लेखक परिचय

राजीव पाठक

राजीव पाठक

वर्तमान में पत्रकारिता में शोध छात्र हैं।

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 राजीव पाठक

असम के कोकराझार में दो सम्प्रदायों के बीच भीषण हिंसा का दौर सप्ताह भर जारी रहा | सरकार ने लगभग चालीस लोगों के मरने तथा चार लाख लोगों के बेघर होने की आशंका व्यक्त की | क्यों कि हमारे देश के प्रधानमंत्री असम से ही संसद के उपरी सदन राज्यसभा का प्रतिनिधित्व करते हैं अतः दंगा पीड़ित जिले का प्रधानमंत्री जी ने दौरा किया | कुछ लोगो से मिले और दंगा पीड़ितों को तीन सौ करोड़ रूपए की सहायता राशी देने की घोषणा भी की | “कोकराझार का घटना देश के माथे पर कलंक है” यह शिष्टाचार के कुछ शब्द भी प्रधानमंत्री जी ने मिडिया से मुखातिब होते हुए कहा | देश के गृह सचिव और असम पुलिस के अधिकारी ने भी स्थिति नियंत्रण में बताया | नैशनल मिडिया के गिने हुए चैनल और अख़बार के रिपोर्टर ही घटना स्थल तक पहुंचे बाँकी सब अपने न्यूज रूम से ही विशेषज्ञों की राय लेते रहे | सेना ने स्थिति को नियंत्रित किया | अभी सबकुछ शांत है | लेकिन कोकराझार में यह पहली बार नहीं है जब इन दो सम्प्रदायों के बीच दंगा भड़का हो | निचले असम के कुछ जिले, कोकराझार, धुबड़ी, बक्सा, और चिरांग ये बोडो जनजाति बहुल है | १९९३-९४ में बोडो टैरोटरी काउन्सिल (बी.टी.सी) का गठन असम से अलग एक राज्य की मांग बोडोलैंड को लेकर हुआ | बी.टी.सी का गठन आसू और अल्फ़ा के आन्दोलन का ही परिणाम था | प्रारंभ में बी.टी.सी ने भी हिंसक रुख अपनाया परन्तु बाद में सरकार के साथ हुए एक समझौते के तहत बोडो बहुल जिलों में बी.टी.सी को एक स्वायत्त संस्था के रूप में मान्यता दे दिया गया | इस निर्णय के बाद बी.टी.सी के साथ सरकार का गतिरोध ख़त्म सा हो गया | लेकिन वर्षों का एक जख्म बार-बार पनपता है उसी का परिणाम है यह वर्तमान दंगा | वास्तव में असम के कोकराझार दंगे का असलियत साठ साल से जिन्दा दफ़न है | स्वतंत्रता के बाद कोकराझार में पहली बार जब १९५२ में दो सम्प्रदायों के बीच दंगा हुआ तो इसे पूरे देश के तात्कालिक परिस्थितियों के समतुल्य माना गया, जबकि दंगाई पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान में बंगलादेश) से सम्बद्ध थे | समय बीतता गया और समस्या गहराती गई | १९९३ के दंगे में ५०, १९९४ में १००, १९९६ में २०० और २००८ में ८० लोगों की जाने गई | फिर जुलाई २०१२ का दंगा भी इसी कड़ी में जुड़ गया है | लेकिन मूल समस्या को सरकार अनदेखा करती रही | पिछले तीन दशकों में असम के अन्य जिलों से कहीं ज्यादा निचले असम में बंगलादेशी घुसपैठ हुआ | पिछले दो दशक में इन जिलों में एक ही संप्रदाय के लोगों के जनसँख्या में चालीस प्रतिशत तक वृद्धि हो गई | जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण २०११ के असम विधान सभा चुनाव में दिखा है | अब इन जिलों में न तो कांग्रेस है, न भाजपा और न ही असम गन परिषद | अब यह क्षेत्र All India United Democratic Front जिसे AIUDF या सर्व भारतीय संयुक्त गणतांत्रिक मोर्चा के नाम से जानते हैं इसी का राजनितिक इकाई असम में AUDF असम यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के नाम से सक्रिय एक पार्टी के नियंत्रण में है | असम विधान सभा चुनाव में AUDF दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है | साथ ही केंद्र के यू.पी.ए सरकार में भी यह सहयोगी दल है | ज्ञात हो कि AUDF असम के सम्बन्ध में नागरिकता सम्बंधित सरकार के फैसले से अलग मत रखती है | पिछले साल इन्ही क्षेत्रों में जनगणना का विरोध हुआ | पाकिस्तान का झंडा को गर्व से फहराने वाले लोग भी यहीं निवास करते हैं | आधार कार्ड का काम असम में रोकना पड़ा क्यों कि पहले ही दिन जो लोग आवेदक थे उसमें अस्सी प्रतिसत संख्या एक ही संप्रदाय के लोगों की थी, और असम में रहने का कोई सबूत भी उनके पास नहीं था | कोकराझार ही नहीं असम के अन्य जिलों में भी हिन्दू-मुस्लिम सद्भाव हमेशा से रहा है | असम के बहुतेरे मुस्लिम का उपाधि नाम वही है जो हिन्दुओं का या किसी जनजाति का है | हजारिका,शैकिया, और डेका जैसे सर नेम हिन्दू-मुस्लिम दोनों में मिलता है | लेकिन समस्या जिन लोगों के कारण उत्पन्न हुआ है उन्हें न तो असमिया या बोडो भाषा बोलने आती है, न ही उनका असम में रहने वाले अन्य मुसलमानों जैसा उपनाम, कला संस्कृति, खान-पान है | ये बंगलादेश के सीमा से भारत में घुसपैठ किये हुए लोग हैं | जिनमें से कुछ रोजगार और जीवन यापन के तलाश में भारत आये और अन्य उग्रवादियों के इशारे पर पूर्वोत्तर को भारत से अलग करने के संकल्प के साथ आये हुए खूंखार आतंकवादी है | स्वयं केंद्र सरकार के रिपोर्ट से हजारों बांग्लादेशियों के प्रति वर्ष भारत के सीमा में घुसपैठ का खुलासा होता है | लेकिन असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने कोकराझार के हालिया घटना के बाद पत्रकारों से बात-चीत में कहा कि असम में एक भी बंगलादेशी नहीं है | केंद्र और राज्य सरकार के आकड़े भी असम में बंगलादेशी घुसपैठ के मुद्दे पर अलग-अलग तस्वीर दिखाता है | वास्तव में यह लाचारी है | वोट बैंक की

लाचारी | सरकार में बने रहने की लाचारी | इसी लाचारी ने असम के कई अन्य जिलों का भी बुरा हल बना दिया है | कोकराझार जैसी घटना असम में कई और जिलों में भी हो सकता है, क्यों कि स्थानीय लोग अब ऊब चुके हैं | विश्व के सबसे बड़े नदी द्वीप और श्रीमंत शंकरदेव के अनुयाइयों की साधना स्थली माजुली (उपरी असम ) के सैकड़ों एकड़ जमीन पर भी बंगलादेशी घुसपैठियों का ही कब्ज़ा हो चुका है | असम के निश्छल और भोले-भाले लोग कश्मीरी पंडितों जैसा जीवन जीने पर मजबूर न हों इसका कोई हल सरकार के पास नहीं है | कोकराझार के वर्तमान घटना से पहले ही बी.टी.सी. प्रमुख हंग्रमा मोहिलारी ने असम सरकार को इस समस्या से कई बार अवगत कराया कि स्थानीय जमीन पर अनजान लोगों का कब्ज़ा बढ़ता जा रहा है, साथ ही यह क्षेत्र भी असुरक्षित होता जा रहा है | सरकार सोती रही | आम जनता का आक्रोश जब सामने आया तब सरकार की नींद खुली है | राज्य सरकार इस सांप्रदायिक संवेदनशील क्षेत्र के बारे में शुरू से जानती थी फिर क्यों चुप रही ? यह एक बड़ा सवाल है | सेना का कार्य निश्चय ही सराहनीय है, जिसने इस आग को फैलने से रोका | लेकिन AUDF के नेता और सांसद बदरुद्दीन अजमल खुलेआम मिडिया को बताते रहे कि यह मुसलमानों के ऊपर अत्याचार है | प्रधानमंत्री को अपने सहयोगी अजमल की बात माननी पड़ी और तीन सौ करोड़ से ज्यादा रकम हालत सुधारने और पुनर्वास के नाम पर दिया गया है | अब निश्चय ही उन घुसपैठियों को पक्का मकान और स्थाई नागरिकता उपहार स्वरुप प्राप्त हो जायेगा जो असम और पूर्वोत्तर को योजना पूर्वक भारत से अलग करने में लगे हुए हैं | लेकिन असलियत फिर भी जिन्दा दफ़न हो जायेगा | इस समस्या का निदान तलाशना होगा, नहीं तो देश का भूगोल पुनः बदल दिया जायेगा | भारत का एक और टुकड़ा हो जायेगा | और हम “कश्मीर हो या गुवाहाटी अपना देश अपनी माटी” का नारा लगाते रह जायेंगे |

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1 Comment on "असम के कोकराझार दंगे का असलियत साठ साल से जिन्दा दफ़न है !"

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Anil Gupta
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सही विश्लेषण किया आपने. असल में पचास और साठके दशक के शुरूआती वर्षों में पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बंगलादेश) से योजनाबद्ध रूप से आसाम में मुस्लिम घुसपेठ जरी थी. जब आई बी ने इसकी जानकारी तत्कालीन प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु को दी तो घुसपेंठ को संरक्षण देने वाले कांग्रेस के मुख्यमंत्री बिमल प्रसाद चालिहा,मोयिनुल हक़ चौधरी, फखरुद्दीन अली अहमद को वहां से हटाकर केंद्र में ले आये. लेकिन घुसपेंठ रोकने का कोई प्रयास नहीं किया. सत्तर के दशक के आखिरी वर्षों में आल आसाम स्टुडेंट यूनियन ने इस मुद्दे पर संघर्ष छेड़ दिया और इतिहास रचा. प्रफुल्ल कुमार मोहंती… Read more »
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