र का नुकसान तो होता ही है।

एक बात और जातिवाद के उभार के चलते हमारा देश कभी भी प्रगति के मार्ग पर नहीं चल सकता। यह देश को कमजोर ही करेगा। अंग्रेज इस बात को अच्छी तरह से जानते थे कि भारत की जनता जब राष्ट्रीय भाव से सोचने लगेगी, तब भारत अपने आप ही प्रगति के मार्ग पर बढ़ेगा, इसलिए अंग्रेजों ने भारत में फूट डालो की नीति अपनाई, उन्होंने समाज में फूट डालकर भारतीय समाज को कमजोर किया। हम आज भी इस बात को नहीं समझ पा रहे कि समाज की फूट ही भारत की कमजोरी का कारण है। मेरा मानना है कि भारत में जिस दिन यह जातिवाद का उभार समाप्त हो जाएगा, उस दिन भारत को प्रगति करने से कोई ताकत नहीं रोक सकती।

देश को समृद्ध करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कई प्रकार के कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं, लेकिन वे कार्यक्रम पूरी तरह से सफल नहीं हो पाते हैं। उसके पीछे एक ही कारण माना जा सकता है कि वहां का समाज इस प्रकार के कार्यक्रमों में अपनी सहभागिता नहीं कर पाता, अगर समाज का सहभाग मिल जाए तो यह राष्ट्रीय कार्यक्रम निश्चित ही सफल होंगे। केन्द्र सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान का सूत्रपात किया। सरकारी स्तर पूरे प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन आम जनता स्वाथी मानसिकता के चलते इस प्रकार के देश हित वाले कार्यों में अपनी भागीदारी नहीं कर रही, जिसके कारण ऐसे कार्यक्रम असफल हो रहे हैं। इसी प्रकार केन्द्र सरकार का बौद्धिक प्रतिभा के विकास के लिए भी तमाम प्रकार के कार्यक्रम किए जा रहे हैं, लेकिन उनके प्रति जनता का लगाव नहीं है। अगर समाज का हर वर्ग सरकार के प्रयासों में सम्पूर्ण भागीदारी करे तो समाज की कई समस्याएं स्वत: ही समाप्त हो जाएंगी।

आरक्षण के सहारे हम यह सोचें कि समाज में कौशल का विकास हो जाएगा तो यह सोच कहीं न कहीं गलत ही सिद्ध होगी। क्योंकि यह सत्य है कि आरक्षण के सहारे जो नौकरी प्राप्त होगी, वह सामान्य स्तर की नौकरी पाने वाले की प्रतिभा के समक्ष भले ही पद के मामले में समान हो, लेकिन बौद्धिक प्रतिभा के मामले में पीछे ही रहेगी। इसलिए समाज के ठेकेदारों को वास्तव में ही अपने समाज का उत्थान करना है तो उसे आरक्षण का सहारा लेना छोडऩा होगा और समय के साथ चलकर अपने समाज को स्थापित करने की दिशा में अपने कार्यों को संचालित करना होगा। यही राष्ट्रीय आवश्यकता है।

सुरेश हिन्दुस्थानी

 

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz