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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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प्रदीप चन्‍द्र पाण्‍डेय

अमर सिंह इन दिनों उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के जनपदों की यात्रा कर लोगों को उनके दर्द और अभाव का आभास करा रहें हैं। यह यात्रा पूर्वांचल की जनता के लिये कितना लाभदायक होगी यह तो नहीं पता किन्तु अमर सिंह को एक मुद्दा तो मिल ही गया है। अवसरवादी राजनीति के कई चेहरे हैं। वे लोगों की भावनाओं को भड़काकर अपना उल्लू सीधा करते रहे हैं। जिस अमर सिंह को समाजवादी पार्टी की सरकार में पूर्वाचल का दर्द नजर नहीं आया और वे पश्चिमी जनपदों के विकास में लगे रहे वे आजकल पूर्वांचल राज्य के नाम पर घड़ियाली आंसू बहा रहें हैं। जब अवसर था तो अपनी मातृभूमि का दर्द नहीं छलका और अब जबकि सपा मुखिया से उनके रिश्ते तल्ख हो गये हैं तो वे पूर्वांचल की गरीबी, अभाव, उद्योगहीनता, पलायन की मजबूरियों का विलाप कर इस अंचल को सपनों का सब्जबाग परोस रहें हैं। राज्यों का विभाजन ही यदि विकास का पैमाना होता तो शायद छोटे राज्य प्रगति के नये आयाम बना चुके होते। कम से कम अमर सिंह और उनके अनुयाइयों को यह स्मरण तो होगा ही कि जिस पूर्वांचल राज्य के गठन को लेकर वे सपने बांट रहें हैं उसी पूर्वांचल में हर 10 किलोमीटर पर राजे रजवाडों ने शासन किया। कभी बस्ती के राजा, नगर, महसो, बांसी, जैसे राजा रहे। उनकी सीमायें बहुत छोटी थी। एक समय अवश्य ऐसा रहा होगा जब कुंआनों के उस पार आना जाना एक राज्य से दूसरे राज्य की यात्रा रही होगी। सवाल ये है कि जब छोटे-छोटे हिस्सोें में विभक्त राजे रजवाडों के शासन काल में विकास नहीं हुआ, लोगों पर तरह-तरह के जुल्म ढाये गये तो इस बात की क्या गारन्टी है कि यदि पूर्वांचल राज्य बन भी जाय तो समस्याओं का समाधान हो जायेगा।

कटु यर्थाथ तो ये है कि कुछ नेता जन भावनाओं को आगे बढने की सीढी के रूप में इस्तेमाल करते हैं और जब उनका लक्ष्य पूरा हो जाता है तो मौन साध लेते हैं। अमर सिंह के पास इस बात का जबाब नही है कि जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी और वे निर्णायक भूमिका में थे, आये दिन उद्योगपतियों के साथ बैठककर प्रदेश के औद्योगिक विकास का खाका खींच रहे थे उस समय उन्हे इस अंचल के पिछड़ेपन का आभास क्यों नहीं हुआ। सच तो ये है कि अन्य नेताओं की तरह अमर सिंह भी पूर्वांचल के पिछड़ेपन के लिये सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं और उन्हें विलाप करने का कोई हक नही बनता।

कहते हैं सत्ता तो भ्रष्ट होती ही है और शासक का कोई चरित्र नहीं होता। अमर सिंह आज के चालू राजनीति में उससे भिन्न हैं ऐसा शायद अमर सिंह ही खुद को मानते हों। किसी कवि ही यह पंक्तियों सटीक है ” टुकड़े-टुकड़े, टुकड़े-टुकडे, जितने तन-मन, उतने टुकड़े, टुकडों से ही पूंछ रहा हूं। मेरा हिन्दुस्तान कहा है।” भारत विभाजन के बाद पटेल जी जैसे लोग आगे न आये होते तो राजे रजवाडों से जमीने खाली कराना और आम आदमी को हिस्सेदारी कराना आसान काम नहीं था। देश की सरहद यदि आज जम्मू-कश्मीर से कन्या कुमारी तक फैला तो इसलिये कि हमारी सोच बड़ी थी। यदि 1947 में अमर सिंह जैसे राजनीतिज्ञ रहे होते तो शायद देश को आजादी ही न मिलती। यदि घडियाली आंसू के सिवा वे पूर्वांचल के लिये कुछ करना चाहते हैं तो गोरखपुर का बन्द कारखाना चलाने, बुनकरों में विश्वास पैदाकर उन्हें अवसर दिलाने, लघु उद्योगों की स्थापना कराने, कृ षि आधारित विकास की पहल करे और अपने उद्योग क्षेत्र के बन्धु बान्धुओं को प्रेरित करें कि वे पूर्वांचल में कल कारखाना लगाये। किन्तु शायद वे ऐसा नहीं करेंगे। उन्हें तो मुद्दा चाहिये जिस पर पांव रखकर वे सपा नेतृत्व को चिढा सके। यदि पूर्वांचल पिछड़ा है, बाढ, बीमारी, उद्योगहीनता, बेरोजगारी की गिरफ्त में है तो इसके लिये अमर सिंह जैसे जन प्रतिनिधि भी सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं जिन्होने लोगों से वोट तो लिया किन्तु वे किसी और के होकर रह गये। विभाजन किसी समस्या का समाधान नहीं है। पूर्वांचल की जनता को भी चाहिये कि वे ऐसे राजनीतिक षड़यंत्रों से सर्तक रहे जो लोग राजनीति की आड में हमारी गरीबी, अभाव, उपेक्षा और संत्रास को सियासत की बड़ी मंण्डियों में बेच देने के लिये माहौल तैयार कर रहें हैं। कितना अच्छा हो कि प्रकृति अमर सिंह को सद्बुध्दि दे कि वे पूर्वांचल की भावनाओं को भडकाने की जगह कुछ कर दिखायें, फिर विलाप करें।

(लेखक दैनिक भारतीय बस्ती के प्रभारी सम्पादक हैं)

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1 Comment on "पूर्वांचल की भावनाओं से खेलते अमर सिंह"

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शैलेन्‍द्र कुमार
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अमर सिंह पर कोई विश्वास नहीं करता लेकिन उनकी सभाओं में भारी भीड़ उमड़ रही है कुछ तो बात है, ये तो तय है की पूर्वांचल के साथ अन्याय हो रहा है और लोगो में आक्रोश भी बढ़ रहा है पूर्वांचल को विकास चाहिए वो छोटे राज्य से हो या बड़े राज्य से

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