लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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jnnuडा. कुंदनलाल चौधरी की पंक्तियां हैं :-
‘‘तुम चकित करते हो मुझे, मेरे देश !
तुम एक भयंकर ‘गाजी’ को न केवल छूट दे देते हो
जिसने वह विद्रोह भडक़ाया,
तुम्हारे विरूद्घ षडय़ंत्र किये और हथियार उठाया,
लूटा, जलाया, मासूमों से बलात्कार किया
और लोगों को गोली मारी
एकदम, छुट्टे होकर
बल्कि उसे सुविधा  देते हो
और वह सर्वोच्च सम्मान
कि वह सलामी ले आज,
गणतंत्र दिवस परेड की
ठीक इसी जगह
जहां से इतने निकट उसके शिकार कांप रहे हैं
शरणार्थी शिविरों में।

यह चित्रण है आज के कश्मीर का। ‘गाजी’ सलामी ले रहा है और कश्मीर का देशभक्त हिंदू शरणार्थी शिविरों में कांप रहा है। ‘गाजी’ का सलामी मंच भी इन हिंदू शरणार्थियों की छाती पर ही बनाया गया है, जिससे कि ये देख सकें कि इस देश में देशभक्ति का पुरस्कार क्या मिलता है? अंग्रेजों ने देश में हिंदू के नि:शस्त्रीकरण की प्रक्रिया प्रारंभ की थी, इसलिए उन्होंने हिंदू को हथियार के लिए लाईसेंस अनिवार्य किया था। इस लाइसेंस प्रणाली का उद्देश्य था कि हिंदू के घर में कोई हथियार ना रहे, जिससे कि उसका आराम से शिकार किया जा सके। हम अंग्रेजों की इसी परंपरा को यथावत आगे बढ़ा रहे हैं, और कश्मीर के भयभीत हिंदू समाज को भी आतंकियों और देशद्रोहियों से लडऩे के लिए हथियार उपलब्ध कराना पाप मान रहे हैं। जबकि कश्मीर का हिंदू आज भी देशद्रोहियों से लडऩे की क्षमता और सामथ्र्य रखता है।

हमारी सरकारों की ‘घुटने टेक नीति’ के कारण ही कश्मीर का अलगाववाद दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय तक आ गया है, जहां पिछले दिनों ‘भारत की बर्बादी और कश्मीर की आजादी’ के नारे खुल्लम खुल्ला लगाये गये हैं। यद्यपि वामपंथी विचारधारा के लोगों ने इस घटना की निंदा करते हुए अपने आपको इससे अलग दिखाया है, पर यह भी सच है कि देश में इस प्रकार की अलगाववादी घटनाओं के पीछे वामपंथियों का प्रोत्साहन अवश्य छिपा होता है।

कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने वामपंथ को पिछली शताब्दी की विचारधारा कहा है। जिससे उनका अभिप्राय है कि यह विचारधारा अपनी उपयोगिता खो चुकी है। उनकी बात सच हो सकती है, पर उन्हें यह भी विवेक होना चाहिए कि कांग्रेस की विचारधारा भी पिछली शताब्दी की (बीते दिनों की) विचारधारा बन चुकी है। इसने देश की समस्याओं का समाधान न देकर उन्हें उलझाने का ही कार्य किया है और इशरतजहां जैसे प्रकरण बता रहे हैं कि कांग्रेस ने राष्ट्रघात करते हुए समस्याएं इतनी अधिक उलझा दी हैं कि अब उनका समाधान करने में भी दशकों लग जाएंगे। मोदी जिन ‘अच्छे दिनों’ को लाने की बात कहते हैं-वे अभी नही आने वाले। उनकी नीतियों के परिणाम भी हमें कुछ देर बाद ही मिलने आरंभ होंगे। तब तक कुछ भी संभव है।

जहां तक कश्मीर का प्रश्न है तो कांग्रेस ने यहां जिस प्रकार की नीतियों को अपनाया है उनसे देश ने बहुत बड़ी क्षति उठा ली है। कांग्रेस ने देश को भ्रमित करने का प्रयास किया था कि गांधीजी की अहिंसा के कारण देश को स्वतंत्रता मिली। कांग्रेसियों का कहना रहा है कि कांग्रेस का जन्म 1885 में हुआ और वह मात्र 62 वर्ष में ही देश को स्वतंत्र करा गयी। इसमें भी गांधीजी का सक्रिय योगदान उसे 1920 से मिलना आरंभ हुआ तो जिस गांधीवाद के सिर स्वतंत्रता मिलने का सेहरा बांधा जाता है-उसका योगदान तो मात्र 27 वर्ष (1920 से 1947) का रहा। गांधीजी की अहिंसा के द्वारा स्वतंत्रता मिलने के इस चमत्कार को हम कश्मीर में मरते देख रहे हैं। जहां 68 वर्ष से गांधी और गांधीवाद की आतंकवादियों ने कब्र खोदकर रख दी है। गांधी और गांधीवाद की हत्या का एक जीवंत दस्तावेज बनी कश्मीर की केसर की क्यारियां ‘बारूद’ उगल रही हैं और हमारे वामपंथी व कांग्रेसियों को कुछ भी दिखाई नही दे रहा है। यह बहुत ही दुख की बात है। इनकी इसी प्रवृत्ति के कारण अलगाववादी जे.एन.यू. में दंगा कर जाते हैं, और शांतमना अपना कार्य करते रहते हैं।

कांग्रेस, वामपंथी, सपा, बसपा, जेडीयू, आरजेडी सहित जितने भर भी धर्मनिरपेक्ष दल हैं उनका एक ही एजेंडा है कि मोदी को असफल करो, जिसके लिए वह देश के साम्प्रदायिक परिवेश को बिगाडऩे का प्रयास कर रहे हैं। परिणामस्वरूप बड़ी तेजी से देश के विद्यालयों में भी छात्रों का विचारधारा को लेकर धु्रवीकरण हो रहा है। जो छात्र देश की मुख्यधारा में रहकर देश को विकास के रास्ते पर लेकर चलना चाहते हैं, उन्हें इस विचारधारा में विश्वास न रखने वाले छात्र नेता सहन नही कर रहे हैं। ऐसे छात्र नेता असहिष्णुता का प्रदर्शन कर रहे हैं और विनाश के रास्ते पर बढऩा चाहते हैं। इस प्रकार छात्र नेताओं का और छात्रों का बड़ी तेजी से विकास बनाम विनाश के झंडों के तले धु्रवीकरण हो रहा है।

छात्र राजनीति करना कोई बुरी बात नही है। विचारधाराओं की विषमता का होना भी कोई बुरी बात नही है। बुरी बात है कि किसी विचारधारा को लेकर देश के प्रति समर्पण के भाव को ही समाप्त कर देना। आपकी विचारधारा चाहे जो हो-पर वह विचारधारा आपको आपके देश के विकास और उन्नति के प्रति समर्पित करने वाली हो-यह बात अति आवश्यक है। हमने विद्यालयों में विभिन्न राजनीतिक विचारों और सिद्घांतों को पढ़ाने की व्यवस्था की है। हमारे छात्र उन विचारों या सिद्घांतों को अपने-अपने ढंग से पकड़ लेते हैं और उन्हीं के प्रति समर्पित हो जाते हैं। साम्यवादी राजनीतिक विचारधारा देश के प्रति समर्पित होना नही सिखाती, यह भारत की एकता की भी शत्रु है। वह अपने आप में एक पूर्ण विचारधारा भी नही है। यही कारण है कि साम्यवादी विचारधारा को विदेशों में छोड़ दिया गया है। संभवत: राहुल गांधी इसीलिए कह रहे हैं कि साम्यवादी विचारधारा पिछली शती की विचारधरा रही है। हम विभिन्न राजनीतिक विचारों और सिद्घांतों को विद्यालयों में पढ़ायें यह तो कोई गलत बात नही है-पर हर विचारधारा के विषय में यह भी स्पष्ट कर दें कि यह विचारधारा हमारे देश के लिए कितनी अनुकूल या प्रतिकूल है? अपने युवाओं के उत्साही विचारों को हम तूफान में तब बदल देते हैं जब हम हर राजनीतिक विचार, विचारधारा या सिद्घांत को पढ़ाते जाते हैं और ‘सभी अच्छे हैं’ की सोच उनमें विकसित कर उन्हें अलग-अलग मतों के प्रति बंधने के लिए एक प्रतियोगिता को खुला आमंत्रण दे देते हैं। जिससे युवाओं की छात्र राजनीति भी हिंसक होती जा रही है, उसने आक्रामकता को अपना एक हथियार बना लिया है।

जे.एन.यू में जो कुछ हुआ है उसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। जे.एन.यू कश्मीर के केसर को पैदा करे तो अच्छा है यदि उसने भी ‘बारूद’ की खेती करनी आरंभ कर दी तो अनर्थ हो जाएगा। सारे राजनीतिक दलों को अब राष्ट्रहित में एक साथ बैठकर ‘बड़ी सोच का बड़ा चमत्कार’ करने के लिए कुछ करना चाहिए। हमें अपने ही भाईयों की छाती पर खड़े होकर सलामी लेने वाले ‘गाजी’ को रोकना ही होगा।

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