लेखक परिचय

अरविंद जयतिलक

अरविंद जयतिलक

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर इनके लेख प्रकाशित होते रहते हैं।

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Zakir-Naikअरविंद जयतिलक
बांग्लादेश की राजधानी ढाका में हुए आतंकी हमले के लिए जिम्मेदार गुनाहगारों में से दो आतंकियों का इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन के संस्थापक डॉ जाकिर नाईक के विचारों से प्रभावित होने के खुलासे के बाद स्पष्ट है कि देश में ऐसे जहरीले तत्वों की कमी नहीं जो अपने भड़काऊ तकरीरों से युवाओं को आतंकी बनने की प्रेरणा दे रहे है। ऐसे जहरीले तत्वों को सियासतदानों का संरक्षण और शाबाशी भी हासिल है जिसके बरक्स वह आतंक को बढ़ावा दे रहे हैं। यह उचित है कि भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने जहरीले तकरीरबाज डॉ जाकिर नाईक को राडार पर ले लिया है और उसके जहरीले तकरीरों की जांच-पड़ताल शुरु कर दी है। ऐसा इसलिए भी आवश्यक है कि ढाका हमले में मारे गए 6 आतंकियों में दो आतंकी निब्रास इस्लाम और रोहन इम्तियाज डॉ जाकिर नाईक के तकरीरों से प्रभावित रहे हैं। भले ही इस समय डॉ जाकिर नाईक के आतंकी गतिविधियों में शामिल होने का पुख्ता प्रमाण उपलब्ध न हो लेकिन इस तथ्य की अनदेखी नहीं हो सकती कि उनके तकरीरों से मुस्लिम युवकों में आतंकी बनने का आकर्षण पैदा हो रहा है। उसका एक प्रमाण है रोहन इम्तियाज द्वारा पिछले वर्ष डॉ जाकिर की तकरीरों को फेसबुक पर शेयर किया जाना। डॉ जाकिर का यह तर्क उचित नहीं कि फेसबुक पर उसके एक करोड़ से अधिक फाॅलोवर हैं और उनमें से कुछ फाॅलोवर आतंकी हैं तो उन्हें हैरानी नहीं है। बेशक इससे किसी को ऐतराज नहीं कि उनके करोड़ों फाॅलोवर हैं। लेकिन जब कोई फाॅलोवर उनके तकरीरों से प्रभावित होकर बंदूक उठाकर मानवता का दहन करेगा तो फिर उनके तकरीरों पर तो सवाल उठेगा ही। तकरीर मानवता की भलाई के लिए होता है न कि लोगों को आतंकी बनाने के लिए। दुर्भाग्यपूर्ण है कि डॉ जाकिर कुछ ऐसा ही कर रहे हैं और अब सवालों के घेरे में हैं तो फाॅलोवरों की संख्या का बहाना बना रहे हैं। बेंगलुरु का मेंहदी मसूर भी तकरीर करता था। उसके भी काफी फाॅलोवर थे। लेकिन जब खुलासा हुआ तो पता चला कि वह आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट का समर्थक था। वह सीरिया जा रहे इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों को बार्डर पार करने की जानकारी अपने ट्विटर हैंडल से ट्वीट करता था। ऐसा भी नहीं है कि डॉ जाकिर का आतंकी कनेक्शन पहली बार रोशनी में आया हो। 7/11 आतंकी धमाके में शामिल एक आरोपी का संबंध रिसर्च फाउंडेशन से उजागर हो चुका है। 2003 के मुलंुड ट्रेन ब्लास्ट मामले में वह स्वयं जांच एजेंसियों के राडार पर आ चुके हैं। अब जब एक बार फिर वे चक्रव्यूह में हैं तो अपनी गिरफ्तारी और कानून की मार से बचने के लिए कुतर्क गढ़ रहे हैं। सफाई दे रहे हैं कि किसी भी आतंकी घटना में उनकी संलिप्तता नहीं है और न ही उनके खिलाफ कोई सबूत है। उनके समर्थकों का भी दावा है कि डॉ जाकिर का इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन सभी धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन का केंद्र है न कि आतंकी बनाने का अड्डा। मान भी लिया जाए कि डॉ जाकिर का आतंकियों से कुछ भी लेना-देना नहीं और वे महज इस्लामिक उपदेशक भर हैं तब भी उन्हें और उनके हिमायतगारों को स्पष्ट करना होगा कि फिर वे अपनी तकरीरों में तालिबान और ओसाबा बिन लादेन की तारीफ क्यों करते हैं? वह दुनिया के सभी मुसलमानों को आतंकी बनने की मशविरा क्यों देते हैं? 2010 में मुंबई में एक प्रेस कांफ्रेंस में वे कहते सुने गए थे कि ‘मैं सारे मुस्लिमों से कहता हूं कि हर मुसलमान को आतंकी होना चाहिए, आतंकी मतलब ऐसा आदमी जो भय फैलाए, जब एक डकैत पुलिस वाले को देखता है तो आतंकित होता है तब डकैत के लिए पुलिसवाला आतंकी है, इस संदर्भ में हर डकैत के लिए एक मुस्लिम को आतंकी होना चाहिए।’ क्या यह भड़काऊ तकरीर रेखांकित नहीं करता है कि जाकिर की मंशा मुसलमानों को आतंकी बनाना है? अगर डॉ जाकिर सचमुच इस्लामिक व्याखाता हैं तो फिर उन पर यूके, कनाडा और मलेशिया समेत पांच देश बैन क्यों लगा रखे हैं? मुंबई पुलिस उन्हें शहर में कांफ्रेंस करने पर पाबंदी क्यों लगायी है? क्या इन पाबंदियों से जाहिर नहीं होता है कि वह अपनी तकरीरों की आड़ लेकर मुस्लिम युवाओं को गुमराह करने और आतंकी बनने के लिए प्रेरित कर रहे हैं? जो व्यक्ति दूसरे धर्म और उसकी पूजा पद्धति को हिकारत भरी नजर से देखता है और तर्क गढ़ता है कि सऊदी अरब में मंदिर नहीं बनना चाहिए वह किस तरह मानवता के लिए पे्ररणा का संदेशवाहक बन सकता है? उस पर कैसे विश्वास किया जाए कि वह आतंकियों और कट्टरपंथियों की मदद नहीं करता होगा? यह तथ्य है डॉ जाकिर नाईक न सिर्फ दूसरे धर्म की बुराईं करते हैं बल्कि गैर-मुस्लिम धर्मगुरुओं को अपमानित भी करते हैं। दुनिया ने देखा कि किस तरह उन्होंने आर्ट आॅफ लिविंग गुरु श्री श्री रविशंकर को अपमानित किया। पहले तो उन्होंने अपने एक कार्यक्रम में श्री श्री रविशंकर को आमंत्रित किया और फिर उन्हें अपने तर्कों से अनादर किया। एक अतिथि का इस तरह अपमान क्या रेखांकित नहीं करता है कि डॉ जाकिर अन्य धर्मों के प्रति असहिष्णु है? सच तो यह है कि डॉ जाकिर कोई उपदेशक नहीं बल्कि एक कट्टरवादी विचारधारा का नुमाइंदे हैं जो अपनी तकरीरों से दुनिया को शरीयत के हिसाब से हांकने का सपना देखते हैं। इस्लाम को सर्वश्रेष्ठ धर्म बताते हैं एवं अन्य धर्मों की बुराई करते हैं। डॉ जाकिर वहीं शख्स है जो कभी दक्षिण मुंबई के भिंडी बाजार की गलियों में एक छोटे से कबाड़खाने में रहते थे। आज जब उन्हें भारत समेत दुनिया भर से भारी मात्रा में जकात के रुप में दान मिल रहा है तो उपदेशक बन बैठे हैं। यह किसी से छिपा नहीं है कि वह उस समय मकबूल हुए जब वह सऊदी राजघराने के वहाबी-सलाफी विचारधारा के निकट आए। यह वह विचारधारा है जो नबियों और सूफियों को नहीं मानता है। इस विचारधारा के लोग दरगाहों पर जाना, चादर व प्रसाद चढ़ाना इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतों के विरुद्ध है। डॉ जाकिर भी दरगाहों और मजारों को उखाड़ फेंकने की सलाहियत देते हैं। गौर कीजिए तो जैश-ए-मोहम्मद, लश्करे तैयबा, स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट आॅफ इंडिया यानी सिमी, अल बद्र, अल जिहाद, हरकत-उल-अंसार इत्यादि संगठनों के आतंकी और उनके सरगना सभी वहाबी समुदाय के ही हैं। यह वहीं विचारधारा है जो मुस्लिम युवाओं को आतंकी बनने की प्रेरणा देता है। इस विचारधारा का केंद्र सऊदी अरब में नज्द नामक शहर में है। सऊदी अरब दुनिया भर में पसरे ऐसे लोगों और उनके संगठनों को आर्थिक मदद देता है। गौरतलब है कि 2015 में सऊदी के किंग सलमान बिन अब्दुल अजीज ने इसी विचारधारा के प्रचार-प्रसार के लिए डॉ जाकिर को किंग फैजल इंटरनेशनल प्राइज फाॅर सर्विस आॅफ इस्लाम से नवाजा। इस पुरस्कार के तहत डॉ जाकिर को दो लाख डाॅलर और एक गोल्ड मेडल मिला। इस पैसे ने उनका जीवन बदल दिया। वह कबाड़खाने से निकलकर मझगांव के आलीशान भवन में रहने लगे। उस पैसे से उन्होंने मझगांव में इस्लामिक इंटरनेशनल स्कूल की स्थापना की जिसमें दूसरे धर्मों की बुराइयों की शिक्षा दी जाती है और इस्लाम को सबसे महान धर्म बताया जाता है। इस स्कूल के शिक्षक हिंदू देवी-देवताओं को अपमानित कर मुस्लिम युवाओं का दिमाग बदलने का काम करते हैं। यह उसी तरह का कृत्य है जैसे आतंकी संगठन अपने ट्रेनिंग सेंटरों में गुमराह मुस्लिम युवाओं के दिमाग में आतंकी बनने का जहर भरते हैं। ऐसे में बेहतर होगा कि जांच एजेंसियां जाकिर की जन्मकुंडली तलाशें और इस बात की पड़ताल करें कि कहीं उन्हें जकात के तौर मिल रहा दान देश विरोधी तत्वों के काम तो नहीं आ रहा? यह आशंका इसलिए कि देश में ऐसे संगठनों की कमी नहीं जो जनसेवा के नाम पर जकात हासिल करते हैं और उससे देश को तोड़ने का काम करते हैं। क्या पता कुछ ऐसा ही कृत्य इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन द्वारा भी किया जा रहा हो। अच्छी बात है कि भारत के कुछ इस्लामिक संगठन डॉ जाकिर का भारत में तकरीर पर बैन लगाने की मांग कर रहे हैं। उन्हें आशंका है कि डॉ जाकिर के संबंध आतंकियों से भी हो सकते हैं।

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