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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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प्रमोद कुमार बर्णवाल

समान्तर सिनेमा की एक उल्लेखनीय विशेषता चीजों, घटनाओं, स्थितियों, परिस्थितियों, अवस्था और दशा को ठीक उसी तरह से प्रकट करना रहा है जैसा कि वह है। कई बार फिल्मकार कहानी की मांग कहकर वह सब पर्दे पर प्रदर्शित करते रहे हैं जिसका यथार्थ से संबंध नहीं रहा है। फिल्मकारों का आरोप रहा है कि जनता ऐसा ही चाहती है, वह अश्लीलता और हिंसा में मजा लेती है, जब वह ऐसा देखना पसंद करती है तो फिर हम क्या कर सकते हैं।

इन फिल्मकारों की ये बातें सही तो लगती हैं किंतु इनमें अंशत: सच्चाई ही है पूर्णता नहीं। इन बातों की सच्चाई जाननी हो तो फिर श्याम बेनेगल निर्देशित अंकुर, मंडी, सूरज का सातवां घोड़ा, भूमिका, निशांत फिल्में देख लीजिये या फिर गोविन्द निहलानी निर्देशित आक्रोश, अर्धसत्य, हजार चौरासी की मां देख लीजिये। या फिर समान्तर सिनेमा के दौर की ऐसी ही अन्य फिल्मों को देख लें। समान्तर सिनेमा जिसे कि कला सिनेमा और सार्थक सिनेमा भी कहा जाता है को लेकर एक वहम आम जन में यह है कि ये मनोरंजन नहीं परोसती। दरअसल समान्तर सिनेमा के दौर की फिल्मों की असफलता का एक बहुत बड़ा कारण यह रहा कि ये जनता तक ठीक से पहुंच ही नहीं पाई। जितनी संख्या में अन्य फिल्में जनता तक पहुंचने में सफल हो पाईं उतनी समान्तर सिनेमा नहीं। इसलिये समान्तर सिनेमा को व्यावसायिक रूप से असफल ओर अलोकप्रिय मान लिया गया।

समान्तर सिनेमा के द्वारा किस तरह से यथार्थ का प्रकटीकरण होता है इसे हम उदाहरणों से समझने का प्रयत्न करेंगे। स्वर्गीय उत्पल दत्त का एक नाटक है जिसमें खान में कार्य करते मजदूरों के बारे में दिखाया गया है। इस नाटक के प्रदर्शन के दौरान प्रकाश व्यवस्था इस प्रकार की थी कि ऐसा जान पड़ता था मानो वास्तव में मजदूर खान में फंस गये हैं और पानी में डूब रहे हैं। इसे देखकर दर्शक तालियां पीटने लगते थे कि वाह क्या नाटक प्रदर्शित किया है मंच पर ही खान में डूबते हुए मजदूरों को दिखला दिया।

लेकिन वास्तव में देखा जाये तो यह तालियों का बजना और प्रशंसा का भाव नाटक की असफलता कहा जाना चाहिए। जब कभी आसपास बीमारी, मृत्यु, हिंसा, बलात्कार का प्रसंग आये तो हम सभी इससे विचलित होते हैं। बलात्कार सिर्फ एक शब्द तभी तक है जब तक यह घटित ना हो, जिस पर यह घटे उस स्त्री से जानने का प्रयास कीजिये, उसके लिये यह कभी ना मरने वाला एक नासूर बन जाता है। जिस घर में मृत्यु हो जाये वहां पसरे सन्नाटे को सुनने का प्रयास कीजिये और तब खान में डूबकर मरते हुए मजदूरों को दखेकर अगर लोग तालियां बजायें तब आप समझ जाईये कि नाटक असफल है।

समान्तर सिनेमा के दौर की फिल्मों में मानवीय भावों को ज्यो का त्यो दिखाने का प्रयास किया गया है। यानी कि अगर कभी हंसी का प्रसंग है तो दर्शक भी उसका एक हिस्सा बन जाते हैं अगर कहीं समर्पण और तल्लीनता का भाव है, जीवन में एक अवस्था से दूसरी अवस्था, एक भाव से दूसरी में परिणति का भाव है तो फिर दर्शक इसमें इस तरह से खो जाते हैं कि नायिका का पर्दे पर निरावरण हो जाना भी दर्शकों को सीटी बजाने और फब्तियां कसने का मौका नहीं देता। श्याम बेनेगल की ‘मंडी’ को देख लीजिये जो कि है तो वेश्याओं की कहानी, किंतु पर्दे पर वेश्याओं को दिखाये जाने के बावजूद यह दर्शकों को उत्तेजित नहीं करती, जितनी उत्तेजित ‘मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिये’ जैसे गीत करते हैं। वेश्यायें भी इंसान हैं, अगर उन्होंने यह पेशा अपनाया है तो किसी मजबूरी के तहत, वह मजबूरी कमर के नीचे की भूख-प्यास नहीं है बल्कि कमर के ऊपर के हिस्से यानी पेट के कारण है। श्याम बेनेगल की ही ‘वेलकम टू सज्जनपुर’ में एक मुन्नी बाई है यह उस समाज का प्रतिनिधि चरित्र है जिसे हम हिजड़ा कहकर मजाक उड़ाते हैं। मुन्नी बाई के ही शब्दों में ‘हम इंसान नहीं हैं का?’ इस तबके के दुख के संगीत को सुना जा सकता है।

शेखर कपूर निर्देशित ‘बैंडिट क्वीन’ को ले लें जिस समय पर्दे पर फूलन देवी का बलात्कार दिखाया जाता है दर्शक तालियां नहीं बजाते। उत्तेजित होते हैं किंतु इसलिये नहीं कि बलात्कार देखकर उन्हें मजा आता है बल्कि इसलिये क्योंकि फूलन का दुख उन्हें अपना जान पड़ने लगता है। दर्शक एक बलत्कृत होती स्त्री को देखकर दुख में बहते चले जाते हैं।

‘अर्द्धसत्य’ का नायक जब समाज में बुरे कार्यों को होते हुए देखता है और उसका दम घुटता सा महसूस होता है तब दर्शक भी ऐसा ही महसूस करता है और जब नायक उस बुराई की जड़ को उखाड़ फेंकता है तब दर्शक भी राहत की सांस लेता है। मणिकौल निर्देशित फिल्म ‘सिद्धेश्वरी’ में जब एक साधारण सी स्त्री का संगीत के प्रति समर्पण होता है तो वह एक मछली की भांति संगीत रूपी पानी में तैरती चली जाती है, उसके शरीर से वस्त्र गिरते जाते हैं और दर्शक भी अपने कानों में संगीत की ध्वनि महसूस करता है। समान्तर सिनेमा में जिस तरह से यथार्थ को रचने का प्रयास किया जाता है वैसा ही नाटकों में भी। समान्तर सिनेमा, व्यावसायिक सिनेमा और रंगमंच में एक साथ कार्य करने वाली मीता वशिष्ठ की रंगमंचीय प्रस्तुति ‘लाल देद’ में भी समान्तर सिनेमा की तरह के यथार्थ की झलक पाई जाती है। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद ओर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के महिला अध्ययन और विकास केन्द्र द्वारा 15 दिसम्बर 2010 को वाराणसी में इसकी संयुक्त प्रस्तुति में भी यथार्थ की झलक देखी गयी।

मीता वशिष्ठ ने बताया कि जब उनके मन में आया कि ‘लाल देद’ पर नाटक किया जाये तो उन्होंने ‘लाल देद’ पर विभिन्न लेखकों को पढ़ना शुरू किया, फिर उनके मन में आया कि क्यों विभिन्न आलोचकों द्वारा लिखे गये पुस्तकों को पढ़ा जाये। क्यों नही मूल स्त्रोत को ही पढ़ा जाये जिनको आधार बनाकर आलोचक लिखते रहे हैं और इन्हीं की परिणति ‘लाल देद’ नामक नाटक के रूप में हुई।

एक कश्मीरी साध्वी लल्ला उर्फ लल्लेश्वरी उर्फ लाल देद के माध्यम से स्त्री की मुक्ति की छटपटाहट को दर्शाया गया है। आतंकी घटनाओं के बाद कश्मीर का समाज किस तरह से भय का शिकार हुआ है वहां की संस्कृति को धक्का लगा है यह भी इस नाटक् के माध्यम से समझा जा सकता है। जीवन क्या है? अगर कोई आपकी बुराई करे, गाली दे तो क्या इसे दुख माना जाये और अगर सम्मान मिले तो क्या इसे ही सुख मान लिया जाये? इन्हीं सब प्रश्नों के जवाब ‘लाल देद’ नाटक में ढ़ूंढ़ने के प्रयत्न किये गये हैं। लल्ला का ब्याह 12 वर्ष में कर दिया गया था। मुक्ति की छटपटाहट में उसने 24 की होने पर सन्यास ले लिया। लाल देद के ही शब्दों में ‘नाम उसका हो जो भी मुक्त करे मुझको इस संत्रास से’ ; लल्ला मुक्ति के उपाय खोजती अटकती रही। अंत में उसने समझा कि परम एक है। वह सबके लिये है। उसे साधना से पाया जा सकता है। यह समझ आते ही वह कपास की तरह खिल गयी। उसे कुछ लोगों ने पागल समझकर पत्थर मारे तो कुछ ने सम्मान भी दिया। एक वस्त्र विक्रेता ने निर्वस्त्र लल को वस्त्र भेंट किया। लल ने उसे दो हिस्सों में फाड़ा और दोनों कंधों पर लटका लिया। कोई गाली देता तो एक कंधे पर रखे कपड़े में बांध देती और कोई सम्मान देता तो दूसरी ओर एक गांठ लगा देती। शाम को तौला तो दोनों बराबर निकले। जो मुक्त हो चुका है उसके लिये मान-अपमान के कोई मायने नहीं हैं। लाल देद को कोई बौद्ध, कोई शैव तो कोई मुस्लिम मानता था। अंतिम संस्कार के लिये हिंदू-मुस्लिम में विवाद पैदा हो गया ठीक काशी के कबीर की तरह, किन्तु लाल देद का अंतिम संस्कार कोई नहीं कर पाया वह रौशनी बनकर चली गयी, केवल उसके गीत गूंजते रह गये।

अभिनेत्री मीता वशिष्ठ ने लल्ला के काव्य कोलाज को अपने अभिनय के फ्रेम ममें सजाकर प्रस्तुत किया और सबको ‘लाल देद’ की तड़प से वाकिफ कराया। उन्होंने हर दृश्य को एक पेंटिंग बनाकर प्रस्तुत किया। मीता वशिष्ठ ने प्राचीन नृत्य शैली कुडिअट्टम से सौंदर्र्य विधान ग्रहण करके नाटक के दृश्यों को रचा।

‘लाल देद’ की रचना में राजेश झा, विष्णु माथुर और बंशी कौल ने मीता वशिष्ठ की मदद की है। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के अशोक सागर भगत ने प्रकाश संयोजन किया। कला संकाय प्रमुख प्रो0 कमलशील, प्रो0 शुभा राव, प्रो0 सदानंद शाही ने नाटक आयोजित करवाने में विशेष सहयोग किया। संचालन डॉ0 आभा गुप्ता ने किया।

प्रकाश व्यवस्था इस नाटक की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी। प्रकाश के संयोजन के कारण दर्शकों को ऐसा जान पड़ रहा था कि कभी लाल देद रात्रि में कार्यशील है तो कभी सूर्य की रोशनी फैल चुकी है मानो मंच पर सूर्य उग आया है। मंच पर ना ही सूई धागा रखा गया था, ना ही चक्की और ना ही जल ; किंतु मीता वशिष्ठ के अभिनय ने दर्शकों को यह महसूस कराने पर मजबूर कर दिया कि मंच पर ये सब चीजें रखी हुई हैं। सबसे बड़ी बात बनारस के आम लोग यह जानकर कि एक बॉलीवुड की हीरोइन उनके सामने अभिनय करेंगी प्रफुल्लित थे, तो कुछ उत्तेजित भी। कुछ मनचलों ने खुशी में सीटियां भी बजाई। लेकिन यह सीटी बजाना नाटक शुरू होने से पहले तक रहा। जब मीता वशिष्ठ मंच पर आईं और एक साधारण स्त्री का साध्वी में परिवर्तन अभिनीत कर रही थीं, तो दर्शक सीटी मारना भूल गये थे, एक झीने वस्त्र में नायिका के आने के बावजूद; बिल्कुल समान्तर सिनेमा के प्रभाव की तरह। ‘लाल देद’ नाटक एक स्त्री की सुख, दुख, गम, खुशी से मुक्ति की झांकी प्रस्तुत करता है, साथ ही कुछ फिल्मकारों के इस मत को भी ध्वस्त करता है कि दर्शक ही अश्लीलता और हिंसा देखना चाहते हैं तो हम क्या करें?

(लेखक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में शोध-छात्र हैं)

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