लेखक परिचय

प्रणय विक्रम सिंह

प्रणय विक्रम सिंह

लेखक श्रमजीवी पत्रकार है. सामाजिक राजनैतिक, और जनसरोकार के विषयों पर लेखन कार्य पिछले कई वर्षो से चल रहा है.

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प्रणय विक्रम सिंह

असम सांप्रदायिकता की आग में दहक रहा है। एक बार फिर मजहब की बुनियाद पर समाज तक्सीम करने की कोशिशें की जा रही है। कुदरत के तोहफों से लबालब हरी-भरी असम की वादियों में मौत का सन्नाटा पसरा हुआ है। दो सौ से ज्यादा राहत शिविर और 4.50 लाख से ज्यादा शरणार्थी। यह सरकारी आंकड़ा जातीय सांप्रदायिक हिंसा की भयावहता को साबित करता है। चारों तरफ चीखती आवाजें, जलते आशियाने, लाशों में बदलते जिंदा जिस्म, लुटती अस्मतें, बेघर होते लोग, बच्चों की डबडबार्इ आंखें और उनमें तैरता यतीम होने का दर्द, हमेशा लोक रंगों में चहकते असम की पहचान बन गए है। प्रभावित इलाकों से मीडिया में आ रही तस्वीरें और रिपोटेर्ं इंसानियत को शर्मसार करने वाली है। दिल को दहला देती है ये बेजुबान तस्वीरें। मीडिया की रिपोटोर्ं के अनुसार उपद्रवियों ने गोलाबारी करते हुए मवेशियों तक की हत्या कर दी।

घटनास्थल की तस्वीरों में गांव शमशान भूमि के रूप में बयान हो रहा था। चारों तरफ जले हुए घर दिखार्इ दे रहे थे। भूख और प्यास के मारे लोग अपने घर पर सुरक्षित स्थानों पर पलायन कर रहे थे। इन शरणार्थी शिविरों में लगभग ९० लोगों के शरीर बे-रूह हो गये तो लगभग 4.50 लाख लोग शरणार्थी शिविरों में अपनी बाकी का जीवन गुजारने को मजबूर है। वह शरणार्थी शिविर जहां का हाल भी पीडि़तों के भाग्य की भांति अभागा है। विधुत का अभाव, दवाइयों की कमी, कपड़ों की तंगी तो है ही साथ में भोजन और साफ पानी भी उपलब्धता भी स्वप्न सरीखी है। असम से निकली सांप्रदायिक दंगों की आग ने देश के अन्य हिस्सों को भी अपने चपेट में ले लिया है। दक्षिण भारत के कुछ शहरों को साथ पुणे, मुंबर्इ, लखनऊ, कानपुर और इलाहाबाद में उन्माद की आहटों को महसूस किया गया। हजारों की संख्या में पूर्वोत्तर के नागरिक सुरक्षित ठिकानों की ओर पलायन कर रहे हैं। सोशल नेटवर्किंग साइटस के माध्यम से खौफ, और अपवाह भी फैलाया जा रहा है। पर सरकार बेबस बनकर देखने को मजबूर है। यह तो निशिचत है कि असम हिंसा की जडें गहरी है। यह तत्काल उन्माद की परिणति नहीं है। यदि कारणों की निरपेक्ष व तटस्थ विवेचना की जाए तो असिमता का संघर्ष ही प्रमुख कारण के रूप में सामने आता है। असिमता का संघर्ष दशकों से असम की वादियों को लाल करता आ रहा है। असिमता को बचाने का यह खूनी खेल बोडों और बंगाली मुसिलमों के मध्य आजादी के पहले से ही चल रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकारों ने उसके स्थायी समाधान हेतु कोर्इ परिणामदायक कोशिश नही की।

दीगर है असम की जनसंख्या में 5 प्रतिशत बोडो और 33 प्रतिशत मुसिलम आबादी है। दोनों बर्गों के बीच नफरत के कारण गुजरे 60 वर्षों में कम से कम चार बार जातीय सांप्रदायिक हिंसा के कारण सभ्यता लहूलुहान हुर्इ है। गौरतलब है कि बोडों समुदाय के लोग बीते ६’ दशकों से अपने लिए अलग राज्य की मांग कर रहे हैं। उनकी इस मांग के कारण अन्य समुदाय के लोगों को अपनी जमीन खोने का डर है जिसके कारण जरा सी बात बड़ी हिंसा में बदल जाती है। चूंकि असम का अधिकतर हिस्सा मुसिलम बांग्लाभाषी हैं और पड़ोसी बांग्लादेश से सटी सीमा पर सुरक्षाबलों की कमी घुसपैठ को बहुत आसान बना देती है।

आज स्थिति यह है कि उ.प्र. के अनेक जिलों में बांग्लादेशी घुसपैठियें बड़ी संख्या में दिखार्इ पड़ते हैं। असम में तो यह राजनैतिक रूप से अत्यंत सबल हो गये है। इनके संख्याबल में लगभग ४०विधानसभा सीटों के परिणामों को प्रभावित करने क्षमता है। ऐसा नहीं कि असम का हर मुसिलम घुसपैठिया है। किंतु दंगे की आग में देश को झोंकने वाला समुदाय बांग्लादेशी घुसपैठियों का बड़ा हाथ है। वर्ष २००१की जनसंख्या के अनुसार देश में लगभग † करोड़ बंग्लादेशी मौजूद थे। इण्टेलीजेंस की रिपोर्ट के अनुसार ४लाख से अधिक बांग्लादेशी असम में रह रहे हैं।

असम के इन जिलों में से आठ में तो बांग्लादेशी मुसलमान बहुसंख्यक हैं। जाहिर है इन घुसपैठियों के कारण असम व अन्य राज्यों का सामाजिक व आर्थिक ढ़ांचा बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। हालात तो यहां तक बिगड़ गए हैं कि असम में यह बकायदा राशनकार्डों का उपयोग कर रहे हैं। समस्त सरकारी सुविधाओं का लाभ प्राप्त करते हैं। मतदाता पहचान पत्र का उपयोग कर भारतीय नागरिक चुनावों में मतदान करते हैं। सवाल यह उठता है कि राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र जैसी बुनियादी सुविधाओं से जहां आम भारतीय नागरिक वंचित है, वहां इन बांग्लादेशियों को यह सुविधाएं कैसे और कौन मुहैया करा रहा है? दरअसल यह राजनीति का वह घिनौना चेहरा है जो अपनी स्वार्थ सिदिघ के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा को भी दांव पर लगाने से नहीं हिचकता हैं। तमाम सुविधाओं को मुहैया कराने के बदले कुछ सियासी तंजीमों ने उनके संख्याबल का मतों के रूप में उपयोग कर स्वयं तो राजनैतिक रूप से शä प्रिप्त की है किंतु उसकी कीमत पर सामाजिक ताने-बाने को बिखेर दिया है। जिसके टूटे धागों से अब भार्इचारे की सरस धुन नहीं निकलती है। सुप्रीम कोर्ट ने बांग्लादेशी घुसपैठियों को बाहर निकालने के सख्त निर्देश राज्य सरकारों को दिये हैं किंतु सरकारें अभी भी आंख बंद किये हैं।

ऐसा नहीं है कि दंगे की यही एक मात्र वजह है। मौजूदा हालात के पीछे अनेक कारण है। दरअसल अभावग्रस्तता का बोध और मांगों के अनसुना होने का अहसास काफी गहरा है। बांग्लादेशी होने के आरोप का दंश झेल रहा असमी मुसिलम भी प्रतिक्रिया स्वरूप हिंसा में शामिल होने लगा है। दोनो समुदायों के बीच सदियों से कायम आपसी विश्वास की पतली लकीर अब अपना वजूद खो चुकी है। अविश्वास की बढ़ती खार्इ को अलगाववादी ताकते मौके की तरह इस्तेमाल करती है और समाज के दंगों की आग में झोंक देती है। असम की हिंसा सरकार की लापरवाही का ही परिणाम है।

असम की सीमा से दूर माया नगरी में अचानक असम और म्यांमार में मुसिलमों पर हुए हमलों और जुल्म के विरूदघ स्थानीय मुसलमानों का हिंसक हो जाना नये खतरों की ओर संकेत कर रहा है। पुलिस मुख्यालय के समीप कुछ देर में ही लगभग पचास हजार मुसिलमों का एकत्रित हो कर तोड़-फोड़ और आगजनी करना, शहीदों को समर्पित अमर ज्योति को तोडना, देश को खौफ और आतंक के वातावरण में ढकेलने की साजिश और प्रशासन और खूफिया तंत्र की बड़ी नाकामी है। दीगर है कि असम के दंगों के लिए तो बांग्लादेशी घुसपैठिये काफी हद तक जिम्मेदार हो सकते हों किंतु मुंबर्इ, बेंगलुरू, लखनऊ आदि में हुर्इ हिंसा किन कारणों का प्रतिबिंबन कर रही है।

किसी भी हिंसा के बाद प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है किंतु उस प्रतिक्रिया में एक ही वर्ग का आक्रोशित होकर खास क्षेत्र के लोगों को चिनिहत करना कुछ और संकेत देता है। मुंबर्इ और लखनऊ की सडकों पर आम आवाम के साथ हिंसा, लूट और आगजनी, पुणे और दक्षिण भारत के शहरों से हजारों की संख्या में पूर्वोत्तर के नागरिकों का पलायन, राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा की स्थिति की पोल खोल रहा है। पूर्वोत्तर के लोगों को धमकी भरे एसएमएस मिल रहे हैं। इससे लोगों का पलायन हो रहा है। अकेले बेंगलुरू से ही पूर्वोत्तर के लगभग 6800 लोग तीन विशेष ट्रेनों से अपने घर को रवाना हुए। पलायन का दौर अब भी जारी है। प्रारंभ में कर्नाटक के गृहमंत्री ने खुद स्टेशन पहुंचकर लोगों को समझाया किंतु वापस जाना ही लोगो को सुरक्षित विकल्प लगा। यह विचारणीय है कि भयभीत करने वाले तत्व इतने बड़े पैमाने पर कैसे सफल हो गए कि पलायन करने वाले पूर्वोत्तर के छात्रो और नागरिकों के लिए सरकार को नयी रेलगाडियों की व्यवस्था करनी पड़ गयी। सरकार की नाकामी का इससे बड़ा सुबूत और क्या हो सकता है कि राज्यों और केंद्र सरकार को मोबाइल और इंटरनेट के जरिये फैलार्इ जा रही हिंसा पर रोक लगाने का उपाय नहीं सूझ रहा है। सरकार के पास टीवी चौनल, रेडियो, जैसे अनेक संसाधन है, जिनका सक्रिय उपयोग कर वह इस विघटनकारी कृत्य को असफल कर सकती थी। देश के अंदर कोर्इ भी नागरिक कही भी निर्भयतापूर्वक रह सकता है। आने-जाने की आजादी नागरिको को एक सूत्र में बांधती है, उनके अंदर राष्ट्रीय बोध की भावना को दृढ़ता प्रदान करती है किन्तु जिस तरह हाल के वर्षो में देश के अंदर आंचलिक दुराग्रह ने पैर पसारने शुरू कर दिए है उससे भारत का राष्ट्रीय चरित्र धूमिल होने लगा है। जिस तरह श्रंखलाबद्ध तरीके से पुणे और मुंबर्इ में पूर्वोत्तर के छात्रों पर हमले हो रहे थे उससे प्रशासन को सतर्क हो जाना चाहिए था। हमला करने वाले अराजक तत्वों का पकड़े न जाने से पूर्वोतर के छात्रों में भय व अविश्वास की भावना है जबकि अराजक तत्वों के हौसले बुलंद है।

अब असम में दंगों के दौर को रोकने के स्थार्इ समाधान की ओर बढना ही होना। उसके लिए सबसे पहले ऐसे लोगों और गुटों को हथियार विहीन किया जाना चाहिए, जो गैर कानूनी तरीके से हथियार रखे हुए हैं और साथ ही उनके तथा उनके संरक्षकों के खिलाफ मौजूदा कानूनों के तहत कार्रवार्इ की जानी चाहिए।

काफी समय से सरकारें रणनीतिक तौर पर या फिर किन्हीं अन्य वजहों से इन हथियारबंद गुटों की तरफदारी करती रही हैं। दूसरी कोशिश यह होनी चाहिए कि अपने घरों से दर बदर हुए लोगों की सुरक्षित वापसी सुनिशिचत की जाए। उनका तेजी से पुनर्वास किया जाए और उन्हें पूरी स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करार्इ जाएं। हिंसा और अराजकता के माहौल में देश की गंगा-जमुनी तहजीब कहीं गुम सी हो गयी है। उसको जीवित किये बगैर यह हिंसा का दौर स्थायी रूप से समाप्त नहीं होगा। हमें समझना होगा कि इस समस्या का हल राजनीतिक नहीं सामाजिक है। अब देश की हर तंजीम के दरम्यान भरोसे की बहाली सबसे बड़ी जरूरत है।

हालांकि यह मुशिकल काम है। जाहिर है यह काम आहिस्ता-आहिस्ता, गांव दर गांव ही होगा। इसके लिए बातचीत और धैर्य की धीमी प्रक्रिया से गुजरना होगा। त्वरित समाधान स्थायी नहीं होते। युवा नेताओं, नागर समाज संगठनों, धर्म गुरूओं की साझी कोशिशों से टूटे भार्इचारे को पुन: कायम होने में बड़ी सफलता मिलेगी। एक समय आयेगा कि समाज हिंसा की लपटों से दूर होगा। क्या यह हो पाएगा? सवाल मुशिकल है पर उत्तर आवश्यक है। खैर, सुंदर भारत, सुरक्षित भारत, सम्पन्न भारत की चाह को पूरा करने के लिये इस चुनौती को तो स्वीकार करना ही पड़ेगा।

 

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