लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दवाओं के अवैध परीक्षण पर केन्द्र व म.प्र. सरकार को लगार्इ फटकार

इंसानों पर गैर कानूनी तरीके से दवाओं के नाजायज परीक्षण के मामले पर संप्रीम कोर्ट ने सख्त रवैया अपनाते हुए केंद्र और म.प्र. सरकार को कड़ी फटकार लगार्इ। न्यायमूर्ति आर एस लोढ़ा ने इस बावत जनहित याचिकाओं के सिलसले में कहा की मनुष्यों के साथ ‘गिनी पिग जैसा सलूक किया जा रहा है। जो दुर्भाग्यपूर्ण है। कोर्ट ने इस बात पर भी नाराजगी जतार्इ की बार-बार जानकारी मांगने के बावजूद केंद्र व राज सरकारें संतोषजनक उत्तर नहीं दे रहीं हैं। दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य पीठ के न्यायमूर्ति बीएस चौहान एवं स्वतंत्र कुमार ने भी कैंसर की होम्योपैथिक दवा का क्लीनिकल दवा परीक्षण की मंजूरी न दिए जाने पर नाराजगी जतार्इ है। डाक्टर एएम माथुर की अध्यक्षता वाले गुडगांव के एनजीओ वल्र्ड होम्योपैथिक डवलपमेंट आर्गेनार्इजेशन ने एक याचिका दायर कर दावा किया था कि कैंसर की ऐसी होम्योपैथिक दवा खोज ली गर्इ है जिससे सौ प्रतिशत कैंसर ठीक हो सकता है। किंतु इन निजी प्रयासों को सरकारी प्राधिकरणों ने इसलिए तबज्जो नहीं दी क्योंकि यह खोज निजी चिकित्सक डा एएम माथुर ने की थी।

यह कितनी दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि मानवीयता और नैतिकता के सभी तकाजों को ताक पर रखकर म.प्र. में दवा परीक्षण के लिए मरीजों के जिस्म को कच्चा माल मानते हुए प्रयोगशाला बनाया जा रहा है। ये दवा परीक्षण नाजायज तौर से भोपाल के भोपाल मेमोरियल अस्पताल और इन्दौर के यशवंतराव होल्कर सरकारी अस्पताल में किये जा रहे हैं। ड्रग कंट्रोलर जनरल द्वारा सूचना के अधिकार के तहत मांगी गर्इ जानकारी में बताया गया है कि दवा परीक्षण के दौरान देश भर में चार साल के भीतर 2031 मौतें हुर्इ हैं। इनमें से केवल 22 मृतकों के परिजनों को मुआवजा दिया है। इस सिलसिले में याचिकाकर्ता अमूल्य निधि, चिन्मय मिश्र एवं बैलू जार्ज का कहना है कि दवा परीक्षण में पारदर्शिता का अभाव है। क्योंकि जिन पर परीक्षण किया जाता है उन्हें उनके अधिकारों की जानकारी नहीं है। लिहाजा हम चाहते हैं कि आल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क के सदस्यों को मिलाकर विशेषज्ञों की एक समिति बनार्इ जाए जो देश विदेश में क्लीनिकल ट्रायल संबंधी प्रावधानों को देखें और दिशा निर्देश तय करने के लिए सिफारिशें करें।

भोपाल गैस पीडि़तों के लिए काम करने वाले संगठन भोपाल ग्रुप फार इंफार्मेशन एण्ड एक्शन ने दावा किया है कि अब तक गैस पीडि़तो पर किये परी़क्षण में करीब 10 लोग जान गवां चुके हैं। इसी तरह इंदौर में 869 लाचार व गरीब बाल-गोपालों की देह पर निर्माणाधीन दवाओं का चिकित्सकीय परीक्षण कर उनकी सेहत के साथ खिलवाड़ किया गया। एक दिन के बच्चे पर भी ये दवा परीक्षण किए गए। मध्यप्रदेश के इन्दौर में ये परीक्षण एक सरकारी अस्पताल में चोरी-छिपे किए गए। इस नाजायज कारोबार को अंजाम अस्पताल के करीब आधा दर्जन चिकित्सा विशेषज्ञों ने दो करोड़ रूपए बतौर रिश्वत लेकर किये। हैरानी यहां यह भी है कि ये परीक्षण सर्वाइकल और गुप्तांग कैंसर जैसे रोगों के लिए किए गए, जिनके रोगी भारत में ढूंढने पर भी बमुशिकल मिलते हैं। इस क्लीनिकल ड्रग एवं वेक्सीन ट्रायल का खुलासा एक स्वयंसेवी संस्था ने किया। बाद में इसे विधायक पारस सखलेचा और उमंग सिंघार द्वारा विधानसभा में पूछ्रे गए एक सवाल के जबाव में प्रदेश सरकार के स्वास्थ्य राज्यमंत्री महेन्द्र हार्डिया ने मंजूर किया कि 869 बच्चों पर दवा का परीक्षण बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों ने इंदौर के महाराजा यशवंतराज चिकित्सालय में किया।

जिन 869 बच्चों पर परीक्षण किए गए उनमें से 866 पर टीका और तीन बच्चों पर दवा का परीक्षण किया गया। ये सभी परीक्षण विश्व स्वास्थ्य संगठन की बजाय बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों ने कराए। ये आंकड़े केवल दो साल के हैं। जबकि प्रदेश में छह साल से आदिवासियों समेत गरीब बच्चों पर दवाओं व टीकों के परीक्षण जारी हैं। परीक्षण के दौरान कुछ बच्चों की मौतें भी हुर्इ हैं। लेकिन इन बच्चों का किसी स्वतंत्र पेनल से शव विच्छेदन नहीं कराया गया। इसलिए यह साफ नहीं हो सका कि मौतें परीक्षण के लिए इस्तेमाल दवाओं के दुष्प्रभाव से ही हुर्इं ? इस बावत आरटीआर्इ कार्यकर्ता एवं चिकित्सक डा. आनंद राय का कहना है कि दरअसल ऐसी सिथति में खुद चिकित्सक नहीं समझ पाते कि प्रयोग में लार्इ जा रही दवा से मरीज को बचाने के लिए कौनसी दवा दी जाए। इसलिए इन प्रयोगों के दौरान रोगी की स्मरणशकित गुम हो जाना, आंखों की रोशनी कम हो जाना और शरीर की प्रतिरोधात्मक क्षमता घट जाना आम बात है।

दवाओं का ऐसा ही प्रयोग भोपाल गैस दुर्घटना के पीडि़तों पर भी भोपाल मेमोरियल अस्पताल में किया गया है। भोपाल ग्रुप फार इंफार्मेशन एण्ड एक्शन समाज सेवी संगठन में सतीनाथ षडंगी और रचना ढिंगरा ने दावा किया है कि केंद्रीय दवा नियंत्रण संगठन नर्इ दिल्ली से प्राप्त जानकारी के अनुसार गैस पीडि़तो ंपर सात दवाओं की जांचों में से मात्र एक पर ड्रग कंट्रोलर जनरल आफ इंडिया द्वारा निगरानी रखी गर्इ। तीन गैस पीडि़तों की मृत्यु उनके ऊपर टेलिवैनसीन दवा की जांच की वजह से हुर्इ, जबकि पांच फानडापरिनक्स और दो टाइगेसाइकलीन दवा के परीक्षण के वजह से मारे गए। इन परीक्षणों के लिए दवा कंपनियों से कुछ अस्पताल के ही चिकित्सकों ने एक करोड़ से अधिक की धन राशि वसूली।

इंदौर के अस्पताल में वर्ष 2010 में ही 44 बालक-बालिकाओं पर सर्वाइकल कैंसर और गुप्तांग कैंसर के लिए वी-503 टीका का परीक्षण किया गया। गुप्तरूप से किए जा रहे इन परीक्षणों का खुलासा एक स्वयंसेवी संस्था के साथ मिलकर इसी अस्पताल के चिकित्सक डा. आनंद राय ने किया तो एक जांच समिति गठित कर मामले को दबाने की कोशिश की गर्इ। इस समिति ने लाचारी जताते हुए अपनी रिपोर्ट में कहा कि दुनिया में ऐसा कोर्इ कानून नहीं है कि जिसके जरिए दवाओं के ऐसे परीक्षणों पर रोक लगार्इ जा सके। इस आधार पर न तो समिति के सुझावों को अमल में लाया जा सका और न ही परीक्षण के लिए दोषी आधा दर्जन चिकित्सकों के विरूद्ध कोर्इ कार्रवाही की जा सकी। यहां इस सवाल को गौण कर दिया गया कि चिकित्सकों ने दवा कंपनियों से मोटी रकम तो निजी लाभ के लिए ली, लेकिन संसाधन सरकारी अस्पताल के उपयोग में लिए ? क्या अस्पताल के साथ यह धोखाधड़ी नहीं हैं ?

जिन जानलेवा बीमारियों पर इंदौर में दवाओं का परीक्षण किया गया, वे बीमारियां मध्यप्रदेश में तो क्या भारत में ही कम होती हैं। चरित्रहीनता के चलते ये बीमारियां योरोपीय देशों के गोरों में ज्यादा होती हैं। वहां का जलवायु भी इन बीमारियों की मानव शरीर में उत्पत्ति का एक कारण माना जाता है। इसलिए ये प्रयोग अनैतिकता की ऐसी विडंबना हैं कि हम विदेशियों के लिए अपने लोगों की जान लेने में कोर्इ रहम नहीं बरतने की गुंजार्इश छोड़ते हैं। यदि ये परीक्षण टीबी, चिकुनगुनिया, कुपोषण, फेल्सीफेरम और मलेरिया जैसे रोगों पर उपचार की कारगर दवा इजाद करने के लिए किए जाते तो किसी हद तक गुप्त रूप से किए जाने के बावजूद इनके औचित्य को जायज ठहराया जा सकता था। क्योंकि इन्हीं बीमारियों की गिरफ्त में सबसे ज्यादा भारतीय आते हैं और समय पर इलाज नहीं होने के कारण मरते भी बड़ी संख्या में हैं।

वैसे ऐसा नहीं है कि इस बाबत कोर्इ नीयम-कायदे वजूद में ही न हों। यदि इजाजत लेकर दवा परीक्षण किए जाते हैं तो नामित विशेषज्ञ चिकित्सकों की समिति की संस्तुति और स्वास्थ्य विभाग की अनुमति जरूरी होती है। अस्पताल के मुखिया और जिन रोगियों पर निर्माणाधीन दवा का प्रयोग किया जा रहा है, पूरी पारदर्शिता बरतते हुए उन्हें भी विश्वास में लिया जाता है। एक सहमति-पत्र पर रोगी के अविभावक के हस्ताक्षर कराकर अनुमति लेना भी ड्रग ट्रायल की अनिवार्य शर्त है। ये परीक्षण सिलसिलेवार तीन अथवा चार चरणों में चलते हैं और प्रयोगशील अवस्था होने के कारण मरीज के शरीर पर इसके दुष्प्रभाव का संदेह बना ही रहता है। कर्इ मर्तबा दवा जानलेवा भी साबित होती है। इसी कारण दवाओं का पहले प्रयोग गिनीपिग, खरगोश और चूहों पर किया जाता है। लेकिन इस मामले में तो सीधे-सीधे इंसानों को ही गिनीपिग और चूहों की तरह इस्तेमाल किया गया। लिहाजा प्रयोग की प्रक्रिया के दौरान मरीजों को नर्सों की देखरेख में रहना चाहिए था, जबकि भोपाल-इंदौर में ऐसा नहीं हुआ। क्योंकि नर्सों तक बात पहुंचने पर जल्दी गोपनीयता भंग होने की आशंका प्रयोग में लगे चिकित्सा दल को थी।

अपने बाल-बच्चों को जान-बूझकर प्रयोग के खतरों से गुजारना कोर्इ भी माता-पिता नहीं चाहते। इसलिए वे अपनी संतान पर आसानी से किसी भी प्रकार के परीक्षण के लिए रजामंद भी नहीं होते। नतीजतन दवा निर्माता कंपनियां दवा परीक्षण के सिलसिले में अकसर मोटी रकम देकर बिचौलियों का हाथ थामती हैं। ये बिचौलिए अस्पतालों और चिकित्सा महाविधालयों के चिकित्सकों को पटाकर गोपनीय तरकीबों से अस्पतालों में सामान्य तौर पर इलाज के लिए आए मरीजों को शिकार के रूप में इस्तेमाल कर परीक्षण शुरू कर देते हैं। इंदौर और भोपाल के अस्पतालों में ऐसी ही तरकीबें अपनाकर दवाओं की आजमार्इश शुरू की गर्इ।

यह कितनी हैरतअंगेज बात है कि जो चिकित्सक नैतिक संकल्प और संबल के साथ उपचार के पेशे में आते हैं, वही बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों के प्रलोभन में आकर बाल-गोपालों की सेहत से खिलवाड़ करने लग जाते हैं। भारत में और दूसरे देशों में भी भारतीय लोगों को गिनीपिग की तर्ज पर इस्तेमाल करना आसान सा हो गया है। यह आसानी इसलिए भी है क्यूँकि यहां हर प्रकृति के रोगी मिल जाते हैं। वैसे भी भारत के अस्पतालों में आपरेशन के बहाने मानव शरीर से गुर्दे गायब कर देना आमफहम हो गया है। मनुष्यों को पशुओं तक की दवाएं खिला देने में चिकित्सक कोर्इ संकोच नहीं बरतते।

कुछ साल पहले इसी तरह का एक प्रयोग इंग्लैण्ड में रह रहीं 21 पंजाबी भाषी महिलाओं पर किए जाने का मामला सामने आया था। इन महिलओं पर वहां के जीव वैज्ञानिकों द्वारा रेडियोधर्मी लौह लवणों का प्रयोग लगातार 20 सालों तक जारी रखा गया। बाद में बीबीसी चैनल-4 पर दिखार्इ गर्इ फिल्म ”डेडली एक्सपेरीमेण्ट में किए गए पर्दाफाश से साफ हुआ कि ये महिलाएं 20-25 साल पहले एनीमिया (रक्त अल्पता) की शिकायत लेकर इंग्लैण्ड के एक अस्पताल में उपचार के लिए गर्इं थीं। यहां के चिमित्सकों ने अंदाज लगाया कि परंपरागत भारतीय भोजन के कारण इन महिलाओं के खून में लौह-तत्व की कमी है। इस निष्कर्ष पर पहुंचते ही इन चिकित्सकों ने इन महिलाओं पर गिनीपिग की तर्ज पर प्रयोग शुरू कर दिए। महिलाओं के शरीर में लौह-तत्व ढूंढ़ने के लिए उपचार के बहाने रोटियों में रेडियोधर्मी यौगिक मिलाकर उन्हें रोटियां खिलाना शुरू कर दीं। नतीजतन रेडियोधर्मी इस जहर से महिलाएं मुख्य बीमारी से ज्यादा प्रयोग के चलते प्राण गवां देने की सिथति में आ गर्इं। बीबीसी ने जब रहस्य से पर्दा उठाया तब यह भी पता चला कि महिलाओं का इलाज कर रहा अस्पताल, दरअसल अस्पताल न होकर एक ‘परमाणु शोध संस्थान है। जिसमें वहां की मेडीकल रिसर्च काउंसिल ये जानलेवा प्रयोग कर रही थी। इस प्रयोग का शर्मनाक पहलू यह था कि ये परीक्षण एक भारतीय चिकित्सक की मदद से किए जा रहे थे। लिहाजा ड्रग ट्रायल, चिकित्सीय उपकरणों और उत्पादों के संबंध में एक कठोर कानून बनाने की जरूरत है, जिससे दवा कंपनियां और चिकित्सक लोभ के लालच में वंचितों व लाचारों की जिंदगी से खिलवाड़ करने से बाज आएं।

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