लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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              thQVKTI3SOबिहार के गया जिले के फतेहपुर विकासखंड की कठौतिया केवाल पंचायत बिहार और झारखंड राज्य की सीमा पर बसी हुई है। इस पंचायत के गिद्धनी गांव में 9 आदिवासी टोलों में 990 आदिवासी परिवार रहते हैं। गिद्धनी गांव और वहां के आदिवासियों की फरियाद सुनने वाला कोई नहीं है। किसी सरकार या सियासी दल के नेताओं ने आज तक उनकी बदतर हालत की ओर ध्यान ही नहीं दिया, जिसका नतीजा यह है कि आदिवासी किसी जंगली की तरह जिंदगी गुजार रहे हैं।
साल 1947 के बाद से ले कर अब तक केंद्र और सूबे में कई सरकारें आईं और चली गईं, मगर किसी ने जंगल में रहने वाले आदिवासियों की सुध नहीं ली। आज भी इन आदिवासियों को भारतीय नागरिक होने का किसी तरह का प्रमाण पत्र ही नहीं मिला है। न तो उनका मतदाता पहचान पत्र है और न ही राषनकार्ड या गरीबी रेखा कार्ड है। इससे टोले के आदिवासियों को वोट देने का हक ही नहीं है। जब वे वोट देने के लायक नहीं हैं, तो नेताओं के लिए किसी काम के नहीं हैं।
सरकार से मिलने वाली नागरिक सुविधाओं के बारे में आदिवासियों को कुछ भी जानकारी नहीं है। वे जहां-तहां गड्ढे खोद कर उनमें बारिष के पानी को जमा करते हैं और उसी गंदे पानी को पीने और खाना बनाने के काम में इस्तेमाल करते हैं। उस गड्ढे में जमा पानी को परीक्षण कराया गया, तो वह पानी इंसानों की सेहत के लिए काफी खतरनाक करार दिया गया। सरकारी फाइलों में आदिवासियों के इस टोले का न नाम और न ही कोई पहचान है। इस वजह से गुरपासीनी पहाड़ की तलहटी में पसरे गुरपासीनी जंगल में रहने वाले आदिवासी आदिम जाति की तरह जंगली जानवरांे की तरह जिंदगी जी रहे हैं।
भोले-भाले आदिवासी बगैर किसी सरकारी मदद के खुद ही अपनी तस्वीर संवारने में लगे हुए हैं। उन टोलांे के गरीब मुंडा आदिवासियों ने गुरपासीनी पहाड़ की तलहटी के घने जंगल को अपना ठिकाना बना रखा है। उन्होंने जल, जंगल और जमीन के साथ गहरा रिष्ता बना लिया है। उनका इलाका तकरीबन ढाई लाख एकड़ वनभूमि पर फैला हुआ है। बगैर किसी सरकारी मदद के अपनी मेहनत और खून- पसीने के बूते आदिवासी मिट्टी को जोत-खोद कर आबाद करने में लगे हुए हैं। पुरूष और महिलाएं मिल कर खेती करते हैं और अब वे मक्का, टमाटर, सब्जी वगैरह पैदा कर अपना और पूरे गांव का पेट पालने की जद्दोजेहद में लगे हुए हैं।
आदिवासियों के नाम पर अलग बने झारखंड राज्य में आदिवासी मुख्यमंत्रियों ने ही आदिवासियों को तहस-नहस करके रख दिया है, जिसका नतीजा यह है कि आदिवासी अपने ही नाम पर बने राज्य को छोड़ कर भाग रहे हैं। आजादी के बाद से अब तक तकरीबन चालीस लाख से ज्यादा गरीब आदिवासी राज्य से भाग चुके हैं। देष की कुल खनिज संपदा का 40 फीसदी झारखंड मंे होने के बाद भी सूबे और आदिवासियों की ही तरक्की नहीं हो सकी है।
हालत यह है कि उद्योग लगाने के नाम पर आदिवासियों को हटाया जाता है, पर न तो उन्हें मुआवजा मिलता है और न ही उद्योग लग पा रहे हैं। हर सरकार नई पुनर्वास नीति बनाने का ऐलान कर आदिवासियों के जख्मों को कुरेदती ही रही है। तकरीबन तीन लाख आदिवासी जमीन से बेदखल होने का दर्द झेलने को मजबूर हैं। आदिवासियों की तरक्की के नाम पर झारखंड राज्य बने पंद्रह साल हो गए, पर अब तक न तो कोई औद्योगिक नीति बनी और न ही विस्थापन और पुनर्वास नीति ही सही आकार ले सकी।
रोज नए खदानों में काम चालू होता रहा और आदिवासियों को जंगल और जमीन छोड़ने के लिए मजबूर किया जाता रहा। बड़े बांधों और सिंचाई की योजनाओं की वजह से भी ऐसा हुआ। 70 फीसदी आदिवासी पुनर्वास के लिए दर-दर भटक रहे हैं, जिनकी सुनने वाला कहीं कोई नहीं है। झारखंड में आदिवासियों के लिए छोटा नागपुर काष्तकारी अधिनियम-1908, संथाल परगना काष्तकारी अधिनियम-1949 और बिहार अनुसूचित क्षेत्र अधिनियम-1969 जैसे कानून बने हुए हैं और लागू भी हैं, लेकिन ये कानून काफी पुराने हो चुके हैं और आज की तारीख में बेकार साबित हो रहे हैं।
सरकार आदिवासियों को बुनियादी सुविधा देने से भी कन्नी काट रही है, जिससे आदिवासियों की हालत खराब ही होती जा रही है। आदिवासी मेहनत कर अपना पेट तो भर लेते हैं, पर उनकी अगली पीढ़ी के बच्चे भी स्कूल, अस्पताल, बेहतर खान-पान की कमी में जंगली बनने के लिए मजबूर होंगे।
नरेन्द्र देवांगन

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