लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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Criminal-Politicsप्रमोद भार्गव

 

राहुल गांघी की बुलंदी ने आखिरकार दागियों के अरमानों पर पानी फेर दिया। लालू प्रसाद यादव ऐसे पहले कद्रदावर नेता होंगे,जिनके राजनीतिक जीवन पर भ्रष्टाचार के कारण लगाम लग रही है। बिहार के पूर्व मूख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र और कांग्रेस नेता रशोद मसूद सजा की जद में आ जाने के कारण भविष्य में चुनाव नहीं लड़ सकेंगे और न ही राज्यसभा के लिए नामित किए जा सकेंगे। लालू और मसूद की संसदीय सदस्यता भी समाप्त हो जाएगी। मंत्री मंडल की बैठक में अघ्यादेश की वापसी के साथ,जनप्रतिनिधत्व कानून संशोघित विधेयक की वापसी का भी फैसला हुआ है,इसलिए शोतकालीन सत्र में राज्यसभा से इस विधेयक के पारित हो जाने की जो उम्मीदें दागियों को बंधी थीं, उन पर भी विराम लग गया है। जाहिर है,राहुल गांधी के विरोध में आने के बाद,उनके तरीके पर भले ही सवाल उठाए जाते रहें,किंतु अंतत:उनके विरोध को लोकतांत्रिक नैतिकता के उल्लंघन के बावजूद सरकार के बदले फैसले को जनभावना के आदर के तौर पर देखा जाएगा। इस पूरे घटनाक्रम में फजीहत तो  प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की हुर्इ है,लेकिन  सिंह मान-आपमान से उपर उठ चुके है,क्योंकि उनके लिए पद की महिमा के समक्ष आत्मसम्मान बौना ही रहा है। यह नियति अब उनके चरित्र का स्थायी भाव है।

इस घटना को अघ्यादेश और विधेयक कि हार के रूप में भले ही देखा जा रहा हो,गोया इस बदलाव को राजनीति से गंदगी दूर करने और चुनाव सुधार की दिशा में एक कारगार शुरूआत के रूप में भी देखा जाना चाहिए? साथ ही आमजन का यह मुगालता भी टूटेगा कि सत्तारूढ़ राजनेता कानून से उपर हैं और तमाम धांधलियों,हत्याओं और दुश्कर्मों में लिप्त होने के बावजूद उनका कोर्इ कानून बाल भी बांका नहीं कर सकता है। किंतु दागी सत्ताधीषों पर लगाम का सिलसिला अब शुरू हो गया है,कालांतर में दागी प्रत्यक्ष राजनीति से दूर होते हुए चले जांएगे। इस परिणाम का श्रेय राहुल के साथ न्यायलय, अन्ना हजारे,बाबा रामदेव,नागरिक समाज,सोशल मीडिया और आरटीआर्इ कार्यकाताओं को भी देने की जरूरत है,जो अर्से से  भ्रष्टाचार के छुटकारे के अभियानों में सकि्रय थे। अघ्यादेश की पराजय परोक्ष रूप से इसी आकांक्षा का सम्मान है।

दरअसल सर्वोच्च न्यायलय के 10 जुलार्इ 2013 के फैसले के बाद विधेयक और फिर अघ्यादेश लाना ही एक ऐसी  सांमती मानसिकता थी, जो व्यकिगत संकीर्ण स्वार्थपूर्तियों के लिए अपनार्इ गर्इ। दरअसल अदालत ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8(4) को अंसवैधानिक करार देते हुए रदद कर दिया था। इस आदेश के मुताबिक अदालत द्वारा दोशी ठहराते ही जनप्रतिनिधि की सदस्यता समाप्त हो जाएगी। अदालत ने यह भी साफ किया था संविधान के अनुच्छेद 173 और 326 के अनुसार दोषी करार दिए लोगों के नाम मतदाता सूची में शामिल ही नहीं किए जा सकते हैं। इसके उलट जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8(4) के अनुसार सजायाफता जनप्रतिनिधियों को निर्वाचन में भागीदारी के सभी अधिकार हासिल हैं। अदालत ने महज इसी धारा को विलोपित किया है। जिसे सरकार ने पहले तो पुनर्विचार याचिका के जरिए  बदलवाने की कोशिश की, लेकिन अदालत ने बिना सुने ही याचिका खारिज कर दी। इसी वजह से अदालत का फैसला यथावत बना रहा।

इसी यथासिथति को बदलने के नजरिए से सरकार ने प्रस्तावित अध्यादेश में जनप्रतिनिधित्व कानून ;संशोधन एवं विधिमान्यकरणद्ध विधेयक-2013 में धारा 8(4) का वजूद बनाए रखने के उपाय किए थे, जिससे 2 साल या इससे अधिक की सजा मिल जाने के बावजूद सांसद-विधायकों की सदस्यता सदनों में बहाल रहे। हालांकि इसमें नये प्रावधान भी जोड़े गये। जिनके मुताबिक सदन में प्रतिनिधि न तो मतदान का अधिकारी होगा और न ही उसे वेतन-भत्ते मिलेंगे। इस बाबत विधि विषेशज्ञों का मानना है कि सांसद व विधायकों को वोट डालने का अधिकार संविधान ने दिया है न कि अध्यादेश अथवा किसी अन्य कानून ने ? गोया यह अधिकार अस्थायी कानूनी उपायों से नहीं छीना जा सकता है ? प्रतिनिधियों को वेतन – भत्ते भी ‘वेतन – भत्ता एवं पेंशन कानून-1954 के मार्फत मिलते हैं, न कि किसी इतर कानून के जरिए ? लिहाजा इस लाभ से सजायाफता प्रतिनिधियों को वैकलिपक कानून से वंचित नहीं किया जा सकता ? यहां महत्वपूर्ण सवाल यह भी खड़ा होता है कि जब सदस्य मतदान का ही अधिकार खो देंगे तो सदन को देने का उद्देश्य कैसे पूरा होगा ? इस लिहाज से यदि राहुल गांधी ने इस अध्यादेश को बकवास करार दिया है तो उनके इस सरकार विरोधी रवैये में दम थी।

इस मसले पर यह सवाल जरुर बनता है कि राहुल गांधी ने कैबिनेट की मंजूरी के तीन दिन बाद अचानक यह कदम क्यों उठाया ? उन्होंने अपनी असहमति संसद में क्यों नहीं जतार्इ ? जबकि राहुल ने खुद लोकसभा में संशोधित विधेयक के पक्ष में वोट देकर सर्वसम्मति से विधेयक पारित होने दिया। उनके विरोध के पहले केंद्र सरकार ने राज्य मंत्री मिलिंद देयोड़ा, दिगिवजय सिंह और शोला दीक्षित भी अध्यादेश का विरोध जता चुके थे। राज्यसभा में इसे भाजपा व वामपंथी दलों ने पास नहीं होने दिया। इसी कारण मनमोहन सिंह को अध्यादेश लाकर दागियों के बचाव की पहल करनी पड़ी। इस पूरी संवैधानिक प्रकि्रया को कैबिनेट ने अंजाम तक पहुंचाया । विडंबना देखिए अब वही कैबिनेट राहुल के कदम को लोकतांत्रिक ठहरा रही है। सप्रंग के सहयोगी दल ही बैठक में भीगी बिल्ली बने रहे। दरअसल हमारे देश में परिवार और वंषवाद की महिमा अपरम्पार है। इनके आगे संवैधानिक और प्रजातांत्रिक गरिमाएं नतमस्तक होती चली जाती है। अध्यादेश के परिप्रेक्ष्य में इस परिवारवाद की पुष्टि हुर्इ है। इसका फायदा राहुल को मिला है। संसद में नीतिगत मुददों पर बहस और सरकारी काम-काज से अक्सर दूरी बनाये रखने वाले राहुल एकाएक केंद्रीय सत्ता की सोनिया के बाद दूसरी धुरी बन गये है। अब भविष्य की कांग्रेस राजनीति और सप्रंग के नीतिगत फैसले राहुल की मर्जी की मुताबिक ही संपन्न होंगे। प्रधानमंत्री की हैसियत आम चुनाव आने तक पूरी तरह बौनी होकर महाभारत के शिखण्डी का पर्याय बन जाएगी। लगता है कांग्रेस ने भीतर ही भीतर निर्णय ले लिया है कि आगामी लोकसभा चुनाव राहुल को बतौर प्रधानमंत्री का दावेदार घोषित करके लड़ा जाए ? साथ ही सरकार और कांग्रेस संगठन के बीच एक स्पश्ट विभाजक रेखा खिंच दी जाए, जिससे संप्रग के दूसरे कालखण्ड में जो भी जनविरोधी फैसले हुए हैं उनका आसानी से ठींकरा मनमोहन सिंह के सिर फोड़ा जाता रहे। इस मकसद पूर्ति के लिए एक अदद आसान सिर मनमोहन सिंह के अलावा मनमोहन सिंह के नाम से कोर्इ और नहीं हो सकता।

 

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