लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

नोट के बदले वोट काण्ड में अमर सिंह की गिरफतारी राजनीति में शुद्धिकरण की दृष्टि से एक अच्छी शुरुआत है। इससे दलाल संस्कृति पर अकुंश लगेगा। राजनीति को प्रबंधन का खेल मानने वाले गैर राजनीतिकों तथा बिना निर्वाचन के राजनीति में धन और वाक्चातुर्य के बूते दखल बढ़ाने दलाल चरित्र के सांसद हाशिये पर आएंगें। ऐसे लोगों के संसद के बाहर रहने से उन नीतियों के निर्माण पर भी अंकुश लगेगा जो कारपोरेट जगत के हित साधने की दृष्टि से बनाई जा रही थीं। बड़बोले और बेवजह बोलने वाले अमर सिंह की गिरफतारी कोई आश्चर्य में डालने वाली बात नहीं है। देर – सबेर गिरफतारी तय थी। अब लालकृष्ण आडवाणी के निकटतम रहे सुधीर कुलकर्णी की बारी है। फिलहाल विदेश में होने के कारण कुलकर्णी हिरासत से बचे हुए हैं। लेकिन बकरे की अम्मां कब तक खैर मनाएगी। अब उंट को पहाड़ के नीचे आना ही पड़ेगा। अमर सिंह, फग्गन सिंह कुलस्ते और महावीर भगोरा की गिरफतारी के बाद अब संकट में संप्रग सरकार आएगी। क्योंकि वोट खरीदने के मकसद से जुड़े सभी सवाल फिलहाल अनुत्तरित हैं। भाजपा वामपंथी और समाजवादी पार्टी समेत कुछ अन्य विपक्षी दल संसद नहीं चलने देंगे। संसद में जो सवाल उठाए जा रहे हैं, उनके छींटे सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को मुश्किलें बढ़ाएंगे। किस मकसद से वोट खरीदे गए और किसे फायदा पहुंचा इस मकसद की पड़ताल के लिए सुप्रीम कोर्ट से भी गुहार लगाई जा सकती है।

इसमें कोई राय नहीं कि मनमोहन सिंह कतई सरकार नहीं चाहती थी नोट के बदले वोट काण्ड की ठीक से तफतीश होने के बाद अदालत में आरोप- पत्र पेश हो। दिल्ली उच्चतम न्यायालय ने बार-बार दिल्ली पुलिस को फटकार न लगाई होती तो इस मामले से जुड़े तीन दलाल और दो पूर्व भाजपा के सांसद तिहाड़ कारागार न पहुंचे होते। चूंकि दिल्ली पुलिस सीधे-सीधे केन्द्र सरकार के गृह मंत्रालय के मातहत काम करती है इसलिए उसकी तहकीकात और आरोप-पत्र संदेह के दायरे में हैं। क्योंकि पुलिस ने जो चालान अदालत में पेश किया है, उसमें केवल तीन बिंदुओं पर विचार कर कार्रवाई को अंजाम दिया गया है। एक, पैसा किसने दिया, दो,पैसा किसने लिया और तीन पैसे की आमद का स्त्रोत क्या है। इस प्रकरण में इस तथ्य को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है कि विश्वास मत हासिल करने के बाद सरकार किसकी बची और फायदा किसे हुआ ? गौण मान लिए गए इस तथ्य पर संसद में हंगामा कितने दिन चलेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता ?

भारतीय पुलिस के इतिहास में राजनीति से जुड़े किसी बड़े मुद्दे पर यह पहली बार हुआ है कि भंडाफोड़ करने वाले सांसदों को भी पुलिस न केवल आरोपी बनाया बल्कि हिरासत में लेकर सींखंचों के पीछे भी कर दिया। हिरासत में लिए गए फग्गन सिंह कुलस्ते और महावीर भगोरा भाजपा के पूर्व सांसद हैं। इन्हें आरोपी इसलिए बनाया गया क्योंकि ये बिकने को तैयार हो गए। मुरैना से भाजपा सांसद अशोक अर्गल को हिरासत में लेने की पुलिस ने अदालत से इजाजत मांगी है। यहां सवाल उठता है कि अमर सिंह इन सांसदों को संप्रग सरकार के मुखिया के इशारे पर लालच दे रहे थे अथवा सरकार बचाने का श्रेय लेकर सरकार के करीब पहुंचने की कवायद में लगे थे ? इन अनुत्तरित सवालों के जबाब तलाशे जाने चाहिए।

अमर सिंह का आरोप-पत्र में नाम आने के बाद ही गिरफतारी की उम्मीद बढ़ गई थी। इस मामले में सांसदों की संसद के प्रति दायित्व और निष्ठा को खरीदने का काम जिन दो दलालों सुहैल हिन्दुस्तान और संजीव सक्सेना ने किया था, इन दलालों से 21 और 22 जुलाई 2008 को अमर सिंह से मोबाइल पर हुई बातचीत के कॉल रिकार्ड को दिल्ली पुलिस ने सबूत के रुप में पेश किया है। संजीव और अमर का रिश्ता जगजाहिर है। वह गोपनीय कभी नहीं रहा। अदालत में पेश आरोप-पत्र में सुहैल के उस बयान को तरजीह नहीं दी गई है जिसमें उसने कहा है कि अमर सिंह सोनिया के राजनीतिक सचिव सहमद पटेल और मनमोहन सिंह के दिशा निर्देश पर काम कर रहे थे। यदि संसद में विपक्ष के दबाव के बाद इस मामले की किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराये जाने को बल मिलता है और निष्पक्ष जांच होती है तो यह तथ्य अनुसंधान के बाद सामने आ सकता है कि अमर सिंह, मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाए रखने के लिए काम कर रहे थे।इस तह तक पहुंचते ही अहमद पटेल पर तो शिकंजा कसेगा ही संप्रग सरकार भी दीवार की तरह भरभरा कर ढह जाएगी।

इधर अमर सिंह पर संकट इसलिए भी और गहराएगा, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी ने दिल्ली के पुलिस आयुक्त को कुछ ऐसे साक्ष्य दिए हैं, जिनसे तय होता है कि विश्वास मत के दौरान अमर सिंह को अमेरिका से आर्थिक मदद मिली। इस बाबत विश्वनाथ ने क्विंलटन फाउण्डेशन, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और चुनाव आयोग से जुड़े कुछ जरुरी दस्तावेज पुलिस को सौंपे हैं। चूकिं संप्रग सरकार अमेरिका से होने जा रहे असैन्य परमाणु समझौते के चलते संप्रग समार्थित वामदलों से समर्थन वापिस ले लेने के कारण संकट में आई थी इसलिए अमेरिका द्वारा दी गई इस मदद को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए ? सुहैल और संजीव को भले ही अमर सिंह ने पैसा दिया हो, लेकिन अमर सिंह के पास इस धन के आने का वास्तविक स्त्रोत क्या है, और किस उद्देश्य पूर्ति के लिए धन दिया गया,यह खुलासा आरोप-पत्र में नहीं है। हिरासत में आने के बाद शायद अब खुद अमर सिंह इस रहस्य का पर्दाफाश करें ? यहां यह तय मानकर चलिए कि यदि अमर सिंह मुंह खोलते हैं तो मनमोहन सिंह के नैतिक शुचिता से लबरेज दामन पर कालिख पुतना तय है।

मनमोहन सिंह पर कठपुतली प्रधानमंत्री, अमेरिका का पिट्ठू विश्व बैंक और अंतर्राष्टीय मुद्रा कोष के हित साधक होने के आरोप भले ही लगते रहे हों, किंतु अब तक वे पाक दामन तो रहे ही, उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर भी अंगुली नहीं उठी। पर 22 जुलाई 2008 को जिस तरह से नेपथ्य में रहकर उन्होंने राजनीति के अग्रिम मोर्चे पर शिखण्डी और बृहन्नलाओं को खड़ा करके विश्वास मत पर विजय हासिल करके सत्ता में बने रहने की जो विवशता जाहिर की उसने संविधान में स्थापित पवित्रता, मर्यादा और गरिमा की बुनियाद दरका कर रख दी। विश्वास मत हासिल करने की इस नाटकीय परिणति ने तभी राजनीतिक जागरुकों की आंखें खोल दी थीं कि सौदा तो हुआ है लेकिन इसके अंर्तसूत्र क्या हैं, यह खुलासा होना जरुरी है।

आरोप-पत्र में सरकार बचाने का मकसद साफ न होने के पीछे पुलिस ने दलील दी है कि ऐसे कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं हुए जिनसे यह तय होता कि सरकार के किसी प्रतिनिधि ने दलालों और खरीदे गए सांसदों के बीच मोबाइल अथवा टेलीफोन पर बातचीत की हो। इस बातचीत के कोई साक्ष्य जांच के दौरान सामने आए भी हों तो पुलिस उन्हें दबा भी सकती है। क्योंकि अब इस संदेह में तो कोई दो राय रह ही नहीं गई है कि पुलिस दिल्ली न्यायालय की निगरानी में काम करने के बावजूद केंद्र सरकार के दबाव में थी, अन्यथा वह धन के स्त्रोत और सांसदों की खरीद के लक्ष्य को भी भेद कर कानूनी प्रक्रिया के दायरे में ले आती। बहरहाल इस मामले ने अन्ना हजारे के जन लोकपाल विधेयक में दर्ज इस बिंदु की महत्ता को तरजीह मिली है कि एक स्वायत्त व स्वतंत्र जांच एजेंसी वजूद में आए, जिससे वह अपने काम को भयमुक्त रहकर निष्पक्ष अंजाम तक पहुंचा सके ? फिलहाल अमर सिंह जैसे धुरंधर की गिरफतारी से यह उम्मीद तो बढ़ी ही है कि दलाल और दल्लाओं के दखल से भविष्य की राजनीति को किसी हद तक मुक्ति मिलेगी।

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