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भूपेन्द्र धर्माणी 

देश के कोने-कोने से आज भ्रष्टाचार को लेकर जिस प्रकार जन समूह सडकों पर उतरा है वह वास्तव में न केवल अभूतपूर्व है बल्कि किसी भी राज सत्ता को विचलित करने वाला है। स्वतंत्रता संग्राम के पश्चात सर्वोदय नेता जयप्रकाश नारायण की ‘सम्पूर्ण क्रांति’ को भी कुछ ही दिनों में इस कद्र जनसमर्थन नहीं मिला, जो आज देश के लगभग हर प्रांत और कस्बे में देखने को मिल रहा है। अन्ना के आह्वान पर सांसदों और नेताओं के घरों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन अन्ना की जनमानस तक झकझोर देने वाली ताकत को स्वत: ही दर्शाता है। अन्ना को यह ताकत क्यों और कैसे मिली इसके विस्तार में जाने के लिए केवल इतना ही काफी है कि यह ताकत आम जनता की दुखती रग पर उनके हाथ रखने से उन्हें प्राप्त हुई है। स्वतंत्रता के पश्चात लगभग 65 वर्षों में इस देश में यदि कोई आजाद हुआ है तो वह है केवल यहां का तंत्र। आम आदमी को वास्तविक आजादी का अहसास अभी भी नहीं हो पाया है। आजादी के बाद से इस देश का गरीब व किसान अभी भी आजाद हुए तंत्र के शोषण का पूरी तरह से शिकार होता रहा है और हो रहा है। अन्ना के आंदोलन को मिले जनसमर्थन का केवल एक ही संकेत है कि वर्षों से ‘स्व’ अर्थात हमारे आजाद हुए ‘तंत्र’ के निरंकुश क्रियाकलापों से त्रस्त देश की जनता अब वास्तव में राहत चाहती है।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के क्षितिज पर गांधी का उदय हुआ तब भारत में एक अनूठी स्थिति उत्पन्न हुई। बरसों से प्राधिनता की बेडियों में जकडे लोग उनसे इतने प्रभावित हुए कि लोगों की भीड उनके पीछे हो ली। उनके अंहिसा एवं सत्य के संदेश ने उनके अंतर्मन को ऐसा छू लिया कि वो गांधी के मुरीद हो गए। ऐसा नहीं कि उन्होंने गांधी के सत्य एवं अहिंसा के संदेश को अपने जीवन में साक्षात उतार लिया परन्तु उनके संदेश से उनमें बरसों की पराजकता, अत्याचार एवं दमन के खिलाफ उठने का साहस पैदा हो गया। एक तरह से सत्य व अहिंसा के लिए जागरुकता पैदा हुई। इतिहास आज अपने आप को दोहरा रहा है। भ्रष्टाचार व महंगाई से प्रताडित जनता को मानो एक महात्मा की इंतजार थी और इसलिए जब एक और गांधी अन्ना के रूप में परिदृश्य पर उभरा तो लोग अन्नामय हो गए। चाहे 107 वर्ष का वृध्द हो या एक साल का बच्चा, दूर छोर का गांव हो या मैट्रो पोलिटेन शहर, ‘अन्ना’ लिखी गांधी टोपी पहने लोग तरह-तरह से इस आंदोलन से अपनी सम्बध्दता से अभिव्यक्ति कर रहे हैं। उनका यह उद्गार स्वभाविक भी है और उत्साहपूर्ण भी। केन्द्र सरकार ने जो हथकंडे बाबा रामदेव के अनशन को समाप्त करने में अपनाए वह सब अन्ना के सामने धराशायी हो चुके हैं। उनका मूल कारण यह है कि अन्ना ऐसे अभियान चलाने, अनशन करने तथा सरकारी तंत्र के हथकंडों से निपटने का परिपक्व अनुभव रखते हैं। यही कारण है कि जब कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह की जगह मनोज तिवारी उतरे और आरोपों को झडी लगाई तो स्वयं उन्हें भूमिगत होना पड़ा। पुलिस ‘रामलीला’ मैदान में अपनी रावणलीला से पहले ही चेताई हुई है। इसलिए प्रदर्शनकारियों को अथाह समुद्र जब दिल्ली की सडकों पर हिलोरे ले रहा है तब उन्हें दिल्ली पर खतरे के बादल नजर नहीं आ रहे। हां, दिल्ली की सरकार पर काले बादल अवश्य मंडरा रहे हैं। उनकी भ्रष्टाचार विरोधी जनलोकपाल बिल से जुडी क्षीण इच्छाशक्ति उनकी छवि को विश्वभर में धूमिल अवश्य कर रही है। विश्व के सबसे अधिक युवाओं के इस देश में जहां आधुनिकता तथा पश्चिमीकरण को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं होती हों वहां 74 वर्षीय गांधीवादी नेता के आह्वान पर पूरे देश में आंदोलन का वातावरण बनना राजनेताओं को एक स्पष्ट संकेत दे रहा है। अन्ना ने जिस प्रकार अपने व्यक्तिगत जीवन में समाजसेवा द्वारा और अपने गृहक्षेत्र में समाजसुधार के कार्य किए हैं वास्तव में प्रभावित करने वाले हैं। आज कांग्रेस के नेता चाहे जिस प्रकार के भी आरोप उन पर या उनकी टीम पर लगाएं परन्तु देश के जनमानस पर अन्ना के प्रभाव को विचलित करने में सफल नहीं हो पा रहे। अब तो देश का जनमानस यह पूछने लगा है कि यदि बाबा रामदेव या उनके साथी यदि कहीं गलत थे तो अभी तक यह तंत्र क्या सोया था जो इसी तंत्र की नाक के नीचे अपना पासपोर्ट बनवाने में सफल रहा। इसी प्रकार आंध्र के बागी कांग्रेसी नेता जगन मोहन रेड्डी की बगावत के बादशाहत वाईएसआर के परिवार पर सत्तादल की छापेमारी को अब देश का जनमानस बदले की कार्रवाई के रूप में पहचान चुका है। सरकार के हाल के इन्हीं कदमों ने अनेक सरकारी संस्थाओं की विश्वसनीयता पर न केवल प्रश्चिह्न लगाया है। यघपि आंदोलनकारियों का यह दावा है कि यह आंदोलन सत्तापरिवर्तन के लिए नहीं फिर भी आज देश की राजधानी में जिस प्रकार इंडिया गेट से लेकर रामलीला मैदान तक मैं भी अन्ना-तू भी अन्ना के नारे गूंज रहे हैं वह किसी भी सत्ता को हिलाने वाले बन सकते हैं। अभूतपूर्व जनसैलाब किसी भी राजनेता के लिए टॉनिक होता है परन्तु राज्यसभा में विपक्ष के नेता द्वारा यह स्वीकारोक्ति अपने आप में महत्व रखती है कि कितना बडा जनसमूह एकत्र करने की क्षमता आज हमारे किसी भी राजनेता में नहीं बची है। क्या राजनेता अपने क्षीण होते इस प्रभाव का कारण जानने का प्रयास करेंगे? पिछले एक सप्ताह से अनशन पर बैठे बुजुर्ग समाजसेवी अन्ना हजारे की मांग पर जिस प्रकार संसद और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की दुहाई दी जा रही है वास्तव में हैरान करने वाली है। संसद को देश की जनता का प्रतिनिधित्व करने वाली सबसे बडी पंचायत माना जाता है। लोकतंत्र में जनता द्वारा जनता के लिए सरकार चुनी जाती है। आज जनप्रतिनिधि जिस प्रकार अपनी वास्तविक शक्ति जनता से विमुख होते जा रहे हैं वह किसी भी लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। कोई भी नेता चाहे वह कितना भी भ्रष्टाचारी हो यह नहीं कहता कि भ्रष्टाचार होना चाहिए। ‘भ्रष्टाचार समाप्त हो, इसे दूर करने के लिए हम भी प्रयासरत हैं पर इसमें समय लगेगा’, यह सरकार के मुखिया कहते हैं। क्या कोई बताएगा कि आखिर भ्रष्टाचार जैसा यह कैंसरस कीटाणु इस देश के स्व-तंत्र को कैसे लगा और क्यों लगा? जब इस देश के जनप्रतिनिधि अपने भत्ते और सुविधाएं बढाने के लिए प्रस्ताव चंद ही घंटों में संसद या विधानसभा में पास करवा सकते हैं तो भ्रष्टाचार जैसे नासूर जिसे वह स्वयं कैंसर मानते हैं दूर करने के लिए समय क्यों मांग रहे हैं? जबकि इसके उपचार के लिए लोकपाल बिल का लॉलीपॉप इस देश की जनता को दशकों से दिखाया जा रहा है। अन्ना ने ऐसा नहीं कि धरने पर बैठने की एकाएक घोषणा की हो। उन्होंने चरणबध्द तरीके से सरकार को न केवल चेतावनी दी थी बल्कि पर्याप्त समय भी दिया कि वह जनभावना को समझे और भ्रष्टाचार दूर करने के लिए अपनी प्रामाणिकता प्रदर्शित कर एक कठोर लोकपाल बिल पेश करे परन्तु ऐसा नहीं हुआ। जब-जब राजनैतिक इच्छा शक्ति कमजोर पडती है जनशक्ति अपना उग्र रूप दिखाने के लिए किसी प्रामाणिक नेतृत्व को खोजती है जो अन्ना के रूप में आज मिल गया है। परिणाम है कि आज महाराष्ट- के एक छोटे से गांव के एक प्रमाणिक समाजसेवी ने पूरे देश के जनमानस में न केवल विश्वास उत्पन्न किया है बल्कि भ्रष्टतंत्र में लिप्त लोगों की नींद उडा दी है। हां, उनके अभियान में आज ईमानदार भी शामिल हैं और भ्रष्टाचारी भी क्योंकि भ्रष्टाचारी भी भ्रष्टतंत्र का शिकार हुआ है। समय आ गया है कि सरकार को अपनी इच्छाशक्ति जागृत करनी होगी और कठोर कदम उठा हर स्तर पर अपनी जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। नीचले स्तर से लेकर ऊपर तक हर स्तर पर जिस प्रकार सरकारी धन का दुरुपयोग सरकारी तंत्र द्वारा किया जा रहा है उससे अब युवा भारत और अधिक सहन करने के लिए तैयार नहीं है। यह अन्ना के भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन में सडकों पर उतरकर युवाओं ने दिखा दिया है। अच्छा होगा जितनी जल्दी सरकार पैंतरेबाजी छोडकर सीधे संवाद को अपनाए और अन्ना टीम द्वारा मांगे गए जनलोकपाल के प्रावधानों पर प्रभावी चर्चा प्रारंभ कर बिल को मूर्त रूप दे। इसमें देरी न केवल सत्तापक्ष के लिए भारी पडेगी बल्कि राजनीतिक व्यवस्था के प्रति पनप रहे रोष को और भी अधिक तीखा कर सकती है।

* लेखक हिन्दुस्थान समाचार के संपादक हैं।

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