लेखक परिचय

मृत्युंजय दीक्षित

मृत्युंजय दीक्षित

स्वतंत्र लेखक व् टिप्पणीकार लखनऊ,उप्र

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aryabhat21 मार्च पर विशेष:-

मृत्युंजय दीक्षित

भारत के महान खगोलशास्त्री आर्यभट्ट ने खगोलशास्त्र के क्षेत्र में भारत का लोहा दुनिया को मनवाने वाले प्रथम वैज्ञानिक थे। उन्होनें अपने एक ग्रंथ में कलियुग के 3600 वर्ष बाद की मध्यम मेष संक्रान्ति को अपनी आयु 23 बतायी है। इस आधार पर  विद्धान आर्यभटट की जन्मतिथि 21 मार्च 476 ई को मानते हैं। उनके जन्मस्थान को लेकर भी विद्वानों में गंभीर मतभेद हैं। उन्होनें स्वयं अपना जन्मस्थान कुसुमपुर बताया है। कुसुमपुर का अर्थ है फूलों का शहर । विद्वानांे का मत हैकि यह आज का पटना है।

973 ईसा में भारत आये पर्शिया के विद्वान अलबेरूनी ने भी अपने यात्रा वर्णन में कुसुमपुर के आर्यभटट की चर्चा अनेक स्थानों पर की है। कुछ विद्वानंांे का मत है कि उने पंचांगों का प्रचलन दक्षिण भारत में अधिक है। इसलिए कुसुमपर कोई दक्षिण भारतीय नगर होगा। कुछ लोग इसे विन्ध्य पर्वत के दक्षिण में बहने वाली नर्मदा और गोदावरी के बीच का कोई स्थान बताते हैं। कुछ विद्वान आर्यभट्ट को केरल निवासी मानते हैं।

यद्यपि आर्यभटट गणित, खगोल या ज्योतिष के क्षेत्र में  पहले भारतीय व वैज्ञानिक नहीं थे पर उनके समय तक पुरानी अधिकांश गणनाएं एवं मान्यताएं विफल हो चुकी थीं। पैतामह सिद्धान्त, सौर सिद्धांत, वसिष्ठ सिद्धांत, रोमक सिद्धांत और पौलिष सिद्धांत यह पुराने पड़ चुके थे। इनके आधार पर बतायी गयी ग्रहों की स्थित तथा ग्रहण के समय आदि की प्रत्यक्ष स्थिति में काफी अंतर मिलता था। इस कारण भारतीय ज्योतिष पर से लोगों का विश्वास उठ गया। ऐसे में लोग इन्हें अवैज्ञानिक एवं अपूर्ण मानकर विदेशी एवं विधर्मी पंचांगों की ओर झुकने लगे थे।

तब आर्यभटट ने खगोलशास्त्र का गहन अध्ययन प्रारम्भ किया और उसके बाद उन्होनें आर्यभट्टीयम नामक ग्रंथ का लेखक किया लिसमें उनकी महतवपूर्ण खेाज एवं शोध की  जानकारी मिलती है। इसमें कुल 121 श्लोक हंै। जिन्हें गीतिकापद,गणितपाद,कालक्रियापद और गोलापाद नामक चार भागों में बांटा है। वृत्त की परिधि और उसके व्यास के संबंध को ”पाई“ कहते हैं। आर्यभटट द्वारा बताये गये इसके मान को ही आज भी गणित में प्रयोग किया जाता है । इसके अतिरिक्त पृथ्वी, चंद्रमा और  आदि ग्रहों के प्रकाश का रहस्य, छाया का मापन, कालगणना, बीजगणित, त्रिकोणमिति, व्यस्तविधि, मूल ब्याज सूर्योदय व सूर्योस्त के बारे में भी उन्होनंे निश्चित सिद्धांत बताये।

आर्यभटट ने सूर्य और चंद्र ग्रहण के वैज्ञानिक कारणों या आधार का वर्णन् करते हुए लिखा है कि सूर्य या चंद्र का ग्रहण राहु द्वारा उन्हें ग्रसित करने के कारण नहीं होता अपितु सूर्य अथवा चंद्रमा की आड़ में पृथ्वी अथवा चंद्र की छाया आ जाने से होता है। उनके  आर्यभटटीयम नामक  ग्रंथ में सूर्य और तारों के स्थिर होने तथा तथा पृथ्वी के परिभ्रमण के कारण दिन और रात होने का वर्णन है।

आर्यभट्ट की सर्वाधिक महत्वपूर्ण देन तो ग्रहों की गतियों के निर्धारण की उनकी अभिनव एवं अनुपमेय प्रणाली हैं। उन्होनें ही ज्योतिष के सिद्धांत ग्रंथ में अंकगणित, बीजगणित और रेखागणित तीनों का समावेश करके कालमान के धु्रुवांक निश्चित किये थे। उन्होनें ही सर्वप्रथम 1,2,3 अंकों के लिये क, ख, ग आदि वर्णो का निर्धारण किया था।

आर्यभट्ट ने ही इकाई, दहाई, सैकड़ा, हजार ,दस हजार, लाख, दस लाख, करोड़,  दस करोड़, अरब, दस अरब, खरब, दस खरब, नील, दस नील, शंख, दस शंख अथवा महाशंख तक की 19 अंकों की संख्यााओं को एक -एक वर्ण में समेट दिया था। गणना का यह क्रम हिंदी वर्णमाला के ”क“ वर्ग से लेकर “ह” वर्ण तक चलता है। गणना की यह पद्धति अत्यंत विलक्षण और पूर्ण  रूप से शुद्ध है।  उनकी इस अद्वितीय प्रतिभा के कारण पश्चिमी जगत के समीक्षकों ने उन्हें ”भारत का न्यूटन“ कहा है।

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