लेखक परिचय

अशोक “प्रवृद्ध”

अशोक “प्रवृद्ध”

बाल्यकाल से ही अवकाश के समय अपने पितामह और उनके विद्वान मित्रों को वाल्मीकिय रामायण , महाभारत, पुराण, इतिहासादि ग्रन्थों को पढ़ कर सुनाने के क्रम में पुरातन धार्मिक-आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक विषयों के अध्ययन- मनन के प्रति मन में लगी लगन वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन-मनन-चिन्तन तक ले गई और इस लगन और ईच्छा की पूर्ति हेतु आज भी पुरातन ग्रन्थों, पुरातात्विक स्थलों का अध्ययन , अनुसन्धान व लेखन शौक और कार्य दोनों । शाश्वत्त सत्य अर्थात चिरन्तन सनातन सत्य के अध्ययन व अनुसंधान हेतु निरन्तर रत्त रहकर कई पत्र-पत्रिकाओं , इलेक्ट्रोनिक व अन्तर्जाल संचार माध्यमों के लिए संस्कृत, हिन्दी, नागपुरी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में स्वतंत्र लेखन ।

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अशोक “प्रवृद्ध”

hakikat rai

ऋतु परिवर्तन के संदेशवाहक पर्व वसंत पञ्चमी पर पतंगबाजी की प्रथा तथा वीर हकीकत की कथा का लाहौर निवासी वीर हकीकत राय से भी गहरा संबंध है। इतिहासज्ञों के अनुसार वसंत पञ्चमी के दिन ही  23 फरवरी 1734 को लाहौर निवासी तेरह वर्षीय वीर हकीकत राय को इस्लाम स्वीकार नहीं करने के कारण सिर को धड़ से अलग कर दिया गया था, परन्तु उस वीर धर्मप्रेमी का शीश धरती पर नहीं गिरा । वह आकाशमार्ग से सीधे स्वर्ग चला गया । हकीकत के आकाशगामी शीश के स्मरण में वसंत पञ्चमी पर पतंगबाजी की प्रथा प्रचलित है। इस्लामी देश होने बावजूद हकीकत के जन्म स्थल लाहौर में भी वसंत पञ्चमी के शुभ अवसर पर आज भी पतंगें उड़ाने का दृश्य बहुतायत में देखने को मिल जाता है । वसंत पञ्चमी के दिन हकीकत राय का बलिदान जहाँ एक ओर हिन्दुओं और हिन्दुत्व की हकीकत का वर्णन करता है वहीं वह मुसलमान एवं इस्लाम की हकीकत को भी अनावृत्त करता है। हकीकत राय की कथा तत्कालीन भारत की सामाजिक पृष्ठभूमि, हिन्दुओं की दुर्दशा और इस्लाम का थोथापन, मुल्ला-मौलवियों की अन्ध साम्प्रदायिकता, इस्लामी न्याय की हास्यास्पद-प्रक्रिया ही नहीं अपितु पैगम्बर की संकीर्णता, पक्षपात एवं नैतिकता तथा चारित्रिक पतन का प्रखर और प्रबल प्रहरी है। वीर हकीकत की धर्म पर अटल रहने के कारण शीश गँवा देने की इस कथा को आज विधर्मियों के देश में भी पतंगबाजी कर याद किया जाता है , परन्तु प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या आज का भारतीय नपुंसक हिन्दू नाबालिग हकीकत राय की निर्मम हत्या से कुछ पाठ सीखेगा ? आज का हिन्दू नपुंसकता की पराकाष्ठा पर पहुँच चुका है किन्तु उसको क्लैब्यं मा स्म गमः  कहकर उसके अस्तित्व और अस्मिता को जागृत करनेवाले विद्वानों अर्थात ब्राह्मणों तथा इसके लिए दायित्वों को भी आज साँप सूँघ गया है।

इतिहास की कथा के अनुसार लाहौर निवासी वीर हकीकत राय मदरसे में पढ़ा करते थे ।एक दिन जब मदरसे में पढ़ने वाले मौलबी अर्थात मुल्ला जी किसी कार्य से मदरसा छोड़कर चले गए तो सब बच्चे खेलने लगे परन्तु वीर हकीकत पढ़ता रहा। जब अन्य बच्चों ने यह देख उसे छेड़ा, तो उसने दुर्गा माँ की सौगंध दी। इस पर मुस्लिम बालकों ने दुर्गा माँ की हंसी उड़ानी शुरू कर दी । हकीकत ने कहा कि यदि मैं तुम्हारी बीवी फातिमा के बारे में कुछ कहूँ, तो तुम्हें कैसा लगेगा? बस फिर क्या था, मुल्ला के आते ही उन शरारती मुस्लिम छात्रों ने शिकायत कर दी कि हकीकत ने बीवी फातिमा को गाली दी है। बात बढ़ते हुए काजी तक जा पहुँची।  इस पर काजी के द्वारा आदेश दिया गया कि या तो हकीकत मुसलमान बन जाए, अन्यथा उसे मृत्युदंड दिया जाएगा। हकीकत ने धर्म बदलने का यह आदेश स्वीकार नहीं किया। परिणामस्वरुप उसे तलवार के घाट उतारने का फरमान जारी हो गया। कहा जाता है कि तेरह वर्षीय हकीकत के भोले मुख को देखकर जल्लाद के हाथ से तलवार गिर गई। इस पर हकीकत ने तलवार उसके हाथ में दी और कहा कि जब मैं बच्चा होकर अपने धर्म का पालन कर रहा हूँ, तो तुम बड़े होकर अपने धर्म से क्यों विमुख हो रहे हो?  इस पर जल्लाद ने दिल कठोर कर तलवार चला दी, परन्तु उस वीर का शीश धरती पर नहीं गिरा। वह आकाशमार्ग से सीधा स्वर्ग चला गया। यह घटना वसंत पंचमी की तिथि 23 फरवरी 1734 को घटी थी। हकीकत के आकाशगामी शीश की याद में वसंत पंचमी पर पतंगें उड़ाई जाती है। अनुपम, अद्वितीय बलिदानी हकीकत राय लाहौर का निवासी था, अतः मुस्लिम देश होने के बावजूद वहाँ पर आज भी पतंगबाजी का खूब प्रभाव देखने को मिलता है।

 

धर्म पर अडिग रहने वाले अनुपम, अद्वितीय बलिदानी वीर हकीकत की कथा इस्लाम की क्रूरता, उसका मजहबी थोथापन, न्याय के नाम पर अन्याय की पराकाष्ठा, कुरान का खोखलापन और सुनी-सुनाई गप्पों को गूँथ कर हदीस बनाए गए कागजों के अपवित्र पृष्ठों को पवित्रता और अकाट्यता का परिधान पहनाकर इस्लाम के अत्याचार, अनाचार, अन्याय और अन्धत्व की क्रूर कथा है । आज भी स्थिति बदली नहीं है ।वही शरा, वही हदीस आज इस्लाम द्वारा हिन्दुस्तान पर हिंसा और साम्प्रदायिकता का ताण्डव करने पर उतारू है। लेकिन खेद की बात है कि आज का नपुंसक हिन्दू नाबालिग हकीकत की निर्मम हत्या से कुछ पाठ नहीं सीखकर शुतुरमुर्ग की भांति सिर छुपाये बैठा है। देश के शासक वर्ग अर्थात सरकार की भी यही स्थिति है । दोनों नपुंसकता की पराकाष्ठा पर पहुँच चुके हैं । किन्तु दुःख की बात है कि इस बात को गलत  कहकर देशवासियों के अस्तित्व और अस्मिता को जागृत करनेवाले देश के  विद्वानों अर्थात ब्राह्मणों तथा दायित्वों को भी आज साँप सूँघ गया है और वे देशहित की बातों पर भी समाज और सरकार को सत्य का मार्ग दिखला कल्याण के मार्ग पर आरूढ़ कराने के अपने कार्य से विमुख हो गये हैं । विद्वानों की भांति ही देश का विपक्ष भी अपने संबैधानिक कार्यों से विमुख है । देश व सरकार को देशहित में कार्य करने के लिए दबाव नहीं बनाने का दोषी देश का विद्वत्वर्ग जितना है उतना ही दोषी विपक्ष भी है और विपक्ष सदैव ही सरकार के कार्यों में सिर्फ अड़ंगा डालना ही अपना कर्तव्य समझ बैठा है । यही कारण है कि देश के अन्दर संसद भवन, हवाई अड्डों , शहर के भीड़ – भाड़ वाले इलाकों में विदेशी आतंकी आते हैं और अपने आतंकी गत्तिविधियों को अंजाम देते हैं और सरकार दोषियों को नहीं छोड़ा जायेगा कहते रह जाती है ।देश की राजधानी दिल्ली में सरकार के नाक के नीचे एक शैक्षणिक संस्थान में विदेशी समर्थक नारे लग रहे हैं, पडोसी देश पाकिस्तान की जय – जयकार हो रही है और स्वयं अपने देश हिन्दुस्तान के मुर्दाबाद के नारे खुल्लेआम लग रहे हैं और बहुमत से बनी कहने की बहुसंख्यकों की सरकार इस पर कोई सार्थक प्रयास करने के बजाये अपनी नपुंसकता सार्वजनिक करने को बेकरार है । समाज, देश और सरकार को इस स्थिति पर पहुँचाने का दोषी कौन है ? कौन है इसका अपराधी ? और इस दोष और अपराध का निराकरण करनेवाला कौन है ? इन सभी प्रश्नों का एक उत्तर ही है-हम और केवल हम। क्योंकि हम अर्थात देश की जनता ही समाज, राज्य और राष्ट्र का निर्माण करती है और प्रजातंत्र में तो यह अर्थात देश की जनता सरकार के निर्माण के लिए सीधी उत्तरदायी होती है क्योंकि वही उसे अपने मतदान से चुनती है। इसलिए सरकार के कार्यों की भी उत्तरदायिनी जनता ही होती है क्योंकि जनता ही उसे यह अवसर उपलब्ध कराती है । इसलिए हमें परमुखा-पेक्षिता को छोड़कर आत्मबल को पहचानना होगा। समय और स्थितियाँ बार-बार जागने और कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने की चुनौती और चेतावनी दे रही हैं । काल अर्थात समय की गति को कोई नहीं रोक सकता, केवल उसके साथ सहअस्तित्व वीर भावना वाले उसकी गति का सामना कर सकते हैं और नपुंसक समुदाय काल प्रवाह में प्रवाहित होकर अपना अस्तित्व, अस्मिता, और पहचान खो बैठते हैं। काल का पुनरागमन कभी नहीं होता, तदपि इतिहास की पुनरावृत्ति होती देखी गई है। गतं न शोचन्ति का वाक्य चिरनिद्रा में सोने का सन्देश नहीं देता अपितु कहता है – जो बीत गया सो बीत गया किन्तु अब तो जागो ! अपनी वीरता के इतिहास को दोहराओ ! हमारे पूर्वज, हमारे इतिहास पुरुष, हमारे रण बाँकुरे, हमारे हकीकत जैसे धर्मध्वजी, प्रताप जैसे प्रणवीर, शिवा जैसे शौर्यशाली, छत्रसाल जैसे क्षत्रप, गोविन्दसिंह जैसे गुरु, बन्दा वैरागी जैसे वीरों की गाथाएं चिरनिद्रा त्यागने और हकीकत (बलिदानी वीर और वास्तविकता दोनों) की हत्या का प्रतिकार करने तथा अपना अस्मिता की स्थापना एवं अपने अस्तित्व की पहचान जताने के लिए मोहनिद्रा त्यागकर कटिबद्ध हो जाने की प्रेरणा देती हैं ।

 

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